दिल्ली दंगे: हर्ष मंदर ने भड़काऊ भाषण देने वाले बीजेपी नेताओं के ख़िलाफ़ याचिका दायर की है.

  • मोहम्मद शाहिद
  • बीबीसी संवाददाता
हर्ष मंदर

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सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर पर क़ानूनी मामला चलाए जाने के मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने हर्ष मंदर से अपना जवाब दाख़िल करने को कहा है.

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर करके कहा था कि हर्ष मंदर ने न्यायपालिका का अनादर किया है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले की सुनवाई 15 अप्रैल तक के लिए टाल दी है.

दिल्ली पुलिस ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर किया था जिसमें उसने कहा था कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दिसंबर 2019 में हर्ष मंदर ने कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी की थी.

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हर्ष मंदर के भाषण की ट्रांसक्रिप्ट मुहैया कराई जिसमें वो कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी कर रहे हैं.

कैसे हुई शुरुआत?

दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत हर्ष मंदर की एक जनहित याचिका के बाद हुई थी.

हर्ष मंदर ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर बीजेपी के नेताओं--अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, अभय वर्मा और कपिल मिश्रा पर दिल्ली में हिंसा भड़काने और भड़काऊ भाषण देने के मामले में एफ़आईआर दर्ज करने की मांग की थी.

साथ ही, उनकी मांग थी कि दिल्ली दंगे मामलों की जांच की जाए.

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले को स्थगित कर दिया था जिसके बाद हर्ष मंदर ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी.

सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हर्ष मंदर के पुराने भाषण पर सवाल खड़े किए थे, जिसके बाद उनसे जवाब तलब किया गया है.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब दिल्ली हाईकोर्ट में दंगों से जुड़ी सुनवाई 12 मार्च को होगी.

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आख़िर हर्ष मंदर ने क्या कहा था?

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अंदर पुलिस की कार्रवाई के एक दिन बाद 16 दिसंबर को हर्ष मंदर जामिया पहुंचे थे.

वहां पर छात्र पुलिस की कार्रवाई, नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.

इस दौरान हर्ष मंदर ने जामिया के गेट नंबर 7 पर आठ मिनट से अधिक लंबा भाषण दिया था.

उन्होंने कहा था, "यह लड़ाई पहले हमारे देश के लिए, फिर हमारे संविधान के लिए है और उसके बाद यह लड़ाई मोहब्बत के लिए है."

हर्ष मंदर अपने भाषण में फिर सरकार पर हमलावर होते हैं. वो कहते हैं कि इस सरकार ने न सिर्फ़ इस देश के मुसलमानों के ख़िलाफ़ ललकार और जंग छेड़ी है बल्कि यह पूरे देश की संकल्पना के ख़िलाफ़ है.

इस भाषण में 5 मिनट के बाद वो अपनी उस बात पर आते हैं जिसको लेकर उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामला चलाए जाने की बात की जा रही है.

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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समाप्त

हर्ष मंदर भारत में सभी धर्मों के बराबरी के हक़ की बात करते हुए कहते हैं कि आज सड़कों पर इसलिए उतरना पड़ा है क्योंकि देश के संविधान और उसकी आत्मा को बचाना है.

इसके बाद वो कहते हैं, "यह लड़ाई संसद में नहीं जीती जाएगी क्योंकि हमारे राजनैतिक दल जो ख़ुद को सेक्युलर कहते हैं, उनमें लड़ने के लिए नैतिक साहस नहीं है. यह लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं जीती जाएगी क्योंकि हमने पिछले कुछ वक़्त में सुप्रीम कोर्ट को एनआरसी, अयोध्या, कश्मीर के मामलों में देखा है. सुप्रीम कोर्ट ने इंसानियत, समानता और सेक्युलरिज़्म की रक्षा नहीं की है."

हालांकि, हर्ष मंदर इस बयान के बाद कहते हैं कि वो सुप्रीम कोर्ट में कोशिश ज़रूर करेंगे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट उनका है लेकिन फ़ैसला न संसद में और न ही सुप्रीम कोर्ट में होगा, यह फ़ैसला सड़कों पर और दिलों में होगा.

इसके बाद हर्ष मंदर कहते हैं कि नफ़रत का जवाब नफ़रत नहीं हो सकता, अगर देश में कोई अंधेरा कर रहा है तो उसका सामना चिराग़ जलाकर ही किया जा सकता है.

अपने भाषण को हर्ष मंदर ने 16 दिसंबर को रिट्वीट भी किया था.

हर्ष मंदर संविधान ज़िंदाबाद और मोहब्बत ज़िंदाबाद के नारे लगाने के बाद अपना भाषण समाप्त करते हैं.

इस वीडियो के अलावा बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने हर्ष मंदर का एक दूसरा वीडियो ट्वीट किया है जिसमें वो अल्पसंख्यक और छात्रों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की आलोचना कर रहे हैं.

यह वीडियो जनवरी 2020 की एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस का अधूरा हिस्सा है. इसमें हर्ष मंदर लगभग वही बात कर रहे हैं जो उन्होंने जामिया में अपने भाषण में कही थी.

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क्या क़ानूनी मामला चलाया जा सकता है?

हर्ष मंदर को उनके बयान के लिए सोशल मीडिया पर काफ़ी ट्रोल किया जा रहा है. एक पक्ष उनका समर्थन कर रहा है तो दूसरी ओर उनकी आलोचना की जा रही है.

उनके बयान को क़ानूनी नज़रिए से किस तरह से देखा जाना चाहिए. इसको लेकर हमने हैदराबाद की लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति फ़ैज़ान मुस्तफ़ा से बात की.

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि हर्ष मंदर एक ओर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वो कह रहे हैं कि उनका सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है, इससे लगता है कि वो सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ नहीं हैं.

वो कहते हैं, "अगर आप हर्ष मंदर के पूरे भाषण को सुनें तो पाएंगे कि वो कहते हैं कि यह लड़ाई दिलों की लड़ाई है. वो कहते हैं कि दिलों में एक-दूसरे के नफ़रतें पैदा हो गई हैं और इसमें संसद और सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं कर सकते हैं."

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़े के एक बयान के बारे में बताते हुए कहते हैं कि दिल्ली में हुए दंगों पर जस्टिस बोबड़े ने कहा था कि कोर्ट के आदेशों से यह मामला हल नहीं होगा क्योंकि दिलों में खाइयां पैदा हो गई हैं."

हर्ष मंदर जामिया में दिए अपने भाषण में कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट से हमारा भरोसा उठ गया है. क्या इसके आधार पर उन पर न्यायालय की अवमानना का मामला चलाया जा सकता है?

वीडियो कैप्शन,

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फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि कभी भी भाषण के एक अंश के हवाले से मामला चलाया नहीं जाता है बल्कि पूरा भाषण बहुत मायने रखता है.

वो कहते हैं, "अगर आप पूरा भाषण सुनें तो उसमें हर्ष मंदर कह रहे हैं कि यह लड़ाई संसद में और सुप्रीम कोर्ट में नहीं लड़ी जाएगी बल्कि यह लड़ाई दिलों में लड़ी जाएगी. लोगों के दिलों में अगर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नफ़रत पैदा हो गई है तो उसे कोई सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ठीक नहीं कर सकता है. लोगों को अपने दिल बड़े करने होंगे."

हर्ष मंदर अपने भाषण में एनआरसी, अयोध्या और कश्मीर के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की आलोचना कर रहे हैं. क्या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की आलोचना की जा सकती है?

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि क़ानूनी रूप से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की आलोचना सीमाओं में रहकर हो सकती है, अगर आप किसी जज का विशेष रूप से उल्लेख न करें.

आगे इस मामले में क्या हो सकता है? इस सवाल पर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि न्यायालय की अवमानना के मामलों में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अमूमन उदार रवैया अपनाते हैं और अगर हर्ष मंदर साबित कर दें कि उनके कहने का क्या मक़सद था तो शायद उन पर मामला न चले.

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