छत्तीसगढ़: आदिवासियों पर क्या वाक़ई हावी हो रहे हैं बांग्लादेशी शरणार्थी

  • आलोक प्रकाश पुतुल
  • बीबीसी हिंदी के लिए, परलकोट (छत्तीसगढ़) से
परलकोट का मिनी बंगाल

इमेज स्रोत, Alok Putul/BBC

"इन शरणार्थियों ने आदिवासियों की घर-ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है. ये शरणार्थी जंगल काट रहे हैं और उस पर कब्ज़ा कर रहे हैं. आदिवासी लड़कियों से ब्याह कर ये चुनावी राजनीति में घुस गए हैं. सच कहें तो इनके कारण आदिवासी समाज संकट में आ गया है."

ये कहना है राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष और वरिष्ठ बीजेपी नेता नंद कुमार साय का.

दरअसल, देश में नागरिकता क़ानून को लेकर चल रहे विवादों के बीच भारत सरकार के राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में 60 साल पहले बसाए गए हिंदू शरणार्थियों को लेकर सवाल उठाए हैं.

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने राज्य सरकार से कहा है कि इन शरणार्थियों की वजह से बस्तर के आदिवासियों के सामने संकट खड़ा हो गया है. उनके अधिकार ख़त्म हो रहे हैं और उनकी जनसंख्या तक कम होती जा रही है.

हालांकि, बीते 60 सालों के दौरान अलग-अलग समय पर बसाए गए इन बांग्लादेशी शरणार्थियों के नेता ऐसे आरोपों को सिरे से ख़ारिज़ कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में बंग शरणार्थी समाज के अध्यक्ष और बीजेपी नेता असीम राय का कहना है कि बांग्लादेशी शरणार्थियों के कारण कहीं कोई समस्या नहीं है.

उनका कहना है कि कुछ लोग राजनीति से प्रेरित हो कर इस तरह के आरोप लगा रहे हैं.

असीम राय कहते हैं, "हमारी दो पीढ़ियां यहीं पैदा हुईं. हममें और स्थानीय आदिवासियों में किसी तरह का कोई भेद नहीं है. हम एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं. तक़लीफ़ केवल उन्हें है, जो हमारे बीच फूट डालकर अपनी राजनीति करना चाहते हैं."

इमेज स्रोत, Alok Putul/BBC

मिनी बंगाल

बस्तर के घने जंगलों के बीच बसे माओवाद प्रभावित पखांजूर विकासखंड को इस इलाके में 'मिनी बंगाल' के नाम से जाना जाता है.

पखांजूर के 295 गांव में से 133 इन बांग्लादेशी शरणार्थियों के लिए बसाए गए थे. 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां की कुल 1.71 लाख की आबादी में से एक लाख लोग बांग्ला बोलते हैं. वहीं पखांजूर शहर की कुल 10,201 लोगों की आबादी में क़रीब 95 फ़ीसदी हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान से आए इन्हीं लोगों का है.

बाहर से यहां पहुंचे लोगों को इस आदिवासी इलाके में खान-पान, रहन-सहन, भाषा-बोली को देख कर लगेगा कि वो बंगाल के किसी इलाके में पहुंच गए हैं.

केंद्र सरकार ने 12 सितंबर 1958 को एक प्रस्ताव पारित कर पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को तत्कालीन मध्यप्रदेश के बस्तर और उड़ीसा के मलकानगिरि में बसाने के लिए 'दंडकारण्य परियोजना' को मंजूरी दी थी.

आंकड़े बताते हैं कि 31 अक्तूबर 1979 तक बस्तर के इलाके में 18,458 शरणार्थियों को बसाया गया. इन शरणार्थियों के लिए सिंचाई सुविधा, पेयजल आपूर्ति, ज़मीन सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा, सड़क निर्माण जैसे विकास के काम किए गए.

इमेज स्रोत, Alok Putul/BBC

इमेज कैप्शन,

गौरंग साहा

अंकों में गांव का नाम बताते हैं यहां के लोग

बस्तर के जिस परलकोट के इलाके में शरणार्थियों को बसाया गया, उन सभी गांवों को परलकोट विलेज़ का नाम दिया गया और उनके साथ संख्या जोड़ दी गई. यानी किसी गांव को पीवी-1 कहा गया तो किसी को पीवी-80.

आज की तारीख़ में इस इलाके में ऐसे 133 गांव हैं. हालांकि बाद के दिनों में इन गांवों को नाम देने की कोशिश भी हुई. लेकिन इन इलाकों में रहने वाले लोगों से उनके गांव का नाम पूछें तो वे अब भी अंकों में ही अपने गांव का नाम बताते हैं.

पीवी-130 में रहने वाले 70 साल के गौरंग साहा गांव की मुख्य सड़क पर एक छोटी-सी दुकान चलाते हैं.

परिवार में पत्नी के अलावा एक लड़का और दो लड़कियां हैं. सबकी शादी हो गई है और दुकान के अलावा गौरंग साहा का अधिकांश वक़्त नाती-पोतों के साथ गुजरता है.

वे अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "सरकार की ओर से सभी परिवारों को सात एकड़ ज़मीन दी गई. साढ़े छह एकड़ खेती के लिए और आधा एकड़ घर और बाड़ी के लिए. घर और खेती के लिए आर्थिक सहायता भी समय-समय पर दी गई. जब हमलोग यहां आए तो यह पूरा जंगल था. आसपास के इलाके में केवल आदिवासी रहते थे. लगा कि कहां आ गए."

गौरंग साहा लगभग पूरा भारत घूम आए हैं लेकिन अब बस्तर का यह इलाका उन्हें दुनिया की सबसे अच्छी जगह लगती है.

इमेज स्रोत, Alok Putul/BBC

इमेज कैप्शन,

चंदन सरकार

गौरंग साहा की दुकान पर हमारी मुलाक़ात 21 साल के चंदन सरकार से हुई. बी कॉम की पढ़ाई पूरी कर चुके चंदन पीवी-55 में रहते हैं. परिवार में दो बड़ी बहनें हैं, एक की शादी रायपुर में और दूसरी की मुंबई में हुई है.

चंदन अब पखांजूर बाज़ार में कॉस्मेटिक की अपनी दुकान खोलने की तैयारी कर रहे हैं.

क्या इस आदिवासी इलाके में रहने में उन्हें कोई मुश्किल नहीं होती या कहीं बाहर जा कर कुछ काम करने का ख्याल नहीं आया?

वे सहज भाव से कहते हैं, "इस इलाके में जहां भी जाएंगे, आपको केवल बंगाली लोग ही मिलेंगे. 90 फ़ीसदी लोग बांग्ला में बात करते हैं, देश के किसी भी दूसरे हिस्से के बंगाली की तरह उनका रहन-सहन है. मैं यहां कंफर्टेबल हूं. मुझे तो कोई मुश्किल नहीं है. हां, जो आदिवासी हैं, उन्हें ज़रूर इस परिवेश में कुछ अजीब लगता है."

इमेज स्रोत, Alok Putul/BBC

आदिवासियों का क्या है कहना?

सर्व आदिवासी समाज के नेता बीपीएस नेताम का आरोप है कि बाहरी शरणार्थियों के कारण इस इलाके में आदिवासी हाशिए पर चले गए हैं.

उनका दावा है कि 1960 के बाद से लगातार बांग्लादेशी यहां आ कर बस रहे हैं और इनमें बड़ी संख्या अवैध रूप से रहने वालों की है.

नेताम कहते हैं, "यहां आदिवासी अल्पसंख्यक हो गए हैं. आदिवासियों की संख्या घटती जा रही है और बांग्लादेशी शरणार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है. अगर ऐसा ही हाल रहा तो पखांजूर के कई गांवों में एक भी आदिवासी नहीं बचेगा. आदिवासी अपनी बोली भूल रहा है, इससे भयावह और क्या होगा?"

इमेज स्रोत, Alok Putul/BBC

इमेज कैप्शन,

लक्ष्मीरानी दास

हालांकि पीवी-130 के शासकीय प्राथमिक शाला की प्राचार्या लक्ष्मीरानी दास का कहना है कि यह स्वाभाविक है कि जिन 133 गांवों में बांग्लादेशी शरणार्थियों को बसाया गया था, वहां उनकी आबादी अधिक है. ऐसे में बंगालियों का सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव इस इलाके में अधिक है.

पांचवीं तक की कक्षा वाले इस आदिवासी स्कूल में 20 बच्चे हैं, जिनमें केवल दो बच्चे ही आदिवासी हैं. ये दोनों आदिवासी बच्चे स्कूल में भी बांग्ला में ही बात करते हैं.

इन दो आदिवासी बच्चों में अकेले बादल नरेटी ही हैं, जो नियमित रूप से स्कूल आते हैं.

पांचवीं में पढ़ने वाले बादल नरेटी बांग्ला में ही बताते हैं कि उन्हें बांग्ला भाषा समझने-बूझने में कोई दिक्कत नहीं होती.

हमारे अनुरोध पर वे एक गीत भी गाते हैं, "सकाले उठी आमी, मोने-मोने बोली. सारा दिन..."

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम का कहना है कि पखांजूर जैसे इलाकों में अब आदिवासियों के हिस्से कुछ भी नहीं है. पढ़े-लिखे शरणार्थियों ने निरक्षर आदिवासियों के रोजी-रोज़गार पर कब्जा कर लिया है.

नेताम का आरोप है कि सरकारी विकास सुविधाओं का भी लाभ आदिवासियों के बजाए बाहरी लोगों को ही मिला.

नेताम को इस बात की आशंका है कि अगर देश में नया नागरिकता क़ानून लागू किया गया तो इसका सर्वाधिक दुष्परिणाम बस्तर जैसे इलाक़ों पर पड़ेगा.

नेताम कहते हैं, "पचास-साठ साल पहले शरणार्थियों के नाम पर हमारे इलाके में लोगों को थोप दिया गया. इसका परिणाम हमारी कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ा और अब भी वे भुगत रहे हैं. अब कम से कम इस तरह की किसी कोशिश को आदिवासी बर्दाश्त नहीं करेगा. आदिवासी नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ अंतिम सांस तक लड़ेगा."

सरकार का क्या है कहना?

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह का दावा है कि छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशी शरणार्थियों के कारण आदिवासियों को किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ है.

इमेज स्रोत, FB @Dr. Premsai Singh

इमेज कैप्शन,

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह

प्रेमसाय सिंह कहते हैं, "आदिवासियों को आरक्षण का जो लाभ मिलता रहा है या आदिवासियों के लिए विशेष तौर पर जो योजनाएं चलाई गई हैं, उसका लाभ कोई ग़ैर आदिवासी कैसे ले सकता है?"

हालांकि, राज्य की कांग्रेस सरकार में मंत्री प्रेमसाय सिंह केंद्र सरकार के नए नागरिकता संशोधन क़ानून के भी ख़िलाफ़ हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा," इस समय सीएए, एनपीआर और एनआरसी जैसे क़ानून ला कर केंद्र सरकार आदिवासियों के लिए ज़रूर मुश्किल खड़ी कर रही है. इससे सबसे अधिक अगर कोई प्रभावित होगा तो वे आदिवासी ही होंगे. जो आदिवासी साक्षर ही नहीं है, जो आज यहां कल वहां रहता है, वह बाप दादा के ज़माने का अपना क़ागज़ कहां से दिखाएगा?"

ये भी पढ़ें:

बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)