मोदी को कश्मीर की राजनीति बदलने में मदद करेगा कोरोना वायरस?

  • 25 मार्च 2020
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अभी जब कोरोना वायरस के ख़तरे ने दुनिया पर अपना शिकंजा नहीं कसा था, तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कश्मीर में राजनीतिक व्यवस्था को दोबारा स्थापित करने के तमाम विकल्प तलाश रहे थे.

कश्मीर में अगस्त महीने से लगभग लॉकडाउन की ही स्थिति थी. बीते साल 5 अगस्त को भारत सरकार ने जम्मू और कश्मीर को मिले विशेषाधिकारों को निरस्त कर दिया था.

अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के बाद इस क्षेत्र में हिंसा की बेहद मामूली घटनाएं हुई थीं और किसी की जान नहीं गई. अब इस क़दम के कुछ महीनों बाद सरकार का सारा ध्यान जनता की नाराज़गी को सीमित रखने और अपने लिए नए राजनीतिक सहयोगियों को जमा करने पर केंद्रित हो गई थी.

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जनता की हिंसक प्रतिक्रिया के डर से अधिकारियों ने हज़ारों राजनेताओं को बंदी बना लिया था. इनमें भारत समर्थक राजनेता भी शामिल थे. इनमें फ़ारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती जैसे प्रमुख नेता भी शामिल थे.

फ़ारूक़ और उमर अब्दुल्ला कश्मीर के सबसे पुराने राजनीतिक संगठन, नेशनल कांफ्रेंस का नेतृत्व करते हैं. वहीं महबूबा मुफ़्ती नेशनल कांफ्रेंस की ताक़तवर विरोधी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अगुवा हैं. दोनों ही दल पहले बीजेपी के साथ गठजोड़ कर चुके हैं.

नेशनल कांफ्रेंस, 1999 में केंद्र में वाजपेयी सरकार के नेतृत्व वाली सरकार में हिस्सेदार रही थी और महबूबा मुफ़्ती ने जम्मू-कश्मीर में तीन साल तक बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार चलायी थी.

महबूबा मुफ़्ती की सरकार तब कार्यकाल ख़त्म होने से पहले ही गिर गई थी, जब बीजेपी ने महबूबा मुफ़्ती पर पाकिस्तान समर्थित अलगाववाद के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाकर उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया था.

पीडीपी में महबूबा मुफ़्ती के कई साथियों ने उनका साथ छोड़कर फ़ारूक़ और उमर अब्दुल्ला व महबूबा मुफ़्ती की ग़ैर मौजूदगी से पैदा हुए ख़ाली सियासी मैदान को भरने की कोशिश की थी.

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इन नेताओं में से अल्ताफ़ बुख़ारी एक वैकल्पिक राजनैतिक नेतृत्व देने वाले सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे.

उन्होंने पीडीपी में महबूबा के विरोधियों और नेशनल कांफ्रेंस में अब्दुल्ला परिवार से दूरी रखने वाले अन्य नेताओं को इकट्ठा करके फटाफट एक गठजोड़ तैयार किया.

चूंकि, कश्मीर के पुराने राजनेता जैसे कि फ़ारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला या महबूबा मुफ़्ती बदले हुए हालात के हिसाब से अपने रुख़ में बदलाव लाने को तैयार नहीं थे. ऐसे में मोदी और शाह ने अल्ताफ़ बुख़ारी और उनकी नए बने दल अपनी पार्टी से मुलाक़ात की. लेकिन कश्मीर में ये नया राजनीतिक दल ठीक से लॉन्च भी नहीं हो पाया था कि भारत में कोविड-19 के प्रकोप ने दस्तक दे दी.

कई लोगों के कोरोना वायरस से संक्रमित पाए जाने के बाद फ़ारूक़ अब्दुल्ला को नज़रबंदी से रिहा कर दिया गया. रिहा होने के बाद फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने कहा कि जब तक बाक़ी के राजनीतिक बंदी रिहा नहीं हो जाते, तब तक वो राजनीति की कोई बात नहीं करेंगे.

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कोरोना वायरस के प्रकोप से पूरी दुनिया में फैले डर और भारत में लॉकडाउन की तैयारी के बीच फ़ारूक़ अब्दुल्ला के बेटे और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी 24 मार्च को नज़रबंदी से रिहा कर दिया गया.

सुरक्षा के लिए तय प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते हुए उमर अब्दुल्ला ने अपने घर के बाहर मीडिया से बात की और कहा कि वो तब तक अपने राजनीतिक स्टैंड की बात नहीं करेंगे, जब तक कोरोना वायरस का ये संकट ख़त्म नहीं हो जाता.

कश्मीर के अधिकारियों का कहना है कि महबूबा मुफ़्ती को भी छोड़ा जा रहा है. और बहुत से जानकारों का मानना है कि फ़ारूक़ और उमर अब्दुल्ला ने पहले ही कश्मीर का सियासी एजेंडा तय कर दिया है. ऐसे में महबूबा मुफ़्ती भी बदले हुए हालात में अपने राजनीतिक स्टैंड और राजनीतिक बंदियों की रिहाई को कोरोना वायरस के ख़तरे की वजह से आपस में जोड़ने का जोखिम नहीं ले पाएंगी.

श्रीनगर के कॉलमनिगार और राजनीतिक विश्लेषक एजाज़ अयूब ने बीबीसी से कहा, "कश्मीर के नेता लंबे समय से सत्ता के लिए भारत की केंद्रीय सरकार से डील करने के फॉर्मूले पर अमल करते रहे हैं. हमें अभी ये नहीं मालूम कि क्या अब्दुल्ला परिवार और महबूबा मुफ़्ती ने अपनी रिहाई के लिए केंद्र सरकार से कोई डील की है या नहीं. लेकिन, कोरोना वायरस का प्रकोप यहां के राजनेताओं और केंद्र सरकार के लिए मददगार पर्दा साबित होगा, जिसके पीछे वो आपस में किसी डील के फॉर्मूले पर काम कर सकते हैं."

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"उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती की ख़ामोशी की वजह तो समझ में आती है. लेकिन, मोदी और शाह की असल राजनेताओं को दोबारा राजनीतिक परिदृश्य पर प्रतिस्थापित करने की कोशिश बिना बहुत प्रयास के ही सफल हो गई लगती है."

एजाज़ अयूब का कहना है कि पहले भी आपदाओं और महामारियों ने पूरी दुनिया के राजनैतिक संवाद को नई दशा-दिशा में ले जाने में अहम भूमिका अदा की है.

अयूब के अनुसार, "क्षेत्रीय स्वायत्तता से जुड़े हुए लोगों के जज़्बात पिछले आठ महीनों में काफ़ी कमज़ोर हो गए हैं. ऐसे में कोरोना वायरस के प्रकोप ने इस मुद्दे को और पीछे धकेल दिया है. ऐसे में मोदी सरकार के लिए ये महामारी एक ऐसा सुनहरा मौक़ा लेकर आई है, जिसमें वो राजनेताओं को रिहा कर रहे हैं."

जहां तक कोरोना वायरस के प्रकोप की बात है कि तो इस हिमालयी क्षेत्र में, जिसे दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया है, वहां बहुत चुनौती भरी परिस्थितियां पैदा हो गई हैं.

अधिकारियों ने जम्मू और कश्मीर में कोरोना वायरस के संक्रमण के छह मामलों की तस्दीक़ की है. तो लद्दाख में अब तक 13 केस सामने आ चुके हैं. अकेले कश्मीर घाटी में ही सैकड़ों लोगों को लॉकडाउन का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है. और कम से कम पांच हज़ार लोगों को आइसोलेशन और क्वारंटाइन में रखकर उनकी निगरानी की जा रही है.

हालांकि, केंद्र सरकार को कश्मीर की राजनीति के पुनर्गठन का एक अच्छा मौक़ा मिल गया है. जिसे अर्धराष्ट्रवादी से पूरी तरह सिर झुकाने वाली राजनैतिक व्यवस्था में परिवर्तित किया जा सकता है. लेकिन बहुत से पर्यवेक्षकों का ये मानना है कि अभी किसी भी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगी.

एक स्थानीय पत्रकार तारिक़ अली मीर कहते हैं, "हमें अभी ये नहीं मालूम कि कोरोना वायरस से भारत और कश्मीर पर किस हद तक प्रभाव पड़ेगा. जो राजनेता रिहा किए गए हैं उनका राजनीतिक संवाद मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर करेगा. पहला तो ये कि कोरोना वायरस किस हद तक क्षेत्रीयता की उम्मीदों पर प्रभाव डालता है. और दूसरा ये कि ये रिहा हुए राजनेता अपने ताज़ा राजनीतिक समझौते के लिए कितना जनसमर्थन जुटा पाते हैं."

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