भारत रंग महोत्सव में दिखा लोक नृत्य आधारित नाटकों का जलवा

नई दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में तीन सप्ताह तक चला नाटकों का महोत्सव.

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नई दिल्ली के मंडी हाउस इलाक़े में 1 से 21 फ़रवरी तक 21वें भारत रंग महोत्सव की धूम देखने को मिली.

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राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तत्वधान में क़रीब तीन सप्ताह तक देश दुनिया के अलग-अलग नाट्य समूहों की ओर से 70 से ज़्यादा नाटकों का मंचन किया गया.

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21वें भारत रंग महोत्सव का सबसे अहम पहलू दस तरह के लोकनृत्यों पर आधारित नाटकों का मंचन रहा. दो फ़रवरी को छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य महुआ के पानी से शुरू हुआ ऐसे नाटकों का दौर 20 फ़रवरी को पश्चिम बंगाल के जात्रा लोकनृत्य के तहत आयोजित गंगा पुत्र भीष्म तक जारी रहा.

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इसके अलावा भारतीय नाटकों की दुनिया के एवरग्रीन माने जाने वाले नाटक ताजमहल का टेंडर, अंधा युग, महाभोज, तुगलक़ जैसे नाटकों ने ज़्यादा सुर्खि़यां बटोरीं.

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21वें भारत रंग महोत्सव की प्रस्तुतियों में, ख़ासकर हिंदी नाटकों की प्रस्तुति में महिला चरित्र प्रधान नाटक देखने को मिले. कोलकाता की मौलाली रंगशिल्पी की ओर प्लाबन बसु की जमीला रही हो या फिर महाश्वेता देवी की लिखी बायन. या फिर अतुल सत्य कौशिक के निर्देशन में बालीगंज 1990.

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राष्ट्रीय नाट्य विद्याल के एक्टिंग डायरेक्टर सुरेश शर्मा के मुताबिक़ महिला चरित्र वाले नाटकों के लिए कोई ख़ास प्रावधान नहीं थे लेकिन ऐसा हुआ है क्योंकि समाज में महिलाओं की भूमिका अब कहीं ज़्यादा सशक्त हो रही है.

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महात्मा गांधी के कम मशहूर प्रयोगों को लेकर एनएसडी के एक्टिंग डायरेक्टर सुरेश शर्मा के निर्देशन में पहला सत्याग्रही भी चर्चा में रहा.

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हालांकि इस बार आधे से ज़्यादा युवा लोगों के नाट्य समूह को भारत रंग महोत्सव में शिरकत करने का मौक़ा मिला, जिसमें भिखारीनामा और जाग उठा रायगढ जैसे नाटकों ने ख़ासा प्रभावित किया.

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राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कार्यकारी निर्देशक सुरेश शर्मा के मुताबिक़ जब तक युवाओं को बड़े मंच पर मौक़ा नहीं मिलेगा तब तक उनसे परपैक्शन की उम्मीद बेमानी है.

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भारत रंग महोत्सव के आयोजन को लेकर हर बार नाटकों पर विवाद होते हैं, इस बार नए समूहों को मंचन का मौक़ा मिलने पर और नाटकों चयन को लेकर उठते सवालों पर सुरेश शर्मा ने कहा कि जिन नाटकों के आवेदन हमें मिले थे, उनमें सबसे बेहतरीन नाटकों का चयन किया गया है, चयन की प्रक्रिया दोहरे स्तर पर होती है, लिहाज़ा उसमें किसी के साथ भेदभाव की गुंजाइश बेहद कम होती है.

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इस भारत रंग महोत्सव के दौरान एनएसडी ने अपने नामचीन एल्यूमनाई ओम शिवपुरी और एमएस सत्यू पर पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं.