शाहीन बाग़ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से किस ओर बढ़ रहा

  • चिंकी सिन्हा
  • बीबीसी संवाददाता
शाहीन बाग़

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सुप्रीम कोर्ट में 17 फ़रवरी 2020 को होने वाली सुनवाई से पहले एक व्हाट्सऐप ग्रुप पर पूरी रात चर्चा चलती रही थी.

तड़के क़रीब तीन बजे शाहीन बाग़ के आधिकारिक हैंडल से एक चिट्ठी जारी की गई. इस चिट्ठी में शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों ने ये उम्मीद जताई थी कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, भारत की केंद्रीय सरकार, दिल्ली की सरकार और पुलिस प्रशासन पर्याप्त निष्पक्षता से अदालत के सामने शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों का भी पक्ष रखेंगे.

इस चिट्ठी में ये तर्क भी दिया गया था कि ये प्रदर्शन नागरिकों का बुनियादी अधिकार है. शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों का ये ख़त सोशल मीडिया पर जारी किया गया था.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान, बातचीत के लिए जिन दो मध्यस्थों को नियुक्त किया, उस समय इस चिट्ठी का भी अदालत ने ज़िक्र किया था. सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वक़ील संजय हेगड़े और मध्यस्थता की विशेषज्ञ साधना रामचंद्र को प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया है.

संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन, शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों से बात कर के उन्हें इस बात के लिए मनाने की कोशिश करेंगे कि वो अपना धरना किसी और जगह स्थानांतरित कर लें, ताकि इसकी वजह से ट्रैफ़िक प्रभावित न हो.

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अभी जिस जगह धरना चल रहा है, वहां सड़क बंद होने और ट्रैफिक डायवर्ज़न की वजह से लोगों को काफ़ी परेशानी हो रही है. मध्यस्थता के इस काम में पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह, संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन की मदद करेंगे.

सोमवार को शाहीन बाग़ के धरने का 65वां दिन था. नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 के ख़िलाफ़ ये धरना कालिंदी कुंज के शाहीन बाग़ मुहल्ले की सड़क 13ए जीडी बिड़ला मार्ग पर चल रहा है. ये जगह, यमुना नदी के किनारे, ओखला की दक्षिणी-पश्चिमी सीमा पर स्थित है.

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि, 'विरोध का अधिकार बुनियादी संवैधानिक हक़ है. प्रदर्शनकारियों के लिए ऐसी कौन सी वैकल्पिक जगह हो सकती है, जहां वो बिना ट्रैफिक को बाधा पहुंचाए, अपना विरोध जारी रख सकते हैं.'

जो चिट्ठी शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों की तरफ़ से सोशल मीडिया पर जारी की गई थी, उसे सुप्रीम कोर्ट में शाहीन बाग़ के धरना स्थल के आस-पास सड़क बंद होने की सुनवाई से संबंधित शाहीन बाग़ का आधिकारिक बयान कहा गया था.

ये चिट्ठी, धरने में शामिल स्वयंसेवियों ने तैयार की थी. जो अपना नाम और पहचान उजागर नहीं होने देना चाहते क्योंकि वो चाहते हैं कि ये धरना किसी चेहरे या किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि सामूहिक है.

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और इसकी यही पहचान है. रविवार की देर रात इन स्वयंसेवकों ने कहा कि, 'हम शाहीन बाग़ के लोग, यहां पिछले 64 दिनों से शांतिपूर्वक धरना दे रहे हैं. हमारा मक़सद अपने देश की संवैधानिक व्यवस्थाओं की रक्षा करना है. हम अपने उन साथी नागरिकों के प्रति हमदर्दी रखते हैं, जिन्हें अपने रोज़ाना के सफ़र में मुश्किलें पेश आ रही हैं. हालांकि हम उनसे अपील करते हैं कि वो हमारे अहिंसक विरोध प्रदर्शन के अधिकार के बारे में भी सोचें. साथ ही वो ये भी समझें कि हमें अपनी सरकार और संबंधित अधिकारियों तक अपनी शिकायतें पहुंचाने की कितनी सख़्त ज़रूरत है.'

शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों की इस चिट्ठी में आगे कहा गया था कि, 'माननीय सुप्रीम कोर्ट के सामने सुनवाई के लिए आई, अमित साहनी बनाम पुलिस कमिश्नर की विशेष अनुमति याचिका (सी) नंबर 002456/2020 से हमारा कोई वास्ता नहीं है. और न ही इस मामले में हमने अपनी तरफ़ से किसी को भी कोर्ट के सामने पक्ष रखने के लिए अधिकृत किया है.'

एक स्वयंसेवक ने कहा कि, 'चूंकि हमारा कोई औपचारिक प्रतिनिधित्व नहीं है. इसीलिए हमने सरकार से कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में वो हमारा पक्ष रखे.'

इस स्वयंसेवक ने आगे कहा कि, 'जो बयान सोशल मीडिया पर जारी किया गया था, उसे तैयार करने में प्रदर्शनकारियों की रज़ामंदी थी और इसे क़ानून की जानकारी रखने वाले स्वयंसेवकों ने ख़ुद परखा था.'

सोमवार रात संजय हेगड़े के प्रदर्शनकारियों से मिलने की योजना थी.

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शाहीन बाग़ की तर्ज़ पर पूरे देश में क़रीब 300 जगहों पर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. इन धरनों में महिलाएं नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ दिन-रात बैठ रही हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ये अहिंसक विरोध है. जो देश की संवैधानिक व्यवस्थाओं को फिर से स्थापित करने की मांग उठाने के लिए है.

शाहीन बाग़ में धरने पर बैठी एक महिला ने कहा कि, 'अगर हम यहां से हट जाते हैं, तो देश के बाक़ी धरनों का क्या होगा? उन सभी को हमसे ही तो ताक़त मिल रही है.'

धरना स्थल पर महिलाएं रोज़ की तरह तिरपाल के नीचे बैठी हुई थीं. एक महिला ने मंच संभाला और गाने लगी, 'हमको मालूम है हम निशाने पे हैं.'

नंद किशोर गर्ग के साथ वक़ील और सामाजिक कार्यकर्ता अमित साहनी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाख़िल की थी. इन याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से दरख़्वास्त की थी कि वो शाहीन बाग़ के धरने की निगरानी करें.

इन याचिकाकर्ताओं ने देश की सर्वोच्च अदालत से ये गुहार भी लगाई थी कि वो दिल्ली पुलिस को निर्देश दे कि वो दिल्ली के कालिंदी कुंज से शाहीन बाग़ के रास्ते पर यातायात को सुगम बनाए. क्योंकि ये रास्ता 15 दिसंबर 2019 से शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों ने बंद कर रखा है. जिसमें ज़्यादातर महिलाएं हैं.

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गुलशन, पिछले एक महीने से भी ज़्यादा वक़्त से इस धरने में शामिल होने रोज़ आती हैं. वो शाहीन बाग़ की ही रहने वाली हैं. गुलशन का कहना है कि, 'महिलाओं के लिए चौबीसों घंटे, दिन-रात खुले में बैठना कोई आसान काम नहीं है.'

वो आगे कहती हैं कि, 'उन्हें सड़क की बड़ी चिंता हो रही है. उन्हें ट्रैफिक जाम और सड़क बंद होना तो दिखता है, पर हम नहीं दिखते. क्या हम अदृश्य हैं?'

गुलशन के बगल में सत्तर बरस की वहीदन ख़ामोशी से बैठी थीं. 15 दिसंबर को जब से ये धरना शुरू हुआ है, वहीदन तब से रोज़ाना यहां आती हैं. वहीदन कहती हैं कि, 'हम यहां बैठे हैं जबकि हम ये जानते हैं कि शायद ये धरना हमेशा यूं ही चलता रहे. शायद हम यहीं धरने पर बैठे-बैठे मर जाएं. हम ने बहुत कुछ झेला है. हम यहां से नहीं हटेंगे.'

हालांकि अभी तक प्रदर्शनकारियों ने ये फ़ैसला नहीं किया है कि सुप्रीम कोर्ट की अपील के मुताबिक़ अपना धरना कहीं और ले जाएंगे या नहीं. लेकिन, इन प्रदर्शनकारियों का दावा है कि उन्होंने न तो स्कूल बसों को रोका है और न ही एंबुलेंस जैसे ज़रूरी वाहनों को वहां से गुज़रने देने से मना किया है.

सच तो ये है कि 16 फ़रवरी को जब धरना देने वाले गृह मंत्री अमित शाह के घर की तरफ़ मार्च के लिए कूच करने वाले थे तब उस से कुछ देर पहले वहां से एक एंबुलेंस को गुज़रने दिया गया था.

प्रदर्शनकारियों के मार्च को रोक दिया गया था. उन्हें बताया गया था कि उनके पास इतनी बड़ी संख्या में मार्च करने की इजाज़त नहीं है. जिसके बाद महिलाएं धरना स्थल पर लौट आई थीं.

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धरना देने वालों ने गृह मंत्री अमित शाह के घर तक मार्च की इजाज़त मांगने वाली जो अर्ज़ी शनिवार को दोपहर बाद पुलिस को सौंपी थी. जिसे स्थानीय पुलिस ने अपने मुख्यालय और गृह मंत्रालय को बढ़ा दिया था.

82 बरस की बिल्कीस बानो पूछती हैं कि, 'आख़िर हम ने क्या रोक रखा है.' बिल्कीस उन तीन बुज़ुर्ग महिलाओं में से एक हैं, जो शाहीन बाग़ की दबंग दादियों के तौर पर मशहूर हो गई हैं. बिल्कीस बानो कहती हैं कि, 'हम नहीं हटेंगे. हम पिछले दो महीनों से यहां बैठे हैं और उन्होंने हमसे बात तक नहीं की है. उन्हें हमारे पास आ कर बात तो करनी चाहिए. पर हम हटेंगे नहीं.'

बिल्कीस बानो के बग़ल में बैठी एक युवती ने बताया कि बिल्कीस ने सुबह से बस दो बिस्कुट खाए हैं. और एक कप चाय पी है. वो बताती है कि जब से धरना शुरू हुआ है, तब से बिल्कीस बानो ने ढंग से कुछ भी खाया नहीं है.

वो युवती बिल्कीस से कहती है कि, 'दादी कुछ खा लो वरना धरना कैसे दोगी?'

इसके जवाब में बिल्कीस कहती हैं, 'अगर मैं मर जाती हूं तो कम से कम मुझे दो गज ज़मीन तो मयस्सर होगी. अब जबकि हम यहां तमाम मुसीबतों के बावजूद धरने पर बैठे हैं. शूटआउट के बाद भी नहीं हटे हैं. हम ने इतना अपमान बर्दाश्त किया है. इतना कुछ झेला है, तो हम क्यों हटें. हम चाहते हैं कि मोदी जी ये क़ानून वापस लें. तभी हम घर वापस जाएंगे.'

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धरने पर बैठी 75 बरस की सरवरी कहती हैं कि, 'गांधी जी ने कहा था कि कोई तुम्हें एक थप्पड़ मारे, तो तुम अपना दूसरा गाल भी आगे कर दो. वो फिर भी तुम्हें थप्पड़ मारे तो भी तुम हिंसा मत करो. हम यहां शांति से बैठे हैं. अब यही हमारा घर है. हम ने किसी से बदसलूकी नहीं की है.'

अपने मज़बूत इरादों की वजह से ये दादियां शाहीन बाग़ के प्रदर्शन का चेहरा बन गई हैं. उनका कहना है कि वो किसी भी हालात के लिए तैयार हैं.

और अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए मध्यस्थों को नियुक्त किया है, तो इन महिलाओं के सामने उम्मीद की एक किरन चमकी है. उन्हें लग रहा है कि शायद अब वो अपनी आशंकाओं, चिंताओं को सरकार से ज़ाहिर कर सकेंगी. शायद ये महिलाएं, भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने वाले संविधान को बचाने में सफल हो सकेंगी.

शाहीन बाग़ में धरना देने वाली महिलाओं के लिए इस पल का इंतज़ार बहुत लंबा रहा है. उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को न्यौता दिया कि वो आ कर इन महिलाओं से नागरिकता संशोधन क़ानून के बारे में बात करें. ये महिलाएं बार-बार ये कहती रही हैं कि वो तब तक धरना ख़त्म नहीं करेंगी, जब तक नागरिकता का नया क़ानून वापस नहीं लिया जाता है. और सरकार उन्हें लिख कर नहीं देती कि वो एनआरसी को देश भर में लागू नहीं करेगी. इन महिलाओं का कहना है कि सीएएऔर एनआरसी, दोनों मिल कर उन्हें बेमुल्क का इंसान बना देंगे.

धरने पर बैठी एक और बुज़ुर्ग महिला हैं नूरुन्निसा. उनकी उम्र क़रीब 75 बरस है. नूरुन्निसा कहती हैं कि, 'हम यहां सबके लिए बैठे हैं. हम चाहते हैं कि वो हमसे बात करें.'

शाहीन बाग़ में धरना स्थल के टेंट के बाहर, एक अस्थायी पुस्तकालय भी बनाया गया है. इसे सावित्री बाई फुले लाइब्रेरी का नाम दिया गया है. शाम ढलते ही यहां रोशनी कर दी गई है. इस पुस्तकालय को दान की गई किताबों की तादाद बढ़ती जा रही है. सड़क के उस पार बहुत से रेहड़ी और खोमचे वाले खड़े हैं. जो सूप, बिरयानी और चाय बेच रहे हैं. उनके बगल में मर्द और औरतें क़तार में खड़ी हो कर एक लंगर में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं. शाहीन बाग़ का ये लंगर, सिख किसान चला रहा हैं.

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अपने घर का काम-काज निपटा कर अब और भी महिलाएं धरने में शामिल होने आ रही थीं. तिरपाल के नीचे रौशनी कर दी गई थी. और अब फिर से तक़रीरों, नज़्मों और हिम्मत से लबरेज़ एक शब सामने खड़ी थी. धरना देने वाले अब 'वार्ता' का इंतज़ार कर रहे थे.

बिल्कीस बानो ने कहा कि, 'हम तो बात करने के लिए तैयार ही हैं. हम तो काफ़ी वक़्त से बात करने को तैयार हैं. क्या ट्रैफ़िक, हमारे मुल्क के संविधान से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है?'

बिल्कीस बानो लिखना-पढ़ना नहीं जानती हैं. उन्हें संविधान के अलग-अलग प्रावधानों की भी समझ नहीं है. लेकिन, उन्हें ये मालूम है कि संविधान उन्हें धरने पर डटे रहने का हक़ देता है.

बिल्कीस ने कहा कि, 'उन्हें आने तो दो बात करने के लिए'

बेनाम लोगों का जो समूह इस धरने के शुरू होने के साथ ही सक्रिय हुआ था, उनका कहना है कि उन्होंने अब तक ये तय नहीं किया है कि वो शाहीन बाग़ के लोगों की नुमाइंदगी के लिए कोई वक़ील करेंगे या नहीं.

सोशल मीडिया पर जारी बयान को पढ़ते हुए इन कार्यकर्ताओं में से एक ने कहा कि, 'शाहीन बाग़ का धरना एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और अहिंसक विरोध प्रदर्शन है. ये लोगों का, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए चलाया जाने वाला आंदोलन है. इस धरने का औपचारिक प्रतिनिधित्व करने वाला कोई नहीं है. जिसे हम शाहीन बाग़ की आवाज़ या उसके इरादे ज़ाहिर करने वाला कह सकें. इसीलिए कोई एक व्यक्ति, संस्था या कार्यकर्ता, ये दावा नहीं कर सकता है कि कि वो धरना दे रहे लोगों का चुना हुआ प्रतिनिधि है. न ही वो इस विशेष मामले में यानी इस मुक़दमे में या किसी अन्य मंच पर हमारी नुमाइंदगी करने का दावा कर सकता है.'

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मध्यस्थ और वरिष्ठ वक़ील, संजय हेगड़े ने कहा कि वो इस मुद्दे पर बात करने से पहले अपने साथी मध्यस्थों से सलाह-मशविरा करना चाहेंगे.

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