कश्मीरः जब सात महीने बाद खुले स्कूल

  • माजिद जहांगीर
  • श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
कश्मीर में खुले स्कूल

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जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किए जाने के सात महीने बाद सोमवार को कश्मीर घाटी में स्कूल फिर से खुल गए.

यूनीफ़ॉर्म पहने हज़ारों बच्चे स्कूल जाते नज़र आए.

स्कूल जाने के लिए उत्साहित अदा सुबह जल्दी ही उठ गईं और तुरंत यूनीफ़ॉर्म पहनने लगीं.

वो कहती हैं, "हम तो यूनीफ़ॉर्म पहनना ही भूल गए थे. मैं देखना चाहती थी कि अब मैं स्कूल यूनीफ़ॉर्म में कैसी लगती हूं. स्कूल के बिना ज़िंदगी बहुत मुश्किल थी."

वो पाँच अगस्त 2019 को याद करते हुए कहती हैं, "उस दिन सुबह जब हम उठे तो सबकुछ बदला हुआ था. इंटरनेट बंद था. दुकाने बंद थीं. सबकुछ बंद था."

अदा को पियानो सुनने की आदत है और वो इंटरनेट पर संगीत सुना करती थीं. वो कहती हैं, "सात महीनों तक इंटरनेट नहीं था. उन चीज़ों से दूर रहना जिनकी आदत थी बहुत मुश्किल था. अचानक स्कूल, इंटरनेट सबकुछ बंद हो गया था. ये झटके की तरह था."

अदा दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के फोर्बेल हाई स्कूल में नौवीं कक्षा में पढ़ती हैं

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भारत सरकार ने बीते साल जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म कर दिया था और इस राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था.

कश्मीर में बेहद सख़्त पाबंदियां भी लगाईं गईं थी जिसकी वजह से आम जनजीवन पटरी से उतर गया था.

अदा कहती हैं कि कश्मीर के स्कूली बच्चे सामान्य ज़िंदगी नहीं जी पाते हैं.

वो कहती हैं, "हमारे लिए सबकुछ अप्रत्याशित है. आज हमने स्कूली पोशाक पहनी हैं, हमें नहीं पता कि कल स्कूल खुलेगा या नहीं. हर दिन डरावना होता है. हमें सामान्य स्कूल लाइफ़ नहीं मिल पाती है. कश्मीर के हालात की वजह से हमारी शिक्षा भी बहुत ज़्यादा प्रभावित हुई है."

वो कहती हैं, "370 हटाए जाने के बाद हमें आठवीं क्लास के बोर्ड एग्ज़ाम देने थे. पेपर लिख पाना आसान नहीं था. बेहद डर के माहौल में हमने बोर्ड के एग्ज़ाम दिए. लेकिन अब वो वक़्त बीत गया है. आज मैंने स्कूल में अपने कई दोस्तों से मुलाक़ात की. आज स्कूल आकर ऐसा लगा कि पहली बार स्कूल आ रही हूं."

सरकार ने कश्मीर घाटी में फिर से स्कूल खोलने के कई प्रयास किए लेकिन ज़्यादा कामयाबी नहीं मिली. परिजनों ने अधिकतर बच्चों को घर ही रखा.

बीच-बीच में छात्र और परिजन कभी-कभी असाइनमेंट जमा करने ज़रूर स्कूल गए.

सातवीं की छात्रा महक मलिक ने बताया कि बीते सात महीनों में वो स्कूल में सिर्फ़ असाइनमेंट जमा करने ही आईं.

महक कहती हैं कि वो क्लास करना चाहती थीं लेकिन क्लास चल ही नहीं रही थी.

दिसंबर 2019 में सरकार ने स्कूलों में 12 हफ़्ते का शीतकालीन अवकाश कर दिया था. इस दौरान कॉलेज, यूनिवर्सिटी और शिक्षण संस्थान बंद ही रहे.

आठवीं की एक छात्रा महक रामेज़ कहती हैं, "सबसे ज़्यादा नुक़सान उन बच्चों का हुआ जिनके घर में कोई पढ़ाने वाला नहीं था. मेरे घर में भी कोई पढ़ाने वाला नहीं था. मेरे जैसे बच्चों के पास करने के लिए कुछ नहीं था. मैंने ख़ुद पढ़ने की कोशिश की. मेरे अम्मी-अब्बा मुझे नहीं पढ़ा पाए क्योंकि मेरा सिलेबस उनकी समझ से बाहर था. मेरे आसपास भी कोई टीचर नहीं था. मेरा बहुत नुक़सान हुआ."

फोर्बेल स्कूल के प्रिंसिबल अरशद बाबा कहते हैं कि बच्चों के स्कूल पहुंचने से उनकी उम्मीदें बंधी हैं.

बाबा कहते हैं, "हम अपने छात्रों को मुफ्त ट्यूशन दे पाए थे. हमने बच्चों को किताबें पढ़ते रहने की सलाह भी दी थी."

बच्चों को स्कूल जाता देख परिजन भी ख़ुश नज़र आए. लेकिन बच्चों को लंबे समय तक घर पर ही रखना उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं था.

अज़हर आफ़ाक़ स्कूल खुलने के पहले दिन अपनी बेटी को स्कूल छोड़ने आए.

वो कहते हैं, "बच्चों को घर पर रखना बेहद मुश्किल था. उनकी पढ़ाई छूट रही थी. बच्चों का सही मानसिक विकास स्कूल में ही होता है. परिजन बेहद परेशान थे. परिजनों के तनाव का असर बच्चों पर भी हो रहा था."

आफ़ाक़ कहते हैं, "मेरा बेटा तो आज सुबह पाँच बजे ही उठ गया था और बार-बार कह रहा था कि वो स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहा है. पहले हम बच्चों को उठाते थे, आज बच्चे ख़ुद ही उठ गए."

वो कहते हैं, "कश्मीर के ख़राब हालात की वजह से हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं."

दक्षिण कश्मीर के सैंट लूके स्कूल में पढ़ने वाले एक छात्र मोअज़्ज़म अमीन वानी कहते हैं कि उनके परिजन उन्हें घर पर पढ़ा रहे थे लेकिन टीचर की कमी कोई पूरा नहीं कर सकता.

इसी स्कूल के एक टीचर कहते हैं कि बीते सात महीनों में उन्होंने बहुत कुछ खो दिया.

वो कहते हैं, "जो नुक़सान हुआ है उसकी भरपाई नहीं की जा सकती है. पहले दो महीनों में तो हमारी बच्चों से कोई बात ही नहीं हो पा रही थी. फिर धीरे-धीरे हमने बच्चों से संपर्क करना शुरू किया. लेकिन अभी भी हमारे पास तेज़ रफ़्तार इंटरनेट नहीं है. बिना इंटरनेट की एजुकेशन ही नहीं बल्कि और भी बहुत चीज़ें प्रभावित हो रही हैं."

इसी बीच कश्मीर में स्कूल शिक्षा के निदेशक यूनुस मलिक ने शिक्षकों से लगन और मेहनत से बच्चों को पढ़ाने का आह्वान किया है.

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