मोहन भागवत को राष्ट्रवाद को ऐसे देखना चाहिए - नज़रिया

  • 21 फरवरी 2020
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत को शायद अब पता चला है कि राष्ट्रवाद को दुनिया भर में एक ख़तरनाक और संदिग्ध विचार माना जाता है क्योंकि इससे हिटलर और मुसोलिनी जैसे उन नेताओं के नाम जुड़े हैं जिन्होंने धार्मिक और नस्ली पहचानों के आधार पर लाखों लोगों का बेरहमी से क़त्ल करवाया.

जिस यूरोप से यह राष्ट्रवाद निकला है उसके इतिहास को मोहन भागवत थोड़ा और खंगालेंगे तो वे पाएंगे कि राष्ट्रवाद के नाम पर और भी डरावने और मनुष्यता को लज्जित करने वाले अपराध दर्ज हैं बल्कि उतना दूर जाने की ज़रूरत नहीं, वे भारत में अंग्रेजों का इतिहास भी देख सकते हैं.

अंग्रेज़ों को अपने राष्ट्रवाद पर बहुत गर्व था. वे कहा करते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज दुनिया में कभी डूबता नहीं है लेकिन इसी राज के एक समाजवादी लेखक अर्नेस्ट जोन्स का कहना था कि 'इस राज में ख़ून की नदियां भी कभी नहीं सूखती थीं'.

चाहें तो जालियांवाला बाग़ को याद कर सकते हैं. वैसे भी यह उस जघन्य नरसंहार की सौवीं बरसी है. उस दिन जनरल डायर ने बड़ी तादाद में मासूम भारतीयों को गोलियों से भून दिया था.‌ डायर की भारतीयों से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी, वह बस ब्रिटिश राष्ट्रवाद का नुमाइंदा था. जांच आयोग के सामने दिया गया उसका बयान देखें. वह एक पक्के देशभक्त का बयान है.

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Image caption रवीन्द्रनाथ टैगोर

राष्ट्रवाद के इस घातक रूप को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत के अलावा यूरोप और जापान के अपने अनुभवों से भली-भांति पहचाना था. टैगोर कोई मामूली आदमी नहीं थे. वे संभवतः दुनिया के अकेले कवि होंगे जिनकी‌ कविताएं दो-दो देशों में राष्ट्रगान के रूप में स्वीकृत हुईं. भारत के अलावा बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी टैगोर का है लेकिन टैगोर राष्ट्रवाद के बहुत बड़े आलोचक थे.

अपने एक दोस्त को उन्होंने चिट्ठी लिखी थी कि वे कभी भी राष्ट्रवाद के कांच से मनुष्यता के हीरे को नहीं बदलेंगे. इसके अलावा, एक और जगह उन्होंने लिखा था कि राष्ट्रवाद मनुष्य का बनाया सबसे ताक़तवर एनिस्थीसिया (बेहोशी की दवा) है.

दरअसल, जिन लोगों ने उन्नीसवीं-बीसवीं सदियों में राष्ट्रवाद का नतीजा देखा है, वे अच्छी तरह समझते हैं कि राष्ट्र के नाम पर मनुष्यों को कैसे हथियारों में, हिंसा की मशीनों में बदला जाता है. लेकिन राष्ट्रवाद की इस सख्त आलोचना से एक मुश्किल सवाल हमारे सामने आ खड़ा होता है.

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राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम का अंतर

क्या हमें राष्ट्रवाद नहीं चाहिए? क्या देश के नाम पर हमने जो कुछ सीखा है, वह सब कुछ झूठ है? क्या हमारा देश, हमारा ध्वज, हमारा गान, हमारा देशप्रेम सब बेमानी या अमानवीय हैं?

समझने की ज़रूरत दरअसल इसी मोड़ पर है. देश हो, धर्म हो या ऐसी जितनी भी संस्थाएं हों, वे सब मनुष्य निर्मित हैं, मनुष्यों की भलाई के लिए बने हैं. देश के नाम पर युद्धों में मरने-मारने की बातें उत्तेजना पैदा कर सकती हैं लेकिन किसी का भला नहीं करतीं. और ऐसे वक्त में जब कहीं कोई युद्ध न हो तो देश के नाम पर युद्ध जैसा माहौल तैयार किया जा सकता है और उसके नागरिकों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा किया जा सकता है, यही राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा ख़तरा है.

जाने-माने इतालवी लेखक और दार्शनिक उंबेर्तो इको ने बरसों पुराने अपने लेख में याद किया था कि कैसे मुसोलिनी के राष्ट्रवादी भाषण बचपन में उन लोगों को अभिभूत करते थे और किस तरह वे देश के लिए जान देने के ख़याल पर लेख लिखकर पुरस्कार जीता करते थे. इको ने लिखा है कि बाद में उन लोगों ने इस राष्ट्रवाद के नतीजे भुगते.

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इसी लेख में इको बताते हैं कि मुसोलिनी को मात देने वाले कमांडर का भाषण सुनकर उन्होंने सीखा कि 'फ्रीडम ऑफ़ स्पीच' का मतलब 'फ्रीडम फ्रॉम रेटॉरिक'- यानी शब्दाडंबर से मुक्ति भी होता है.

दरअसल, राष्ट्रवाद को भी शब्दाडंबर से मुक्त करने की ज़रूरत है. यह समझने की ज़रूरत है कि यूरोप में राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद से गठजोड़ करता हुआ विकसित हुआ है, वहां उपनिवेशों पर शासन के लिए शासक वर्ग की पहचान का मसला बहुत बड़ा रहा है इसलिए वहां राष्ट्र धर्म और नस्ल के आधार पर बनते और बंटते रहे. दो-दो विश्वयुद्ध लड़ लेने और नौ करोड़ लाशें बिछा देने के बाद यूरोप की समझ में आया कि यह बाँटने की नीति बेमानी है और यह राष्ट्रवाद घातक है.

लेकिन भारत में जो राष्ट्रप्रेम या देशभक्ति आज़ादी की लड़ाई के दौरान गांधी के नेतृत्व में विकसित हो रहा था वह‌ हज़ार साल के साझा जीवन की विरासत से विकसित हो रहा था. उसमें कई सभी भाषाओं, पूजा पद्धतियों, रीति-रिवाजों, खान-पान और पहनावों की पूरी गुंजाइश थी.

बेशक उस दौर में भी ऐसे राष्ट्रवादी थे जो यूरोप से राष्ट्रवाद पढ़ रहे थे और इस आधार पर इसे हिंदू राष्ट्र मान बैठे थे, ऐसे लोगों को गांधी के आंदोलन में लाठियाँ खा रहे लोग उपहास के पात्र लगते थे. यह अनायास नहीं है कि राष्ट्रवाद की इस दूसरी धारा ने या तो अंग्रेजों से लड़ना छोड़ दिया या फिर उनसे सांठगांठ कर ली.‌‌‌‌

दूसरी तरफ़, सबको साथ लेकर चलने वाला विचार मध्यकाल के भजन गाता रहा, पीठ पर लाठी खाता रहा, उपवास करता रहा और वह संविधान बनाता रहा जिसमें सबके लिए बराबरी का सपना है.

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राष्ट्रवाद का मौजूदा ख़तरा

आज वह सपना ख़तरे में है. राष्ट्रवाद के एक अतिवादी विचार को उन नागरिकों पर थोपा जा रहा है जो शायद सबसे असहाय हैं और जिन्हें सबसे ज़्यादा मदद चाहिए. यह राष्ट्रवाद देश की पूरी अवधारणा पर अपना दावा ठोक रहा है और ख़ुद को अकेला देशभक्त बता रहा है.

मोहन भागवत अगर वाक़ई राष्ट्रवाद को समझने निकले हैं तो उन्हें राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम के बीच का अंतर समझना होगा, अंधी देशभक्ति और उदार देशप्रेम को अलग-अलग करना होगा. इस अंतर को न समझने की वजह से ही तमाम तरह के भ्रष्ट लोग, देश को नुक़सान पहुंचाने वाले देश भक्त बने ही घूम नहीं रहे, बल्कि वे उन तमाम लोगों को देशद्रोही बता रहे हैं जो किन्हीं वजहों से सत्ता से नाराज़ हैं या देशप्रेम को ज़्यादा उदार नज़रियों से देखने की वकालत करते हैं.

चाहे तो मोहन भागवत यह भी याद कर सकते हैं कि देशों को बार-बार बनाया जाता है. जयशंकर प्रसाद के नाटक चंद्रगुप्त में चाणक्य कहता है- 'क्या राष्ट्र की शीतल छाया का संगठन मनुष्य ने इसलिए किया था? मगध में इतना अत्याचार! तुझे नष्ट कर दूंगा या नए सिरे से बनाऊंगा.'

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चाणक्य मगध पर शासन कर रहे अत्याचारी नंद की निगाह में भले देशद्रोही रहे हों लेकिन वह मगधवासियों के लिए देशभक्त थे. ऐसा देशभक्त न होता तो चंद्रगुप्त न होता. लेकिन चाणक्य को और उनके पिता को नंद राष्ट्रवाद के अंधे कुएं में डालने की कोशिश कर रहा था.

इसमें संदेह नहीं कि देशप्रेम एक ज़रूरी अवधारणा है लेकिन इस प्रेम से पहले समझना होगा कि देश क्या है, वह किन लोगों से बनता है‌ और क्यों उसके भीतर कभी-कभी ऐसी निराशा घर कर जाती है कि कुछ लोगों के लिए वह पराया मालूम पड़ने लगता है? इस बात पर गंभीरता से विचार करेंगे तो पाएंगे कि हमारी देशभक्ति को कुछ उदार होने की ज़रूरत है.

राष्ट्रवाद सामूहिक जीवन का नमक है. वह ना हो तो यह सामूहिकता बेस्वाद हो जाए लेकिन नमक ज़्यादा हो जाए तो वह ज़हर हो जाता है. हमारे सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रवाद का यह नमक वाक़ई इतना ज़्यादा हो गया है कि वह ज़हर में बदल गया है. अब हमें यह तय करना होगा कि हम हिंदुस्तान का सांझा चूल्हा कैसा चाहते हैं.

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