हिंसा प्रभावित बच्चे - 'हमारी किताबें जला दीं, अब हम कैसे पढ़ेंगे?'

  • गुरप्रीत सैनी
  • बीबीसी संवाददाता
हिंसा
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सारा

24 फ़रवरी को 11वीं में पढ़ने वाली सारा का एग्ज़ाम था. वो उत्तर-पूर्वी दिल्ली के इंदिरा विहार इलाक़े में रहती हैं. उनका स्कूल -सर्वोदय कन्या विद्यालय, घर से क़रीब तीन किलोमीटर दूर यमुना विहार में है.

वो स्कूल जाने की तैयारी कर रही थीं, तभी देखा कि अचानक बाहर सड़क पर लोग भागने लगे. उनकी अम्मी ने कहा, ''लगता है कुछ हो गया है.''

तभी कबीर नगर में रहने वाली सारा की सहेली का फ़ोन आता है. वो बताती हैं कि उसके इलाक़े में माहौल बहुत ख़राब हो गया है. "गोलियां चल रही हैं. दंगाई उनपर हमला करने के लिए उनकी गली में घुसने वाले हैं."

सारा क्लास की मॉनिटर हैं, इसलिए कबीर नगर-शिव विहार में रहने वाले उनके सहपाठी उन्हें फ़ोन करके कहने लगे कि ऐसे हालात में वो परीक्षा देने स्कूल कैसे आ पांएंगे.

सारा ने टीचर को फ़ोन किया. टीचर ने कहा कि प्रिंसिपल से बात करती हूं. कुछ देर में टीचर का फ़ोन आया, "प्रिंसिपल कह रही है कि एग्ज़ाम आज ही होगा. कैंसल नहीं कर सकते."

तनाव में दी परीक्षा

सारा बताती हैं कि इसके बाद वो जैसे-तैसे स्कूल पहुंची. उनके अंकल उन्हें स्कूल छोड़कर आए. कई बच्चे देरी से परीक्षा देने पहुंचे. इस तनाव की स्थिति में बच्चों ने परीक्षा दी. परीक्षा का वक्त साढ़े पाँच बजे तक था. लेकिन पाँच बजे ही बच्चों से आंसर शीट वापस ले ली गई.

बच्चों को मां-बाप के साथ ही वापस भेजा जा रहा था. जिनके घर वाले आते जा रहे थे, वो घर जाते जा रहे थे, बाक़ी इंतज़ार कर रहे थे.

शीबा भी उसी स्कूल में पढ़ती हैं. उन्हें लेने उनके पिता आए.

शीबा बताती हैं, "पूरा रोड सुनसान था. मेरा स्कूल दूसरे इलाक़े में है. जब हम अपने मौहल्ले में पहुंचे, मैंने देखा कि पुलिस की पूरी फ़ोर्स थी. हमारे इलाक़े का पूरा रोड ब्लॉक था. ना कोई बाहर आ रहा था, ना कोई अंदर जा रहा था. स्कूल के बच्चों को जाने दे रहे थे. हम पैदल आए. क्योंकि कोई रिक्शा नहीं था. बहुत डर लग रहा था. मैं बहुत डर गई थी. रास्ते में मैंने देखा एक आदमी को बहुत मारा गया था, वो ख़ून में लथपथ था. उसे लेकर जा रहे थे. मैं उसे देख रही थी. लोग कह रहे थे, यहां मत देखो. उसकी पूरी बॉडी डैमेज हो चुकी थी. मैंने हमेशा यहां रौनक़ देखी है, दुकाने खुली देखी हैं. लेकिन उस दिन जो देखा, मैं बहुत डर गई थी." शीबा कहती हैं कि उस रात वो सो नहीं पाई.

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दिल्ली हिंसा का शिकार रहे बच्चों ने क्या कुछ झेला?

चौथी में पढ़ने वाली एक और बच्ची बताती है, "हमारे स्कूल की जल्दी छुट्टी कर दी थी. स्कूल से बाहर आए तो पत्थर चल रहे थे. लोग सिलेंडर फेंक रहे थे. स्कूल के पास भी लडाई हुई. भाई का स्कूल जल गया था. जहां हम समोसे लेने जाते थे, वो जगह भी जला दी."

हालांकि दिल्ली सरकार ने इसके बाद घोषणा कर दी थी कि उत्तर पूर्व दिल्ली में अब सात मार्च तक सभी स्कूल बंद रहेंगे.

ऐसा "बच्चों की मनोस्थिति को ध्यान में रखते हुए किया गया, ताकि इन भयावह हालात का उनके दिलो-दिमाग़ पर जो असर हुआ है, उससे उन्हें बाहर आने में मदद मिले."

दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाक़े में तीन दिनों तक हिंसा होती रही थी, जिसने 40 से ज़्यादा लोगों की जान ले ली.

हिंसा में कई घर, दुकानें जला दिए गए. कई स्कूलों को भी आग के हवाले कर दिया गया. वहां से आईं जली हुई किताबों, टूटी हुई बेंचों की तस्वीरों ने देखने वालों को और झकझोर दिया.

ये कहते हुए परीक्षाएं रद्द कर दी गई थीं कि जल्द ही परीक्षा की नई तारीख़ों का ऐलान किया जाएगा.

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दो साल की विवान

'हमारा घर तोड़ दिया'

हिंसाग्रस्त इलाक़ों में हालात अब सामान्य हो रहे हैं, लेकिन बच्चों के दिलो-दिमाग़ पर इस हिंसा का असर अब तक है. बच्चे चाहे हिंदूओं के हों या मुसलमानों के, जिसने भी इन स्थितियों को देखा, उनके दिमाग़ पर इसका गहरा असर हुआ है.

शिव विहार के दो साल के विवान को नहीं पता कि ये सब क्यों हुआ. लेकिन उसे ये ज़रूर पता है कि इस सब से उसके घर को नुक़सान हुआ है.

विवान के चाचा अजीत तोमर बताते हैं कि उनके घर पर भी दंगाइयों ने हमला कर दिया था. पुलिस वालों ने उन्हें बचाकर वहां से निकाला. दूसरी जगह जाने पर उनके दो साल के भतीजे विवान ने उनसे पूछा कि क्या हमारा घर भी जल गया है. उन्होंने विवान को समझाया, कि नहीं...सब ठीक है. लेकिन जब वो विवान को घर लेकर गए तो वो ख़ुद ही पूरे घर में घुमकर देखने लगा और टूटी खिड़कियों को देखकर बोला, 'हमारा घर तोड़ दिया'.

विवान के घर के पास ही पड़ने वाले एक स्कूल - डीआरपी कॉन्वेंट स्कूल को दंगाइयों ने बुरी तरह तोड़-फोड़ दिया है. वहां हिंदुओं के बच्चे भी पढ़ते हैं और मुसलमानों के भी.

स्कूल की प्रिंसिपल इंदू शर्मा स्कूल की मरम्मत करवा रही हैं.

वो कहती हैं कि वो स्कूल दोबारा खुलने से पहले स्कूल को पहले जैसे करवा देंगी. "मैं नहीं चाहती कि बच्चे स्कूल को इस हालत में देखें. मैं चाहती हूं कि जिस स्कूल में बच्चों को शिक्षा मिलती है, उसे वो हमेशा अच्छी हालत में देखें."

गुरुवार को सीबीएसई ने कहा कि बोर्ड के आगे के पेपर सोमवार से तय तारीख़ों पर ही होंगे. लेकिन हिंसाग्रस्त इलाक़ों के बच्चे अब भी एग्ज़ाम की तैयारी नहीं कर पा रहे हैं.

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शिवपुरी की रिशिका चौहान

फ़ौज़िया अंसारी के 12वीं के बोर्ड के एग्ज़ाम हैं, वो कहती हैं, "पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं. हर जगह परेशान लोग नज़र आते हैं. हम भी रात को सो नहीं पा रहे. तैयारी नहीं हो पा रही. कोचिंग नहीं जा पा रहे हैं. बच्चे डरे हुए हैं. बस एक दो बच्चे कोचिंग आते हैं."

शिव विहार की रहने वाली रिशिता चौहान दसवीं में पढ़ती हैं. वो भी कहती हैं कि ऐसे हालात में पढ़ना बहुत ही मुश्किल है.

कई बच्चे तो ऐसे हैं जिनके घर हिंसा में जल गए हैं. उनके बस्ते-किताबें जल चुकी हैं.

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सानिया

नहीं देंगे एग्ज़ाम

सग़ीर दसवीं में हैं. लेकिन उनकी सारी किताबें जल चुकी हैं. वो कहते हैं कि ना उनके पास बस्ता है ना किताबें, वो कैसे एक्ज़ाम की तैयारी करेंगे? उनका कहना है कि वो अपने 10वीं के एग्ज़ाम नहीं दे पाएंगे.

हिंसा से बचने के लिए अपना घर छोड़कर आए कई बच्चे अपने घर वालों के साथ शिविरों में पनाह लेकर रह रहे हैं. उनका कहना है कि वो अपना सब कुछ छोड़कर वहां रह रहे हैं. उनकी किताबें जल चुकी हैं.

10 साल की सानिया कहती हैं, "हम स्कूल कैसे जा पाएगें? हमारे पेपर भी आ रेह हैं. हमारे घर जला दिए, हमारी किताबें जला दीं. सारी कॉपियां उड़ा कर फेंक रहे थे. पत्थरबाज़ी कर रहे थे. एक दूसरे को मार रहे थे. सबकुछ सपने में याद आता है. बहुत डर लगता है." ये कहते-कहते सानिया की आंखों से आंसू गिरने लगे.

हिंसाग्रस्त इलाक़ों में लोगों ने अपने छोटे बच्चों को रिश्तेदारों के घर भेज दिया है. ताकि वो इन हालात से दूर रह सकें. लेकिन इनके मां-बाप को यही चिंता है कि मासूम बच्चों के मन से कैसे इन चीज़ों को वो निकाल पाएंगे.

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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इस बारे में दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में वरिष्ठ मनोविज्ञानी डॉक्टर पंकज कुमार कहते हैं, "बच्चे चीज़ों को उस तरह प्रोसेस नहीं कर पाते जैसे बड़े करते हैं. अचानक जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो बच्चे एक तरह की कंडीशन - पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर में जा सकते हैं. जिन बच्चों ने ख़ुद हिंसा देखी है, जिन बच्चों के क़रीबी हिंसा से सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, जिन्होंने किसी को मरते हुए या जलते हुए भी देखा है."

डॉक्टर पकंज के मुताबिक़, ऐसे बच्चों को तुरंत काउंसलिंग की ज़रूरत पड़ती है. इसमें स्कूल और मां बाप की अहम भूमिका है. बच्चा अगर चुप-चुप, अकेला-अकेला रहने लगे, स्कूल में किसी से बात नहीं कर रहा है तो उस बच्चे की पहचान करने की ज़रूरत है और स्कूल काउंसलर के पास ले जाएं या किसी दूसरे साइकेट्रिसिस्ट के पास ले जाएं.

"इसमें कम्युनिटी, स्कूल और सरकार की ज़िम्मेदारी है. प्रोग्राम्स चलाए जाएं और जिन इलाक़ों में बच्चे प्रभावित हुए हैं, पता किया जाए कि स्कूल में बच्चों का प्रदर्शन कैसा रहा है. घर में मां-बाप देखें कि बच्चे के व्यवहार में क्या किसी तरह का बदलाव आया है. इसके बाद बच्चे की सही काउंसलिंग कराएं."

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