शाहीन बाग़: धरने पर बैठी औरतों ने कहा, "हम हटे तो सब ख़त्म हो जाएगा''

  • 20 फरवरी 2020
शाहीन बाग़ इमेज कॉपीरइट Getty Images

"वो आए, देखा और कहा कि फिर आएंगे."

बुधवार को शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों और सुप्रीम कोर्ट के नियुक्त किए गए मध्यस्थों के बीच हुई बातचीत का सार बस इतना सा ही है.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) को लेकर दिल्ली के शाहीन बाग़ में हो रहे प्रदर्शन के सिलसिले में अपने फ़ैसले में कहा था कि लोकंतत्र में विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का अधिकार है. हालांकि इसके साथ ही अदालत ने ये भी कहा था कि लोगों की आवाजाही की असुविधा को देखते हुए प्रदर्शन स्थल को दूसरी जगह शिफ़्ट किया जाना चाहिए.

अदालत ने इस मद्देनज़र तीन मध्यस्थ भी नियुक्त किए हैं जिन्हें शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों को धरने की जगह बदलने के लिए मनाने की ज़िम्मेदारी दी गई है.

बुधवार की शाम प्रदर्शनकारियों से मुलाकात करने के बाद मध्यस्थ जब लौट गए तब भी महिलाएं रोज़ की तरह रात भर धरने पर बैठी रहीं.

धरने पर बैठी इन बुजुर्ग महिलाओं के सामने माइक थे और पत्रकार महौल का लाइव अपडेट दे रहे थे. मगर बुधवार का सिर्फ़ एक ही अपडेट था: प्रदर्शकारियों ने कहा कि वो हटेंगे नहीं.

इंतज़ार में माहिर हो चुकी हैं शाहीन बाग़ की औरतें

धरने पर बैठी बिलकिस बानो ने कहा, "हम यहां से कहीं नहीं जा रहे हैं."

एक दूसरे से टकराती शाहीन बाग़ की तंग गलियों में बिजली के तार बेतरतीबी से झूलते हुए नज़र आते हैं. इन झूलते हुए तारों को देखकर ऐसा लगता है जैसे ये उलझे रहने की ज़िद पर अड़े हैं. यहां घरों की खिड़कियां थोड़ी सी सूरज की रोशनी पाने के लिए एक-दूसरे से टकराती रहती हैं.

इस माहौल में आप उन 'शर्मीली औरतों' को देखते हैं जो अब राजनीतिक परिदृश्य में आ चुकी हैं. ये औरतों को यहां से हटाने की कई कोशिशों की जा चुकी हैं और इस संघर्ष की वजह से वो मज़बूत हो चुकी हैं. वो राजनीतिक दांव-पेंचों के बारे में बहुत जल्दी समझ चुकी हैं. ये औरतें कहती हैं कि सरकार और बाकी लोग उनका इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन ये फ़ैसला कर चुकी हैं.

ये औरतें पिछले दो महीनों से तीखी सर्दी और बारिशों को झेल रही हैं. वो फटे हुए तिरपाल के नीचे बैठी सर्द हवाओं को झेल रही हैं और इन्हीं सबने इन्हें इंतज़ार करने में माहिर बना दिया है. शाहीन बाग़ की औरतें कहती हैं कि हालात ने उन्हें मोलभाव करना और धीरज रखना सिखा दिया है. अब उन्हें कभी-कभार ही ग़ुस्सा आता है.

इन महिलाओं का मानना है कि बुधवार की शाम इन्होंने 'राजनीतिक मंसूबों' और मीडिया के बहकावे को कामयाब नहीं होने दिया. बुधवार की शाम शाहीन बाग़ की दादियों के अनौपचारिक प्रतिनिधि मंडल ने सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थों से बात की. मध्यस्थों ने धरने की जगह बदलने के बारे में इनकी राय जाननी चाहिए.

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'हम झुके तो सब ख़त्म हो जाएगा'

सुप्रीम कोर्ट के नियुक्त मध्यस्थों में से दो संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन बुधवार दोपहर दो बजे के करीब शाहीन बाग़ पहुंचे. दोनों ही वरिष्ठ वकील हैं और मध्यस्था में निपुण माने जाते हैं.

धरने पर बैठी औरतों ने ज़िद की कि वो सभी साथ में मध्यस्थों से बात करेंगी और मीडिया इस पूरी बातचीत को सुनेगी.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के युवा छात्र ने खड़े होकर दोनों मध्यस्थों से बताया कि कैसे शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया गया है और कैसे उन्होंने अपनी ज़िंदगियां ख़तरे में डाल रखी हैं. शाहीन बाग़ में गोलीबारी भी हुई थी. हालांकि इस हमले में कोई घायल नहीं हुआ था.

बीजेपी सांसद परवेश वर्मा ने कहा था, "शाहीन बाग़ में लाखों लोग इकट्ठे हो गए हैं. दिल्ली के लोगों में अब इस बारे में सोचना होगा और सोचकर कोई फ़ैसला लेना होगा. वो आपके घरों में घुसकर आपकी बहन-बेटियों का रेप करेंगे और उन्हें मार डालेंगे. आज समय है लेकिन मोदी जी और अमित शाह कल आपको बचाने नहीं आएंगे. अगर दिल्ली के लोग आज ही जाग जाएं तो बेहतर होगा."

इसके बाद ये आरोप भी लगे कि शाहीन बाग़ में औरतों को धरने पर बैठने के लिए रोज़ 500 रुपये दिए जा रहे हैं.

प्रदर्शनकारियों में से एक परवीन (34 साल) ने कहा, "उन्हें लगता कि मसला सिर्फ़ शाहीन बाग़ है लेकिन देश में होने वाले हर प्रदर्शन को हमसे उम्मीदें हैं. अगर हम झुक जाते हैं तो वे सब ख़त्म हो जाएंगे."

'...तो हम घर लौट जाएंगे'

सबसे मुखर प्रदर्शनकारियों में शुमार 90 वर्षीय असमा ख़ातून को उम्मीद है कि दोनों मध्यस्थ सरकार और अदालत के सामने उनका पक्ष रखेंगे.

वो कहती हैं, "अगर वो हमारी बातें सुनकर सीएए और एनआरसी को वापस ले लेते हैं तो हम बेहद ख़ुश होंगे और अपने घर लौट जाएंगे."

बोलते-बोलते अचानक असमा की चमकती आंखें नम हो जाती हैं और वो कहती हैं, "सब समझते हैं कि यहां बाहर बैठना आसान है."

गतिरोध ख़त्म करने के लिए शाहीन बाग़ की महिलाओं को 'मनाने' के पहले दौर में मध्यस्थ साधना रामचंद्रन ने कहा कि उनकी सारी बातों को सुप्रीम कोर्ट के सामने बिना किसी बदलाव के सामने पेश किया जाएगा.

रामचंद्रन ने कहा, "मैं एक बात ज़रूर कहना चाहती हूं. जिस देश के पास आप जैसी बेटियां हों उसे कभी कोई ख़तरा नहीं होगा."

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Image caption प्रदर्शनकारियों से बात करतीं साधना रामचंद्रन

'धरने की वजह से रास्ता जाम नहीं है'

संजय हेगड़े ने प्रदर्शनकारी महिलाओं को सुप्रीम कोर्ट के बारे में बताया.

शाहीन बाग़ के वॉलंटियर रामचंद्रन और हेगड़े को लेकर पुलिस के लगाए बैरिकेड दिखाने ले गए. उन्होंने बताया कि ट्रैफ़िक की समस्या पुलिस के बैरिकेड की वजह से हो रही है, न कि उनकी वजह से. उन्होंने बताया कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने स्कूल की बसों और एंबुलेंस के लिए हमेशा रास्ता बनाया है.

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा था कि शाहीन बाग़ में धरने की वजह से सड़क जाम है और इससे लोगों को 'परेशानी' हो रही है. अदालत ने धरने को किसी ऐसी जगह शिफ़्ट किए जाने का सुझाव दिया था जिससे कोई सार्वजनिक स्थान जाम न हो.

छह-सात महिलाओं ने खड़े होकर संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन से अपनी परेशानियों के बारे में बताया.

रामचंद्रन ने उनसे कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने आपके विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन किया है लेकिन बाकी नागरिकों के भी अपने अधिकार हैं और उनकी रक्षा होनी चाहिए. हम सब मिलकर कोई हल निकालना चाहते हैं. हम सबकी बात सुनेंगे."

82 वर्षीय बिलकिस बानो ने कहा कि वो शाहीन बाग़ छोड़कर कहीं नहीं जा रही हैं.

अपना परिवार नहीं फिर भी भूख हड़ताल

उन्होंने कहा, "मध्यस्थों ने सीएए और एनआरसी के बारे में बात नहीं की लेकिन महिलाओं ने ये मुद्दा उठाया. हम कहीं नहीं जाएंगे. हम क्यों हटें? परेशानी हम लोगों को हो रही है, किसी और को नहीं. क्या उन्हें ये दिखाई नहीं देता?"

75 साल की नूरुनिस्सा ने तिरंगे स्कार्फ़ ढंक रखा है. वो कहती हैं कि शाहीन बाग़ का प्रदर्शन औरतों की सहन शक्ति का एक इम्तिहान साबित हुआ है. प्रदर्शन के दौरान एक नवजात बच्चे की ठंड की वजह से मौत भी हो गई थी.

प्रदर्शन कर रही इन औरतों को कई तरह की भद्दी बातें भी सुननी पड़ी हैं. बीजेपी सांसद दिलीप घोष ने कहा था कि दिल्ली के शाहीन बाग़ और कोलकाता के पार्क सर्कस में 'अनपढ़ मर्द और औरतें' धरना दे रहे हैं क्योंकि उन्हें विदेशी फंड से बिरयानी और पैसे मिल रहे हैं.

ऐसे बयानों के उटल 50 वर्षीय मेहरुनिस्सा लगभग दो महीने से भूख हड़ताल पर हैं. ज़ैनुल आब्दीन ने सबसे पहले 15 दिसंबर से भूख हड़ताल शुरू की थी. बीमार पड़ने की वजह से उन्होंने एक हफ़्ते पहले ही अपनी हड़ताल ख़त्म की है.

मेहरुनिस्सा सोनिया विहार की रहने वाली हैं और वो जामा मस्जिद की कैंटीन में काम करती थीं. उनका अपना कोई परिवार नहीं है लेकिन वो कहती हैं कि देश और आने वाली पीढ़ों के लिए उन्होंने धरने पर बैठने का फ़ैसला किया.

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'सीएए हमारे परिवार तोड़ देगा'

वो कहती हैं, "ये ग़रीबों की लड़ाई है और मैं सबके साथ खड़ी हूं. मुझे अपनी नौकरी छोड़ने का पछतावा नहीं है. मेरे दिल में उम्मीद है." मेहरुनिस्सा के घर में पिछले 50 दिनों से ताला लगा है क्योंकि वो तबसे वो घर गई ही नहीं हैं.

उन्होंने कहा, "दो लोग आए थे. उन्होंने कहा कि वो कल फिर हमसे बात करने आएंगे. हम उन्हें बताना चाहते हैं कि तकलीफ़ सिर्फ़ ट्रैफ़िक को नहीं बल्कि हमें भी हो रही है. हम बताना चाहते हैं कि हम यहां मौज-मस्ती नहीं कर रहे हैं."

56 वर्षीय हुसैन बानो कहती हैं कि रास्ता होने की बात सिर्फ़ 'राजनीतिक दांव' के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि आने-जाने के लिए दूसरे रास्ते भी हैं और प्रदर्शनकारी सिर्फ़ एक रास्ते पर ही बैठे हैं.

उन्होंने कहा, "हमें सम समझ आता है और हम एकजुट हैं. आवाज़ दो, हम एक हैं."

धरने पर बैठी रज़िया अंसारी कहती हैं कि सीएए और एनआरसी उनका परिवार तोड़ देंगे लेकिन किसी को ट्रैफ़िक जाम के अलावा कुछ नज़र नहीं आता.

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'हम यहीं हैं...'

उन्होंने कहा, "अगर हम अपनी जगह से हट जाएं तो क्या वो हमारी बातें सुनेंगे? हम महीनों से यहां बैठे हैं, कुछ हुआ क्या? अगर हम यहां से हटे तो सब कुछ ख़त्म हो जाएगा."

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष वजहत हबीबुल्ला भी बुधवार शाम शाहीन बाग़ गए थे. उन्होंने महिलाओं को भरोसा दिलाया कि उनकी चिंताएं सुनी जाएंगी. वहीं, हेगड़े ने मुलाकात के बारे में हमारे सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.

हुसैन बानो ने कहा, "वो कल भी आएंगे. वो 24 फ़रवरी तक आते रहेंगे. हम उनके सामने अपना पक्ष रखेंगे लेकिन यहां से जाएंगे नहीं." इतना कहकर बानो ने मुड़कर महिलाओं की भीड़ को देखा और कहा, "ये देखिए. हम सब यहीं हैं."

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