पाकिस्तान में 15 रुपए सस्ता हुआ पेट्रोल, भारत में क्यों नहीं?

  • प्रशांत चाहल
  • बीबीसी संवाददाता
पेट्रोल

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पाकिस्तान सरकार ने पेट्रोलियम के उत्पादों की क़ीमत में भारी कटौती की घोषणा की है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी 'पाकिस्तान तहरीक़े इंसाफ़' ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट किया है कि 'अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें कम हो रही हैं, इसलिए पाकिस्तान सरकार ने मई महीने के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की क़ीमत कम कर दी है ताकि आम लोगों को इससे कुछ लाभ मिल सके.'

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पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार बुधवार को देश की ऑयल एंड गैस रेग्युलेटरी अथॉरिटी (OGRA) ने पाकिस्तान के ऊर्जा मंत्रालय से यह अनुरोध किया था कि 'अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें कम हो रही हैं, इसलिए देश में भी तेल की क़ीमतें कम की जाएं.'

पाकिस्तान के ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक़ एक मई 2020 से देश में नई क़ीमतें लागू हो चुकी हैं जिसमें पेट्रोल पर 15 रुपए, हाई स्पीड डीजल पर 27.15 रुपए, मिट्टी के तेल पर 30 रुपए और लाइट डीजल ऑयल पर 15 रुपए कम किए गए हैं.

यानी जो एक लीटर पेट्रोल पहले 96 रुपए का मिल रहा था, अब 81 रुपए लीटर हो गया है. वहीं हाई स्पीड डीजल की क़ीमत पहले 107 रुपए लीटर थी, जो अब घटकर 80 रुपए प्रति लीटर हो गई है.

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फ़ैसले पर दो तरह के विचार

सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के कुछ लोग सरकार के इस फ़ैसले की तारीफ़ कर रहे हैं. वो लिख रहे हैं कि 'कोविड-19 महामारी की वजह से जो अतिरिक्त आर्थिक दबाव उन पर बना है, तेल की क़ीमतें कम होने से उसमें थोड़ी राहत मिलेगी.'

लेकिन आर्थिक मामलों के कुछ जानकार सरकार के इस फ़ैसले को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बता रहे हैं.

पाकिस्तान के नामी अर्थशास्त्री, डॉक्टर कैसर बंगाली ने लिखा है कि 'हर बार तेल की क़ीमत कम होने के साथ महंगाई या सार्वजनिक परिवहन की क़ीमतों में कोई कमी नहीं आती. उपभोक्ताओं का मुनाफ़ा एक झूठा प्रचार है जो तेल बेचने वाली कंपनियाँ अपनी सेल बढ़ाने के लिए करती हैं.'

डॉक्टर कैसर बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं और सिंध सरकार के आर्थिक विकास सलाहकार भी रहे हैं.

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उन्होंने ट्वीट किया है, "पेट्रोल के दाम कम करने से सिर्फ़ तेल बेचने वाली कंपनियों का मुनाफ़ा होता है. तेल की क़ीमत कम नहीं होनी चाहिए. बल्कि सरकार अगर तेल को पुरानी दरों पर ही बेचे, तो उससे जो मुनाफ़ा होगा, सरकार उसे अपने क़र्ज़ चुकाने, उत्पादों के जीएसटी रेट कम करने में लगाए जिससे उद्योगों और रोज़गार को प्रोत्साहन मिले."

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वैश्विक तेल उद्योग जगत का अनुमान है कि कोविड-19 महामारी की वजह से दुनिया में तेल की खपत में 35 प्रतिशत से ज़्यादा गिरावट दर्ज की गई है.

सबसे पहले चीन और फिर कई यूरोपीय देशों के एक साथ लॉकडाउन में चले जाने से तेल की खपत पर सबसे ज़्यादा असर देखने को मिला.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार की इतनी बुरी स्थिति कैसे हो गई कि तेल की क़ीमतें नेगेटिव में चली जाएं और जो देश बड़ा ऑयल रिज़र्व होने का दंभ रखते थे, उन्हें वो तेल एक मुसीबत लगने लग जाये, इसे समझने के लिए हमने बीजेपी नेता और तेल मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा से बात की.

तनेजा ने बताया, "कोरोना वायरस महामारी अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार की मुसीबत का ट्रिगर ज़रूर है, लेकिन स्थिति को ज़्यादा पेचीदा बनाया है अमरीका, रूस और सऊदी अरब समेत तेल उत्पादक खाड़ी देशों की आपसी होड़ ने जो तेल बाज़ार पर अपनी बादशाहत साबित करने में तुले हैं."

वे कहते हैं, "जब तक ओपेक प्लस देशों में1 मई का समझौता नहीं हुआ, तब तक ये देश दबाकर उत्पादन करते रहे. और लॉकडाउन की वजह से जो माँग घटती चली गई, उसके बारे में एक आम राय बनने में बहुत देर हो गई. अब इन देशों ने तय किया है कि ये रोज़ाना 97 लाख बैरल का उत्पादन घटाएंगे. लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की माँग के अनुसार तेल के उत्पादन में जितनी कमी की जानी चाहिए, यह उसका एक तिहाई ही है. बाज़ार का अनुमान है कि रोज़ाना तीन करोड़ बैरल कम उत्पादन हो, तब जाकर माँग और आपूर्ति का सही बैलेंस बनेगा और बाज़ार में तेल की क़ीमतें सामान्य स्थिति में आ सकेंगी."

तो भारत इस स्थिति का फ़ायदा क्यों नहीं उठाता? इस पर वो कहते हैं, "कच्चे तेल के दाम भारत के लिए एक सौगात की तरह हैं, लेकिन भंडारण की क्षमता ना होने से इसका अधिक लाभ भारत नहीं ले सकता क्योंकि भारत में केवल नौ दिन के सामरिक तेल भंडारण की ही क्षमता है."

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'भारत में 2004 वाले रेट होने चाहिए'

कांग्रेस पार्टी ने मार्च के महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस दलील के साथ घेरने की कोशिश की थी कि 'अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें क़रीब 35 प्रतिशत घट चुकी हैं तो भारत की आम जनता को तेल की घटी हुई क़ीमतों का मुनाफ़ा कब मिलने वाला है? भारत सरकार कब पेट्रोल की क़ीमत 60 रुपये प्रति लीटर से नीचे लाएगी?'

पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था कि 'कच्चे तेल की जो क़ीमत नवंबर 2004 में थी, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में वही क़ीमत अब है. तो मोदी सरकार भारत में तेल की क़ीमतों को 2004 वाले रेट पर क्यों नहीं ला रही.'

21 अप्रैल को एक बार फिर कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि "दुनिया में कच्चे तेल की क़ीमतें अप्रत्याशित आँकड़ों पर आ गिरी हैं, फिर भी हमारे देश में पेट्रोल 69 रुपये और डीज़ल 62 रुपये प्रति लीटर क्यों? इस विपदा में जो दाम घटें, वो उतना अच्छा. कब सुनेगी ये सरकार?"

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पाकिस्तान कर सकता है तो भारत क्यों नहीं?

पाकिस्तान में तेल की क़ीमतें घटने की ख़बर आने के बाद भारत में भी सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि 'पाकिस्तान सरकार ये कर सकती है तो भारत सरकार क्यों नहीं?'

यह सवाल जब हमने नरेंद्र तनेजा से पूछा जो तेल मामलों पर भारतीय जनता पार्टी का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, तो उन्होंने कहा कि 'इस मामले में भारत और पाकिस्तान की तुलना करना ही ग़लत है.'

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान एक बहुत छोटी और असंगठित अर्थव्यवस्था है जिसका साइज़ 280 से 300 बिलियन डॉलर का है. यानी महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था से भी छोटा. वहाँ मध्यम वर्ग का आकार बहुत छोटा है, जबकि भारत में सबसे ज़्यादा और मध्यम वर्ग ही तेल उत्पादों का सबसे महत्वपूर्ण ग्राहक है. तो दोनों देशों में ऊर्जा की खपत का ट्रेंड काफ़ी अलग है."

तनेजा ने दलील दी कि 'कच्चे तेल की सप्लाई करने वाले अधिकांश देश इस्लामिक देश हैं जो पाकिस्तान के लिए भारत की तुलना में ज़्यादा आसान शर्तें रखते हैं और उन्हें हमारी तुलना में बेहतर क्रेडिट मिलता है.'

वीडियो कैप्शन,

धंधा पानी

समाचार एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार सामान्य दिनों में भारत में रोज़ाना 46-50 लाख प्रति बैरल तेल की खपत होती है. लेकिन भारतीय तेल बाज़ार का अनुमान है कि कोविड-19 महामारी की वजह से भारत में तेल की खपत लगभग 30 प्रतिशत कम हो गई है.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे समय में जब भारत को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चा तेल सस्ते दामों पर मिल रहा है, तो क्या इसका फ़ायदा रेट कम करके लोगों को नहीं दिया जाना चाहिए?

इसके जवाब में नरेंद्र तनेजा ने कहा, "भारत में तेल की क़ीमतों में क़रीब 50 फ़ीसद टैक्स शामिल होता है. भारत में तेल की माँग घटी है तो सरकार को टैक्स भी कम मिल रहा है और केंद्र-राज्य, दोनों के टैक्स कलेक्शन में गिरावट दर्ज की गई है."

"दूसरी बात ये है कि तेल कोरोना महामारी की वजह से सस्ता हुआ है, पर अगर ये किसी अन्य कारण से भी सस्ता होता तो भी इसे सस्ते में नहीं दिया जाता क्योंकि भारत में पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को भी देखा जाता है."

तनेजा कहते हैं कि "खाड़ी देशों में रहने वाले क़रीब 80 लाख भारतीयों का रोज़गार भी तेल बाज़ार से जुड़ा है इसलिए सरकार उन्हें लेकर भी चिंतित है. सभी खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था तेल पर आधारित है. तेल के दाम लगातार कम रहने से वहाँ कंपनियाँ बंद होने, बेरोज़गारी और अर्थव्यवस्था में मंदी की आशंका होगी. इसका प्रभाव वहाँ रहने वाले भारतीयों पर पड़ेगा, उनके द्वारा भेजी जाने वाली कमाई पर पड़ेगा जो क़रीब 50 बिलियन डॉलर है. साथ ही इन देशों में भारत के निर्यात पर भी असर पड़ेगा. इसलिए भारत के लिए भी यही अच्छा होगा कि दुनिया की अर्थव्यस्था ठीक रहे, खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था ठीक रहे."

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