क्या इंसान गाय-भैंस का दूध पीना बंद कर सकता है?

  • केली ओआकेस
  • बीबीसी फ़्यूचर
भैंसे

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दूध को इंसानों के लिए एक पोषक और संतुलित आहार माना जाता है.

लेकिन अब लोग गाय, भैंस, बकरी के दूध की जगह वैकल्पिक दूध जैसे सोयाबीन का दूध, नारियल का दूध, जई का दूध या भांग के दूध का सेवन ज़्यादा करने लगे हैं. इन्हें पौधे से निकलने वाला दूध कहा जाता है. एक दौर था, जब इस तरह के दूध को कोई पूछता तक नहीं था.

लेकिन अब वेगन लोगों की एक बड़ी आबादी हो गई है, जो दूध की ज़रूरत पौधों से निकलने वाले दूध से ही पूरा करते हैं. इसीलिए पौधों से निकलने वाला हर तरह का दूध अब बाज़ार में उपलब्ध है.

अब से पहले भी कुछ लोग डेयरी दूध की जगह बादाम का दूध पीना पसंद करते थे. बहुत से लोग जानवरों के अधिकारों के लिए ऐसा करते थे, जबकि बहुत से लोग दूध में मौजूद शुगर लैक्टोज़ नहीं पचा पाने के चलते इस विकल्प को चुनते थे. लेकिन अब बढ़ते जलवायु संकट के चलते एक बड़ी आबादी ऐसा कर रही है.

क्या वाक़ई इससे वातावरण का भला होगा? और क्या इस तरह के दूध में डेयरी दूध से मिलने वाले तमाम पोषक तत्व मौजूद हैं?

कार्बन उत्सर्जन

जोसेफ़ पूर, ब्रिटेन की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में एक रिसर्चर हैं. उन्होंने वैकल्पिक दूध पर अपनी एक रिसर्च 2018 में प्रकाशित की थी. जिसमें ये निष्कर्ष निकला था कि नॉन डेयरी मिल्क गाय के दूध से ज़्यादा फ़ायदेमंद है. गाय का दूध हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर ज़मीन और चारे का इंतज़ाम करना पड़ता है. गाय का दूध हासिल करने में काफ़ी तादाद में कार्बन उत्सर्जन होता है, जो वातावरण के लिए घातक है.

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अगर बात की जाए कार्बन उत्सर्जन की तो जई, सोया, बादाम, चावल से निकलने वाले दूध तैयार करने में डेयरी के दूध के मुक़ाबले एक तिहाई से भी कम कार्बन उत्सर्जन होता है.

इसे इस तरह समझिए. जई के पौधे से एक लीटर दूध निकालने के लिए जितनी जई बोई जाती है उससे सिर्फ़ 0.9 किलो ग्राम कार्बन वातावरण में मिलता. चावल से 1.2 किलोग्राम. जबकि, सोया से एक किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन होता है. जबकि एक लीटर डेयरी वाला दूध पैदा में 3.2 किलो ग्राम कार्बन उत्सर्जन होता है.

डेयरी के दूध के मुक़ाबले पौधों से दूध निकालने में पानी की खपत भी कम होती है. मिसाल के लिए बादाम को सबसे ज़्यादा पानी दरकार होता है. एक लीटर बादाम का दूध उत्पादन करने में 371 लीटर पानी की ज़रूरत होती है. जबकि डेयरी का एक लीटर दूध उत्पादन करने में 628 लीटर पानी की ज़रुरत होती है.

ऑर्गेनिक या जैविक खेती

अगर आप ये फ़ैसला कर चुके हैं कि आप पौधों से निकलने वाले दूध का ही सेवन करेंगे. तो फिर, आपको ये भी तय करना होगा कि आप ऑर्गेनिक खेती से पैदा होने वाला दूध लेंगे या फिर पारंपरिक तरीक़े की खेती की तरफ़ जाएंगे. ऑर्गेनिक या जैविक खेती में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं होता है.

अगर होता भी है तो बहुत कम. ऐसी खेती वातावरण और सेहत दोनों के लिए फ़ायदेमंद है.

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लेकिन नई रिसर्च बताती हैं कि जैविक खेती का वातावरण पर कुछ ख़ास असर नहीं पड़ता. दरअसल जैविक खेती के लिए ज़्यादा ज़मीन की आवश्यकता होती है.

पारंपरिक खेती से एक कार्टन सोया पैदा करने के लिए जितनी ज़मीन दरकार है, जैविक खेती के लिए उसके दोगुना ज़मीन चाहिए होती है.

लगातार बढ़ती मांग पूरा करने के लिए महज़ जैविक खेती पर निर्भर नहीं रहा जा सकता.

वैसे भी अगर जैविक खेती से कार्बन उत्सर्जन कम होगा, तो दूसरे खाद्य पदार्थ पैदा करने के लिए कहीं और जंगल साफ़ करके खेत तैयार किए जाएंगे.

ऐसे में जंगल में कार्बन का जितना स्टॉक होगा वो ख़त्म हो जाएगा. और बात फिर वहीं आ जाएगी.

इसमें कोई शक ही नहीं कि पारंपरिक खेती के मुक़ाबले जैविक खेती में मिट्टी में कार्बन ज़्यादा जमा होता है. जो फ़सल की गुणवत्ता के लिए ज़रूरी है.

ख़राब मौसम में भी मिट्टी का यही कार्बन उसे तबाह होने से बचा लेता है. हो सकता है वर्तमान समय में जैविक खेती से उत्पादन ज़्यादा ना हो, लेकिन भविष्य में जब मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी हो जाएगी शायद जैविक खेती में भी पारंपरिक खेती जितनी ही उपज हो जाए.

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दूध से दो पोषक तत्व सबसे ज़्यादा मात्रा में मिलते हैं. कैल्शियम और प्रोटीन. अगर आप दूध का इस्तेमाल सिर्फ़ चाय-कॉफ़ी के लिए करते हैं, तो फिर आप दूध के किसी भी विकल्प पर विचार कर सकते हैं लेकिन अगर दूध आपके या आपके बच्चे की ख़ुराक़ का अहम हिस्सा है तो फिर संजीदगी से सोचना पड़ेगा. प्रोटीन के मामले में सिर्फ़ सोया दूध में ही डेयरी के दूध जितना प्रोटीन पाया जाता है. 100 मिलीलीटर सोया दूध में 3.4 ग्राम प्रोटीन होता है. जबकि गाय के 100 मिलीलीटर दूध में 3.5 ग्राम प्रोटीन होता है. वहीं बादाम, चावल, नारियल आदि के दूध में सोया दूध के मुक़ाबले काफ़ी कम प्रोटीन होता है.

हेज़लनट, भांग और जई के दूध में भी सोया जितना तो नहीं, लेकिन क़रीब-क़रीब उतना ही प्रोटीन होता है. जानकार भी डेयरी दूध की जगह सोया मिल्क की ही सलाह देते हैं.

पौधों से निकलने वाले दूध की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें वसा की मात्रा लगभग नहीं के बराबर होती है. सिर्फ़ नारियल के दूध में फैट ज़्यादा होता है. हालांकि वसा मुक्त दूध छोटे बच्चों के लिए उचित नहीं है. ब्रिटेन में तो दो साल तक के बच्चे को गाय या भैंस का ही दूध पिलाने की सलाह दी जाती है. इसके बाद पाँच साल की उम्र तक सेमी-स्किम्ड दूध देने को कहा जाता है.

बहरहाल, ये आपकी मर्ज़ी है कि आप दूध का कौन सा विकल्प चुनते हैं. लेकिन सच्चाई यही है कि वातावरण की भलाई के लिए पौधों से निकलने वाले दूध, डेयरी मिल्क के मुक़ाबले बेहतर विकल्प हैं. वैसे आपको तंदुरुस्त रखने के लिए अकेले दूध ही काफ़ी नहीं है. इसके लिए आपको संतुलित आहार लेना लाज़मी है.

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