बाबूलाल मरांडी की पार्टी का बीजेपी में नहीं कांग्रेस में विलय?- प्रेस रिव्यू

  • 18 फरवरी 2020
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झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने 14 सालों बाद बीजेपी में सोमवार को घर वापसी तो कर ली लेकिन सवाल उठ रहा है कि मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा का विलय बीजेपी में हुआ या कांग्रेस में?

झारखंड कई अख़बारों में रिपोर्ट छपी है जेवीएम के ख़त्म होने से असली फ़ायदा कांग्रेस को हुआ न कि बीजेपी को.

दरअसल, बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम के कुल तीन विधायक थे. एक ख़ुद मरांडी दूसरे प्रदीप यादव और तीसरे बंधु तिर्की. मरांडी सोमवार को बीजेपी में शामिल हुए तो बंधु तिर्की और प्रदीप यादव कांग्रेस में शामिल हो गए. इस हिसाब देखा जाए तो मरांडी के बीजेपी में जाने से झारखंड में बीजेपी के विधायकों की संख्या महज एक बढ़ी जबकि कांग्रेस की दो.

प्रदीप यादव और बंधु तिर्की सोमवार को दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी में शामिल हुए. हिन्दुस्तान अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''मीडिया से बातचीत में प्रदीप यादव और बंधु तिर्की ने जेवीएम के कांग्रेस में विलय का दावा किया. दोनों झारखंड में मंत्री रह चुके हैं. रविवार को दोनों ने जेवीएम की बैठक आयोजित कर कांग्रेस में पार्टी का विलय करने का निर्णय लिया और प्रस्ताव पास किया. इस प्रस्ताव को अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वीकार किया है. आने वाले दिनों में जल्द ही एक रैली कर औपचारिक तौर पर जेवीएम कार्यकर्ता और पदाधिकारियों का विलय करेंगे.''

प्रदीप प्रदीप यादव और बंधु तिर्की ने असली जेवीएम का कांग्रेस में विलय का दावा किया है. कांग्रेस में शामिल होने के बाद प्रदीप यादव ने कहा कि रविवार को रांची में पार्टी की बैठक आयोजित की गई थी. इसमें जेवीएम का विलय कांग्रेस में करने का निर्णय लिया गया था. उन्होंने कहा कि पार्टी के तीन विधायक हैं और जब दो एक साथ हैं तो असली जेवीएम उन दोनों की ही हुई.

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केजरीवाल कैबिनेट में विभागों का बँटवारा हुआ

केजरीवाल कैबिनेट में विभागों के बँटवारे को हिन्दुस्तान टाइम्स ने तीसरे पन्ने पर छापा है. अख़बार ने लिखा है, ''दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को तीसरी बार सत्ता संभालने के बाद मंत्रियों के विभागों का बँटवारा कर दिया है. केजरीवाल ने कोई भी विभाग अपने पास नहीं रखा है जबकि विभागों के बँटवारे में सत्येंद्र जैन और गोपाल राय इस कार्यकाल में और ताक़तवर हो गए हैं. जल बोर्ड को अब तक मुख्यमंत्री संभाल रहे थे, लेकिन इस बार उन्होंने इसे सत्येंद्र जैन को सौंप दिया है.''

गोपाल राय को पर्यावरण विभाग दे दिया है. यह विभाग अब तक कैलाश गहलोत के पास था. राय के पास पिछले कार्यकाल में मुख्य रूप से श्रम विभाग था. केजरीवाल अब सभी मंत्रियों के काम पर नज़र रखेंगे. मुख्यमंत्री ने सरकार के तीन मंत्रियों के विभाग बदले हैं.

मनीष सिसोदिया को फिर से उपमुख्यमंत्री बनाया गया है. उनके पास पहले की तरह ही महत्वपूर्ण विभाग रहेंगे. मगर महिला एवं बाल विकास विभाग उनसे लेकर राजेंद्र पाल गौतम को दे दिया है. बताया जा रहा है कि सिसोदिया ने ही यह विभाग किसी अन्य मंत्री को दिए जाने का आग्रह किया था. बाक़ी अन्य मंत्रियों के विभाग में कोई फेरबदल नहीं किया गया है.

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वोडाफ़ोन सिर्फ़ 3,500 करोड़ रुपए एजीआर चुकाने में समर्थ

दैनिक जागरण ने एजीआर मामले में 50 हज़ार करोड़ रुपए की बकाया राशि चुकाने में वोडाफ़ोन की असमर्थता को पहले पन्ने पर छापा है.

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''देश की प्रमुख दूरसंचार कंपनी वोडाफ़ोन ने एक तरह से यह साफ़ कर दिया है कि मौजूदा हालात में उसके लिए एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) मामले में 50 हज़ार करोड़ रुपए की बकाया राशि का भुगतान करना संभव नहीं है. कंपनी की तरफ़ से सोमवार को महज 2,500 करोड़ रुपए तत्काल और कुछ दिन बाद 1,000 करोड़ रुपए के भुगतान की अर्जी दी गई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया.''

भारती एयरटेल ने 10 हज़ार करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया है. टाटा समूह की टाटा टेलिसर्विसेज ने भी 2197 करोड़ रुपए का भुगतान किया है. इस तरह से देखा जाए तो दूरसंचार कंपनियों पर एजीआर के तौर पर बकाए 1.47 लाख करोड़ रुपए की राशि में से महज 14,700 करोड़ रुपए सरकार के पास आए हैं.

इस बीच, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि बैंक टेलिकॉम कंपनियों के इस संकट पर पैनी नजर रखे हुए हैं. दूसरी तरफ, दूरसंचार विभाग (डीओटी) के सूत्रों का कहना है कि अगर कंपनियों ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की 17 मार्च को होने वाली सुनवाई तक पूरा भुगतान नहीं किया तो उनकी बैंक गारंटी जब्त करने के क़ानूनी पहलुओं पर विचार किया जा रहा है.

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संकट में उत्तराखंड की बीजेपी सरकार?

नवभारत टाइम्स के अनुसार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की कुर्सी ख़तरे में है. अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''दिल्ली में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की बीजेपी के कुछ अहम नेताओं के साथ उपस्थिति से उत्तराखंड में नेतृत्व बदलाव की ख़बरों को हवा मिल रही है. कहा जा रहा है कि इन लोगों की बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाक़ात होनी है. मुख्यमंत्री के साथ सोमवार को दिल्ली में एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान उत्तराखंड के बीजेपी विधायकों को दिल्ली बुलाया गया था. मुख्यमंत्री के साथ महज 13 विधायक और 2 सांसद ही पहुंचे, जिसमें एक कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक, दो सांसद अजय भट्ट और माला राज लक्ष्मी शाह शामिल हैं जबकि अन्य विधायक, मंत्री और सांसद नहीं आए.''

अख़बार के अनुसार, ''इसे त्रिवेंद्र विरोधी ज़्यादातर विधायकों की उनसे नाराज़गी से जोड़कर देखा जा रहा है. सवाल उठ रहा है कि केवल 13 विधायक ही दिल्ली क्यों पहुंचे? यहां तक कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री निशंक भी मौजूद नहीं थे. बीजेपी अध्यक्ष से मुलाक़ात के बाद ही प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन पर तस्वीर साफ़ हो सकती है. सीएम के मीडिया प्रभारी समेत ज़्यादातर त्रिवेंद्र समर्थक इसे अफ़वाह बता रहे हैं.''

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