कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन के दौरान दुआ ने ख़तों में क्या लिखा?

दुआ की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाती सौम्या

दिल्ली की एक लड़की और श्रीनगर की एक लड़की ने एक दूसरे को छह चिट्ठियाँ लिखकर अपने अनुभव साझा किए. दोनों के बीच देश के हालात पर बहुत सी बातें हुईं. पढ़िए इस सिरीज़ की आख़िरी चिट्ठी.

तारीख़ - 02.02.20

प्यारी सौम्या

ये ख़त मैं आपको कश्मीर से नहीं बल्कि दुनिया की सबसे पाक जगहों में से एक, सऊदी अरब के मक्का से लिख रही हूं. मुसलमानों के लिए मक्का सबसे पाक शहर है.

ये वो शहर है जहां हमारे पैग़म्बर मोहम्मद पैदा हुए थे और जहां उन्हें अल्लाह के फ़रिश्ते जिब्रील से ग़ार-ए-हिरा यानी गुफ़ा में पहली सीख मिली थी.

इस शहर में होना, काबा को पहली बार देखना, ऐसा अनुभव है जिसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती. बस इतना कह सकती हूं कि दुनिया भर से मुसलमानों को यहां आकर दुआ करते देखना अद्भुत लगता है.

आपकी आख़िरी चिट्ठी में आपने मुझसे मुसलमानों के बीच डर के बारे में पूछा था. मैं कश्मीर में रहने वाली मुसलमान हूं यानी ऐसी जगह जहां हमेशा तनाव बना रहता है.

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पॉडकास्ट
बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

बात सरहद पार

समाप्त

जब नागरिकता का ये नया क़ानून पारित हुआ तब हम लोग धारा 144 की बंदिशों के तहत रह रहे थे. धारा 370 हटाए जाने की वजह से हम लोग मजबूरी में छह महीने तक घर में बैठे रहे, कोई काम नहीं कर पाने का नुक़सान झेल रहे थे.

नतीजा ये कि हम नए क़ानून के बारे में सोच ही नहीं पाए क्योंकि ऐसा करते तो शायद फिर छह महीने के लिए नज़रबंद कर दिए जाते.

ये सब मैं कश्मीरी मुसलमानों के नज़रिए से कह रही हूं. बाक़ी शहरों में रह रहे मुसलमानों के बीच कितना डर है इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं.

मैं ख़ुश हूं कि अब आप कश्मीर की सच्चाई जान गई हैं. वादी अब आधिकारिक तौर पर टूरिस्ट्स के लिए खोल दी गई है पर हम कश्मीरियों की तरफ़ से बाहर वालों के लिए ये दरवाज़े कभी बंद नहीं हुए थे.

कश्मीर के ज़्यादातर (80%) लोग टूरिज़्म से जुड़े हुए हैं. पिछले साल टूरिस्ट्स से जुड़े आधिकारिक ऑर्डर की वजह से टूरिस्ट्स और बाहर से आकर यहां काम करने वालों पर ही असर नहीं पड़ा बल्कि टूरिज़्म सेक्टर से जुड़े लोगों को भी बहुत नुक़सान हुआ.

जब वो ऑर्डर आया तब अमरनाथ यात्रा समेत कुछ और यात्राएं चल रही थीं और उन सबको रोक दिया गया जिससे यात्रियों को बहुत परेशानी हुई. आपको पता है अमरनाथ यात्रा 90 के दशक में भी नहीं रोकी गई थी जब आतंकवाद चरम पर था.

ऑर्डर्स और 90 के दशक की बात चली है और आपने फ़िल्म 'शिकारा' का ट्रेलर भी देखा है, तो आप जानतीं होंगी कि एक ऑर्डर ही था जिसने कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने पर मजबूर किया.

सच कहूं तो मुझे लगता है कि ये मसला विश्व स्तर पर उठाने की ज़रूरत है. उस ऑर्डर ने ना सिर्फ़ कश्मीरी पंडितों को यहां से जाने पर मजबूर किया बल्कि कश्मीरी मुसलमानों और पंडितों के बीच भाई-चारे को भी तोड़ दिया.

आपको पता है कश्मीर के खान्यार में एक पहाड़ी पर अलग-अलग मज़हबों की इबादतगाह हैं. सबसे नीचे एक गुरुद्वारा है, बीच में एक दरगाह जिसे मख़दूम साहिब की दरगाह कहा जाता है और सबसे ऊपर मंदिर है.

मेरी मम्मा का घर उसी इलाक़े के पास था और उनके पड़ोस में पंडित परिवार रहते थे. मेरी मम्मा बचपन में मुझे कश्मीर में अलग-अलग समुदायों के बीच भाई-चारे की कई कहानियां सुनाती थीं.

ज़्यादातर कहानियां पड़ोस में रहने वाले एक कश्मीरी पंडित परिवार के इर्द-गिर्द घूमती थीं. वो महिला मेरे नाना जी को कहतीं कि जब वो फ़ज्र (सुबह) की नमाज़ के लिए जाएं तो उन्हें साथ मंदिर ले जाएं.

मेरे नाना उन्हें मंदिर छोड़ते और नीचे नमाज़ पढ़ने चले जाते. फिर वो महिला नीचे आ जातीं और दोनों साथ घर जाते.

अब जब मैं पलटकर उस कहानी के बारे में सोचती हूं तो एहसास होता है कि महज़ एक ऑर्डर ने कितने मज़बूत भाईचारे को तोड़ दिया.

कश्मीर, रहने के लिए एक बहुत ख़ूबसूरत जगह है और मैं इस पाक शहर मक्का में अल्लाह से यही दुआ करती हूं कि कश्मीर में फिर से अमन और भाईचारा लौटा दें.

ये ख़त मैं इस उम्मीद के साथ ख़त्म कर रही हूं कि मेरी ये दुआ पूरी हो जाए और आप मुझे मिलने कश्मीर आएं.

ढेर सारा प्यार

दुआ

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में बड़ी हो रही 17 साल की दुआ भट और दिल्ली की 18 साल की सौम्या सागरिका ने एक-दूसरे की अलग ज़िंदगियों को समझने के लिए चिट्ठियों के ज़रिए दोस्ती की.

क़रीब दो साल पहले एक-दूसरे को पहली बार लिखा. कई आशंकाएं दूर हुईं.

फिर पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के साथ-साथ वहां कई सारी बंदिशें लागू कर दी गईं. संपर्क करना मुहाल हो गया. पांच महीने बाद जब इनमें कुछ ढील दी गई ख़तों का सिलसिला फिर शुरू हुआ.

दोनों के बीच दिसंबर से फ़रवरी के दौरान लिखे गए छह ख़तों में से यह आख़िरी ख़त है. इस चिट्ठी में लिखी बातें दुआ की अपनी राय और समझ हैं जिनमें बीबीसी ने कोई फ़ेरबदल नहीं किया है.

ग़ौरतलब है कि कश्मीरी पंडितों के पलायन की वजह पर आम राय नहीं है. एक मत ये है कि ऐसा सरकार के कहने पर किया गया और दूसरा मत है कि इस्लामी चरमपंथ के डर के कारण पंडितों ने घाटी छोड़ी.

(प्रोड्यूसर: बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य; इलस्ट्रेटर: नीलिमा पी. आर्यन)

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