दिल्ली के मौजपुर में CAA विरोधी और समर्थकों में टकराव

  • 23 फरवरी 2020
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दिल्ली के मौजपुर में रविवार को नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों और सीएए का समर्थन कर रहे लोगों के बीच पत्थरबाजी हुई.

हिंसक होती स्थिति से निपटने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले भी छोड़े. हालांकि बाद में पुलिस अधिकारियों की ओर से बयान जारी कर कहा गया कि स्थिति नियंत्रण में है.

प्रदर्शन स्थल पर अब भी सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद हैं और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती है.

मौजपुर में सीएए का विरोध पिछले साल दिसंबर से ही हो रहा था लेकिन शनिवार को प्रदर्शन करने वाले जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे आकर बैठ गए थे. प्रदर्शन करने वालों में ज़्यादातर महिलाएं ही हैं.

इस प्रदर्शन की वजह से इलाक़े को जोड़ने वाली कई सड़कें (सीलमपुर, मौजपुर और यमुना विहार को जोड़ने वाली सड़क) बंद हैं. कई रुट डायवर्ट कर दिए गए और मेट्रो सेवा भी प्रभावित हुई. जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन पर कोई ट्रेन रुक नहीं रही. यहां न एग्ज़िट खुला है ना एंट्री. आसपास की ज़्यादातर दुकानें भी बंद हैं.

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एक ओर जहां जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे सीएए के विरोध में प्रदर्शन के लिए सैकड़ों लोग जमा हैं तो दूसरी ओर वहीं से महज़ एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर एक और समूह सड़क पर मौजूद था.

ये वो लोग थे जो सीएए का विरोध कर रहे लोगों के 'विरोध' में सड़क पर उतरे थे. उनके मुताबिक़, "जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं उन्हें इन क़ानून के बारे में पूरी जानकारी नहीं है और वे सिर्फ़ विरोध करने के लिए विरोध कर रहे हैं."

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बीबीसी से बात करते हुए इन्हीं में से एक शख़्स ने आरोप लगाते हुए कहा कि जो लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं उन्होंने गुट बना रखे हैं. बोरियों में पत्थर भर रखा है.

मौजपुर और जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन के बीच की दूरी दस से पंद्रह मिनट में तय की जा सकती है लेकिन सोच के लिहाज़ से दोनों छोरों पर खड़े लोग एक-दूसरे से काफ़ी दूर नज़र आते हैं.

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प्रदर्शन उग्र कैसे हो गया?

यह प्रदर्शन बिल्कुल वैसा ही था जैसा शाहीन बाग़ में. यहां भी प्रदर्शन का नेतृत्व महिलाएं ही कर रही थीं लेकिन ना तो अख़बारों में इसकी बहुत चर्चा थी और ना ही टीवी चैनलों ने वहां अपनी ओवी वैन भेजी थी.

प्रदर्शन में शामिल एक महिला ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा, "बहुत सीधी सी बात है. हम मेट्रो स्टेशन के नीचे इसलिए हैं ताकि सरकार को दिखाई दे. हम अभी तक शांति से प्रदर्शन कर रहे थे तो किसी ने पूछा नहीं इसलिए हम यहां जमा हुए हैं ताकि दिखाई दे और सुनाई भी दे."

जाफ़राबाद में ज़्यादातर औरतों ने बात करने से इनक़ार कर दिया. अगर कोई औरत बात करने के लिए राज़ी भी हुई तो दूसरे ने आकर उसे बात करने से मना दिया.

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प्रदर्शन में शामिल एक महिला ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप की ओर इतना ध्यान दे रहे हैं पर अपनी माताओं-बहनों पर उनका ध्यान क्यों नहीं जाता, जो बीते दो महीने से सर्द रातों में सड़कों पर हैं.

सीएए का विरोध कर रहे लोगों के 'विरोध' में सड़क पर उतरे लोगों की संख्या बेशक उतनी नहीं थी लेकिन उनकी बातों में नाराज़गी साफ़ थी. उनके नारे, उन नारों के बिल्कुल उलट थे.

ये सीएए के समर्थन में नारे लग रहे थे. इस प्रदर्शन में औरतों की गिनती बेशक कम थीं लेकिन उन्होंने बात करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई.

प्रदर्शन में शामिल एक महिला ने कहा, "इतने दिनों से ये लोग प्रदर्शन कर रहे थे हम बर्दाश्त कर रहे थे, लेकिन अब तो हद हो गई है. हमारे घरों में बच्चे हैं. उनके एग्ज़ाम हैं और वो पढ़ नहीं पा रहे."

उन्हीं में से एक शख़्स ने शाहीन बाग़ का उदाहरण देते हुए कहा, "इन्हें कोई हल चाहिए ही नहीं. पीएम और गृह मंत्री इतनी बार कह चुके हैं कि यह क़ानून नागरिक विरोधी नहीं है लेकिन इन्हें यक़ीन ही नहीं हो रहा. बात करने को बुलाया तो ये तय ही नहीं कर सके कि बात कैसे और कौन करेगा. कभी पांच हज़ार लोग बात करने जाते हैं क्या..."

वहां मौजूद लोगों का कहना था "ये जाफ़राबाद है और अगर किसी को लगता है कि वो इसे शाहीन बाग़ बना लेगा तो ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला."

विरोध-प्रदर्शन से आम लोगों को दिक़्क़तें

दिल्ली के कनॉट प्लेस से जाफ़राबाद पहुंचने में 30 से 40 मिनट का वक़्त लगता है लेकिन ये दूरी चार घंटे में तय की. वो भी किसी से लिफ़्ट मांगकर तो कुछ किलोमीटर पैदल चलकर.

जाफ़राबाद जाने के लिए हाईवे जाम था. लोग शिकायत कर रहे थे. कुछ सरकार को बुरा-भला कह रहे थे तो कुछ प्रदर्शन कर रहे लोगों को. लेकिन मौजपुर और जाफ़राबाद इलाक़े में आते ही यह तस्वीर बदल गई. यहां ट्रैफ़िक की समस्या दिख तो साफ़ रही थी लेकिन किसी को इससे शिकायत नहीं.

जाफ़राबाद मेट्रो के सामने एक नाला है. उसी नाले की पुलिया पर बैठे एक शख़्स से जब हमने पूछा तो उसने कहा, "कोई दिक्क़त नहीं है और होगी भी तो हम कहेंगे नहीं क्योंकि ये जो हो रहा है वो ज़रूरी है."

वहीं एक महिला ने गु्स्से में कहा, " जाम लगता है तो लगने दो, जनता को परेशानी होती है होने दो. जब ये सब सरकार देखेगी तभी उसे हमारी परेशानी समझ आएगी. तभी उस पर दबाव बनेगा."

वहीं ऑटोचालक और रिक्शा चलाने वालों की अपनी परेशानियां हैं. उनका कहना है कि पुलिस रोक रही है, सवारी मिल नहीं रही और मिनटों के सफ़र को तय करने के लिए घंटों के बराबर सीएनजी और बैटरी जलानी पड़ रही है.

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वहीं देर शाम ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (ईस्टर्न रेंज) ने बयान जारी कर कहा कि स्थिति नियंत्रण में है और उनके पुलिसकर्मी प्रदर्शन स्थल पर ही मौजूद हैं.

हालांकि उनका ये बयान पत्थरबाजी के बाद आया और जैसा कि उन्होंने कहा..पुलिसकर्मी उस वक़्त भी प्रदर्शन स्थल पर मौजूद ही थे.

एक ओर जहां जाफ़राबाद में प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि वो तब तक नहीं हटेंगे जब तक सरकार सीधे तौर पर बात नहीं करती, वहीं प्रदर्शन कर रहे लोगों का विरोध कर रहे स्थानीय लोगों का कहना है कि वो जाफ़राबाद को शाहीन बाग़ नहीं बनने देंगे.

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