कोरोना लॉकडाउन से प्रभावित असंगठित क्षेत्र को सरकार क्या भूल गई है?

  • 25 मार्च 2020
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वित्त मंत्रालय में जारी लगातार बैठकों और विचार-विमर्श के बाद मध्यम वर्ग और कॉर्पोरेट जगत को कोरोना से निपटने के लिए एक के बाद दूसरी राहतों का एलान हुआ.

इसके बाद भारत के 50 से अधिक समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों ने केंद्र और राज्य सरकारों को ख़त लिखकर लगभग 40 करोड़ से अधिक दिहाड़ीदारों, खेतिहर मज़दूरों, छोटे किसानों, वृद्धा पेंशन भोगियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवालों विशेष वित्तीय मदद दिए जाने की अपील की है.

ख़त भेजनेवाले लोगों में से एक समाजसेवी रीतिका खेड़ा कहती हैं काम बंद हो जाने और रोज़ कमाने, रोज़ खानेवाला ये वर्ग महामारी से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है लेकिन हुकूमत के ज़रिए दी गई राहतों में 'क्लास बाएस' यानी एक ख़ास वर्ग के लिए पूर्वग्रह साफ़ देखा जा सकता है.

हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार इससे किसी भी तरह से अनजान नहीं और न ही इसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश कर रही है, बल्कि इसे लेकर तैयारी जारी है.

रीतिका खेड़ा कहती हैं, "कामबंदी के बाद इनमें से बहुत के पास तो खाने को नहीं और सात-आठ फ़ुट लंबी और शायद उससे भी कम चौड़ी झुग्गियों में रहनेवालों के लिए सोशल डिस्टैंसिंग महज़ एक लफ़्ज़ है."

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19 मार्च को देश को दिए गए संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोविड-19 इकॉनोमिक रेस्पॉन्स टास्क फ़ोर्स का एलान किया था. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, इसके बाद हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में टीम लीडर निर्मला सीतारमण ने वित्तीय राहतों को लेकर किसी टाइम टेबल या समय निर्धारित करने की बात से इनकार किया.

हालांकि, उसके बाद निर्मला सीतारमण ने इनकम टैक्स रिटर्न्स फ़ाइल करने की तारीख़ को 31 मार्च की जगह 30 जून करने, जीएसटी रिटर्न दाख़िल करने की तारीख़ को भी जून के अंतिम सप्ताह में करने, बैंकों में मिनिमम बैलेंस की ज़रूरत नहीं होने, और बोर्ड मीटिंग करने की अविध में छूट जैसी राहतों का एलान किया. लेकिन इन्हें सीधे असंगठित क्षेत्र में कामगर लोगों को राहत पहुंचाने की श्रेणी में नहीं देखा जा रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार शाम देश के नाम फिर एक भाषण दिया जिसमें स्वास्थ्य के क्षेत्र को मज़बूती प्रदान करने के लिए 15,000 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की, लेकिन उससे ये साफ़ नहीं हो पाया कि 21 दिनों के लॉकडाउन के दौरान दिहाड़ी मज़दूर और असंगठित क्षेत्र में काम करनेवाले किस तरह गुज़ारा कर पाएंगे.

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सोशल मीडिया पर सवाल किए जा रहे हैं कि जब केरल अपने बलबूले 20,000 करोड़ के राहत पैकेज की बात कह रहा है तो प्रधानमंत्री की घोषणा महज़ 15,000 करोड़ तक ही क्यों सीमित है?

लेकिन प्रधानमंत्री का ये एलान सिर्फ़ स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर है.

हालांकि सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार इस बारे में अंसगिठत, पेंशनधारी और दूसरे वैसे वर्ग के लोगों के बारे में जानकारियां जुटा रही हैं और इसको लेकर जल्द ही कोई ठोस नीति सामने आएगी.

वित्त मंत्रालय इस मामले में नीति आयोग की भी मदद ले रहा है जहां सर्विस सेक्टर, जो सबसे अधिक असंगठित क्षेत्रों में से एक है, से जुड़े लोगों से पिछले कई दिनों से बैठकें जारी हैं.

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बहुत कुछ किया जाना बाक़ी

केंद्र और सुबाई हुकूमतों को भेजे गए ख़त में कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों और समाज के दूसरे कमज़ोर तबक़ों को 'एक बार दी जानेवाली आकस्मिक राहत' में 3.75 लाख करोड़ रुपयों की दरकार है, जो भारत के जीडीपी का महज़ एक फ़ीसद है.

मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने कहा कि सरकारें जब सुनतीं नहीं तो हमें उन्हें याद दिलाना पड़ता है.

इससे पहले मंगलवार को कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भेजकर असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा नीति के तहत विशेष भत्ता देने की बात कही थी.

सोनिया गांधी ने कहा था ये राहत इस बाबत जमा की गई वेलफेयर फंड से ख़र्च की जा सकती है.

मंगलवार को ही राज्य के श्रम मंत्रियों को भेजे गए ख़त में केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने निर्देश दिया है कि फंड की जमा 52,000 करोड़ निधि का इस्तेमाल निर्माण क्षेत्र में लगे मज़दूरों के खाते में सीधे फंड ट्रांसफ़र करने में किया जाए.

पंजाब ने पहले ही निर्माण क्षेत्र में लगे पंजीकृत कामगारों में से हर एक को 3,000 रुपये देने का ऐलान किया है. हिमाचल इस बाबत हर ऐसे मज़दूर को एक हज़ार रुपये देगा.

मुल्क में इस वक़्त निर्माण क्षेत्र में साढ़े तीन करोड़ पंजीकृत मज़दूर हैं.

सरकारों को जो ख़त सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भेजा है उसमें कम से कम तीन माह का मुफ्त राशन मुहैया करवाने, जो बेधर हैं उनके लिए रहने का इंतज़ाम और सामूहिक रसोई लगाकर दिन में दो बार खाने की व्यवस्था करने की अपील की है.

कई राज्य सरकारों जैसे दिल्ली ने इस सिलसिले में लोगों के लिए रैन-बसरों में इंतज़ाम करने और सामूहिक किचन खोलने की बात कही है.

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