कर्नाटक: मुसलमान युवक बनेगा लिंगायत मठ का प्रमुख

  • इमरान क़ुरैशी
  • बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
सफ़ेद धोती और रुद्राक्ष माला पहने दीवान शरीफ़

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सफ़ेद धोती और रुद्राक्ष माला पहने दीवान शरीफ़

उत्तरी कर्नाटक के गदग ज़िले में एक मुसलमान युवक को लिंगायत मठ का प्रमुख बनाया जाएगा. 32 वर्षीय दीवान शरीफ़ रहीमनसाब मुल्ला 26 फ़रवरी को औपचारिक रूप से लिंगायत मठ के प्रमुख बनाए जाएंगे.

शरीफ़ मुल्ला कुछ वक़्त पहले तक ऑटो चलाते थे. उन्हें 12वीं सदी के समाज सुधारक बसवन्ना के वचन (उपदेश) बचपन से ही कंठस्थ हैं और पिछले दो-तीन वर्षों से एक लिंगायत स्वामी उन्हें प्रशिक्षण दे रहे हैं.

शरीफ़ ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "इस्लाम छोड़ने या लिंगायत में धर्मांतरित होने जैसी कोई बात ही नहीं है. पैगंबर मोहम्मद साहब ने हमें क़ुरान दिया और बसवन्ना ने हमें वचन दिए. अगर हम क़ुरान और वचन को अच्छी तरह समझकर उनका पालन करें तो हम शांति से अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं. मैं सभी धर्मों से बराबर प्रेम करूंगा."

खजूरी मठ के प्रमुख मुरुगराजेंद्र शिवयोगी कहते हैं, "शरीफ़ इस्लाम और लिंगायत धर्म, दोनों के प्रतिनिधि हैं. हां, कुछ साल पहले तक वो नमाज़ पढ़ते थे लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वो वचन भी सीख रहे थे. लिंगायतों ने उन्हें स्वीकार कर लिया है."

कोरनेश्वर संस्थान मठ कलबुर्गी ज़िले के खजूरी गांव में स्थित है. यह चित्रदुर्ग के श्री जगदगुरु मुरुगजेंद्र मठ के उन 351 मठों में से एक हैं जिसके अनुयायी न सिर्फ़ कर्नाटक बल्कि महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु में भी हैं. इस मठ के अनुयायी मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते.

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कुछ ऐसे मिली प्रेरणा

शरीफ़ ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैंने अपने पिता के निधन के बाद से ही वचन सीखना शुरू कर दिया. उससे पहले तक मैं ऑटो चलाता था और शराब पीकर दूसरों को तंग करता था. कभी-कभी मैं नमाज़ भी पढ़ता था. दिन में पांच बार नहीं, लेकिन जब भी मुझसे हो पाता, मैं नमाज़ पढ़ता था. हालांकि मुझे हमेशा ये महसूस होता रहा कि मैं सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के लिए काम कर रहा हूं और उस समाज को कुछ नहीं दे रहा हूं जिसके लिए मेरा जन्म हुआ है."

शरीफ़ बताते हैं, "मैंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीतकार पुट्टराज गवई से प्रेरणा ली जो दृष्टिबाधित हैं. मैंने सोचा कि अगर एक नेत्रहीन व्यक्ति इतने लोगों को खाना खिला सकता है तो आंखें रहते हुए मुझे भी समाज के लिए कुछ करना चाहिए."

शरीफ़ के पिता रहीमनसाब मुल्ला ख़ुद भी पिछले 30 वर्षों से ज़्यादा समय से शिवयोगी स्वामी जी के शिष्य हैं.

शिवयोगी स्वामी जी बताते हैं, "रहीमनसाब मुल्ला हमारे मठ के लिए रुद्राक्ष माला बनाते थे. उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया. उनके निधन के बाद शरीफ़ का मन ऑटो चलाने में नहीं लग रहा था. बाद में, शरीफ़ की मां ने शांतिधाम मठ बनवाने और बसवन्ना के उपदेश के प्रचार-प्रसार के लिए अपनी दो एकड़ ज़मीन दान में दे दी."

शरीफ़ की शादी हो चुकी है. उनकी पत्नी का नाम शमशाद बेगम है और उनके चार बच्चे हैं जिनकी उम्र छह, पांच तीन और दो साल है, आम तौर पर मठों के प्रमुख ब्रह्मचारी होते हैं.

इस बारे में शिवयोगी स्वामी जी कहते हैं, "मठ प्रमुख का ब्रह्मचारी होना अनिवार्य नहीं हैं. बसवन्ना ख़ुद भी शादीशुदा थे. ये शिशुनला शरीफ़ और गोविंद भट्ट की परंपरा का हस्सा है."

शिशुनला शरीफ़ के पिता भी दीवान शरीफ़ के पिता की तरह हजारेश क़ादरी के शिष्य थे जिन्होंने 1800 के शुरुआत में 'लिंग दीक्षा' दी थी.

शिशुनला शरीफ़ को रामायण, महाभारत और वचन तीनों की जानकारी थ. वो गोविंद भट्ट नाम के एक ब्राह्मण से काफ़ी प्रभावित थे जिन्होंने उन्हें अपने बेटे के रूप में अपनाया और उनसे शादी करने को कहा. आज कर्नाटक के शिवामोग्गा ज़िले में गोविंद भट्ट और शिशुनला, दोनों की मूर्तियां हैं. इतना ही नहीं, हिंदू और मुसलमान दोनों इनका सम्मान करते हैं.

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'हमारे शांतिधाम का कोई धर्म नहीं'

वचन अध्ययन संस्थान के पूर्व निदेशक रमज़ान डागर ने बीबीसी हिंदी से कहा कि उन्हें दीवान शरीफ़ की नियुक्ति पर बिल्कुल हैरत नहीं हुई. उन्होंने कहा, "उत्तरी कर्नाटक के ज़्यादातर हिस्सों में मुसलमान और लिंगायत एक दूसरे के त्योहार मनाते हैं. यहां तक कि लिंगायत नमाज़ में भी शामिल होते हैं. ये रिवाज़ का हिस्सा ज़्यादा है और दर्शन का कम."

रमज़ान डागरा के मुताबिक़, "इस्लाम और लिंगायत संप्रदाय दोनों ही एक ईश्वर में विश्वास रखते हैं. सच तो ये है कि लिंगायतों में नर्क और स्वर्ग की कोई परिकल्पना नहीं है. इसलिए किसी मुसलमान के लिए लिंगायत संप्रदाय का पालन करना मुश्किल नहीं है. हिंदू धर्म में ऐसा नहीं है. अगर आप मुसलमान से हिंदू बनते हैं तो आपकी जाति का सवाल हमेशा बना रहता है लेकिन लिंगायतों में ऐसा नहीं नहीं होता."

दीवान शरीफ़ कहते हैं, "मां के गर्भ में बच्चे का कोई धर्म नहीं होता. जन्म के बाद ही उसे एक धर्म मिलता है. इसलिए, हमारे शांतिधाम का भी कोई धर्म नहीं है."

मठ प्रमुख बन जाने के बाद उनकी पत्नी और बच्चों की देखभाल कौन करेगा?

इसके जवाब में शरीफ़ कहते हैं, "मैंने अपना ऑटो अपने भाई को दे दिया है. वही मेरी पत्नी और बच्चों की देखभाल करेगा. अगले दो महीने बाद उसकी भी शादी होने वाली है. अगर शादी के बाद वो मेरे परिवार की तरफ़ ध्यान नहीं दे पाता तो मेरे दोस्त उनका ख़याल रखेंगे."

क्या शरीफ़ को स्वीकार्यता मिलेगी?

इसके जवाब में वो कहते हैं, "मुझे कौन स्वीकार करता है और कौन नहीं, ये महत्वपूर्ण नहीं है. अगर कोई मुश्किल वक़्त में मेरे पास आएगा और मैं उसके आंसू पोंछ पाऊंगा तो मुझे शांति मिलेगी."

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