राकेश मारिया: मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर ने अजमल कसाब के बारे में क्या दावे किये हैं

  • 19 फरवरी 2020
बीबीसी

'कित्थों दा मुँडा है तू?' (कहाँ का लड़का है तू?)

मुंबई पुलिस क्राइम ब्रांच के जॉइंट कमिश्नर रहे राकेश मारिया ने जब पंजाबी लहजे में यह सवाल पूछा तो सामने बैठा शख़्स चौंक गया.

उसकी आँखों में पहचान लिए जाने का भाव कौंधा. उसने जवाब दिया, 'ओकाड़ा'.

ओकाड़ा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का एक ज़िला है. राकेश ने अपने ससुर से इसके बारे में सुन रखा था. ओकाड़ा की कुछ और जानकारी जुटाकर राकेश दोबारा पूछताछ करने लौटे.

थोड़ा और कुरेदने पर उन्हें एक और जवाब मिला, "मेरी पहचान हो गई तो भारत और अमरीका मेरे गाँव को बम से उड़ा देंगे."

राकेश सोचने लगे कि अगर उस रात सब कुछ सामने बैठे शख़्स के मुताबिक़ हुआ होता, तो कलावा बांधे यह शख़्स एक 'हिंदू आतंकवादी' के तौर पर मर चुका होता.

उसका नाम समीर दिनेश चौधरी बताया जाता. उसके पास से हैदराबाद के अरुणोदय डिग्री कॉलेज की आईडी मिलती है .

उसके घर का पता 254, टीचर्स कॉलोनी, नगरभावी, बेंगलुरु बताया जाता. और यह सब कुछ फ़र्ज़ी होता.

क्योंकि उस रात राकेश मारिया के सामने अजमल आमिर कसाब बैठा था. 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हमला करने वाले 10 हमलावरों में से एक.

होमगार्ड्स के डायरेक्टर जनरल पद से रिटायर हुए और मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे राकेश मारिया ने एक किताब लिखी है जिसका नाम- 'लेट मी से इट नाऊ' (Let Me Say It Now) है. इस किताब में राकेश अपने हिस्से की कहानियाँ सुना रहे हैं.

मुंबई हमले और अजमल कसाब को लेकर उनके ख़ुलासे सुर्ख़ियों में हैं.

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Image caption मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर की क़िताब - लेट मी से इट नाऊ

'वरना सब फ़र्ज़ी होता'

राकेश ने अपनी किताब में लिखा है, "अगर कसाब उस फ़र्ज़ी आईडी के साथ मर जाता, तो अख़बारों की हेडलाइंस चीख़ रही होतीं कि कैसे एक हिंदू आतंकवादी ने मुंबई पर हमला किया. टीवी पत्रकार बेंगलुरु में इकट्ठे होकर उसके परिवार और पड़ोसियों का इंटरव्यू ले रहे होते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पाकिस्तान के फ़रीदकोट का अजमल कसाब मेरे सामने बैठा था और मैं उससे पूछ रहा था, 'की करन आया है?' (क्या करने आया है?)".

राकेश लिखते हैं कि 'धीरे-धीरे कसाब ने सारी परतें खोलीं. हमले के लिए भर्ती किए जाने से लेकर मुंबई में घुसने तक'.

वह एक दिलचस्प वाक़या याद करते हैं कि कसाब और उसके साथी 'अल हुसैनी' नाम की नाव से मुंबई में दाख़िल हुए थे.

वे लिखते हैं, 'यह नाम 1993 में मुंबई सीरियल ब्लास्ट्स केस में भी सुनने को मिला था. उस हमले के मुख्य आरोपी टाइगर मेमन के अपार्टमेंट ब्लॉक का नाम भी 'अल हुसैनी' था. पुलिस के मुताबिक़ इसी इमारत में साज़िश रची गई थी.'

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Image caption 1993 में मुंबई में बम धमाके के बाद का एक मंज़र

'गद्दार कौन है?'

राकेश ने कसाब की सुरक्षा को लेकर कुछ ऐसी बातें दर्ज की हैं जिनका ज़िक्र संभवत: पहले नहीं हुआ है.

वे लिखते हैं, "क्राइम ब्रांच के जॉइंट कमिश्नर के तौर पर कसाब को ज़िंदा रखना मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी. लोगों और अफ़सरों का उसके प्रति बर्ताव देखते हुए मैंने उसके गार्ड्स ख़ुद चुने थे. ISI और लश्कर उसे किसी भी तरह ख़त्म करना चाहते थे ताकि हमले के इकलौते ज़िंदा सबूत को मिटाया जा सके. हमें भारत सरकार से ख़त मिला कि कसाब की सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच पर है. केंद्रीय जाँच एजेंसियों से मिली जानकारी से पता चला कि पाकिस्तान ने कसाब को मारने का काम दाऊद इब्राहिम गैंग को दिया था. उसे कुछ हो जाता, तो सिर्फ़ मेरी नौकरी ही नहीं, बल्कि मुंबई पुलिस की प्रतिष्ठा दांव पर थी."

कसाब की दो तस्वीरें इंटरनेट पर ख़ूब इस्तेमाल होती हैं.

हाथ में AK-47 लिये कसाब की एक तस्वीर तो छत्रपति शिवाजी टर्मिनस की है और दूसरी फ़ोटो मुंबई के एक पुलिस थाने की है.

उस दूसरी तस्वीर के बारे में मारिया लिखते हैं, "हमने बहुत सावधानी बरती कि उसकी फ़ोटो ना खींची जाए और कोई फ़ोटो मीडिया के पास ना जाए. जब कुर्सी पर बैठे कसाब की फ़ोटो मीडिया में चलने लगी, तो हमें झटका लगा. मैंने सभी अफ़सरों को किनारे बुलाकर पूछा, 'ग़द्दार कौन है?' सबने इनकार किया. उनके चेहरे से पता चल रहा था कि वे सच बोल रहे हैं. फिर उन्होंने बताया कि केंद्रीय एजेंसियों ने कसाब से पूछताछ के लिए अपना एक अफ़सर मुंबई भेजा था."

मारिया के मुताबिक़ तस्वीर से सरहद-पार यह संदेश भेजना था कि सबसे बड़ा सबूत जो ख़ुद कसाब है, वह भारत के क़ब्ज़े में है. यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पाकिस्तान हमले की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर रहा था.

पाकिस्तान ने शुरुआत में कसाब को अपना नागरिक मानने से इनकार कर दिया था.

हमले के कुछ महीनों बाद पाकिस्तानी सरकार ने कसाब के पाक नागरिक होने की पुष्टि की. फिर एक स्थानीय न्यूज़ चैनल ने बताया कि कसाब मध्य पंजाब के फ़रीदकोट गाँव का रहने वाला है.

मुंबई हमले में 166 लोग मारे गए थे. अजमल कसाब को 312 मामलों में अभियुक्त बनाया गया था. स्पेशल कोर्ट में उस पर 86 आरोप तय हुए थे और 6 मई 2010 को उसे मौत की सज़ा सुनाई गई.

तमाम क़ानूनी अधिकार आज़माने के बाद 5 नवंबर 2012 को राष्ट्रपति ने कसाब की दया याचिका ख़ारिज कर दी थी. फिर 21 नवंबर 2012 को सुबह 7.30 बजे पुणे की यरवडा जेल में फांसी दे दी गई.

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Image caption मुंबई में कसाब को फांसी की सज़ा का जश्न मनाने की रैली में एक बच्चा

'भारत की कितनी ख़राब समझ थी कसाब को!'

मारिया लिखते हैं, "कसाब को बचपन से बताया गया था कि भारत पाकिस्तान का दुश्मन है. उसे भारत और दुनिया की कोई ख़ास जानकारी नहीं थी. उसे भरोसा था कि भारत, अमरीका और इसराइल, पाकिस्तान और इस्लाम के दुश्मन हैं. उसका मानना था कि भारत में मुसलमानों को नमाज़ नहीं पढ़ने दी जाती है और अधिकारी मस्जिदों में ताला लगाकर रखते हैं. क्राइम ब्रांच के लॉकअप में जब उसके कानों में अज़ान की आवाज़ पड़ती, तो यह उसे अपनी मनगढ़ंत कल्पना लगती. इसका पता चलने पर मैंने एक गाड़ी में कसाब को मेट्रो सिनेमा के पास वाली मस्जिद ले जाने को कहा. अपनी आँखों से लोगों को नमाज़ पढ़ते देखकर वह हक्का-बक्का रह गया."

कसाब पर केस चलने के दौरान 2008 में बीबीसी संवाददाता अली सलमान कसाब के गांव पहुंचे थे. बीबीसी ने ही पहली बार उनका घर दिखाया था.

कसाब की फांसी के बाद बीबीसी संवाददाता शुमाइला जाफ़री पाकिस्तान में कसाब के गाँव का माहौल जानने पहुँची थीं. वहाँ लोगों ने शुमाइला जाफ़री से ढंग से बात नहीं की.

कसाब का घर पूछने पर कुछ बच्चों ने शुमाइला को एक घर की तरफ़ भेजा. घर में सन्नाटा पसरा था. कैमरापर्सन के घर की तस्वीर खींचने के दौरान कुछ लोग वहाँ पहुंचे और बीबीसी टीम से लौट जाने को कहा और गली में मौजूद लोगों ने कसाब से जुड़ी कोई भी जानकारी होने से इनकार किया.

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Image caption फ़रीदकोट के लोग कसाब की किसी भी जानकारी से इनकार करते हैं

सियासी बयानबाज़ी

स्थानीय लोगों का कहना था कि वहाँ कसाब नाम का कोई शख़्स रहता ही नहीं था.

उनके मुताबिक़ यह पाकिस्तान को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साज़िश है.

मारिया की किताब के खुलासों से सियासी बयानबाज़ी भी शुरू हो गई है.

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, "मारिया ने ये सब बातें अभी क्यों बोलीं? जब वह पुलिस कमिश्नर थे, उन्हें तब ये बातें बोलनी चाहिए थीं. वास्तव में सर्विस रूल्स में अगर कोई जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के पास है तो उन्हें उस पर ऐक्शन लेना चाहिए था. मेरी राय में बहुत गहरी साज़िश रची गई थी कांग्रेस द्वारा. UPA द्वारा. झूठ और फ़रेब का एक और नमूना उस समय हमने देखा था. जब उन्होंने एक पूरी तरह से झूठा हिंदू टेरर.... चिदंबरम साहब के कहने पर खड़ी करने की कोशिश की थी. मैं निंदा करता हूँ कांग्रेस की और उन लोगों की जिन्होंने हिंदू टेरर के झूठे आरोपों पर देश को गुमराह करने की कोशिश की थी. टेरर का कोई धर्म नहीं होता."

बीजेपी नेता राम माधव ने कहा है कि "किताब से बड़ा ख़ुलासा हुआ है. इससे पता चलता है कि ISI की साज़िश सफल नहीं हुई, लेकिन कांग्रेस के कुछ लोगों ने उस समय इसे सफल बनाने की कोशिश की थी. कुछ बुद्धजीवियों ने मुंबई हमले को RSS से जोड़ने की कोशिश की थी, उन्हें कांग्रेस का समर्थन था."

कांग्रेस की ओर से अधीर रंजन चौधरी ने पीयूष गोयल के बयान का जवाब दिया. उन्होंने कहा कि 'हिंदू टेरर' शब्द का इस्तेमाल एक अलग परिप्रेक्ष्य में किया गया था. तब मक्का मस्ज़िद ब्लास्ट केस में प्रज्ञा ठाकुर और अन्य लोग गिरफ्तार किए गए थे. आतंकवादी असल पहचान के साथ हमला नहीं करते हैं. यूपीए सरकार ने हमले के बारे में सभी खुलासे किए थे और यूपीए के कार्यकाल में कसाब को फांसी दी गई थी.'

वहीं महाराष्ट्र के गृहमंत्री और एनसीपी नेता अनिल देशमुख ने मारिया की किताब पर कहा, "राकेश मारिया ने अपनी किताब में जो लिखा, हम उससे जुड़ी जानकारी जुटाएंगे. हम उनसे बात करके फडणवीस सरकार के कार्यकाल में हुई घटनाओं के बारे में जानने की कोशिश करेंगे. ज़रूरत पड़ने पर हम जांच के आदेश देंगे."

बीजेपी नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा, "हम कांग्रेस के 'हिंदू टेरर' के आइडिया और लश्कर-ISI की 26/11 हमले की साज़िश के बीच तार जुड़ते देख सकते हैं. क्या भारत के कोई हैंडलर के रूप में ISI की मदद करते हुए आतंकियों को हिंदू पहचान दे रहा था? क्या दिग्विजय सिंह हैंडलर के तौर पर काम कर रहे थे? कांग्रेस को इसका जवाब देना चाहिए."

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