अमरीका या रूसः सैन्य तकनीक-उपकरणों के लिए भारत किस पर ज़्यादा निर्भर?

  • 26 फरवरी 2020
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पहले इन पांच बातों को ध्यानपूर्वक पढ़िए.• 25 फ़रवरी, 2020 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि दुनिया के सभी ताक़तवर देशों के बीच, भारतीय सेना अमरीकी सैनिकों के साथ सबसे ज़्यादा ट्रेनिंग करती है. उन्होंने ये भी बताया कि अमरीकी और भारतीय सेना के बीच पारस्परिक संबंध काफ़ी बेहतर हुए हैं.• इसके जवाब और भारत के अमरीकी एमएच 60 आर सीहॉक और अपाचे हेलिकाप्टर ख़रीदनों को सही ठहराते हुए अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रप ने इन शब्दों को इस्तेमाल किया, "हमारे सैनिक प्रशिक्षण देना और साथ में काम करना जारी रखेंगे."• रूसी सरकार का कहना है कि, "भारत के विदेशी देशों के साथ सैन्य-तकनीकी संबंधों में रूस सबसे पहले स्थान है, रूस की हिस्सेदारी भारत के सैन्य तकनीकी उपकरणों में 60 प्रतिशत से ज़्यादा है." बीते साल, रूसी समाचार एजेंसी तास ने रिपोर्ट किया था कि भारत ने क़रीब 14.5 अरब डॉलर के हथियार और सैन्य उपकरणों की ख़रीद का ऑर्डर रूस को दिया है.• भारतीय वायुसेना, थल सेना और नौ सेना, साइज़ और मात्रा के हिसाब से दुनिया की इकलौती सेना है जिसने अमरीका और रूस दोनों देशों के हथियारों को प्रमुख हथियारों में जगह दी हुई है.• 2014 से 2018 के बीच, भारत दुनिया का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य हथियारों का आयातक देश था. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) के मुताबिक़ दुनिया भर में बेचे जा रहे हथियारों में 10 प्रतिशत की ख़रीददारी भारत कर रहा था.

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इन सबके क्या मायने निकलते हैं?संक्षेप में कहें तो, इन बातों से ज़ाहिर होता है कि भारत ऐसी हैसियत में है कि जैसा चाहे, वैसा चुन सकता है. कई लोग यह कह सकते है कि भारत को अपने पैसों के उपयोगी इस्तेमाल की स्वतंत्रता है.भारतीय नौसेना के प्रवक्ता रहे कैप्टन डीके शर्मा (रिटायर्ड) इसे समझाते हुए कहते हैं, "इतिहास से ये ज़ाहिर है कि हमने सारे अंडों को एक टोकरी में रखने जैसी ग़लती कभी नहीं की. हम अपने सैन्य उपकरणों के लिए केवल एक स्रोत पर निर्भर नहीं रहे. हम अपनी स्वायत्ता क़ायम रखने में कामयाब रहे. इसलिए आज देखते हैं कि रफाल जेट फ्रांस से आ रहे हैं, पी8आई और एमएच60 आर हेलिकाप्टर अमरीका से और हवा में रक्षा करने वाले एस400 सिस्टम रूस से आ रहे हैं, तो हमारी नीति वही है."अर्थव्यवस्था में सुस्ती और वैश्विक स्तर पर ऊंचे पायदान वाली सीट की चाहत को जोड़कर देखें तो यही सवाल उत्पन्न होता है कि क्या अब तक अपनाए भारत का दृष्टिकोण अभी भी सही है?

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इसके अलावा, एक पहलू और है जिस पर लोगों का ध्यान कम ही जाता है.कैप्टन शर्मा बताते हैं, "भारतीय वायु सेना का उदाहरण लीजिए. सुखोई विमान रूस से आए थे, जगुआर ब्रिटेन से लिए गए थे. फ्रांस भी एक अन्य आपूर्तिकर्ता देश था. इन अलग-अलग देशों से उपकरणों की ख़रीद का असर हमारे सिस्टम पर बहुत अधिक पड़ा. लॉजिस्टिक नज़रिए से देखें तो इनके पार्ट्स को हासिल करना, शार्ट नोटिस पर उन्हें देश के विभिन्न स्थानों तक पहुंचाना और उसे चालू हालत में बनाए रखना, यह बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ है."इन अलग अलग तरह के उपकरणों के रख रखाव के लिए विदेशी फ़र्म को हर साल करोड़ों रुपये का भुगतान अलग करना होता है.

कैप्टन शर्मा के मुताबिक़, "अगर हम आयात पर इतने अधिक निर्भर नहीं होते तो बाहर जाने वाला पैसा अपने देश में रहता. यही रफाल डील में भी हो रहा है."वैसे यहां यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि ऐसा भी नहीं है कि भारत ने इस दिशा में कुछ नहीं किया.आज भारत अपना एयरक्राफ्ट कैरियर, अपना फ़ाइटर जेट और अपना टैंक तक बना रहा है. लेकिन ये सब मिलकर भी भारत को उसकी मुश्किल से बाहर नहीं निकाल पा रहे हैं.ऐसे में सवाल यही है कि भारत इस दिशा में कुछ कर सकता है?

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विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) के पूर्व वैज्ञानिक और प्रवक्ता रहे रवि गुप्ता एक दिलचस्प पहलू की ओर ध्यान दिलाते हैं.वे बताते हैं, "भारत परमाणु चालित पनडुब्बी बना सकता है, अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल बना सकता है, बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च करने वाली पनडुब्बी तैयार कर सकता है. इतना ही नहीं एंटी-सैटेलाइनट मिसाइल भी तैयार कर सकता है. हम जो आयात करते हैं, उससे ये सब ज़्यादा बेहतर हैं. कितना अजीब है ये. मेरे ख्याल से आयात पर पाबंदी लगाने की इच्छा शक्ति से जुड़ा मसला है यह. लेकिन मैं गारंटी दे सकता हूं अगर हम इच्छा शक्ति दिखाएं तो हमारी स्वदेशी तकनीकी अधिक बेहतर परिणाम दे सकती हैं."रवि गुप्ता कहते हैं, "इस बाज़ार को बनाने के लिए हम ज़िम्मेदार हैं, जहां वैश्विक कंपनियां पाई पाई के लिए होड़ कर रही हैं. वे हम पर दबाव डालते हैं, वे हमें एक के बाद दूसरे, दूसरे के बाद तीसरे और ऐसे ही तमाम कंपनियों से ख़रीदारी करने के लिए धकेलती हैं."

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ऐसे में भविष्य में क्या होगा?

विदेशी मामलों और रणनीति पर नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता बताती हैं, "हमारी सैन्य निर्भरता काफ़ी हद तक रूस से शिफ्ट होकर अमरीका पर हो गई है. पहले जो तकनीक हमें नहीं दी जाती थी वह हमारे लिए अब उपलब्ध है. ऐसे में अमरीकी उपकरणों की संख्या बढ़ेगी. लेकिन मेक इन इंडिया को देखते हुए यह कितना अधिक होगा, यह सवाल बना हुआ है. इसके अलावा यह भी सही है कि जब अमरीका सख्ती से पेश आएगा और तकनीकों के स्थानांतरण पर रोक लगाएगा तो भारत एक बार यूरोपीय ताक़तों के साथ अपने संबंध मज़बूत करेगा."स्मिता शर्मा बताती है, "अभी यह निश्चित नहीं है कि भारत कब ख़ुद से अपनी ज़रूरतों को पूरी करने में सक्षम होगा और कब निर्यात करने की स्थिति में आएगा."स्मिता के मुताबिक़, "सैन्य सौदों का उपयोग अमूमन दो देशों के बीच सौदेबाज़ी की चिप के तौर पर होता है. इसका श्रेय भारत को देना होगा कि वह एक साथ अमरीका और रूस के साथ, ईरान और इसराइल के साथ संबंध रख रहा है. यह तनी हुई डोर पर चलने जैसा है लेकिन भारत के लिए नई बात बिलकुल नहीं है."

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