कोरोना का रोना: क्वारंटीन में रहने के लिए अलग-अलग तरीक़े अपना रहे हैं लोग

  • समीरात्मज मिश्र
  • लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना वायरस क्वारंटाइन

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

कोरोना वायरस से संक्रमित या फिर उनके संपर्क में आए लोगों को क्वारंटीन या फिर आइसोलेशन में रखा जाता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो एहतियातक के तौर पर ख़ुद को दूसरों से अलग-थलग रखे हुए हैं, वो भी बेहद दिलचस्प तरीक़े से. ऐसे कुछ लोग स्वेच्छा से रह रहे हैं और कुछ विवशता में.

उत्तर प्रदेश के हापुड़ ज़िले के रहने वाले मुकुल त्यागी ने तो घर से दूर जंगल में ही अपना आशियाना बना लिया है, वो भी पेड़ पर.

जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, मुकुल त्यागी यहीं रह रहे हैं. उनका खाना-पीना, सोना सब यहीं होता है. मुकुल त्यागी के साथ में उनका बेटा भी है और एक पेड़ पर उसका आशियाना बना है.

मुकुल त्यागी बताते हैं, "लॉकडाउन के कारण हर चीज़ बंद है. कोर्ट-कचेहरी भी बंद है. मैं वकील हूं तो अब मेरे पास कोई काम भी नहीं था. सोचा, क्यों न प्रकृति की गोद में ही रहा जाए. फिर हमने यहां पेड़ के ऊपर लकड़ी से मचान जैसी एक चीज़ बनाई."

"यहां से ज़्यादा सोशल डिस्टेंसिंग और कहां बनाई जा सकती है. घर से खाने-पीने की चीज़ें आ जाती हैं. बाक़ी मैं दिन-रात यहीं रह रहा हूं. धार्मिक पुस्तकें पढ़ रहा हूं और शुद्ध हवा ले रहा हूं."

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कोरोना: आइसोलेशन में रहने के लिए पेड़ों पर घर बना रहे हैं लोग

25 मार्च से पूरे भारत में 21 दिनों का लॉकडाउन है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की है कि सोशल डिस्टेंसिंग का अधिकतम पालन किया जाए. हालांकि कई जगह सोशल डिस्टेंसिंग की ज़बर्दस्त अनदेखी देखने को मिल रही है लेकिन मुकुल त्यागी जैसे लोग इसे रोचक तरीक़े से निभा भी रहे हैं.

मुकुल त्यागी बताते हैं कि उन्होंने पेड़ तक पहुंचने के लिए एक सीढ़ी भी बना रखी है. जब मन करता है तो नीचे भी उतर आते हैं लेकिन बग़ीचे से बाहर नहीं जाते.

मुकुल त्यागी बताते हैं कि इस ट्रीहाउस को उन्होंने ख़ुद ही अपने बेटे के साथ मिलकर बनाया है और बनाने में दो दिन लगे. वो कहते हैं, "अब यहां रहना अच्छा लग रहा है. मैं गांव का रहने वाला हूं लेकिन प्रकृति का इतना साहचर्य शायद ही कभी मिला हो और मैंने अनुभव किया हो."

घर नहीं जा पाए मज़दूर सड़कों पर हैं

मुकुल त्यागी तो स्वेच्छा से अकेलेपन का आनंद ले रहे हैं लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मजबूरी ने ऐसे ही रोचक तरीक़े से 'क्वारंटीन' में रहना पड़ रहा है.

कानपुर में रहने वाले हज़ारों मज़दूर और बेलदार जो अपने घरों को नहीं जा पाए, वो उन्हीं दुकानों के बाहर अकेले में रह रहे हैं जहां वो काम करते थे.

कानपुर का मूलगंज इलाक़ा वहां का प्रमुख थोक बाज़ार है. यहां बड़ी संख्या में इस तरह के मज़दूर हैं जो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए वहीं रह रहे हैं.

ऐसे ही एक बेलदार रघुवर पाल कहते हैं, "अपने घर जा नहीं सके बंदी के कारण. अब यहीं रह रहे हैं. खाने-पीने का इंतज़ाम मालिक लोग कर देते हैं. साथ में कई लोग रह रहे हैं लेकिन हम लोग दूरी बनाकर रहते हैं. बातचीत भी करते हैं तो दूर से ही."

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कई ऐसे मज़दूर भी हैं जो बाहर के रहने वाले हैं और अचानक लॉकडाउन होने के बाद यहीं पर फँस गए. ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में इन्हीं परिस्थितियों में रह रहे हैं.

आज़मगढ़ के रहने वाले सुजीत भी उन्हीं लोगों में से हैं. बोले, "होटल में काम करता था. होटल बंद हो गया. कई और लोग भी हैं. सड़कों पर चादर बिछाकर रह रहे हैं. खाने-पीने का इंतज़ाम यहां हो जाता है. कोई न कोई दे ही जाता है."

टूटी वैन में बनाया घर

वहीं हमीरपुर के रहने वाले कल्लू को गांव वालों ने जब आने नहीं दिया तो वो कानपुर में ही रुक गए. कानपुर में मज़दूरी करते थे, उनके साथ के लोग पहले ही गांव चले गए थे लेकिन वो नहीं जा पाए थे.

कानपुर के नौबस्ता में ही एक पुरानी और टूटी-फूटी वैन में उन्होंने अपना आशियाना बना डाला है.

कल्लू बताते हैं, "बंदी की घोषणा होने के बाद काम मिलना बंद हो गया. गांव जाना था तो हमने किराये का मकान भी छोड़ दिया लेकिन गांव वालों ने ऐतराज़ किया. फिर हम यहीं आ गए. यहां यह गाड़ी ख़ाली दिखी. पहले से ही ऐसे पड़ी थी. मैंने इसी को अपना घर बना लिया. किसी ने मना भी नहीं किया."

"अब तो पंद्रह दिन हो गए यहीं रहते हुए. अकेले अपना पड़े रहते हैं यहीं. खाने-पीने का कुछ सामान रखे हैं. हालांकि कोई दिक़्क़त नहीं होती है. पुलिस वाले भी दे जाते हैं और कुछ दूसरे लोग भी खाना बांटने आते हैं."

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कल्लू जिस वैन में अपना आशियाना बनाए हुए हैं वो एक गैराज के बाहर खड़ी है. उसकी स्थिति को देखकर लगता है कि उसमें इंजन जैसी कोई चीज़ नहीं है, सिर्फ़ ढांचा ही बचा हुआ है.

यही टूटा-फूटा ढांचा कल्लू को पनाह दिए हुए है. आस-पास के लोग कुछ ज़रूरी सामान भी दे जाते हैं, इसलिए उन्हें किसी तरह की समस्या नहीं होती है.

लेकिन बकौल कल्लू, "अपना गांव और अपना घर तो याद आता ही है. इस छोटी सी जगह पर दिन काटना किसी जेल की कोठरी में ज़िंदग़ी बिताने जैसा ही है."

हालांकि वो कहते हैं कि जब तक लॉकडाउन ख़त्म नहीं हो जाता, वो यहीं रहेंगे.

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