दिल्ली हिंसा: पुलिस के रवैये पर बीबीसी संवाददाताओं की आंखों देखी

  • 26 फरवरी 2020
दिल्ली हिंसा इमेज कॉपीरइट Getty Images

उत्तर पूर्वी दिल्ली में बीते तीन दिनों से हिंसा की घटनाएं हो रही हैं. इलाक़े में हालात बिगड़े हुए हैं और तनाव पसरा हुआ है.

कई इलाक़ों में हिंसा और आगज़नी की घटनाएं हुई हैं. जाफ़राबाद, भजनपुरा, खजूरी ख़ास इलाक़ों में झड़पें और पथराव के मामले भी सामने आए.

इस सब के दौरान दिल्ली पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. कई इलाक़ों में लोगों ने इस बात के आरोप लगाए हैं कि जब पथराव और आगज़नी की घटनाएं हो रही थीं तो पुलिस कुछ नहीं कर रही थी.

बीबीसी संवाददाताओं ने कई इलाक़ों में जाकर हालात का जायज़ा लिया और कुछ जगहों पर उन्होंने भी पाया कि पुलिस निष्क्रिय रही. कई जगहों पर उपद्रवियों की भीड़ के आगे पुलिसवाले बेहद कम थे.

पढ़िए, बीबीसी संवाददाताओं ने किस इलाक़े में कब क्या देखा...

Image caption विनायक गायकवाड़, बीबीसी मराठी संवाददाता

जाफ़राबाद. 26 फ़रवरी. रात 12.30 बजे

विनायक गायकवाड़, बीबीसी मराठी संवाददाता

जाफ़राबाद से चांदबाग तक मुख्य सड़कों पर लोग कम ही दिखे लेकिन अंदर-अंदर गलियों में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और उनके पास लाठी, डंडे और रॉड थे. तनाव साफ देखा जा सकता था.

हम लोग रात में करीब 12 बजे जाफ़राबाद पहुंचे थे. प्रदर्शनकारियों को हटा दिया गया था. वहां बैरिकेड लगाया गया है और पुलिस किसी को आगे नहीं जाने दे रही. वो इलाका प्रदर्शनकारियों से खाली करा दिया गया है. पुलिसवालों ने कहा कि आप आगे जाना चाहते हैं तो जाइए लेकिन अपने रिस्क पर क्योंकि कर्फ्यू लगा है और उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के आदेश हैं.

हम गाड़ी से ही आगे बढ़े और वहां का जायजा लेकर लौट आए. हम गाड़ी से उतरे नहीं.

रात में करीब 12:30 बजे हम वापस जब बैरिकेड के पास लौटकर आए तब देखा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल का काफ़िला जा रहा था. वो वहां का जायजा लेने आए थे.

कड़ी सुरक्षा के बावजूद एक बाइक पर सवार तीन लड़के काफ़िले के बगल से ही गुजरे. उनके हाथों में डंडे और रॉड थे. वो जय श्री राम के नारे लगा रहे थे. वो लड़के एनएसए के काफ़िले से भी तेज़ स्पीड में थे और उनसे आगे निकल गए. किसी पुलिसकर्मी ने उन्हें नहीं रोका.

वहां से हम आगे बढ़े. यमुना विहार और चांदबाग के बीच में लोग रास्ते में जमा थे. एंट्री प्वाइंट सील किए गए थे. बैरीकेड लगे थे लेकिन बैरीकेड के पीछे काफ़ी भीड़ थी और जय श्री राम के नारे लगा रही थी.

रात में अधिकतर जगहों पर मुख्य सड़कों पर सन्नाटा था. एंट्री प्वाइंट सील थे इसलिए अंदर गलियों में जा नहीं पाए. मुस्तफ़ाबाद जाना चाहते थे लेकिन रास्ते बंद होने की वजह से जा नहीं पाए. रात में करीब ढाई बजे हम वापस लौट आए.

Image caption फ़ैसल मोहम्मद अली, बीबीसी हिन्दी संवाददाता

अशोक नगर. 26 फ़रवरी. सुबह 8 बजे

फ़ैसल मोहम्मद अली, बीबीसी हिन्दी संवाददाता

मंगलवार को जिस मस्जिद का वीडियो वायरल हो रहा था हम उसके बारे में पता करने गए थे. दिल्ली पुलिस बार-बार दावा कर रही थी कि ऐसी कोई घटना यहां नहीं हुई.

उस मस्जिद के बारे में कहा जा रहा था कि कुछ लोगों ने वहां भगवा झंडा और तिरंगा लगा दिया. हमने जाकर देखा कि मस्जिद में बुरी तरह तोड़फोड़ की गई थी. गली नंबर पांच पर यह मस्जिद है. मस्जिद में चप्पल और टोपियां बिखरी हुई थीं. पवित्र किताबों को नुकसान पहुंचाया गया.

वहां सुबह काफी भीड़ लगी थी. कोई भी आम आदमी वहां बात करने को तैयार नहीं था. ये हिंदू बहुल इलाका है. कुछ लोगों का कहना है कि बाहर से लोग आए थे और उन्होंने ये काम किया.

हम वहां थे तभी सूचना मिली कि अशोक नगर के ई ब्लॉक में एक स्कूल के पास दूसरी मस्जिद को जला दिया गया. हम वहां गए और पाया कि ये घटना सच है. वहां एक शर्माजी थे जिन्होंने अपने घर का सबमर्सिबल चालू किया और मस्जिद में लगी आग बुझाने में स्थानीय लोगों के साथ मशक्कत की. करीब 15 परिवार मुसलमानों के हैं और शर्मा जी का कहना है कि उन्होंने अपने पड़ोसियों की मदद की है. कोई बहुत बड़ा काम नहीं किया.

दोपहर करीब 01:00 बजे हम बाबरपुर की तरफ जा रहे हैं. बाबरपुर मेट्रो स्टेशन में आना-जाना बंद है. इलाके में जो बिजली के तार तोड़े गए हैं उन्हें ठीक किया जा रहा है. बिजली व्यवस्था चालू का काम जारी है.

Image caption सलमान रावी, बीबीसी हिन्दी संवाददाता

जाफ़राबाद. 25 फ़रवरी. दोपहर 2 बजे

सलमान रावी, बीबीसी हिन्दी संवाददाता.

हम चांदबाग की तरफ जाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उपद्रवियों की भीड़ सड़कों पर थी. लोगों को जाने नहीं दिया जा रहा था. मीडिया के लोगों से मारपीट की गई. आईकार्ड दिखाने के बाद भी भीड़ ने उनके साथ मारपीट की.

मीडियाकर्मियों का धर्म पूछा जा रहा था. एक मीडियाकर्मी का मोबाइल छीन कर फॉर्मेट दिया. ये भीड़ दोनों तरफ की थी. रॉड डंडे लेकर सड़कों पर हंगामा कर रही थी. देर शाम पैरामिलिट्री फोर्स बढ़ी और भीड़ को कंट्रोल करने की कोशिश की. पुलिस कह रही थी कि शांति है लेकिन उनकी जो हेल्पलाइन है उस पर लगातार फोन आ रहे थे कि माहौल ठीक नहीं है. अलग-अलग इलाकों से लोग बता रहे थे कि उनके घरों के सामने भीड़ जमा है और नारेबाजी कर रही है.

कुछ लोगों का आरोप है कि जाफ़राबाद का विरोध-प्रदर्शन और सड़क जाम करने के पीछे पिंजरा तोड़ नाम के संगठन की रणनीति थी और उनके कहने पर ही महिलाएं वहां जमा हुई थीं.

हालांकि पिंजरा तोड़ की एक सदस्य ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि उनके संगठन के लोग इस प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे लेकिन ये उनकी ओर से आयोजित नहीं था.

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Image caption बुशरा शेख़

जाफ़राबाद. 25 फ़रवरी. रात साढ़े दस

बुशरा शेख़, बीबीसी हिन्दी संवाददाता

जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन से काफ़ी पहले सड़क पर बैरीकेड लगाया गया था. पूरा इलाका सुनसान था. बहुत से लोग सामान लेकर निकल रहे थे. ऐसा लग रहा था कि लोग वो इलाका छोड़ कर जा रहे हैं.

पत्रकारों को भी आगे नहीं जाने दिया जा रहा था. भीड़ ने पुलिस की गाड़ी पर पथराव किया था. गाड़ियों के शीशे टूटे हुए थे. दुकानें बंद होने की वजह से खाने-पीने की दिक्कत हो रही है.

पुलिस फोर्स काफी थी. आंसू गैस के गोले और हथियारों से लैस थी. हमने रिक्शेवालों और दूसरे आम लोगों से बात करने की कोशिश की तो उनकी नाराज़गी साफ़ दिखी. लोग सरकार से नाखुश हैं और हिंसा के लिए सरकार को ही दोषी मान रहे हैं.

तक़रीबन चार बजे सलमान रावी और मैं मुस्तफ़ाबाद की तरफ़ बढ़े. वहां रास्तों पर सन्नाटा पसरा हुआ था. सड़क पर पत्थर ही पत्थर थे. घर जले हुए थे. बाहर लोग नहीं थे, सिर्फ़ हिंसा के निशान नज़र आ रहे थे. कई जगहों पर पुलिसबल तैनात था.

हम कुछ ऐसे घरों में गए जहां मंगलवार रात आग लगाई गई थी मगर धुंआ अब तक निकलता दिख रहा था. घरों में चप्पल, साड़ियां कपड़े और वॉशिंग मशीन...ये सब टूटे-फूटे बिखरे पड़े थे.

इसके बाद हम एक ऐसे घर में गए जहां शिव विहार से तकरीबन 400 महिलाओं को बचाकर लाया गया था. इन सभी महिलाओं को एक व्यक्ति ने अपने घर के नीचे पार्किंग में उन्हें रहने की जगह दी गई.

जैसे ही मैं उस पार्किंग हॉल में पहुंची, महिलाएं मुझे देखते ही मदद की पुकार लगाने लगीं. वो सब सिर्फ़ एक ही गुहार लगा रही थीं, ''हमारे जो घर बचे हैं, उन्हें बचा लिया जाए. वहां पुलिस भेजी जाए.''

वहां एक महिला ऐसी भी थी जिसकी गोद में तकरीबन चार महीने की बच्ची थी. ये सब देखना बहुत ही पेशान करने वाला था.

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Image caption श्रीकांत बंगाले

भजनपुरा. 25 फ़रवरी. दोपहर क़रीब 2 बजे

श्रीकांत बंगाले, बीबीसी मराठी संवाददाता

मेरे बायीं ओर खजूरी कच्ची था और दायीं ओर खजूरी खास. हम बिल्कुल बीचोबीच खड़े थे फ्लाईओवर पर. नीचे बहुत से लोग खड़े थे और जय श्री राम के नारे लगा रहे थे. खजूरी कच्ची में नमाज चल रही थी.

जैसे ही नमाज ख़त्म हुई मुस्लिम इलाके की तरफ से कुत्ते भागते नज़र आए. नमाज ख़त्म हुई तो खजूरी खास की तरफ जो भीड़ थी उसने एक पत्थर मुस्लिमों की तरफ फेंका. फिर दोनों तरफ से पत्थर चलने लगे. खजूरी कच्ची की तरफ का एक लड़का फंस गया और उसे पत्थर मार-मार कर अधमरा कर दिया गया.

थोड़ी देर बाद कुछ लड़के आए और उस लड़के को उठा ले गए.

नीचे जो लोग खड़े थे वो वीडियो बनाने और फोटो खींचने से मना कर रहे थे. लाठी डंडे दिखाकर धमकी दे रहे थे कि अगर किसी ने मोबाइल निकाला तो तोड़ दिया जाएगा. एक आदमी नीचे ट्रैफिक और बाकी लोगों को ऐसे मैनेज कर रहा था कि उन लोगों को किसी तरह की परेशानी ना हो और जो करने आए हैं वो करके जाएं.

वहां पुलिस थी लेकिन कुछ कर नहीं रही थी. पुलिस से नाराज होकर मुसलमानों ने थाना खजूरी खास पर पथराव करना शुरू कर दिया, इतना होने पर पुलिस एक्शन मे आई और मुस्लिमों की तरफ आंसू गैस के गोले छोड़े.

हम चांद बाग गए और वहां काफ़ी चीज़ें रिकॉर्ड की कैमरे पर. वहां से लौट रहे थे तभी कुछ लड़के आए और हमें फुटेज डिलीट करने के लिए बोलने लगे. हम उन्हें कह रहे थे कि हम अपना काम कर रहे हैं. तभी कुछ बुजुर्ग आए और उन्होंने लड़कों को समझाया जिसके बाद हम किसी तरह वहां से निकल पाए.

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Image caption दलीप सिंह

न्यू मुस्तफ़ाबाद. 25 फ़रवरी. शाम 4.30 बजे

दलीप सिंह, बीबीसी पंजाबी संवाददाता.

हम लोग न्यू मुस्तफाबाद पहुंचे तो गलियों से लोग बाहर निकले. दूसरे ओर बहुत से लोग छतों पर चढ़े थे और नारेबाजी कर रहे थे. मोहल्ले के कुछ बुजुर्ग आए और उन्होंने माहौल सही करने की कोशिश की. हम गलियों में गए तो लोग वहां मुस्तैद नज़र आए. एक लड़के ने मेरे मोबाइल से वीडियो डिलीट कर दिए. मुझे और मेरे साथियों को ऐसे घेरा गया था जैसे हमने गुनाह किया हो. मीडिया से हैं ये बताने के बाद भी वो लोग हमें छोड़ने को राजी नहीं थे. एक आदमी ने पीछे से मेरे सिर पर मारा. मुझे लगा था कि लिंचिंग ना हो जाए. थोड़ी ही देर में कुछ बुजुर्ग आए और उन्होंने लड़कों को रोका.

एक जगह शोर मचा कि एक लड़के को हाथ में गोली लगी है और तनाव बढ़ने लगा. हम किसी तरह उस इलाके से बाहर निकलने की कोशिश करने लगे. पुलिस ने एंट्री प्वाइंट पर बैरीकेड लगा रखे थे. हमने बताया कि मीडिया से हैं और बाहर निकलना है. उन्होंने आईकार्ड चेक किया और फिर आगे जाने दिया. हम वहां से निकल ही रहे थे तब देखा कि कुछ लोग ट्रे में समोसे लेकर आ रहे थे पुलिस वालों के लिए. पुलिस वाले आराम से समोसे खा रहे थे.

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