लॉकडाउन डायरी: बाहर नाचती मौत और कमरे में बंद घुटन

  • चिंकी सिन्हा
  • बीबीसी संवाददाता
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ये बहुत पहले की बात है. मेरे पिता जी को इस बात की बड़ी फ़िक्र रहती थी कि मैं बातें नहीं करती. ये उन दिनों की बात है, जब मैं छोटी बच्ची थी. मैंने फिर से ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली है.

अब मैं किसी हड़बड़ी में नहीं हूं. मैं आराम से बातें करती हूं. धीरे-धीरे बोलती हूं. एक बार में एक सच बयां करती हूं और बड़ी मोहब्बत से बातें करती हूं. मेरी आंखों से आंसू बहते रहते हैं और इन आंसुओं के ज़रिए शायद मैं अपनी ग़लतियों पर अफ़सोस ज़ाहिर करती हूं.

अप्रैल के महीने ने यूं भेष बदला है मानो इंतज़ार का दूसरा रूप है. मैं हर बात और हर इंसान की अनदेखी कर देती हूं. मैं फ़ोन को साइलेंट मोड पर रख देती हूं. वक़्त कितना ख़ूबसूरत लगता है न, जब वो ठहरा हुआ होता है. और, जैसा कि एक कवि ने कहा है, अप्रैल का महीना तो देखो, कितना निर्दयी है.

मेरे शहर में एक क़ब्रिस्तान उन लोगों के नाम कर दिया गया है, जिनकी मौत कोरोना वायरस की वजह से हुई. इस शहर की तनहाई में वो लाखों लोग शामिल हैं, जो अपने घरों की खिड़कियों से झांकते हुए इस दौर के ख़त्म हो जाने का इंतज़ार कर रहे हैं.

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त्रासदियों का बोझ

कुछ त्रासदियों का बोझ इतना ज़्यादा होता है कि हमारा दिल उन्हें उठा नहीं पाता है. तो फिर ये तबाही, गलियों में टहलते हुए दुकानों की दराज़ों में घुस जाती है. खाने में, फूलों में और हर चीज़ में पैवस्त हो जाती है. ये तबाही हवा पर सवार हो कर आगे बढ़ती जाती है.

इस त्रासदी का सामना करने के लिए मैंने ख़्वाब देखने शुरू किए हैं. मैंने तय किया है कि मैं अपनी यादों को बिसरने नहीं दूंगी. अब मेरे पास उन यादों को संजोने के लिए अभी का ही वक़्त है. अभी मेरा मुस्तक़बिल बहुत दूर खड़ा है.

और हाल की हक़ीक़त ये है कि मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है. ग़रीबों के प्रति बेदिली का सिलसिला बदस्तूर जारी है. ऐसी मुसीबत के मारे दूर के गांवों से शहरों में आए मज़दूर अपने घरों को पैदल लौट रहे हैं. इस मरदुए वायरस की अंतहीन क्रूरता बड़ी तकलीफ़देह है.

ये किसी बुर्जुआ की ज़िंदगी का कोई अंतरंग क़िस्सा नहीं है. मुझे मालूम है कि ऐसे माहौल में खिड़की के पास बैठ कर अपनी ज़िंदगी की कहानी लिखना कोई अच्छा शग़ल नहीं है. जब आप बेफ़िक्र हों कि आपके रेफ्रिजरेटर में सामान ठसाठस भरा है. क्योंकि खिड़की के उस पार बाहर जो दुनिया है, वहां दर्द बेशुमार है. ग़ुरबत है. अभाव है.

ये सिर्फ़ एक वायरस से फैली महामारी भर नहीं है. दरअसल ये तन्हाई की भी एक संक्रामक वबा है. मैं तो अकेली ही रहती हूं. मैंने बरसों पहले ही ये फ़ैसला किया था कि अपनी ज़िंदगी अकेले ही गुज़ारूंगी. मैं अपना ये ख़याल किसी और से साझा नहीं करना चाहती थी. लेकिन, सच तो ये है कि अक्सर रातों को मैं फूट-फूटकर रोती हूं.

मैं अपना तजुर्बा काग़ज़ पर बस इसलिए उकेर रही हूं कि शायद इससे मुझे कुछ क़रार मिले. पर, लिख कर भी मुझे कोई तसल्ली नहीं मिलती.

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रातों को नींद नहीं, अजीबो-ग़रीब सपने

मैं न्यूयॉर्क की एक नर्स जेनिफ़र कोल की फ़ेसबुक पोस्ट पढ़ती हूं. जेनिफ़र ने कोरोना वायरस की एक मरीज़ के साथ तीन रातें बिताई थीं. बाद में उस शख़्स की मौत हो गई.

तब जेनिफ़र ने अपने उस क्यूट से बुज़ुर्ग मरीज़ का स्वेटर तह किया. फिर उसका स्वेटर, उसके जूते और दूसरे सामान को एक बैग में रखा. और फिर वो उस बैग को उस कमरे में रख आई थी, जहां वायरस से मरने वालों का सामान जमा किया जाता है. जहां बाद में गुज़र जाने वालों के परिजन आकर उस सामान पर दावा करते हैं.

जेनिफ़र ने सोमवार को अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा कि, 'ये शहर ज़र्रा-ज़र्रा बिखर रहा है और साथ ही साथ ये मेरा दिल भी चुरा रहा है.'

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तन्हा मौत...

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ड्रामा क्वीन

समाप्त

मैं कहीं दूर सड़क पर सायरन की आवाज़ सुनती हूं. आजकल मुझे ये बजते सायरन अक्सर सुनाई देते हैं. मैं अक्सर रो पड़ती हूं. लॉकडाउन के 13वें दिन जा कर माहौल का शिद्दत से एहसास होता है.

बाहर तो मौत नाच रही है और ये मौत भी बड़ी तन्हा होगी. यूं कि मानो ज़िंदगी पहले से ही अकेली नहीं थी. अक्सर मुझे रातों को नींद नहीं आती. मुझे अजीब-ओ-ग़रीब ख़्वाब आते हैं.

यूं लगता है कि मैं हक़ीक़ी दुनिया से दूर हो चुकी हूं. बस एक फ़ोन है और तकनीक के धागे का एक सिरा, जिससे मैं बाक़ी दुनिया से जुड़ी हुई हूं. एक रोज़ की बात है, जब मैंने सोचा कि मैं अपनी दोस्त के माथे पर बिखरे हुए बालों को ठीक कर दूं फिर मुझे ख़याल आया कि मेरे और उसके बीच फ़ोन का स्क्रीन आ जाता है.

किसी पर भरोसे का भविष्य भी तो दांव पर है. अक्सर मैं ये बातें भूल जाती हूं. वक़्त लगता है. पर, शायद मोहब्बत जताने का कोई और तरीक़ा निकल आएगा. मुझे याद आता है कि मैं एक लाइटहाउस में अकेली हूं. जिसके छज्जे पर बरसाती टंगी है और कांच की दीवारों का घेरा बना है.

मैं अपनी मेज़ से, अपनी रसोई से और अपने बिस्तर से दूसरी खिड़कियां भी देख पाती हूं. वो भी मुझे डेढ़ कमरे के इस अपार्टमेंट में चहलक़दमी करते देखते ही होंगे कि एक औरत है, जो कबूतरों को दाना चुगाती है, कपड़े सूखने को डालती है, अक्सर शामों को वो महिला अपने हाथ में एक ग्लास पकड़ कर खड़ी होती है और आसमान की ओर निहारती रहती है. मैंने अपने अपार्टमेंट पर भूरे रंग की पेंटिंग कर डाली है. मुझे नहीं मालूम कि मुझे किसकी तलाश है. शायद ज़िंदगी की.

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अब तो दुनिया ख़त्म हो रही है न?

मुझे अब तक नहीं पता कि मेरी बिल्डिंग की पहली मंज़िल पर कौन रहता है. मुझे ये तो पता है कि ग्राउंड फ्लोर पर कोई नहीं रहता. मकान की मालकिन तो उसी साल गुज़र गई थीं, जब मैं यहां रहने आई थी. मेरे टैरेस के उस पार के अपार्टमेंट में खिड़की पर फ्रेंच ग्लास लगा हुआ है. ये उच्च मध्यम वर्गीय परिवार की निशानी है, जिसने दुनिया का दीदार किया है.

मुझे बिस्तर पर एक आदमी नंगा लेटा हुआ दिखाई देता है. मैं उन दो कमरों की हर चीज़ देख सकती हूं, क्योंकि मेरी नज़र और उस मंज़र के बीच बस कांच की दीवार ही तो है. वहां पर क्रीम कलर का, चमड़े का एहसास देने वाला थ्री सीटर सोफ़ा है. दीवार पर एक बड़ी सी स्क्रीन वाला टीवी सेट टंगा है. एक बिस्तर है. मुलायम सी रज़ाई है और वो नग्न इंसान है. वो अपने बिस्तर पर पलटा. बत्तियां जल रही हैं.

अकेले रहने पर आप अजीब-ओ-ग़रीब हरकतें करने लगते हैं. पिछले तीन बरसों में मैंने कभी अपने टैरेस के उस पार किसी को इस तरह नंगे पड़े हुए नहीं देखा. और इस तन्हाई में आपकी हरकतों पर कौन तब्सेरा करने जा रहा है भला. इस बेशर्म और दिलेरी भरी नग्नता पर भी कोई क्या ही कहेगा. लेकिन, अब तो दुनिया ख़त्म हो रही है न.

मुझे इस पर ज़रा भी अचरज नहीं होता. मैं इस मंज़र को आज़ादी के एलान के तौर पर देखती हूं. ये आज़ादी संपूर्ण है. हर बंदिश से परे है. मुझे नहीं पता कि वो शख़्स मुझे ख़ुद को देखते हुए देख रहा या नहीं. मैं यहां ख़ुद के साथ हूं. मैं एक ऐसी दुनिया से ताल्लुक़ रखती हूं, जिसका इंतज़ार बढ़ता ही जाता है. मैं एक ऐसे शहर पटना से आती हूं, जो अंतहीन इंतज़ार का दूसरा नाम बन चुका है.

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अंतहीन इंतज़ार, बेवफ़ा ज़िंदगी

मैंने अपने दादा जी को देखा था कि वो मैग्निफ़ाइंग ग्लास लेकर अपनी मेज़ पर झुकते थे और वहां रखी हज़ारों किताबों में एक को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे. वो किताबें, जो उन्होंने ख़ुद ही जुटाई थीं. इसके बाद वो डायरी में अपने ख़यालात और यादों को दर्ज करते थे. मैं इन्हें ग़म के रिसाले कहा करती थी. मुझे अपने दादा की तीन डायरियां विरासत में मिली थीं.

औरों की तरह, मेरे ज़हन से भी वक़्त का हिसाब किताब निकल गया है. मैंने औरों से बहुत पहले ही ख़ुद को आइसोलेशन की चादर में लपेट लिया था. वजह ये थी कि मैं किसी ऐसे शख़्स से मिली थी, जो अमरीका से लौटा था. और उसके बाद सरकार ने लॉकडाउन का एलान कर दिया था. और बिना किसी चेतावनी के वो ज़िंदगी मुझसे छीन ली गई थी, जो मेरी हमसफ़र थी. जिससे मेरी ख़त-ओ-किताबत थी. और मुझे तो अपनी ज़िंदगी से महरूम करने की वजह भी नहीं बताई गई थी.

वो ज़िंदगी तो बस यूं बेवफ़ा हो गई थी, जैसे कोई आशिक़ बिन बताए आपसे दूर चला जाए. अक्सर आपको हक़ीक़त को मंज़ूर करने में वक़्त लगता है. लॉकडाउन के एलान और उसे लागू करने के बीच बस चार घंटों का फ़ासला था. मगर, ये चार घंटे कहां काफ़ी थे.

मेरे पास तो लॉकडाउन से पहले निपटाए जाने वाले कामों की लंबी फ़ेहरिस्त थी. तो मैंने घर बैठ कर ख़ुद को इस सोच में मुब्तला कर लिया कि क्या इश्क़-ओ-मोहब्बत का भविष्य बड़ा अनिश्चित है. और यादों के बारे में क्या ख़याल है? यादों का मुस्तक़बिल शानदार है क्या? क्योंकि, मरने वालों की तादाद तो लगातार बढ़ती ही जा रही है.

जब मुझे वक़्त का ख़याल आया, तो मुझे अपने घर के दरवाज़े पर लगे एक नींबू के पेड़ की याद आई. मुझे वो पेड़ आज भी याद है, क्योंकि बचपन में मैं अक्सर उस पेड़ पर चढ़ जाती थी. और एक बार मैं उससे गिर भी पड़ी थी. और गिरते वक़्त नींबू के पेड़ के कांटों ने मुझे ख़ून-ओ-ख़ून कर डाला था. बड़े दिन पर मैं उस पेड़ पर सितारे टांकती थी. क्रिसमस के दिन वो पेड़ मेरे लिए एक जादुई दरख़्त हो जाता था. मुझे उस वक़्त जादू पर भरोसा हुया करता था. मुझे जादू पर आज भी तो यक़ीन है.

उन दिनों में मैं ब्रितानी लेखिका एनिड ब्लाइटन की किताबें ख़ूब पढ़ती थी. इस वजह से मुझे ख़ाली पड़े खंडहरों में घुसने में बिल्कुल डर नहीं लगता था. मैं उन खंडहरों में छुपे ख़ज़ाने और राज़ तलाशने के लिए अक्सर जाया करती थी.

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वक़्त की कमी

मुझे बचपन में दिन में ख़्वाब देखने का ख़ब्त था. क्योंकि वो दिन भी तो आज जैसे ही थे. उस समय में ऐसे ही हमारे पास ख़ूब समय होता था, जैसे इन दिनों है. मेरे घर में घड़ियां नहीं हैं. बस एक घड़ी है, जो मुझे किसी ने तोहफ़े में दी थी. ये एचएमटी की पुरानी घड़ी है. मगर इसने महीनों पहले चलना बंद कर दिया है. बचपन से लेकर आज के वक़्फ़े में मुझे हमेशा ही वक़्त की कमी महसूस होती रही थी.

मैंने अपने दादा की तीन डायरियां निकालीं, जो मैंने उनके पुराने घर से क़रीब दो दशक पहले चुराई थीं. उनके गुज़र जाने के बाद, उनकी जो किताबें और डायरियां थीं, उन्हें वहीं छोड़ दिया गया था. बाद में मुझे पता चला कि उन्होंने वो किताबें और डायरियां फेंक दी थीं.

'मेरे जैसे घर में अकेलेपन जैसी कोई चीज़ नहीं होती. कभी दरवाज़ा बंद होता सुनाई देता है. कभी किसी के क़दमों की आहट आती है. कभी घर की घंटी बजती है और कोई आवाज़ आती है, जिससे आपके ज़हन में यादों का कोई झोंका सा आता है. और फिर आप जाने किन ख़यालों में गुम हो जाते हैं.'

मेरे दादा ने ये बातें 14 अगस्त 1988 को अपनी डायरी में लिखी थीं, जो उनकी सालगिरह से एक दिन पहले की तारीख़ थी. और आज 32 बरस बाद एक और महीने में, मेरे ख़याल न जाने कहां फिर गुम हो रहे हैं.

मैं अपने दादा की पोती हूं.

मगर, जहां मेरे दादा के घर की दीवारें हरे रंग में रंगी थीं. वहीं, मैंने अपने इस अस्थाई मकान की दीवारों को भूरे रंग से रंग डाला है. हम दोनों अगस्त महीने की पैदाइश हैं. उनकी किताबों की दराज़ों में मैंने टॉल्सटॉय, दोस्तोवस्की, मोराविया, शेक्सपियर, फिट्ज़गेराल और बेकेट...समेत न जाने कितने लेखकों की रचनाएं देखी थीं.

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अकेलापन: स्टेट ऑफ़ माइंड

मुझे अपने दादा का वो सब्ज़ कमरा आज भी याद है. जहां पर मेरे दादा ने व्हिस्की पीते हुए अपनी ज़िंदगी के आख़िरी कुछ दिन गुज़ारे थे. उनकी शराब वाली बोतल एक भूरे रंग के काग़ज़ में लिपटी हुई होती थी. उनका सिर, मेज़ पर झुका होता था. मेज़ पर एक चिराग़ भी रौशन होता था, जो दीवारों पर अजीब क़िस्म की परछाइयां उकेरता रहता था. दीवार पर हरे रंग की जो मोटी सी परत थी, वो उधड़ रही थी. और उन दीवारों को देख कर ही एहसास होता था कि कैसे तन्हाई, अचानक ज़बरदस्ती ज़िंदगी में दाख़िल होती है. और फिर वो आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती है.

असल में अकेलापन एक स्टेट ऑफ़ माइंड होता है. जो कई बार ज़हन का स्थायी भाव हो जाता है. अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दशक में जब मेरे दादा, मौत का इंतज़ार कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी डायरी में पटना और आरा की सर्दी और बारिश के बारे में लिखा था. वहां के लोगों के बारे में अपने ख़यालात दर्ज किये थे.

उनकी डायरी में उन तार संदेशों का भी ज़िक्र था, जो उन्होंने अपने बेटों को भेजे थे. और उस खीझ को भी बयां किया था, जब पेंशन पाने के लिए उन्हें हर बार ख़ुद को तैयार करके साहब के सामने पेश कर ये साबित करना होता था कि वो ज़िंदा हैं और पेंशन पाने के लिए हाज़िर हैं. सबसे बड़ी बात कि उन्होंने अपनी डायरी में उस इंतज़ार को दर्ज किया था, जिसमें वो मसरूफ़ थे.

उन्होंने लिखा था:

'मैं इंतज़ार भी कर रहा हूं. इस अकेलेपन में मैं गुज़रे हुए वक़्त की सही और ग़लत बातों के बारे में सोचता हूं. ज़िंदगी के फ़रेब, पेचीदा हक़ीक़त, छल, जज़्बात की बातें, अलविदा कहने के दर्द, तल्ख़ सच्चाई और हज़ारों ग़ुलामियों के बारे में सोचता हूं. वो काली स्क्रीन, वो की-बोर्ड और कॉफ़ी का ठंडा पड़ चुका कप, वो सब मुझे घूरते रहते हैं. वो हमेशा ही ऐसा करते हैं. ज़ुबान या क़लम से निकले दुख भरे शब्दों में से सबसे दुखद लफ़्ज़ ये होते हैं-काश ऐसा होता तो!'

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अमरीकी लेखक ग्रीनलीफ़ व्हिटियर की नज़्म मॉड मिलर का ये टुकड़ा मेरे दादा ने अपनी डायरी में 12 अप्रैल 1989 को दर्ज किया था.

महामारी का ये दौर दूसरे मौसमों की तरह नहीं है, जो धरती के चक्कर लगाने पर निर्भर है. ये अंतहीन मौसम है. लॉकडाउन बढ़ा दिया गया है. मैंने अभी-अभी इसकी ख़बर पढ़ी. मैं तो सोने जा रही हूं. शाम को मैं चुपके से बाहर निकलूंगी और गिरे हुए फूल गिनूंगी. मुझे डर है कि कहीं मुझे इसकी लत न लग जाए. मुझे इंसानों का मुख़ालिफ़ बन जाने के ख़याल से भी डर लगता है. मुझे लगता है कि शायद मैं फिर से रिपोर्टर ही बनना चाहूंगी.

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