दिल्ली हिंसा: नुक़सान और मुआवज़े की पूरी कहानी

  • सरोज सिंह
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कैप्टन कटोरा

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24 फरवरी, दोपहर 12 बजे तक कैप्टन कटोरा कुछ ऐसा दिखता था.

चमचमाती लाइट्स, रंग-बिरंगे गुब्बारे, फूल और माला से कुछ इस तरह से इसे सजाया गया था कि हर आने-जाने वाले की निगाह सबसे पहले उसी पर पड़े.

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नुक़सान और मुआवज़े की पूरी कहानी

ताकि भजनपुरा के मेन रोड से आपको ये रेस्तरां दूर से ही दिख जाए. रेस्तरां के सामने खड़ा ये 'जैक स्पैरो'- कुछ इस तरह से बनाया गया था मानो वो रेस्तरां की हिफ़ाज़त में खड़ा हो.

एक पल के लिए देखकर किसी को लगेगा कि जैक स्पैरो जैसे दिखने वाले इस बुत को यहां इसलिए खड़ा किया गया होगा ताकि कोई भी अनहोनी होने पर वो रेस्तरां को बचा ले. उस दिन वहां एक पार्टी की तैयारी थी.

लेकिन 24 फरवरी देर शाम तक दंगाई वहां पहुंचे चुके थे. रेस्तरां की सजावट पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी. कुछ घंटों में पार्टी मातम में तब्दील हो चुकी थी. पार्टी में शामिल होने आए सभी गेस्ट की गांड़ियां देखते ही देखते जल कर राख हो गईं, गेस्ट जल्दी-जल्दी में पीछे के दरवाज़े से किसी तरह जान बचा कर निकले.

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4 मार्च का हाल

तक़रीबन हफ़्ते भर बाद ये रेस्तरां बुधवार को खुला. उस दिन का खाना आज तक वहां पड़ा सड़ रहा था. ज़ाहिर है वहां सुबह से बोहनी तक नहीं हुई थी. रेस्तरां की बत्ती गुल थी और शेफ़ ड्यूटी पर नहीं आए थे. केवल रेस्तरां के मालिक रवि शर्मा वहां मौजूद थे. जैसे ही बीबीसी की टीम वहां पहुंची वो बिफर पड़े. मानों हफ़्ते भर की ज़िंदगी में सालों का दर्द सहा था.

रवि ने कहा, "बाहर से दुकान को आग लगा दी गई. किसी तरह गेस्ट और शेफ़ को पीछे से निकाला. बाद में जब हमने वापस आकर अगले दिन चेक किया तो पता चला कि रेस्तरां से होम थिएटर, दो प्लाज़्मा टीवी, कंप्यूटर सब ग़ायब था. बाहर का डेकोरेशन भी पूरी तरह जल चुका था. जब हमने हिसाब लगाया तो पता चला कि कम से कम 17 से 18 लाख का नुक़सान हुआ है."

जैसे ही रवि अपना नुकसान गिनाने लगे, वैसे ही हमने पूछा, सरकार तो नुक़सान की भरपाई जल्द से जल्द करने की बात कह रही है. आपने मुआवज़ा लेने वाला फ़ॉर्म नहीं भरा क्या?

वो तुरंत बोले, "जिस दिन सरकार ने एलान किया अगले दिन ही फ़ॉर्म भर दिया. एसडीएम से लेकर, पार्षद से लेकर विधायक तक सबके चक्कर काट चुके. हमारी सुधि लेने वाला कोई नहीं."

कैप्टन कटोरा के मालिक रवि शर्मा का दावा है कि एक ही मोहल्ले में उन्होंने दो दुकान किराए पर ली है. दोनों दुकानें एक ही रोड पर अगल-बगल हैं. एक का इस्तेमाल पार्टी बुकिंग के लिए करते हैं और एक का डाइनिंग के लिए. दोनों दुकानों का महीने का लगभग ढाई लाख रूपए किराया जाता है. उनके दोनों रेस्तरां में कुल मिलाकर 38 स्टॉफ़ काम करते हैं. सब कुछ आठ दिन से बंद है.

ये पूछने पर कि मुआवज़े के लिए कोई सर्वे करने वाले तो आए होंगे?

रवि का कहना है कि अभी तक कोई नहीं आया. बताइए कहां से घर चलेगा. आगे दुकानदारी कब पटरी पर लौटेगी इसका भी पता नहीं.

दिल्ली सरकार का पक्ष

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समाप्त

दंगों के तुंरत बाद ही दिल्ली सरकार ने मुआवज़े का एलान किया था. वयस्क की मौत पर परिवार को 10 लाख रुपए, 18 साल से कम उम्र वाले की मौत पर 5 लाख रुपए, गंभीर रूप से घायल वाले को पांच लाख और कम घायल को 20000 रुपए देने का एलान किया है. इन दंगों में अनाथ हुए बच्चों के लिए भी दिल्ली सरकार ने 3 लाख मुआवज़ा राशि देने का एलान किया था.

बीबीसी की टीम यहां से निकलकर कैप्टेन कटोरा की दूसरी दुकान पर पहुंची. पास ही बाहर से जला एक घर दिखा. वहां रंगाई-पुताई का काम चल रहा था. अंदर झांक कर पूछा तो पता चला, रेस्तरां इसी घर के नीचे किराए पर चलता है. कैप्टन कटोरा के साथ-साथ उनके घर को भी दंगाइयों ने नहीं छोड़ा. घर के मालिक दीपक गर्ग ने बताया उन्होंने भी मुआवज़े के लिए फ़ॉर्म भरा पर अभी तक कोई जांच करने नहीं आया और ना ही पैसे एकाउंट में आए हैं.

'हमारी तो मेन रोड की दुकान है, घर है. ये भी नहीं दिखता क्या. इसका और क्या प्रूफ़ दें हम. पार्षद, विधायक सब आए. लेकिन कुछ न मिला.' कैमरा के सामने दीपक गर्ग ने बिना सवाल पूछे मन में जो आया पूरा एक सांस में बोल दिया और अंत में पूछा कितने दिन दफ्तरों के चक्कर काटते सो हमने खुद ही मरम्मत करवानी शुरू कर दी.

दीपक गर्ग का प्लॉट यमुना विहार मेन रोड पर है. 200 गज में उनकी कोठी है, जिसका नीचे का हिस्सा उन्होंने कैप्टन कटोरा को किराए पर दिया है. 24 तारीख़ को दंगाइयों ने जब वहां आग लगाई तो बड़ी मुश्किल से उन्होंने पड़ोसी के छत से जाकर अपनी और परिवार की जान बचाई. बाद में घर पहुंचे तो आगे का हिस्सा पूरी तरह जल कर राख हो चुका था.

मुआवज़ा न मिलने की कुछ वजह दीपक कैमरे पर बताते हैं और कुछ बिना कैमरे के.

बीबीसी के कैमरे पर उन्होंने साफ़ कहा कि घर जलने का जो मुआवज़ा है वो 25-30 गज वाले मकानों के लिए है. लेकिन 200 गज वालों के लिए कुछ नहीं है. कैमरे के बिना उन्होंने राजनीतिक पार्टियों की प्रतिद्वंद्विता की ओर इशारा किया.

मुआवज़ा मिलने में दिक्कत

मुआवज़ा मिलने में एक दूसरी दिक़्क़त भी है. दीपक के घर पर उस दिन दो गाड़ियां भी थीं. चार पहिया एक गाड़ी थी और दूसरी दो पहिया गाड़ी. दोनों जल कर राख हो गईं. दीपक का दावा है कि जांच के लिए पुलिस जली गाड़ियां उनके घर से ले गई.

इंश्योरेंस क्लेम वाले बोले जली गाड़ी चाहिए, बिना उसके क्लेम नहीं मिलेगा. तो हम तो दोहरी मार झेल रहे हैं. इंश्योरेंस भी नहीं है और गाड़ी भी नहीं है और मुआवज़ा भी नहीं है.

दिल्ली दंगों में नुक़सान

दिल्ली सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक़ 3 मार्च तक हिंसा में प्रभावित लोगों को 38.75 लाख रुपए मुआवज़े के तौर पर दिए गए हैं, कुल 79 घरों को जलाया गया है, 168 घर आधे से ज़्यादा जले हैं, 327 दुकानें पूरी तरह जल कर राख हो गईं.

सरकार ने लोगों तक मुआवज़े की रकम पहुंचाने के लिए मुस्तफ़ाबाद इलाक़े में एक सहायता कैंप भी लगाया है ताकि लोगों को सहायता कैम्प में रहने की सुविधा मिले और मुआवज़े का फ़ॉर्म भी भरवाया जा सके.

ईदगाह कैंप का हाल

बीबीसी की टीम जब वहां पहुंची तो अफरा-तफरी का माहौल था. ईदगाह पर लगे इस कैम्प में तक़रीबन 300-400 लोग हमें दिखे. ज़रूरी सामान भी वहां मौजूद था. गद्दा, पानी, कपड़ा, खाना, और मुआवज़े वाला फॉर्म भरने वाले कुछ वॉलेंटियर भी.

वॉलेंटियर जहां मौजूद थे, उस टेंट के बाहर लिखा था - 'लीगल एड यानी क़ानूनी सलाह केंद्र.'

चार-पांच कुर्सियों पर वहां नौजवान वॉलेंटियर बैठकर हिंसा पीड़ित लोगों से पूछ रहे थे - आपका कितने का नुक़सान हुआ?

सहायता फ़ॉर्म भरवाने वाले ने पूछा - कैसे पता करेंगे?

फ़ॉर्म भरने वाले वॉलेंटियर ने फिर कहा - टीवी, फ्रीज़, पलंग और घर में किस किस चीज़ का नुकसान हुआ है? उनकी कितनी क़ीमत रही होगी. ये सब बताओ, वो भरना है.

सहायता फ़ॉर्म भरवाने वाले ने कहा - यही कोई कुल 50000 रुपए का.

तो वॉलेंटियर ने फॉर्म पर क्लेम में 50000 रुपए लिख दिया.

हम सोच में पड़ गए क्या फ़ॉर्म भरते समय वेरिफ़िकेशन नहीं हो रहा. भला इन फ़ॉर्म का होता क्या होगा?

बहुत खोजने पर हमें दिल्ली वक़्फ बोर्ड की तरफ से बनाई गई एक कमेटी के सदस्य चौधरी ज़हीन अब्बास मिले. मीडिया से बात करने के लिए ईदगाह सहायता केंद्र ने उन्हें ही नियुक्त किया था. उन्होंने हमें बताया कि पता चला दिन में एक बार इलाक़े के एसडीएम वहां आते हैं और जमा किए फ़ॉर्म ले जाते हैं.

दिल्ली सरकार ने दंगा पीड़ितों के लिए 11 राहत कैंप बनाए हैं. उनमें से 9 नाइट शेल्टर है, एक श्रीराम कॉलोनी सेंटर है और एक ईदगाह राहत कैंप.

हमने वहां भी लोगों से मुआवज़े के बारे में पूछा. जितने लोगों से हमने बात की उनमें से किसी को किसी तरह का मुआवज़ा नहीं मिला था, ज़्यादातर लोगों ने लेकिन फ़ॉर्म ज़रूर भर दिया था.

घायलों को मुआवज़ा

वहां से हम निकले अल-हिंद अस्पताल. ईदगाह कैंप से कुछ ही दूरी पर ये अस्पताल है. इसी अस्पताल में घायलों का इलाज़ कराने के लिए आधी रात को कोर्ट ने सुनवाई की थी.

वहां हमारी मुलाक़ात दानिश की मां इशरत से हुई थी. इशरत का दावा है कि उनके बेटे को दंगे के दिन गोली लगी. जीटीबी अस्पताल में इलाज ठीक से नहीं हुआ तो वो उसे वापस अल-हिंद अस्पताल ले आईं. ईदगाह कैंप में जाकर पहले ही दिन फ़ॉर्म भरा लेकिन अभी तक कोई पैसा नहीं आया और आज भी उन्हें मुआवज़े का इंतज़ार है.

बीबीसी की टीम जैसे ही वहां से जाने को हुई इशरत ने पीछे से कहा - हम तक तो केवल आप पत्रकार लोग ही पहुंच रहे हैं, ना तो मुख्यमंत्री आए ना ही कोई नेता ना ही उनका कोई नामलेवा.

उत्तर पूर्वी दिल्ली में सीएए के विरोध में प्रदर्शन चल रहे थे. 23-24 फरवरी के रात से सीएए के पक्ष में प्रदर्शन करने वालों के साथ उनके विरोध ने उग्र रूप ले लिया था. 24 तारीख से स्थिति ज्यादा बिगड़ गई. उत्तर पूर्वी दिल्ली में तीन दिन तक चली इस हिंसा में 50 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

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