पढ़ने-लिखने में आगे, पर अब भी हिंसा क्यों झेल रहीं लड़कियां

पढ़ने लिखने में आगे, पर अब भी हिंसा-भेदभाव क्यों झेल रही हैं लड़कियां

दुनियाभर में लड़कियों की स्थिति शिक्षा के मामले में बेहतर हुई है लेकिन इसके बावजूद लड़कियों को समानतापूर्ण और कम हिंसक वातावरण अब भी नहीं मिल पा रहा है.

यूनिसेफ़ की महिलाओं की स्थिति पर आई ताज़ा रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि दुनियाभर में महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा होना अब भी आम है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले बीस सालों में स्कूल न जाने वाली लड़कियों की तादाद सात करोड़ 90 लाख कम हुई है और पिछले एक दशक में सेकेंड्री स्कूल में लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों की संख्या बढ़ी है.

अगर भारत की बात की जाए तो भारत में लड़कियों और लड़कों के लिंगानुपात की स्थिति बेहतर हुई है. प्राथमिक विद्यालयों में लैंगिक अनुपात सुधरा है. जिसके चलते बाल विवाह में कमी आई है और किशोरावस्था में गर्भधारण के मामले आधे हुए हैं.

शिक्षा मिली, पर अब भी सह रही हिंसा

चौंकाने वाली बात ये है कि दुनियाभर में 15 से 19 साल की उम्र की एक करोड़ तीस लाख लड़कियां, यानी हर 20 में से एक लड़की बलात्कार की शिकार हुई है.

भारत में राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वेक्षण के 2015-16 के आंकड़ों के मुताबिक़ 15 साल की उम्र तक भारत में हर पाँच में से एक लड़की यानी एक करोड़ बीस लाख लड़कियों ने शारीरिक हिंसा झेली है.

वहीं, हर तीन (34%) में से एक लड़की (उम्र 15-19) ने, चाहे वो शादीशुदा हो या परिवार के साथ रहती हो, अपने पति या पार्टनर से शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा की पीड़ित रही है.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वेक्षण की मानें तो 16 फ़ीसदी लड़कियों (15-19) ने अपने साथ हुई शारीरिक हिंसा की बात बताई है. तीन फ़ीसदी ने यौन हिंसा की बात कही है. वहीं, 15 से 49 साल की कभी भी शादीशुदा रही महिलाओं में से 31% ने पति की ओर से शारीरिक, यौन या मानसिक प्रताड़ना सही है.

भारत में अब भी चार में से एक लड़की की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो जाती है.

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यूनिसेफ़ की कार्यकारी निदेशक हेनरिटा फॉ कहती हैं, "महिलाओं को शिक्षा प्रदान करना ही काफ़ी नहीं है. हमें लोगों का बर्ताव और लड़कियों के प्रति उनकी सोच को भी बदलना होगा."

सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी कहती हैं कि महिलाओं और लड़कियों के साथ हिंसा और भेदभाव होने की वजह पितृसत्तात्मक समाज है.

वह कहती हैं, "महिलाओं पर ताक़त दिखाने और नियंत्रण रखने के लिए पुरुष ऐसा करते हैं, ताकि महिला हमेशा उनसे कमतर रहे, उसे बराबरी का हक़ ना मिले. बदलाव के लिए शिक्षा के साथ-साथ इस सत्ता का बदलना भी ज़रूरी है. जब तक पुरुष और महिला की बराबरी का भाव समाज में मूल्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक महिलाओं पर हिंसा होती रहेगी."

रंजना कहती हैं, "इसका एक कारण ये भी है कि लड़कियां अब चुप नहीं रहती हैं. लड़कियां अब शिकायत दर्ज करवा रही हैं. वो अपने साथ हो रहा ग़लत व्यवहार बर्दाश्त नहीं कर रही हैं. ऑफि़स में होने वाले यौन दुर्व्यवहार और घर की मारपीट को वो सहन नहीं करतीं. वो बोल रही हैं. इसलिए भी आपको आंकड़े बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं."

रंजना कुमारी कहती हैं, "आपके स्वाभिमान को जगाने और स्वतंत्रता दिलाने का रास्ता शिक्षा ही है. शिक्षा वो सीढ़ी है, जिसपर चढ़े बग़ैर महिलाओं को पता नहीं चलेगा कि उनके क़ानूनी और संवैधानिक अधिकार क्या हैं. साथ ही अधिकार के बारे में जानना और वो अधिकार इस्तेमाल करना दोनों अलग बातें हैं. जब वो अपने अधिकारों को जानेंगी तभी उसे ले पाएंगी. इसलिए शिक्षा सबसे ज़रूरी है. ये महिलाओं के सशक्तीकरण की पहली शर्त है."

"आने वाले वक़्त में लड़कियां कहीं भी पीछे नहीं रहने वाली हैं. शिक्षित और स्वतंत्र लड़कियां अपनी अस्मिता की रक्षा का महत्व समझती हैं. शिक्षा के ज़रिए जैसे-जैसे वो क़ाबिल हो रही हैं, तो आने वाले समय में उनके साथ कुछ भी करना इतना आसान नहीं होगा. लड़कियों के लिए बहुत से क़ानून भी बन गए हैं. इन क़ानूनों के इस्तेमाल से उनके साथ ग़लत करने वालों को सबक़ मिलेगा और वो हिंसा करने से डरेंगे."

रंजना कुमारी का मानना है, "पुरुषों में भी एक बड़ी जमात ऐसी सामने आ रही है, जो इस बात का महत्व समझती है कि लड़कियों को बराबरी मिलनी चाहिए. नए समाज की संरचना में ऐसे शिक्षित लड़के-लड़कियों की भूमिका अहम है. साथ ही परिवार में मां-बाप को अपने लड़कों को ये बात समझानी पड़ेगी कि इस तरह की हिंसा करने का किसी को हक़ नहीं है. ऐसे अधिकार ना उन्हें संविधान देता है, ना धर्म देता है और ना पारिवारिक मूल्य देते हैं. ऐसा होगा तो निश्चित तौर पर हिंसा समाज से ख़त्म हो जाएगी."

यूनिसेफ़ इंडिया की प्रतिनिधि डॉ. यासमिन अली हक़ कहती हैं कि बाल विवाह और शिशु मृत्यु दर को तब तक ख़त्म नहीं किया जा सकता है, जब तक हर बच्चे को स्कूली शिक्षा और आगे बढ़ने के लिए हिंसा मुक्त समाज ना मिले.

प्लान इंटरनेशनल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहते हैं, "ख़ासतौर पर 10 से 19 साल की लड़कियां अपनी उम्र और जेंडर की वजह से बहुत ज़्यादा भेदभाव झेलती हैं. इसके बावजूद उनके समुदायों में उन्हें दरकिनार किया जाता रहा है और फ़ैसलों में उनकी राय नहीं ली जाती है. सरकारी नीतियों में उन्हें ज़्यादातर नज़रअंदाज़ किया जाता है."

वो ज़ोर देते हैं कि किशोर लड़कियों के सशक्तीकरण से समाज को तीन स्तरों पर फ़ायदा हो सकता है - पहला- आज की किशोर लड़कियां, दूसरा- वही लड़कियां आगे व्यस्क होंगी और तीसरा- आगे की पीढ़ियों के बच्चे.

हालांकि, भारत सरकार बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सुकन्या समृद्धि योजना और अनिवार्य मातृत्व अवकाश नियम जैसे क़दमों के ज़रिए लैंगिक असमानता की चुनौतियों से निपटने की कोशिश कर रही है.

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