बिहार: बेटे की लाश लिए दौड़ती औरत है स्वास्थ्य तंत्र की तस्वीर

  • सीटू तिवारी
  • बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से
बच्चे की लाश लिए दौड़ती महिला

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बच्चे की लाश लिए दौड़ती महिला

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

बिहार के जहानाबाद की सड़क पर अपने तीन साल के बेटे की लाश लिए दौड़ती-रोती महिला का वीडियो इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है.

दिल दहला देने वाला जो वीडियो वायरल हुआ है, उसमें महिला आगे-आगे दौड़ रही हैं और पीछे-पीछे उनके पति 'बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था' का मातम मनाते हुए चल रहे हैं. वो कह रहे है, "नहीं मिला, एम्बुलेंस नहीं मिला."

स्थानीय पत्रकार गौरव जिन्होने ये वीडियो शूट किया था, उन्होंने बीबीसी को बताया, "ये परिवार अरवल ज़िले के कुर्था थाने के सहोपुर गांव का था. बच्चे को सर्दी-खांसी थी जिसके इलाज के लिए पिता गिरिजेश उसे कुर्था के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए थे. लेकिन वहां डॉक्टरों ने उन्हे जहानाबाद सदर अस्पताल रेफ़र कर दिया. गंभीर हालत में पहुंचे बच्चे को जहानाबाद सदर अस्पताल ने पटना रेफ़र किया लेकिन परिवार को एम्बुलेंस नहीं मिली और बच्चे ने दम तोड़ दिया."

ख़बरों की तलाश में निकले गौरव को अचानक ये महिला बदहवास दौड़ते हुए मिली जो पैदल ही अपने बेटे की लाश लिए 25 किलोमीटर दूर अपने गांव वापस लौट रही थीं.

बाद में एक स्थानीय समाजिक कार्यकर्ता ने घर जाने के लिए इस परिवार को गाड़ी मुहैया कराई.

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बच्चे के पिता

बिना कोरोना वाले मरीज़ परेशान

स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार ने इस घटना पर ट्वीट करते हुए लिखा, " ज़िला अस्पताल में तीन एम्बुलेंस थे परंतु देने का ख़्याल नहीं आया. डीएम की जांच में चार नर्सों, दो चिकित्सकों और हैल्थ मैनेजर को दोषी पाया गया है जिनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होगी."

उन्होने इसे शर्मनाक घटना बताते हुए लिखा है, "ये व्यवस्था से ज़्यादा मानसिकता का दोष है. हमे ये सोचना होगा कि हम कैसा बिहार बना रहे हैं?"

प्रधान सचिव का ये सवाल बेहद महत्वपूर्ण है. लेकिन इस सवाल के आईने में बिहार की लचर और फिसड्डी स्वास्थ्य व्यवस्था से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता.

कोरोना के इस संकट में नॉन-कोविड मरीज़ जो 'नॉन कम्युनिकेबल डिजीज़' (एनसीडी) मसलन डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, कैंसर, किडनी की बीमारी आदि से ग्रसित हैं, वो परेशान हैं.

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दवा, इंजेक्शन और ऑपरेशन के लिए परेशान कैंसर मरीज़

पटना के गोला रोड में रहने वाली 63 साल की नीलम पांडेय सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी है. वो आयुक्त कार्यालय पटना में उप निदेशक के तौर पर काम करती थीं. फ़ोन पर उनकी आवाज में थकान, भारीपन और बेचैनी पसरी है.

वजह ये है कि वो बीते तीन साल से मल्टीपल माइलोमा कैंसर से पीड़ित है. उन्हें अपने ख़ून की कुछ खास जाँच कराने के बाद उसकी रिपोर्ट मुंबई में अपनी डॉक्टर के पास भेजनी है.

लेकिन उनकी ख़ून की नियमित जाँच करने वाले गाँव में फंसे हुए हैं जिसके चलते वो परेशान हैं.

अकेले रहने वाली नीलम बताती हैं, "इस कैंसर में ब्लड का बहुत अहम रोल है. दवाइयां और जीवन रक्षक इंजेक्शन का इंतज़ाम बहुत मुश्किल से किया है लेकिन ब्लड कैसे टेस्ट होगा? जब तक वो जांच नहीं होगी डॉक्टर के लिए आगे की दवाइयां लिखना मुश्किल है. इसके अलावा मुझे अप्रैल में बंबई जाना था दिखाने के लिए लेकिन अब तो ये असंभव लगता है."

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नीलम पांडेय

ठीक यही परेशानी कैमूर ज़िले के दुर्गावती प्रखंड के कन्हैया सिंह झेल रहे है. ट्रांसपोर्ट के कारोबार से जुड़े कन्हैया सिंह ब्लड कैंसर से पीड़ित है और मुंबई में उनका इलाज चलता है. 5 मई को उन्हें डॉक्टर को दिखाना है और डॉक्टर के पर्चें के आधार पर ही उन्हें पटना से मुफ़्त दवाई मिलती है.

कन्हैया ने बीबीसी से कहा, "गाड़ी चल नहीं रही है, हम जाएगें नहीं डॉक्टर को दिखाने, तो दवाई कैसे मिलेगी. वो भी दवाई पटना से जाकर लानी पड़ती है, लेकिन सब कुछ बंद है. हमारा धंधा भी मंदा पड़ा है. थोड़े दिन बाद पैसे की भी चिंता सताएगी."

वहीं सहरसा के सत्तरकटैया प्रखंड के पुरूख के अशोक कुमार के मुंह का फोड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. उनकी पत्नी ललिता देवी ने फोन पर बताया कि अशोक को मुंह का कैंसर है जिसका इलाज मुंबई में चल रहा है. उनके चार कीमो हो चुके है और ऑपरेशन के लिए मार्च में मुंबई जाना था.

वो बताती है, "एक महीने की बंदी के चलते उनके मुंह पर फोड़ा फूलता जा रहा है और मुंह के अंदर मवाद बन रही है. कोई गाड़ी चलेगा तब ना पटना या बंबई जाएगे."

सत्तरकटैया वो प्रखंड है जहां पटना स्थित आईजीआईएमएस की एक टीम जांच के लिए कुछ माह पहले गई थी और एक ही दिन की जांच में मुंह, गले, स्तन कैंसर के 35 मरीज चिह्नित किए गए थे.

ज़िला पार्षद प्रवीण आनंद कहते हैं, "जब तक दवाई है यहां आदमी किसी तरह घिसट रहा है. दवाई ख़त्म, आदमी ख़त्म. क्योंकि दूर-दूर तक इलाज का कोई साधन सामान्य दिनों में भी नही है और अब बंदी आ गई तो सब कुछ ठप है."

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रंजीत कुमार

थैलेसेमिया और हीमोफीलिया के मरीज़ परेशान

परेशानी में सीतामढ़ी के रंजीत कुमार भी है. सीतामढ़ी के पुपरी बाज़ार में पशु आहार की छोटी सी दुकान चलाने वाले रंजीत का ढाई साल का बेटा राहुल कुमार थैलेसेमिया से पीड़ित है.

राहुल को हर 15 से 20 दिन में ख़ून चढ़ता है लेकिन इस बार ये समय लंबा खिंचता जा रहा है.

राहुल के पिता रंजीत कुमार बताते है, "हम लोग दरभंगा मेडिकल कॉलेज ले जाकर बच्चे को ख़ून चढ़वाते है जिसमें दो दिन लगते है. हम लोगों के पास बहुत पैसे नहीं हैं फिर भी किसी तरह बच्चे को ले जाते हैं. अभी कोई ऑटो, बस नहीं चल रही है और मेरे पास बाइक तक नहीं है. बच्चे को कैसे ले जाएं?"

ठीक यही परेशानी हीमोफीलिया मरीज़ों की भी है. बिहार हीमोफिलिया सोसाइटी के सचिव डॉक्टर शैलेन्द्र बताते हैं कि राज्य में 1450 हीमोफीलिया और 850 थैलेसेमिया के रोगी हैं.

वो बताते हैं, "सबसे बड़ी परेशानी ट्रांसपोर्ट की है. पटना से 15 किलोमीटर दूर गौरीचक के मरीज़ को सरकारी एम्बुलेंस ने लाने से इनकार कर दिया, इसी तरह बिहार शरीफ़ का एक मरीज 4,000 रुपए में निजी एम्बुलेंस से पटना पहुंचा. हमारी सिर्फ़ इतनी मांग है कि सरकार तेलंगाना सरकार की तरह ही हमें एम्बुलेंस या कार का परमिशन लेटर दे दे ताकि मेरे मरीज़ पटना तो पहुंच सकें."

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राकेश कुमार

डॉक्टरों का व्यवहार

इस बीच पूरे बिहार के कुछेक अस्पतालों को छोड़कर सभी निजी अस्पताल बंद हैं. सामान्य परिस्थितियों में 80 फ़ीसदी मरीज़ प्राइवेट ओपीडी में जाते हैं लेकिन फ़िलहाल सिर्फ़ सरकारी अस्पताल खुले होने के चलते लोग उन्हीं की तरफ रुख़ कर रहे है. लेकिन यहां भी आउटडोर मरीज़ों की संख्या बहुत कम है.

आर्ट्स कॉलेज, पटना के पूर्ववर्ती छात्र राकेश भी कुछ दिन पहले रात 11 बजे पेट दर्द की शिकायत लेकर बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच गए.

वो बताते हैं, "डॉक्टर पर्सनल प्रोटेक्शन किट पहने हुए थे लेकिन उन्होंने मुझे कमरे के दरवाजे पर ही खड़ा रखा और बिना मेरी पूरी बात सुने दवाइयां लिख दी. लॉकडाउन टूटने के बाद फिर से डॉक्टर को दिखाएगे."

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राजधानी पटना का हाल

राजधानी पटना की बात करें तो फ़िलहाल अशोक राजपथ स्थित पॉली क्लिनीक और पाटलिपुत्र स्थित रूबन अस्पताल खुला है.

रूबन अस्पताल के मालिक डॉक्टर सत्यजीत ने बीबीसी को बताया, "ओपीडी को रिस्ट्रिक्टेड की है लेकिन गंभीर रोग जैसे किडनी की डायलिसिस के लिए आने वाले रोगियों को अस्पताल प्रबंधन की तरफ़ से पत्र जारी किया गया है जिससे उनको आसानी हो."

वहीं पॉली क्लिनीक से जुड़े और जनस्वास्थ्य के मुद्दे पर लगातार काम कर रहे डॉक्टर शकील बताते हैं, "मरीज़ों की आमद बहुत कम हो गई है क्योंकि आवाजाही का कोई साधन ही नहीं है. ऐसे में हाजीपुर, सोनपुर, दीघा यानी पटना शहर के आसपास से आने वाले मरीज़ भी नहीं आ रहे है. दूसरा ये कि सरकार निजी अस्पतालों को बार बार खोलने के लिए कह रही है, लेकिन क्या सरकार ने उन्हें पीपीई उपलब्ध कराया है. आप अगर ख़ुद भी ख़रीदना चाहें तो मार्केट में एन-95 मास्क नहीं मिलेगा. ऐसे में ये संभावना प्रबल है कि कोरोना का दौर ख़त्म होने पर गंभीर रोगों से मरने वालों की संख्या बढ़े क्योंकि उन्हें जो नियमित इलाज मिलना चाहिए, वो मिल नहीं पा रहा है."

ये हालात तब हैं जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद नॉन-कोविड मरीज़ों के इलाज को लेकर स्वास्थ्य महकमे को सचेत रहने को कह चुके हैं. राज्य सरकार,आयुक्त और सिविल सर्जन लगातार निजी अस्पतालों और दवाई की दुकान खोलने का आदेश बार-बार जारी कर रहे है लेकिन इसके नतीजे ढाक के तीन पात ही अब तक रहे हैं.

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