मध्य प्रदेशः सिंधिया कांग्रेस में हाशिए पर सिमटे, पर बीजेपी में क्या मिलेगा?

  • प्रदीप कुमार
  • बीबीसी संवाददाता
ज्योतिरादित्य सिंधिया

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होली से एक दिन पहले और होली के दिन भी भोपाल से लेकर नई दिल्ली के सियासी गलियारों में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सुर्ख़ियों में बना रहा. उनकी सोनिया गांधी से 'बात', प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 'मुलाक़ात' और 'बीजेपी में शामिल' होने के क़यास लगाए जाते रहे.

इनमें एक बात तो स्पष्ट हो चुकी है कि सिंधिया ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया है. मगर वो अब बीजेपी का झंडा थामेंगे या नहीं, इसे लेकर अनिश्चय बना हुआ है. हालाँकि मौजूदा परिस्थितियों में सिंधिया के राजनीतिक करियर का रास्ता अब जिस ओर जा सकता है, उसमें बीजेपी का पता सबसे मज़बूत संभावनाओं वाला दिखाई देता है.

वैसे ये दिलचस्प है कि इन दो दिनों में जब सिंधिया अटकलों के केंद्र में थे, स्वयं सिंधिया ने बस दो शब्द बोले - हैप्पी होली.

मगर अपने इस्तीफ़े की कॉपी, जो उन्होंने सोमवार को ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजी थी, उसे एक दिन बाद उन्होंने ट्विटर पर जारी कर दिया.

और इसकी भाषा स्पष्ट थी. उन्होंने लिखा कि वो "कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे रहे हैं लेकिन इस रास्ते की शुरुआत एक साल पहले हो चुकी थी."

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हुआ था पिछले एक साल में?

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के पी यादव और ज्योतिरादित्य सिंधिया की वायरल तस्वीर

लोक सभा चुनाव में प्रतिष्ठा टूटी

ये कहना ग़लत नहीं होगा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया पिछले कुछ अरसे से अपने राजनीतिक करियर के सबसे लो प्वाइंट पर चल रहे हैं.

पहले 2018 में कमलनाथ से वे राज्य के मुख्यमंत्री पद की होड़ में पिछड़ गए और उसके बाद अपने संसदीय प्रतिनिधि रहे केपी यादव से 2019 में परंपरागत लोकसभा सीट गुना में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

इसी चुनाव के दौरान जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उन्हें ज़िम्मेदारी मिली वहां भी पार्टी अपना खाता नहीं खोल पायी.

केपी यादव की जीत के वक़्त उनकी एक सेल्फ़ी बहुत वायरल हुई थी, जिसमें सिंधिया गाड़ी के अंदर बैठे थे और केपी यादव बाहर से सेल्फ़ी ले रहे थे. केपी यादव थोड़े समय तक सिंधिया के संसदीय प्रतिनिधि भी रहे थे.

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प्रदेश राजनीति में भी अनदेखी

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2018 में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की वापसी हुई तो उसमें सिंधिया का ही सबसे अहम योगदान था. ज्योतिरादित्य सिंधिया के उस चुनाव में असर को समझना हो तो ऐसे समझिए कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी अभियान में सिंधिया विरोध को हवा दी थी, भारतीय जनता पार्टी का अभियान ही था- 'माफ़ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज.'

पूरे राज्य में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सबसे ज्यादा चुनावी सभाओं को संबोधित किया. उन्होंने राज्य में क़रीब 110 चुनावी सभाओं को संबोधित किया, इसके अलावा 12 रोड शो भी किए. उनके मुक़ाबले में दूसरे नंबर पर रहे कमलनाथ ने राज्य में 68 चुनावी सभाओं को संबोधित किया था.

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों से ज्योतिरादित्य सिंधिया को बुलाने की मांग थी और आम मतदाताओं में उनका असर भी देखने को मिला.

लेकिन उनकी असली मुश्किलों का दौर चुनावी नतीजे आने के बाद शुरू हुआ. इस मुश्किल दौर के बारे में मध्य प्रदेश कांग्रेस के एक नेता ने बताया कि सिंधिया की मेहनत के चलते 15 साल के बाद कांग्रेस सत्ता में वापसी करने में सफल रही, वे मुख्यमंत्री नहीं बन पाए लेकिन उनका योगदान सबसे ज्यादा था, अब कमलनाथ जी और दिग्विजिय जी मिलकर उनकी लगातार अनदेखी कर रहे हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के क़रीबी रहे हैं, लेकिन मुश्किल यह भी थी कि ख़ुद राहुल गांधी ने कांग्रेस सर्वेसर्वा का पद छोड़ दिया था. इस लिहाज़ से देखें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही थी.

इसलिए कभी शिक्षकों के मुद्दे पर तो कभी किसानों के मुद्दे पर वे कमलनाथ सरकार पर सवाल करते आए हैं.

सिंधिया के सामने अपनी बात मनवाने का कोई विकल्प नहीं बचा था लिहाज़ा उन्होंने वह रास्ता अपना लिया, जिससे 15 महीने पुरानी कमलनाथ सरकार सांसत में आ गई है.

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बीजेपी में गए तो क्या मिलेगा?

एक बड़ा सवाल अब ये है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया यदि बीजेपी में जाते हैं, तो उन्हें हासिल क्या होगा क्योंकि वहां भी वे मुख्यमंत्री तो नहीं बनेंगे.

बहुत संभव हुआ तो उन्हें केंद्र सरकार में एडजस्ट किया जा सकता है.

ना तो सिंधिया के लिए बीजेपी कोई नई चीज़ है और ना ही बीजेपी के लिए सिंधिया. सिंधिया की दादी मां विजय राजे सिंधिया बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में रहीं. दो- दो बुआएं, वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया, अभी बीजेपी में ही हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के सियासी मुक़ामों में केंद्र में मंत्री बनना शायद बहुत अहम ना हो क्योंकि क़रीब नौ साल वे मनमोहन सरकार में मंत्री रह चुके हैं. उनकी नज़र राज्य के मुख्यमंत्री पद पर ही होगी, जिस पद तक उनके पिता माधव राव सिंधिया नहीं पहुंच पाए थे.

1993 में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो कमान दिग्विजिय सिंह को मिली हालांकि ज्योतिरादित्व के पिता माधव राव सिंधिया राजीव गांधी के दोस्त माने जाते थे.

इससे पहले अर्जुन सिंह मौजूद थे. दो साल पहले (2018) राहुल गांधी ने भी कमलनाथ को तरजीह दी थी.

49 साल के ज्योतिरादित्य सिंधिया को यह मालूम है कि उनके पास अभी समय है लेकिन वे ये नहीं चाहेंगे कि पिता की तरह उन्हें भी मध्य प्रदेश की सत्ता हासिल करने का मौक़ा ही नहीं मिले.

यही वजह है कि राजनीतिक रूप से अपने करियर के सबसे लो प्वाइंट पर पहुंचने के बाद भी ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने इलाक़े में लोगों से लगातार संपर्क कर रहे हैं.

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राघोगढ़ और सिंधिया घराने की स्पर्धा और राज्य सभा की सीट

हालांकि प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले लोगों की मानें तो सिंधिया का कमलनाथ से ज्यादा दिग्विजय सिंह से मनमुटाव है. दरअसल, मध्य प्रदेश की राजनीति में राघोगढ़ और सिंधिया घराने के बीच आपसी होड़ की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.

इस होड़ की कहानी 202 साल पुरानी है. जब 1816 में, सिंधिया घराने के दौलतराव सिंधिया ने राघोगढ़ के राजा जयसिंह को युद्ध में हरा दिया था, राघोगढ़ को तब ग्वालियर राज के अधीन होना पड़ा था.

इसका हिसाब दिग्विजय सिंह ने 1993 में माधव राव सिंधिया को मुख्यमंत्री पद की होड़ में परास्त करके बराबर कर दिया था.

दिलचस्प यह है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में आई इस हलचल के पीछे भी ज्योतिरादित्य सिंधिया बनाम दिग्विजय सिंह का मामला सामने आ रहा है. दोनों की दावेदारी राज्य सभा सीट के लिए है. दिग्विजय सिंह राज्य सभा में अपनी वापसी चाहते हैं जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया भी राज्य सभा की सीट चाहते हैं.

मध्य प्रदेश से राज्य सभा की तीन सीटें हैं, इसमें एक-एक सीट बीजेपी और कांग्रेस के पास जाने की उम्मीद है. सिंधिया इसी राज्य सभा सीट से कांग्रेस हाई कमान और कमलाथ सरकार के सामने दबाव डाल रहे थे.

वैसे सालों पहले दिए एक इंटरव्यू में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बताया था कि सिंधिया नाम से उन्हें कभी कोई मदद नहीं मिली और उनके पिता माधवराव ने उन्हें इस नाम के बिना भी बेहतर ज़िंदगी जीने का मंत्र बचपन से ही दिया था.

2018 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन पाने को भी आप यहीं से देख सकते हैं कि उन्हें सिंधिया होने का फ़ायदा नहीं मिला. लेकिन ख़ास बात ये है कि सिंधिया अपनी राजनीतक समझ और क़द दोनों का दायरा बड़ा करते जा रहे हैं.

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कभी इनवेस्टमेंट बैंकर के तौर पर काम करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को मालूम है कि वे आज जो निवेश कर रहे हैं, उसका आने वाले दिनों में 'रिटर्न' भी बेहतर होगा.

उन्हें ये भी मालूम है कि बाज़ार गिरने पर निवेशक ना तो निवेश करना बंद करता है और ना ही निवेश को बाहर निकाल लेता है.

ज़ाहिर है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने समय और अपनी बारी का इंतज़ार बना हुआ है.

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