कोरोना वायरस: क्या शराब की चाहत, लॉकडाउन-4 को दावत है?

  • सरोज सिंह
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कोरोना लॉकडाउन

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  • भारत में अब तक 10 लाख कोरोना टेस्ट हो चुके हैं
  • अब तक 11 हज़ार से ज्यादा मरीज़ ठीक हो चुके हैं
  • भारत की रिकवरी रेट 27.52% है

भारत सरकार की तरफ़ से होने वाले प्रेस कॉन्फ्रेंस में आप रोज़ाना इस तरह की बातें सुनते हैं. इस तरह की बात सुनते ही आपके मन में चाहे अनचाहे एक तस्वीर उभरती है कि भारत में कोरोना काल में स्थिति बेहतर है.

लेकिन क्या आपने भी कभी सोचा है कि जब सब इतना ही अच्छा है

  • तो लॉकडाउन 3 की जरूरत क्यों पड़ी?
  • आज बहुत क्षेत्रों में हमें छूट मिल रही है, तो क्या लॉकडाउन 4 की ज़रूरत भारत में होगी?
  • भारत में 10 लाख टेस्ट होने के बाद भी जानकार क्यों टेस्ट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं?
  • सरकार के आँकड़ों पर कैसे और क्यों भरोसा करें?

बीबीसी ने हर भारतीय के मन में उठने वाले परस्पर विरोधी सवालों को सरकार के सामने रखा.

हमने बात की डॉ. वीके पॉल से, जो नीति आयोग के सदस्य हैं और कोविड19 के लिए देश में बनी एम्पावर्ड कमेटी1 को हेड कर रहे हैं.

इस कमेटी का काम कोविड19 मेडिकल इमरजेंसी के लिए मैनेजमेंट प्लान तैयार करना है, केंद्र सरकार के सामने आने वाली चुनौतियों को देखते हुए अगली रणनीति तैयार करना, सरकार को परामर्श देना.

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पेशे से डॉक्टर, वीके पॉल एम्स के पीडिएट्रिक्स डिपार्टमेंट में बतौर फ़ैकेल्टी 30 से अधिक सालों से जुड़े रहे हैं. भारत सरकार के पोषण और आयुष्मान भारत योजना में भी इनका योगदान रहा है.

इसके साथ ही ये नीति आयोग के हेल्थ विभाग को लीड करते हैं. उन्होंने 2017 में नीति आयोग ज्वाइन किया है.

तो बीबीसी ने भी सबसे पहले उनसे यही पूछा. आख़िर हर दिन इतनी पॉज़िटिव न्यूज़ सरकार हर पल देती है, तो लॉकडाउन3 की ज़रूरत क्यों पड़ी?

इसके जवाब में डॉ. पॉल कहते हैं, "लॉकडाउन 3 को हमें लॉकडाउन 2 की निरंतरता में देखना चाहिए. अब तक हम संपूर्ण लॉकडाउन के दौर में थे. तीसरे चरण के लॉकडाउन में सरकार ने दो चीज़ों को जोड़ने की कोशिश की है. एक तरफ़ कुछ समाजिक और आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने की एक कोशिश की गई है. ग्रीन ज़ोन और ऑरेंज ज़ोन में जहां बीमारी कंट्रोल में है वहां काम शुरू हो, फ़ैक्टरी शुरू की जाए. दूसरी तरफ़ रेड ज़ोन के कुछ इलाक़े में लॉकडाउन जारी भी है. इसलिए लॉकडाउन फेज 3 एक सोची समझी रणनीति के तहत किया है, जहां पूर्ण लॉकडाउन की बंदिशों को थोड़ा कम किया गया है, कुछ इलाक़ों में ढील दी गई है और कुछ में लॉकडाउन जारी है."

भारत में लोगों ने अब तक तीन लॉकडाउन देखा है. 23 मार्च से लॉकडाउन का पहला चरण 21 दिन के लिए लागू हुआ था. फिर 15 अप्रैल से लॉकडाउन का दूसरा चरण लागू हुआ और 3 मई से लॉकडाउन का तीसरा चरण लागू हो गया है, जो 17 मई तक चलेगा.

हर बार लॉकडाउन की तारीख़ ख़त्म होते ही सरकार एक नई तारीख़ ले कर सामने आ रही है. ऐसे में हमने भी सरकार के अहम रणनीतिकार से सीधे सवाल किया - लॉकडाउन 4 की स्थिति नहीं आएगी क्या? क्या ये कहने की स्थिति में अब वो हैं?

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शराब की दुकान के बाहर जमा लोगों की भीड़

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डॉ. पॉल ने सीधे शब्दों में जवाब दिया, "ये बिल्कुल नहीं कहा जा सकता इस स्टेज में. ये फ़ैसला जब भी किया जाएगा उसके पहले लॉकडाउन 3 का मूल्यांकन किया जाएगा. देखा जाएगा कि पिछले फ़ैसले से हमें क्या फ़ायदा मिला, कोई नुक़सान तो नहीं हुआ. ये भी देखा जाएगा कि जब रिलैक्स करते हैं लॉकडाउन को, तो क्या जनता बाक़ी निर्देशों का अच्छी तरह से पालन करती है. एक सोसाइटी के तौर पर हम उसे निभा पा रहे हैं क्या?"

उनके मुताबिक़ हमें टाइट रोप वॉकिंग करनी है. बहुत क्रिटिकल तरीक़े से काम करना है ताकि जान भी बचे और आर्थिक गतिविधियां भी चलाई जा सके. इसी के आधार पर तय होगा लॉकडाउन आगे बढ़ेगा या नहीं."

उनके इस बयान को दो संदर्भ में देखने की ज़रूरत है. एक संदर्भ है सोमवार को शराब की दुकानों के बाहर जिस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ी. साफ था, शराब की दुकान खुलते ही लोगों के अंदर से कोरोना का खौफ़ ग़ायब सा दिखा. कई जगहों पर दुकानें समय से पहले बंद कर दी गई. कई राज्यों ने एक ही दिन में 40 दिन से बंद कमाई के ज़रिए तलाश लिए और पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.

दूसरा संदर्भ हैं, पिछले 7 दिन में भारत का बढ़ता कोरोना ग्राफ़. पिछले सात दिन में हर दिन तकरीबन 1500 से ज्यादा कोरोना पॉज़िटिव मामले बढ़े हैं. पिछले तीन दिनों में 2000 से ज्यादा नए मामले सामने आ रहे हैं. ऐसे में लॉकडाउन3 में सोशल डिस्टेंसिंग जनता नहीं रख पाएगी, तो इसका सीधा असर देश के कोरोना ग्राफ़ पर ही पड़ेगा.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत जैसी बड़ी जनसंख्या वाले देश में सोशल डिस्टेंसिंग शराब की दुकान पर लोग रख पाएंगे?

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इस पर डॉ. पॉल का कहना है, "पूर्ण लॉकडाउन हमेशा के लिए नहीं चल सकता. हमें बैलेंस बनाए रखने की ज़रूरत है. काफ़ी हद तक हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी और आर्थिक काम काज भी चले और कोरोना वायरस पर कंट्रोल भी रहे. उसी सिलसिले में आज सरकार ने एक पहल की है. अब एक ज़िम्मेदारी नागरिकों की भी है. जो गाइडलाइन सरकार ने जारी की है लोगों को उसका पालन भी करना है. हम अगर सोशल डिस्टेंसिंग के रुल तोड़ेंगे तो नुक़सान दोनों तरफ से है. पहला नुक़सान है कि हमें वायरस पकड़ेगा, फिर परिवार को फिर समाज को और फिर देश को. दूसरा नुक़सान ये होगा कि हमें देश को बचाने के लिए फिर रिस्ट्रिक्शन की तरफ़ जाना पड़ेगा. उससे अर्थव्यवस्था को नुक़सान होगा. इसलिए ये हम सबके हित में कि हम सरकार के जारी दिशा-निर्देशों का सख़्ती से पालन करें."

उन्होंने आगे कहा, "इन नियमों का पालन करें. ये नामुमकिन नहीं है. हमें कोरोना वायरस के साथ जीने की आदत महीनों के लिए नहीं बल्कि सालों तक के लिए डालनी पड़ सकती है. ये हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति की टेस्टिंग का समय है. साथ ही ये भी दिखाएगा कि हम ख़ुद पर कितना नियंत्रण रख सकते हैं."

वीके पॉल के बयान में ये संदेश साफ़ था, शराब की दुकानों में लगी भीड़, लॉकडाउन 4 को निमंत्रण जैसा है.

लेकिन केंद्र सरकार हर दिन के प्रेस कॉन्फ़्रेंस में हमेशा भारत की रिकवरी रेट और कम डेथ रेट का जिक्र करती है. इसके पीछे की पूरी तस्वीर क्या है? ख़ास तौर पर तब जब एक दिन में पश्चिम बंगाल से ही 98 की मौत की ख़बरें सामने आ रही हों. क्या वाक़ई भारत के लिए ये पीठ थपथपाने वाला काम है.

इस पर डॉ पॉल कहते हैं, "कोरोना पैन्डेमिक का साइज भारत में थोड़ा लिमिटेड है. डेथ रेट कम होने की कई वजह हो सकती है. इसकी एक वजह हो सकती है कि भारत में बीमारी थोड़ी माइल्ड है. दूसरा ये कि हमारी पॉपूलेशन यंग है. ये हमें एक प्रोटेक्शन प्रोवाइड करती है. फिर भी हमें इस बीमारी को हल्के में नहीं लेना चाहिए. अभी भी स्टेट टू स्टेट डेथ रेट में बहुत अलग अलग वेरिएशन देखने को मिलता है. कुछ राज्यों में दूसरे राज्यों के मुक़ाबले स्थिति बेहतर हैं. तो ये डेथ रेट ये भी दर्शाता है कि हमारा हेल्थ सिस्टम कितना बेहतर है, इस बीमारी से लड़ने के लिए. हमारे यहां जो बीमारी है वो मिडिल ऐज़ में देखने को मिलती है. बुजुर्ग अभी बचे हैं. बीमारी अभी इमर्ज हो रही है, बाहर के देशों में इमर्ज हो चुकी है."

दुनिया भर में कोरोना के कारण मरने वालों का आंकड़ा 2.51 लाख पार कर चुका है. कोरोना वायरस के कारण सबसे अधिक मौतें अमरीका में हुई हैं.

अमरीका में 11.80 लाख लोग इससे संक्रमित हैं जबकि 68,920 लोगों की मौत हो चुकी है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही कह दिया है कि अमरीका में मरने वालों की संख्या एक लाख को पार कर सकती है.

भारत में फ़िलहाल कोरोना के कुल 46 हज़ार मामले सामने आए हैं और 15 सौ से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

क्या भारत में भी ऐसी कोई स्टडी हुई है? आगे के दिनों के लिए भारत में कितने कोरोना पॉज़िटिव मामले आने की संभावना है? भारत में कोरोना का पीक आ गया है या आने वाला है? इन सवालों के सीधे जवाब देने से वीके पॉल बचते दिखे.

लेकिन उन्होंने ज़रूर कहा कि हमने बीमारी को कंट्रोल कर लिया है, डबलिंग रेट को 12 दिनों तक ले जा चुके हैं. फुल लॉकडाउन का असर अगले 10 दिन तक देखने तो मिलेगा. उसके बाद जो होता है वो हम सबपर निर्भर करेगा. जितना हम कंट्रोल कर पाएंगे, आगे की बीमारी का ग्राफ उसी पर निर्भर करेगा. उन्होंने ये भी कहा कि कोरोना की बीमारी भारत में अभी तक शहरों की बीमारी ही है.

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कोविड19 से निपटने के लिए दुनिया में दो तरह की रणनीति अपनाई जा रही है, कुछ देश लॉकडाउन की रणनीति पर काम कर रहे हैं और कुछ देश ज़्यादा टेस्ट करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

कुछ देश दोनों रणनीति को साथ लेकर चल रहे हैं. लेकिन देश ही नहीं दुनिया में भी भारत में टेस्टिंग की कम संख्या पर बार-बार सवाल उठाया जाता है.

इसके जवाब में डॉ. पॉल कहते हैं, "चाहे लॉकडाउन हो या फिर टेस्टिंग, एक दूसरे के बिना दोनों ही रणनीति अधूरी है. लॉकडाउन अपनी जगह पर है और टेस्टिंग अपनी जगह पर है. हम एक को लेकर और दूसरे को छोड़ दें - ये हमारी रणनीति नहीं है. दुनिया के किसी भी देश में अकेले एक रणनीति नहीं चल सकती है. छोटे देशों की बात आप छोड़ दीजिए. भारत जैसे बड़े देश में दोनों को बैलेंस करके चलना चाहिए. अभी हमने अपनी टेस्टिंग क्षमता बहुत बढ़ाई है और आगे भी बढ़ाएंगे. अब तक हमारी टेस्टिंग रणनीति बीमारी की व्यापकता को देखते हुए बनाई गई है. भारत के पास अब इतनी ख़ुद की क्षमता है कि अगले दो-ढाई महीने में पांच लाख टेस्ट रोज़ाना कर सकें. अगर ज़रूरत होगी तो उस तरह की रिलैक्स्ड और उदारवादी रणनीति टेस्टिंग में इस्तेमाल कर पाएंगे. इस पर हमारी नज़र बनी हुई है".

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केंद्र सरकार का दावा है कि भारत में 10 लाख कोरोना टेस्ट हो चुके हैं. अब एक दिन में एक लाख टेस्ट हम कर पा रहे हैं.

लेकिन जब बीबीसी ने उनसे सवाल किया कि सरकारी आँकड़ों पर देश की जनता क्यों और कितना भरोसा कर सकती है, क्या इसका कोई ऑडिट होगा? ख़ास तौर पर जब पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मौत के आँकड़ों को लेकर काफ़ी विवाद चल ही रहा है.

इस पर उन्होंने कहा, "हमारे यहां जो आँकड़े हैं वो स्टेट से आते हैं, फिर उसको वेरिफ़ाई किया जाता है. सर्विलेंस सिस्टम के जो नॉर्म है, जो क्वालिटी एश्योरेंस के पैमानों पर कंफर्म करके ही हम आँकड़े आप तक पहुंचाते हैं. सरकारी आँकड़ों पर हमें आपको पूरा भरोसा होना चाहिए. लेकिन हमें ये बात भी ध्यान में रखना होगा कि ये सभी आँकड़े ज़िलों से निकल कर सामने आ रहे हैं और एक जगह इक्कठा किए जा रहे हैं. लेकिन बीच में आँकड़ों की सत्यता साबित करने के लिए क्वालिटी एश्योरेंस का ख्याल, सर्विलेंस सिस्टम भी रखा जाता है. हमारे सर्विलेंस सिस्टम बहुत रोबस्ट है. ग्राउंड से डेटा आने में थोड़ा समय ज़रूर लग सकता है लेकिन जानकारी पुख़्ता है."

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अंत में अमरीका में रेमडेसिवियर ड्रग ट्रायल के सकारात्मक नतीज़ों और भारत में इसे लाने पर डॉ पॉल ने कहा, "रेमडेसिवियर, एक प्रोमिसिंग ड्रग है. दुनिया भर की नज़र इस दवाई पर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की सोलिडेरिटी ट्रायल का भी ये एक अलग से हिस्सा है. भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन की ट्रायल का हिस्सा भी है. एफडीए की रिकमेंडेशन फ़िलहाल इस ड्रग के इमरजेंसी यूज़ की है. हमें अभी थोड़ा और इंतज़ार करना चाहिए. भारत की फार्मा इंटस्ट्री भी इस बात के लिए तैयार है कि अगर इस ड्रग को इजाज़त मिलती है तो बड़े पैमाने पर भारत के लिए और विदेश के लिए भी इसको हम बना सकें. ये दुनिया के बाक़ी देशों की भी ज़रूरत है कि भारत की फार्मा इंडस्ट्री को एंगेज करें. कोविड19 के लिए जो भी मोलिक्यूल दुनिया में सफल माना जाएगा, वो भारत में बनेगा. ये ज़रूरत केवल हमारी ही नहीं दुनिया के बाक़ी देशों की भी है."

उन्होंने आगे कहा, "इतनी प्रमाणिकता जो अब तक इस ड्रग के लिए मिली है, उतनी प्रमाणिकता के साथ हमारा रेस्पॉंस क्या होना चाहिए इस पर आईसीएमआर टास्क फोर्स भी स्टडी कर रही है. अब तक बड़े ट्रायल का रिजल्ट नहीं आया है. इस पर हमारे यहां भी काम चल रहा है."

कुल मिला कर अगर कोविड19 के इलाज में अगर इस ड्रग को सफल माना जाएगा तो भारत सरकार पूरी तरह कोशिश करेगी की वो भारत आ जाए. लेकिन ये कब तक भारत में आ पाएगी, इसका वक़्त बता पाना थोड़ा मुश्किल होगा.

डॉ पॉल ने बीबीसी से बातचीत में भारत में कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दावों से साफ़ इनकार किया.

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