सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में क्यों आया इन महिला सैन्य अधिकारियों का नाम

  • 18 फरवरी 2020
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Image caption सुप्रीम कोर्ट परिसर में मौजूद महिला सैन्य अधिकारी

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने को लेकर एक अहम फ़ैसला सुनाया. उच्चतम न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया कि सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन मिले.

जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस अजय रस्तोगी की बेंच ने साल 2010 में दिए हाईकोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखते हुए कहा कि सभी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन मिले, चाहे वो कितने भी समय से कार्यरत हों. फ़ैसला लागू करने के लिए अदालत ने सरकार को तीन महीने का वक़्त दिया है.

सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2010 में ही फ़ैसला दिया था जिसे तत्कालीन केंद्र सरकार ने चुनौती दी थी. सरकार की ओर से दी गई एक दलील में महिलाओं की शारीरिक क्षमता की सीमाओं की भी बात की गई थी.

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Image caption सीमा सिंह

इस केस के जजमेंट के 56वें पैराग्राफ़ में कई महिला सैन्य अधिकारियों का उदाहरण दिया गया है.

ऑर्डर के मुताबिक़, काउंटर एफ़िडेविट में महिलाओं द्वारा सेना में प्रदान की जा रही सेवा का विस्तार से वर्णन है. जिसमें कहा गया है कि शॉर्ट सर्विस कमीशन में कार्यरत सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्र निर्माण के लिए अपने पुरुष साथियों के सा कंधे से कंधा मिलाकर योगदान किया.

बावजूद इसके इस कोर्ट के समक्ष बार-बार ये दलील दी जाती रही कि महिलाओं की शारीरिक बनावट और सामाजिक ज़िम्मेदारी ऐसी है कि वे उस तरह रोल नहीं निभा सकतीं जैसे उनके पुरुष साथी.

इस तरह की बातें परेशान करने वाली हैं. भारतीय सेना में कार्यरत महिला अधिकारियों ने दबाव और विपरीत परिस्थितियों में खुद को साबित किया है. इनमें से कुछ के बारे में विस्तार से जानिए.

मिताली मधुमिता

सेना में अधिकारी मिताली को उनकी वीरता के लिए सेना मेडल मिल चुका है.

फरवरी साल 2010 में काबुल में भारतीय दूतावास पर आत्मघाती हमला हुआ. इस हमले में बहुत से लोग घायल हुए थे. मधुमिता ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए कई लोगों को मलबे से बाहर निकाला. मधुमिता ने अपनी हिम्मत से 19 लोगों को बचाया जिनमें सात भारतीय थे.

एक साक्षात्कार में जब मिताली से पूछा गया कि उनके लिए देश के क्या मायने हैं तो उन्होंने कहा था "भारत एक महान देश है और मुझे इस पर गर्व है. बतौर सैनिक हमारी सिर्फ़ और सिर्फ़ यही कोशिश होती है कि हम अपना सबसे बेहतरीन कर सकें."

काबुल के अपने मिशन के बारे में एनडीटीवी को साल 2011 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "वो 26 फरवरी साल 2010 की सुबह थी. हमारी नींद एक धमाके और गोलियों की आवाज़ के साथ खुली. नींद खुलने के साथ जो पहली बात मेरे दिमाग़ में आई वो ये कि मेरे दूसरे साथी कहां हैं. कैसे हैं. मुझे उन्हें खोजना चाहिए. यह एक नॉर्मल ड्रिल थी जो हम काबुल में फॉलो करते थे. मैंने उन्हें फ़ोन किया लेकिन मुझे उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला. जिससे मैं थोड़ा परेशान हो गई. इसके बाद मैंने दूसरे साथियों को कॉल किया."

वो कहती हैं, "बाद में मुझे पता चला कि हमला गेस्ट हाउस पर हुआ है जहां मेरे साथी रह रहे थे. इसके बाद मैं उनकी मदद करने के लिए भागी. हमले के बाद पूरा शहर थम सा गया था. कोई गाड़ी नहीं चल रही थी. कोई इंसान भी नज़र नहीं आ रहा था. मैं दौड़ते हुए वहां पहुंची. जब मैं वहां पहुंची, हमला जारी था. मेरे ज़्यादातर साथी जख़्मी हालत में थे. उसके बाद मैंने रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया."

वो कहती हैं वहां पर कम लोगों को ही अंग्रेज़ी आती थी. लेकिन मुझे थोड़ी-थोड़ी लोकल ज़ुबान आती थी, जिससे काफी मदद मिली.

"बहुत मुश्किल से हमने लोगों को बाहर निकाला. लोगों को उनके घरों से बाहर बुलाया और मदद करने को कहा. जब हम घायलों को लेकर अस्पताल पहुंचे तो चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल था. चौबीस घंटे बीतने को थे और कुछ ज़ख़्मी लोगों की मौत हो चुकी थी. हम पूरी मदद करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन स्थिति बहुत बुरी थी."

मिताली ओडिशा के जिस परिवार से आती हैं वहां ज्यादातर लोग शिक्षा के क्षेत्र में हैं. ऐसे में उनकी मां चाहती थीं कि मिताली भी लेक्चरर ही बनें लेकिन उन्होंने भारतीय सेना में जाने का फ़ैसला किया.

वो बताती हैं कि जिस समय उन्हें सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई, सभी के लिए गौरव महसूस करने वाला क्षण था.

लेफ्टिनेंट कर्नल सोफ़िया कुरैशी

लेफ्टिनेंट कर्नल सोफ़िया कुरैशी मल्टी नेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज़ "एक्सरसाइज़ फोर्स 18" में भारतीय सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाली पहली महिला हैं.

यह अपनी तरह का सबसे बड़ा विदेशी सैन्य अभ्यास था, जिसका आयोजन भारत ने किया था.

वे साल 2006 में संयुक्त राष्ट्र के ऑपरेशन पीसकीपिंग के तहत कांगो में भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. जहां उन्होंने सीज़फ़ायर का नेतृत्व किया था. वहां उनका काम हिंसा वाले क्षेत्रों में शांति बहाल करना भी था.

लेफ़्टिनेंट कर्नल अनुवंदना जग्गी

लेफ़्टिनेंट कर्नल अनुवंदना जग्गी ने यूनाइटेड नेशन्स मिलिट्री ऑब्जर्वर्स टीम में महिलाओं की टुकड़ी का नेतृत्व किया था. संयुक्त राष्ट्र का यह मिशन बुरुंडी में चलाया गया था.

इस काम के लिए उन्हें यूनाइटेड नेशन्स फोर्स कमांडर्स कमेंडेशन सम्मान से नवाज़ा गया था.

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लेफ्टिनेंट भावना कस्तूरी

लेफ़्टिनेंट भावना कस्तूरी भारतीय सेना की पहली ऐसी महिला हैं, जिन्होंने आज़ादी के बाद पहली बार 144 पुरुष सैन्यदल की परेड को लीड किया.

26 साल की भावना हैदराबाद की हैं. उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से मास्टर की डिग्री हासिल की है. भावना पढ़ाई में तो अच्छी थी ही, इसके साथ डांस और गाना गाने में भी अच्छी थीं. उन्होंने क्लासिकल डांस में भी डिप्लोमा किया हुआ है.

आजादी के 71 साल बाद 26 जनवरी 2019 को गणतंत्र दिवस की परेड में भावना पहली वो महिला बनीं जिन्होंने 144 पुरुष सैन्यदल की टुकड़ी का नेतृत्व किया.

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तान्या शेरगिल

कैप्टन तान्या शेरगिल से पहले उनके परिवार के तीन अन्य सदस्य सेना में रह चुके हैं.

तान्या के परदादा, दादा और पिता भी आर्मी में थे. तान्या परेड में सेना की टुकड़ी की कमान संभालने वाली भारत की पहली महिला अधिकारी हैं. आर्मी के कार्प्‍स ऑफ सिग्‍नल्‍स की कैप्‍टन तान्या शेरगिल पंजाब के होशियारपुर से हैं और सेना के सिग्नल कोर में कैप्टन हैं.

Image caption दिव्या अजीत कुमार

दिव्या अजीत कुमार

दिव्या अजीत कुमार भारतीय सेना के इतिहास में पहली ऐसी महिला हैं जिन्हें 'बेस्ट ऑल राउंड कैडेट' का ख़िताब मिला था.

दिव्या एक व्यापारी परिवार से आती हैं. शुरुआत में उनकी सेना में आने को लेकर कोई रुचि नहीं थी और वो प्रशासनिक सेवाओं में जाना चाहती थीं लेकिन नेशनल कैडेट कोर में जाने के बाद उन्होंने प्रशासनिक सेवाओं में जाने का विचार छोड़ दिया.

21 साल की उम्र में दिव्या अजित कुमार को "स्वोर्ड ऑफ़ ऑनर" मिला. उस समय रहे भारत के सेना प्रमुख वीके सिंह ने भी उनकी तारीफ़ की थी. इसके बाद उन्होंने 'पासिंग आउट' परेड की कमान भी संभाली थी.

उन्होंने ये सम्मान क़रीब 230 कैडट को पीछे छोड़ कर हासिल किया था. इन कैडट्स में 70 महिलाएं भी शामिल थीं.

साल 2010 में बीबीसी से बात करते हुए उनके पिता अजित कुमार ने कहा था "अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने एकेडमी में कई सारे पुरस्कार जीते. लेकिन स्वोर्ड ऑफ़ ऑनर के बारे में नहीं सोचा था. यह एक बड़ा ही सुखद अहसास है."

भारतीय सेना में महिलाओं की भर्ती साल 1992 में शुरू हुई थी. जिस समय दिव्या को साल 2010 में स्वोर्ड ऑफ़ ऑनर सम्मान मिला था उस समय ही दिल्ली हाईकोर्ट ने सेना में महिलाओं की स्थायी नियुक्ति को लेकर आदेश दिया था.

हालांकि उस समय भी महिलाओं के युद्ध में भाग लेने को लेकर गतिरोध थे.

तत्कालिक सेना प्रमुख वीके सिंह ने तब कहा था कि युद्ध अभियानों में महिलाओं की भागीदारी कोई सहज सवाल नहीं है इस पर गहरे चिंतन की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा था,"सेना में महिलाओं का रोल है. सेना के बहुत सारे कामों में उनके लिए जगह है. जहां तक वास्तविक युद्ध में उनकी भूमिका का सवाल है तो हमें इस बारे में गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है."

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इसके साथ ही एफ़िडेविट में कई और घटनाओं और नामों का भी ज़िक्र किया गया.

इसमें बताया गया कि साल 2009 में महिलाओं ने पुरुषों के साथ बराबरी करते हुए क्विक रिएक्शन टीम में हिस्सा लिया था.

मेजर गोपिका भट्टी का नाम लेह, श्रीनगर, उधमपुर जैसी दुर्गम जगहों पर ड्यूटी पूरा करने के लिए लिया गया. इसके अलावा मेजर मधु राणा, प्रति सिंह और अनुजा यादव का नाम भी सरकार की दी गई दलीलों के जवाब में जमा किए गए हलफ़नामे में लिखा गया है.

इसमें कैप्टन अश्विनी पवार, कैप्टन शिप्रा मजूमदार के भी नाम हैं, जिन्हें सेवा मेडल से सम्मानित किया जा चुका है.

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