क्या कोरोना संक्रमण से निपटना पीएम मोदी की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है?

  • सरोज सिंह
  • बीबीसी संवाददाता
नरेंद्र मोदी

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"दुनिया के बड़े-बड़े सामर्थ्यवान देशों में कोरोना से जुड़े आँकड़े देखें तो उनकी तुलना में आज भारत बहुत संभली हुई स्थिति में है. महीना डेढ़ महीना पहले दुनिया के कई देश एक प्रकार से भारत के बराबर खड़े थे, आज उन देशों में भारत की तुलना में कोरोना के मामले 25 से 30 गुना ज़्यादा बढ़ गए हैं."

-14 अप्रैल 2020 प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का अंश

प्रधानमंत्री मोदी की ही तरह, उनके दूसरे मंत्रियों ने भी ट्विटर पर पोस्ट शेयर किए हैं, जिसमें कहा जा रहा है कि मोदी सरकार ने कोरोना पर काफ़ी अच्छा काम किया है. इस वजह से दुनिया के लीडरों की बीच मोदी की रैंकिंग बेहतर हैं.

14 अप्रैल को भारत में कोरोना के कुल 11,487 मामले थे. लॉकडाउन बढ़ाने का फ़ैसला जिस दिन किया गया था, उसी भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक उठाए गए अपने क़दम भी गिनाए और अपनी पीठ खुद ही थपथपाई.

•17 जनवरी 2020- जब हमारे यहां कोरोना का एक भी केस नहीं था, उससे पहले ही भारत ने कोरोना प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों की एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी.

•14 मार्च 2020- कोरोना के मरीज़ 100 तक पहुंचे उससे पहले ही भारत ने प्रभावित देशों से आए यात्रियों के लिए 14 दिन का आइसोलेशन अनिवार्य कर दिया था.

•मार्च 2020 - दिल्ली समेत अनेक जगहों पर मॉल हो, थिएटर हो, क्लब हो, जिम हो पहले ही बंद किए जा चुके थे.

•24 मार्च 2020 - जब हमारे यहाँ कोरोना के 550 मरीज़ थे, तभी हमारे यहां 21 दिन के संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी.

इन सभी फ़ैसलों को गिनाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ये कहा कि भारत ने समस्या बढ़ने का इंतजार नहीं किया बल्कि जैसे ही समस्या दिखी, तुरंत फ़ैसले ले कर रोकने का प्रयास किया.

लेकिन क्या कोरोना से निपटने के मामले में भारत की वाक़ई में विश्व में सराहना हो रही है? क्या इस वैश्विक महामारी ने दुनिया में प्रधानमंत्री मोदी का क़द ऊँचा कर दिया है?

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

विश्व में भारत पर पहली सोच

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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ये जानने के लिए बीबीसी ने बात की सदानंद धूमे से.

सदानंद धूमे अमरीका के वॉशिंगटन में अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट में रेज़िडेंट फ़ेलो हैं. 2009 में उन्होंने एक किताब लिखी थी, My Friend the Fanatic: Travels with a Radical Islamist.

2014 में मोदी के आने के बाद से भारत में क्या-क्या बदला, इस विषय पर फ़िलहाल सदानंद अपनी दूसरी किताब लिख रहे हैं.

'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में वो भारत और दक्षिण एशिया पर सप्ताह में दो बार कॉलम लिखते हैं. दुनिया के इस हिस्से में चल रही राजनीति, विदेश नीति और अर्थव्यवस्था पर उनकी गहरी पकड़ है. प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से इंटरनेश्नल रिलेशन में एमए किया और कोलंबिया यूनिवर्सिटी से उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है.

भारत अमरीका से क्या सीख सकता है या सिखा सकता है, जब ये सवाल हमने सदानंद से पूछा, तो उन्होंने कहा, अमरीका से इस मामले में कोई देश पॉज़िटिव बात नहीं सीख सकता.

सदानंद के मुताबिक़, "अमरीका ने शुरूआती दौर में कई ग़लतियां की हैं, जिसकी वजह से वहां ज़्यादा जानें गईं और ज़्यादा लोग प्रभावित हुए हैं. अमरीका ही नहीं, दूसरे यूरोपीय देश जैसे फ़्रांस, स्पेन, इटली, ब्रिटेन के मुक़ाबले भारत में इस वक़्त स्थिति बेहतर है. लेकिन अभी भी ये एक रहस्य बना हुआ है कि आख़िर ऐसा क्यों हुआ है? इसके लिए दुनिया भर में दो तरह की सोच उभर कर सामने आ रही हैं.

धूमे के मुताबिक, पहली सोच यह है कि भारत ने दूसरे यूरोपीय देशों के मुक़ाबले बेहतर किया है क्योंकि मार्च के अंत में ही लॉकडाउन लागू कर दिया, जब भारत में तकरीबन 500 कोरोना मरीज़ थे. ये सोच रखने वाले लोग भारत के गर्म मौसम, भारत में बीसीजी टीका लगाने के चलन को, एंटी मलेरियल ड्र्ग के शुरूआती दौर में इस्तेमाल जैसे क़दमों को इसके पीछे की वजह करार देते हैं.

सदानंद मानते हैं कि भारत के बारे में ऐसी सोच रखने वाले मानते हैं कि भारत ने कोरोना संक्रमण को बेहतर तरीक़े से हैंडल किया है.

भारत सरकार भी इसी सोच के साथ अपनी पीठ थपथपा रही है. 23 मार्च को केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि भारत में कोरोना के मरीज़ों की भारत में बढ़ने की रफ़्तार 'लिनियर है, एक्सपोनेंशियल नहीं, मतलब ये कि भारत ने मरीज़ों के बढ़ने की रफ़्तार को थोड़ा धीमा कर दिया है.

लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि भारत में असली ख़तरा जनवरी के अंत में नहीं बल्कि मार्च में आना शुरू हुआ जब इटली से घूमकर आए लोगों में संक्रमण का पता चला.

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अगर इस नज़रिए से आप सहमत हैं, तो एक तरह से कहा जा सकता है कि अभी तक भारत ने अपनी कोशिशों से कोविड-19 कर्व को तेज़ी से बढ़ने नहीं दिया और एक तरह से परिस्थितियों को अपने नियंत्रण में रखा है.

विश्व में भारत पर दूसरी सोच

सदानंद के मुताबिक़ विश्व में भारत के कोविड19 मैनेजमेंट को लेकर एक दूसरी सोच भी है.

ऐसी सोच रखने वाले जानकार भारत के क़दमों को संदेह की नज़र से देखते हैं. इसमें लोग भारत के कोरोनाग्राफ़ को जनवरी की बजाए मार्च से देखने की बात कहते हैं. ऐसा इसलिए कि तभी से आँकड़े बढ़ने शुरू हुए.

इस नज़रिए से भी देखें तो भी भारत अमरीका और इटली से ज़्यादा बेहतर स्थिति में दिखता है. लेकिन इस स्थिति में आँकड़ों का अंतर थोड़ा कम हो जाता है. मसलन 7- मार्च से 14 मार्च के बीच के भारत के आँकड़े देखें और 7 अप्रैल से 14 अप्रैल के बीच के भारत के कोरोना संक्रमित मरीज़ों के आँकड़े देखें, तो अंतर आपको साफ़ दिखेगा.

इसलिए कहां से कोरोना मामलों की काउंटिंग शुरू की जाती है. वो एक अहम पड़ाव है.

भारत के मामले में इस तरह का नज़रिया रखने वाले जानकार, एक और मामले में संदेह करते हैं, वो है भारत में होने वाली टेस्टिंग की संख्या. भारत में टेस्टिंग की संख्या भी पिछले कुछ दिनों में ज़रूर बढ़ी है, लेकिन अमरीका के मुकाबले अब भी बहुत कम है. भारत ने अमरीका के मुक़ाबले 10 गुना कम टेस्टिंग की है, जबकि अमरीका की जनसंख्या भारत के मुक़ाबले एक चौथाई ही है. और इस लिहाज़ से देखेंगे तो भारत अमरीका के मुक़ाबले टेस्टिंग में काफ़ी पीछे है.

अमरीका पर भी कम टेस्ट करने के आरोप लग रहे हैं क्योंकि जर्मनी अमरीका के मुक़ाबले टेस्टिंग में काफ़ी आगे है.

भारत सरकार का पक्ष

टेस्टिंग पर भी भारत सरकार के पास अपने तर्क हैं. कोविड-19 से निपटने के लिए भारत सरकार ने कई कमेटियों का गठन किया है. इनमें से एक कमेटी के चेयरमैन, सीके मिश्रा ने कहा कि भारत ने अब 5 लाख टेस्ट कर लिए गए हैं.

टेस्टिंग के मामले में अमरीका, इटली और ब्रिटेन से भारत की तुलना करते हुए उन्होंने दावा किया कि भारत की रणनीति सफल है और इसलिए मामले कम हैं.

मिश्रा ने कहा, "अमरीका ने 26 मार्च तक 5 लाख टेस्ट किए थे, और उस वक़्त वहां पॉज़िटिव मरीज़ों की संख्या 8 हज़ार थी. इटली ने 31 मार्च तक 5 लाख टेस्ट किए और उस वक़्त उनके यहां पॉज़िटिव मरीज़ की संख्या 1 लाख थी. ब्रिटेन ने 20 अप्रैल तक 5 लाख टेस्ट किए और उस वक़्त उनके यहां 1 लाख 20 हज़ार पाज़िटिव मरीज़ थे. भारत ने 22 अप्रैल को 5 लाख टेस्ट किए और हमारे यहां केवल 20 हज़ार कोरोना पाज़िटिव मरीज़ हैं."

भारत सरकार ने टेस्टिंग के मामले में दुनिया भर में तारीफ़ बटोरने वाले देश दक्षिण कोरिया और जर्मनी से तुलनात्मक अध्यन का ज़िक्र इस प्रेस कॉंफ्रेंस में नहीं किया.

टेस्टिंग है असली पैमाना

सदानंद धूमे की मानें तो दुनिया में कोविड-19 की लड़ाई में कौन कितना सफल या विफल है, वो उस देश की टेस्टिंग के आँकड़ों को देख कर ही तय किया जाना चाहिए. और उस लिहाज़ से भारत की स्थिति बिल्कुल भी अच्छी नहीं है. जो लोग पहले नज़रिए से इस महामारी को देखते हैं, उनको मेरा ये कहना ग़लत लग सकता है.

सदानंद के अनुसार अगर टेस्ट ही नहीं होंगे तो किसी देश की सही पिक्चर सामने नहीं आएगी. ख़ास तौर पर तब जब बिना लक्षण वाले लोगों के बीमार होने की बात सामने आ रही है. वो ये बात केवल भारत के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए कहते हैं.

उनके मुताबिक, "भारत के लिए ये कतई नहीं कहा जा सकता की विकसित या फिर विकासशील देश भारत से कोविड-19 मैनेजमेंट में काफ़ी कुछ सीख सकते हैं. ये कहने के पहले दो बातों का ख़्याल रखने की ज़रूरत है. पहला- भारत ने टेस्टिंग कितनी ज़्यादा की है. दूसरा - कितना समय गुज़रा है. कुल मिला कर तीन से छह महीने और इंतज़ार करने की ज़रूरत है."

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तो क्या कोविड-19 तय करेगा दुनिया भर के देशों की हैसियत?

इस सवाल पर सदानंद कहते हैं, "वर्तमान स्थिति में दुनिया में किस देश की हैसियत क्या है, आने वाले समय में वो इस बात पर निर्भर करेगा कि कोविड-19 को किस देश ने कैसे हैंडल किया है. ये केवल भारत के लिए नहीं. अमरीका, चीन, रूस के लिए भी उतना ही सही है.

ये हमारी जेनरेशन की सबसे बड़ी ग्लोबल घटना है. 9/11 के हमले से भी बड़ी कहानी है. पूरी दुनिया में किस देश को किस नज़रिए से देखा जाता है ये उस नज़रिए को भी पूरी तरह बदल कर रख देगा. लेकिन इस महामारी को शुरू हुए अभी सिर्फ़ साढ़े तीन महीने ही हुए हैं. इतनी जल्दी किसी देश के लिए कोई धारणा बना लेना मुश्किल होगा."

सदानंद अपनी बात को एक उदाहरण के जरिए समझाते हैं. उनके मुताबिक पिछले दो हफ्ते में सिंगापुर में स्थिति में काफी बदलाव आया है. वैसे ही स्वीडन के कोरोना संक्रमण से निपटने के प्रयासों पर भी दुनिया में दो राय है.

इसलिए अभी के हिसाब से भारत के लिए बस इतना ही कहा जा सकता हैं, "भारत ने बद से बदत्तर होने वाली स्थिति को फ़िलहाल के लिए टाल दिया है और भारत के लिए ये अच्छी बात है. इससे ज़्यादा कोई और निष्कर्ष निकालना फ़िलहाल ठीक नहीं. परिस्थितियां तेज़ी से बदल रही है."

मोदी के लिए करो या मरो वाली स्थिति

प्रधानमंत्री मोदी के लिए कोविड-19 महामारी को सदानंद 'करो या मरो' की स्थिति मानते हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "ये उनके पॉलिटिकल करियर की अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा है. अगर कोविड-19 से निपटने में भारत क़ामयाब रहता है तो वे देश की मौजूदा पीढ़ी के सबसे ताक़तवर और पसंदीदा राजनेता के तौर पर अपनी साख़ को मज़बूत करेंगे. लेकिन अगर भारत में कोरोना संक्रमण के मामले विस्फोटक स्थिति में पहुंचते हैं, तो देश में बड़े स्तर पर अप्रत्याशित समाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल सकता है."

अपने इस बयान का वो कारण भी बताते हैं. उनके मुताबिक़ चाहे गुजरात के भुज में भूकंप की बात हो या 2002 के दंगों की बात हो, इतने बड़े पैमाने पर कुछ भी नहीं हुआ. मोदी ने अपने राजनीतिक करियर में कई चुनौतियां झेली हैं लेकिन किसी की व्यापकता इतनी नहीं थी, जितनी कोरोना संक्रमण की है. कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए उन्हें केवल पब्लिक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर ही संघर्ष नहीं करना है, आर्थिक मोर्चे पर भी उनके सामने कई चुनौतियां है.

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मोदी ही नहीं ट्रंप पर भी है सबकी निगाहें

सदानंद के मुताबिक ये बात केवल मोदी के लिए ही नहीं, अमरीकी राष्ट्रपति के लिए भी उतनी ही सही है.

उन्होंने कहा, "ये ऐसी चुनौती है जो अमरीका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उनकी उम्मीदवारी की जीत या फिर हार को तय करेगी. इसमें संदेह का सवाल ही नहीं है. ये भी सच है कि अपने राजनीतिक कार्यकाल में ट्रंप ने भी कई और चुनौतियों का सामना किया है लेकिन इसका स्केल बिल्कुल अलग है. कोरोना वायरस का संक्रमण दुनिया के किसी भी राजनेता का आने वाला भविष्य तय करेगा. और मोदी इसमें कोई अपवाद नहीं है. ये एक सूनामी की तरह है. इस सूनामी से निपटने के लिए किस नेता ने क्या किया, ये इतिहास में ज़रूर दर्ज होगा. हम सबको उस घड़ी का इंतज़ार करना चाहिए. ये मोदी के पक्ष में भी हो सकता है और नहीं भी हो सकता है."

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