रेणु जयंती: आज होते 'अवॉर्ड वापसी गैंग' के सदस्य कहे जाते

  • जयशंकर गुप्त
  • वरिष्ठ पत्रकार, पूर्णिया से
फणीश्वरनाथ नाथ रेणु

स्वतंत्रता सेनानी, उपन्यासकार और लेखक-रिपोर्टर फणीश्वरनाथ नाथ रेणु का आज से जन्म शताब्दी वर्ष शुरू हो रहा है.

रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया ज़िले के ओराही हिंगना में हुआ था, आज वे होते तो उम्र के 99 वर्ष पूरा कर सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहे होते.

'मैला आँचल' और 'परति परिकथा' जैसे अमर उपन्यासों और 'मारे गए गुलफ़ाम' (जिस पर गीतकार शैलेंद्र ने बासु भट्टाचार्य के निर्देशन में फ़िल्म 'तीसरी क़सम' बनाई थी) जैसी अनेक कहानियों के शिल्पी रेणु का दुखद और असामयिक निधन 11 अप्रैल 1977 को हो गया था.

उन्हें हिंदी का दूसरा प्रेमचंद और उनके मैला आंचल को प्रेमचंद के गोदान के स्तर का कहा जाता है. रेणु ग्रामीण जीवन के जन-सरोकारों से जुड़े साहित्यकार, कथाकार ही नहीं थे बल्कि सामाजिक और राजनीतिक जीवन में उनका सक्रिय हस्तक्षेप रहता था.

इमेज स्रोत, RAJKAMAL PRAKASHAN

उन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम के साथ ही नेपाल में राजशाही के विरुद्ध और लोकतंत्र क़ायम करने के लिए चले आंदोलन में भी सक्रियता से भाग लिया था, भारतीय स्वाधीनता संग्राम में वह जेल भी गए थे.

आंचलिक साहित्यकार

रेणु की तमाम रचनाएं चूंकि पूर्णिया ज़िले के ग्रामीण जीवन और ख़ास तौर से मेला संस्कृति से जुड़ी थीं, हिंदी के कुछ आलोचकों ने उन्हें आंचलिक साहित्यकार के रूप में निरूपित कर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को सीमित करने की कोशिशें भी की लेकिन उनकी आंचलिकता में राष्ट्रीय परिदृश्य को देखा और समझा जा सकता है.

बिहार के वरिष्ठ लेखक और टिप्पणीकार प्रेमकुमार मणि कहते हैं, "मैला आँचल केवल एक अंचल विशेष की कहानी ही नहीं बल्कि हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की ख़ास व्याख्या भी है. मैला आँचल आज़ादी मिलने के तुरंत बाद की उस हलचल को दिखाता है जो भारत के गांवों में शुरू हुआ था. यह बिहार के एक गांव की कहानी है लेकिन इसे आप भारत के लाखों गांव की कहानी भी मान सकते हैं.

पश्चिमी विद्वानों का मानना था कि भारत का ग्रामीण ढांचा लोकतंत्र को बाधित करेगा. उन्हें यहां लोकतंत्र की सफलता पर संदेह था लेकिन रेणु तो एक गांव के ही लोकतंत्रीकरण की कहानी कहते हैं.

इमेज स्रोत, Teesri Kasam Movie Poster

इमेज कैप्शन,

रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' पर गीतकार शैलेंद्र ने 'तीसरी कसम' नाम से एक फ़िल्म भी बनाई

पद्मश्री के अलंकरण

रेणु अपने मैला आँचल में 'यह आज़ादी झूठी है' का नारा भी देते हैं, यही नहीं जब बिहार आंदोलन शुरू होता है और 4 नवंबर 1974 को पटना में प्रदर्शनकारियों और आंदोलन के नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर पुलिस की लाठियां चलती हैं, रेणु से रहा नहीं जाता. वे न सिर्फ़ आंदोलन में कूद पड़ते हैं बल्कि उन्हें मिले पद्मश्री के अलंकरण को वह तत्कालीन राष्ट्रपति को लिखे पत्र के साथ लौटा देते हैं. पत्र में वे 'पद्मश्री अलंकरण' को 'पापश्री' कहते हैं.

यही नहीं, उन्होंने बिहार के राज्यपाल को अलग से एक पत्र लिखकर बिहार सरकार से उन्हें हर महीने मिलने वाली 300 रुपये की वृत्ति को भी लौटा दिया था.

राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम लिखे उनके पत्रों और उनकी भाषा को भी देखें.

इमेज स्रोत, Renu Rachnawali

राष्ट्रपति को लिखी चिट्ठी

प्रिय राष्ट्रपति महोदय,

21 अप्रैल, 1970 को तत्कालीन राष्ट्रपति वाराह वेंकट गिरि ने व्यक्तिगत गुणों के लिए सम्मानार्थ मुझे पद्मश्री प्रदान किया था, तब से लेकर आज तक मैं संशय में रहा हूं कि भारत के राष्ट्रपति की दृष्टि में अर्थात भारत सरकार की दृष्टि में वह कौन सा व्यक्तिगत गुण है जिसके लिए मुझे पद्मश्री से अलंकृत किया गया. 1970 और 1974 के बीच देश में ढेर सारी घटनाएं घटित हुई हैं. उन घटनाओं में, मेरी समझ से बिहार का आंदोलन अभूतपूर्व है. 4 नवंबर को पटना में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लोक इच्छा के दमन के लिए लोक और लोकनायक के ऊपर नियोजित लाठी प्रहार, झूठ और दमन की पराकाष्ठा थी.

आप जिस सरकार के राष्ट्रपति हैं, वह कब तक लोक इच्छा को झूठ, दमन और राज्य की हिंसा के बल पर दबाने का प्रयास करती रहेगी? ऐसी स्थिति में मुझे लगता है कि पद्मश्री का सम्मान अब मेरे लिए 'पापश्री' बन गया है.

साभार मैं यह सम्मान वापस करता हूं.

सधन्यवाद

भवदीय

फणीश्वर नाथ रेणु

इमेज स्रोत, Renu Rachnawali

राज्यपाल के नाम ख़त

इसी तरह की चिट्ठी उन्होंने राज्यपाल को भी लिखी जिसमें कहा गया कि उन्हें मासिक सरकारी सहायता लेना मंज़ूर नहीं है.

प्रिय राज्यपाल महोदय,

बिहार सरकार द्वारा स्थापित एवं निदेशक, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना द्वारा संचालित साहित्यकार, कलाकार, कल्याण कोष परिषद द्वारा मुझे आजीवन 300 रु. प्रतिमाह आर्थिक वृत्ति दी जाती है, अप्रैल 1972 से अक्तूबर 1974 तक यह वृत्ति लेता रहा हूँ.

परंतु अब उस सरकार से, जिसने जनता का विश्वास खो दिया है, जो जनआकांक्षा को राज्य की हिंसा के बल पर दबाने का प्रयास कर रही है, उससे किसी प्रकार की वृत्ति लेना अपना अपमान समझता हूँ. कृपया इस वृत्ति को बंद कर दें.

सधन्यवाद

भवदीय

फणीश्वर नाथ रेणु

इमेज स्रोत, Renu Rachnawali

अवॉर्ड वापसी गैंग

पिछले वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में 'मॉब लिंचिंग' और बढ़ रही असहिष्णुता के विरोध में बहुत सारे साहित्यकारों, रचनाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने अलंकरण और पुरस्कार वापस किए थे. तब उन्हें सत्ता संरक्षित तबक़ों की ओर से 'अवार्ड वापसी गैंग' का सदस्य कहा जाने लगा था.

पूर्णिया में आज रेणु जन्मशती वर्ष के शुभारंभ पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने से पहले सोचता हूँ कि रेणु आज अगर होते और अपना पद्मश्री अलंकरण वापस करते तो संभवत: उन्हें भी 'एवार्ड वापसी गैंग' का सदस्य ही कहा जाता.

विडंबना देखिए, 1974 के नवंबर महीने में उनके पद्मश्री अलंकरण और सरकार की वृत्ति वापस करते समय जिस ख़ेमे के लोग उनकी जय-जयकार कर रहे थे, उनके ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे, आज वही लोग अवॉर्ड वापसी गैंग जैसे जुमलों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)