लॉकडाउन में महाराष्ट्र से साइकिल चला सात दिन में ओडिशा पहुंचा युवक

  • संदीप साहू
  • भुवनेश्वर से, बीबीसी हिंदी के लिए
महेन जेना

इमेज स्रोत, Sandeep Sahu

भारत में कोरोनावायरस के मामले

17656

कुल मामले

2842

जो स्वस्थ हुए

559

मौतें

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

ओडिशा के महेश जेना लॉकडाउन के कारण महाराष्ट्र से साइकिल चलाकर अपने प्रदेश पहुंचे हैं. उन्होंने सात दिनों में ही क़रीब पंद्रह सौ किलोमीटर का ये सफ़र तय कर लिया.

यूं तो लोग इतनी लंबी साइक्लिंग रेकॉर्ड बनाने या एडवेंचर के लिए ही करते हैं लेकिन महेश जेना के लिए यह कोई 'एडवेंचर' नहीं, बल्कि मजबूरी थी.

ऑडिशा के जाजपुर ज़िले के बड़सुआर गावं का रहेनवाला यह बीस वर्षीय युवक पिछले आठ महीनों से महाराष्ट्र के सांगली-मिराज में पानी का पंप बनाने वाली एक कंपनी में काम कर रहा था.

इमेज स्रोत, Sandeep Sahu

इमेज कैप्शन,

इसी पुरानी साइकिल को चलाकर सांगली से ओडिशा पहुंचा युवक

लेकिन मार्च के आख़िरी सप्ताह में देशभर में 'लॉकडाउन' की घोषणा के बाद जब कंपनी के मालिक ने पांच महीने तक कंपनी बंद रखने की घोषणा कर दी, तो महेश ने तय किया कि अब गांव वापस चले जाने में ही समझदारी है क्योंकि वहां रहने पर खाने के लाले पड़ना तय था.

इस समय जाजपुर ज़िले के एक स्कूल में बने अस्थायी क्वारंटीन शिविर में रह रहे महेश ने बीबीसी को बताया कि ज़िंदा रहने के लिए उसे बस यही एक तरीक़ा सुझा.

महेश ने कहा, "जब मालिक ने बोल दिया कि पांच महीने कंपनी बंद रहेगी, तो मैंने सोचा ऐसे में वहां गुज़ारा करना मुश्किल हो जाएगा. थोड़े बहुत पैसे जो बचा के रखे थे वह भी ख़त्म हो जाएंगे और फिर खाना भी शायद नसीब नहीं होगा. इसलिए तय किया कि चाहे जो भी हो गांव वापस चला जाऊंगा. ट्रेनें नहीं चल रहीं थी, गोया साइकिल से ही जाया जा सकता था."

इमेज स्रोत, Sandeep Sahu

लेकिन क्या उसे सचमुच विश्वास था कि 'लॉकडाउन' की सारी पाबंदियों के बावजूद वह इतनी लंबी दूरी साइकिल पर तय कर अपने गावं पहुँच पाएगा? डर नहीं लगा? "जी नहीं, डर नहीं लगा. जब ज़िंदगी ही दांव पर लगी थी तो फिर डर कैसा? भगवान का नाम लिया और एक अप्रैल के तड़के वहां से निकल पड़ा."

महेश ने यह सेकंड हेंड साइकिल काम पर जाने आने के लिए हाल ही में 1500 रुपए में ख़रीदी थी और फिर उसपर रिपेयर के लिए 500 रुपए और ख़र्च किए थे. रास्ते में दो बार साइकिल के टायर भी पंचर हुए. किसी तरह उसे ठीक कर वह फिर निकल पड़ा. आख़िरकार इसी पुरानी साइकिल ने उसे महेश को मंज़िल तक पहुंचा ही दिया.

इमेज स्रोत, Sandeep Sahu

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
पॉडकास्ट
दिन भर

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

ड्रामा क्वीन

समाप्त

"रास्ते में ज़्यादातर ढाबों में खाना खाया करता था. हर ढाबे के पास दर्जनों ट्रक खड़े होते थे. वैसे तो ढाबे बाहर से बंद थे. लेकिन अंदर इन ट्रकों के ड्राइवरों के लिए खाना बनता था. तो मैं भी उनके साथ खा लिया करता था. लेकिन हर जगह ढाबा नहीं होता था. इसलिए मैं कुछ बिस्किट और फल वगैरह हमेशा साथ रखता था ताकि भूखे पेट सोना न पड़े. सुबह से लेकर रात के 11-12 बजे तक साइकिल चलाता था और फिर कहीं ढाबा या मंदिर मिला तो वहीं सो जाया करता था. मैं यह सोच कर निकला था कि मुझे घर पहुँचने में 15 दिन लगेंगे. लेकिन चूंकि मैंन रास्ते में बहुत कम रुका और दिन में 10-12 घंटे साइकिल चलाता था, इसलिए मैं 7 दिन मैं ही यहां पहुंच गया."

अपने सफ़र की ये कहानी सुनाते हुए महेश के आवाज़ में खुशी उमड़ रही थी.

जब मैंने उससे पूछा कि क्या उसे पूरे रास्ते में किसी ने रोका नहीं, तो उसका कहना था, "दो जगह-शायद तेलंगाना या आंध्र प्रदेश में, पुलिस ने रोका ज़रूर था. मुझसे पुछताछ भी की. लेकिन जब मैंने उन्हें अपनी पूरी कहानी बताई तो उन्होंने मुझे जाने दिया."

इमेज स्रोत, Dipesh Tank

इमेज कैप्शन,

राजौरी के आरिफ़ मुंबई से कश्मीर के लिए साइकिल पर निकल पड़े थे, सीआरपीएफ़ ने उनकी मदद की

सांगली से हैदराबाद, फिर वहां से विजयवाड़ा, खम्मम, विजयनगरम, श्रीकाकुलम होते हुए 6 अप्रैल को ही महेश ओडिशा की सीमा में प्रवेश कर गया और फिर गंजाम, भुवनेश्वर, कटक होते हुए अगली शाम जाजपुर पहुंच गया. उसने पहले ही अपने फूफा को ख़बर कर दी थी. इसलिए जब वह जाजपुर पहुंचा तो वे पहले से ही वहां मौजूद थे. पुलिस ने उससे कुछ पूछताछ की और फिर उसे सदर अस्पताल ले गई जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे पास ही अब्दुलपुर गावं के स्कूल में बने क्वारंटीन सेंटर में भेज दिया.

इतनी लंबी दूरी करने के बाद जब वह जाजपुर पहुँचा तो उसकी हालत कैसी थी?

महेश ने बताया, "मैं बिल्कुल ठीक था. हां पैरों और जांघों में सूजन जरूर हो गई थी और बदन चूरचूर हो रहा था. बदन की पीड़ा अभी भी पूरी तरह से गई नहीं है. लेकिन मुझे किसी तरह की बीमारी नहीं हुई, खांसी या छींक तक नहीं. अब मैं पूरी तरह से स्वस्थ हूँ. यहां सुबह नाश्ता और दो वक़्त का खाना मिल जाता है. मेरे फूफा और फुफेरा भाई रोज़ मुझे देखने आते हैं. जब क्वारंटीन ख़त्म हो जाएगा तो मैं उनके साथ घर चला जाऊंगा."

महेश ने बताया कि उसके माता पिता पंजाब में काम करते हैं, इसलिए बचपन से ही वह अपने फूफा के घर ही पला-बढ़ा है.

देशभर में 'लॉकडाउन' लागू की घोषणा के बाद लाखों प्रवासी श्रमिक साइकिल से या पैदल ही अपने-अपने गावं लौट गए. महेश ने क़रीब पंद्रह सौ किलोमीटर का सफ़र साइकिल से सात दिनों में ही तय कर लिया है. हताशा और आत्मविश्वास की यह अनूठी कहानी वाक़ई बेमिसाल है.

इमेज स्रोत, MOHFW_INDIA

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)