कोरोना: लॉकडाउन में छूट है लेकिन वायरस यहीं है, कैसे बचेंगे?

  • सिंधुवासिनी
  • बीबीसी संवाददाता
कोरोना संक्रमण

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‘साउथ एक्स मार्केट में आपका पसंदीदा शोरूम अब खुल गया है. हमें आपका इंतज़ार है. हैप्पी शॉपिंग.’

आजकल मोबाइल फ़ोन पर दिन में एक-दो बार इस तरह के मेसेज आ ही जाते हैं.

अब धीरे-धीरे सबकुछ पहले जैसा होने लगा है. बाज़ार खुलने लगे हैं, दुकानें खुलने लगी हैं, लोग ऑफ़िस जाने लगे हैं और सड़कों पर ट्रैफ़िक जाम लगने लगा है.

ये सब हमें यक़ीन दिलाने की कोशिश करते हैं कि सबकुछ सामान्य हो गया है. लेकिन क्या सचमुच सबकुछ सामान्य हो गया है?

लॉकडाउन-4 में सरकार की तरफ़ से पाबंदियों में कई तरह की छूट दी गई है. लेकिन लॉकडाउन में छूट का मतलब कोरोना वायरस से छूट नहीं है.

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हालात डराने वाले हैं

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार भारत में कोविड-19 संक्रमण के मामले 1,38,845 हो गए हैं और जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आँकड़ों के अनुसार भारत सबसे ज़्यादा संक्रमण वाले टॉप-10 देशों की लिस्ट में आ गया है.

अमरीका, ब्राज़ील,रूस, ब्रिटेन, स्पेन, इटली, फ़्रांस, जर्मनी और तुर्की के बाद भारत अब 10वें नंबर पर है.

भारत सरकार बार-बार ये कह रही है कि अब पिछले दिनों के मुकाबले टेस्टिंग बढ़ी है, इसलिए संक्रमण के मामले भी ज़्यादा आ रहे हैं. सरकार की ओर से लगातार ये भी कहा जा रहा है कि देश में जितनी तेज़ी से संक्रमण मामले बढ़ रहे हैं, उतनी ही तेज़ी से लोग ठीक भी हो रहे हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक़ भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए 57,721 लोग इलाज के बाद ठीक भी हो चुके हैं.

इन सभी आश्वासनों और उम्मीदों के बावजूद इन डराने वाले तथ्यों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में भारत में एक लाख से ज़्यादा लोग कोविड-19 से संक्रमित हैं और इसकी चपेट में आकर 4,021 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं.

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फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग की उड़ती धज्जियां

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ड्रामा क्वीन

समाप्त

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पहली बार देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान किया था तब उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि इस बीमारी के संक्रमण को काबू में करने का एकमात्र कारगर तरीका सोशल डिस्टेंसिंग ही है.

अब इसके दो महीने बाद हालात बिल्कुल बदल गए हैं. अब लॉकडाउन-4 ‘नए रंग-रूप’ में हमारे सामने है और इस दौरान फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के नियमों का बमुश्किल पालन होता दिखता है.

धार्मिक स्थल, स्टेडियम और स्कूल-कॉलेज भले बंद है लेकिन सार्वजनिक जगहों पर भीड़ इकट्ठा होने लगी है. मज़दूर किसी तरह बसों और ट्रकों में भर-भरकर घर जाने पर मजबूर हैं और अब तो घरेलू हवाई उड़ानें भी शुरू हो गई हैं.

उड़ानों के बारे में जानकारी देते हुए नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था कि चूँकि विमानों में बीच की सीट ख़ाली रखने पर फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के मानक पूरे नहीं होते इसलिए उन्हें भी भरा जाएगा.

सोशल मीडिया पर उनके इस बयान का ख़ूब मज़ाक उड़ा और सवाल किया गया कि आम जनता से फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने वाली ख़ुद इसका पालन क्यों नहीं कर रहे हैं?

हालाँकि अब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए विमानों में बीच की सीट ख़ाली रखना अनिवार्य होगा.

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और बुरे हो सकते हैं हालात

एक महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक भारत अब भी कोरोना संक्रमण के ‘पीक’ (संक्रमण के सबसे बुरे दौर) में नहीं पहुंचा है.

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने भी माना है कि भारत में अभी ‘पीक’ नहीं आया है.

ज़्यादातर स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जून-जुलाई के महीने में ‘पीक’ आ सकता है. यानी उस वक़्त हालात आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बदतर हो सकते हैं.

मार्च महीने में सेंटर फ़ॉर डिज़ीज डायनेमिक्स के निदेशक डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण ने बीबीसी संवाददाता रजनी वैद्यनाथन को दिए एक इंटरव्यू में चेताया था कि भारत को कोरोना वायरस संक्रमण की ‘सुनामी’ के लिए तैयार रहना चाहिए.

उन्होंने कहा था, “स्थिति ऐसी हो सकती है कि हर पांच में से एक व्यक्ति संक्रमण के गंभीर स्तर पर होगा. यानी 40 से 50 लाख लोग गंभीर स्थिति में होंगे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की ज़रूरत पड़ेगी.’’

कुछ दिनों पहले जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और संक्रामक बीमारियों के इतिहास पर नज़र रखने वाले जेरेमी ग्रीन ने बीबीसी मुंडो को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हम लोग बड़ी जल्दी ये ये मान लेते हैं कि महामारी ख़त्म हो गई है. महामारी के असल में ख़त्म होने से पहले ही हम इसे ख़त्म मानकर इसके बारे में बात करना भी बंद कर देते हैं.

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संक्रमण का दूसरा दौर

ज़ाहिर है, इन सबके नतीजे ख़तरनाक हो सकते हैं. दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे कई देशों में लॉकडाउन में ढील देने और पर्याप्त एहतियात न बरतने के बाद संक्रमण की दूसरा दौर देखने को मिला.

दक्षिण कोरिया ने टेस्टिंग बढ़ाकर और फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन कर संक्रमण पर काफ़ी हद तक काबू ज़रूर पाया लेकिन पाबंदियों में ढील दिए जाने के बाद वहां के बार और पब्स में जुटने वाली भीड़ से सैकड़ों लोगों में संक्रमण फैल गया.

कुछ ऐसा ही हाल बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस और सिंगापुर का भी हुआ जहां प्रवासी मज़ूदरों का ध्यान न रखे जाने की वजह से बड़े स्तर पर संक्रमण फैल गया.

इन सबसे भारत और भारत के लोगों को क्या सबक लेना चाहिए?

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'भारत सरकार का असंतोषजनक रवैया'

प्रोग्रेसिव मेडिकोज़ एंड साइंटिस्ट्स फ़ोरम के अध्यक्ष डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी का कहना है कि मौजूदा वक़्त में कोरोना संक्रमण के प्रति भारत सरकार का रेस्पॉन्स बेहद असंतषोजनक है.

वो कहते हैं, “अभी कुछ दिनों पहले ही गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट में कहा था कि अगर सभी लोगों का कोविड-19 टेस्ट किया जाए तो 70 फ़ीसदी लोग पॉज़िटिव पाए जाएंगे और इससे लोगों में घबराहट बढ़ जाएगी.”

डॉक्टर भट्टी कहते हैं कि चूंकि भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का बड़ा प्रतिशत एसिंप्टोमैटिक (बिना लक्षणों वाला) है इसलिए सरकार टेस्टिंग और उपचार को गंभीरता से नहीं ले रही है.

डॉक्टर हरजीत भट्टी इन दिनों दिल्ली के मनिपाल हॉस्पिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, “अपनी पिछली दो शिफ़्ट में मैंने चार मरीज़ भर्ती किए हैं जिनमें से तीन कोविड-19 संक्रमण का शिकार हैं.”

डॉक्टर भट्टी कहते हैं कि दो महीने के लॉकडाउन का मक़सद ये होना चाहिए था कि सरकार लोगों की ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग करती और संक्रमित मरीज़ों को जल्द से जल्द क्वारंटीन कर उनका इलाज किया जाता.

अगर ये सब किया जाता तो हम संक्रमण की चेन कमज़ोर में कामयाब हो सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सरकार सिर्फ़ गंभीर मरीज़ों का इलाज करने में जुटी रही.

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फिर बचाव कैसे किया जाए?

डॉक्टर भट्टी कहते हैं कि अपर्याप्त टेस्टिंग, नाकाफ़ी स्वास्थ सुविधाओं और लचर सरकारी रवैए के बीच अपने बचाव का लगभग पूरा ज़िम्मा ख़ुद जनता पर है.

ऐसे में लोगों को इन बातों का ध्यान रखने की कोशिश ज़रूर करनी चाहिए:

-मास्क, ग्लव्स और सैनिटाइज़र को अपना साथी बना लें. अक्सर देखा जाता है कि लोग ऑफ़िस जाते वक़्त और गाड़ी में तो मास्क लगाए रहते हैं लेकिन ऑफ़िस में घुसते ही इसे हटा देते हैं. ऐसा न करें.

ऑफ़िसों में हम बहुत सी सतहों को छूते हैं जैसे: कंप्यूटर, माउस, डेस्क और फ़ोन. इसलिए मास्क और ग्लव्स पहने हुए ही काम करें. संभव हो तो अपने डेस्क पर ही सैनिटाइज़र रखें और थोड़ी-थोड़ी देर में हाथ साफ़ करते रहें. थोड़े अंतराल पर अच्छी तरह हाथ धोने को अपनी आदत में शुमार कर लें.

-बाहर से आने पर सभी कपड़ों को अच्छी तरह धोएं और नहाएं.

-दरवाजे और लिफ़्ट हाथों के बजाय कोहनी या पैरों से खोलने की कोशिश करें.

-बाहर से लाई सब्ज़ियां, फल और अन्य पैक्ड सामानों को अच्छी तरह धोने के बाद ही इस्तेमाल करें.

-खाना खाने से पहले हाथ धोने और सफ़ाई का ख़ास तौर पर ख़याल रखें. चूंकि खाते वक़्त हम अपने हाथों का इस्तेमाल करते हैं और इस दौरान हमारा हाथ हमारे नाक के भी बहुत करीब होती है, इसलिए संक्रमण की आशंका भी ज़्यादा रहती है.

-घर का बना खाना ही खाएं क्योंकि ‘नो कॉन्टैक्ट’ होम डिलिवरी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है.

-आख़िरी और सबसे महत्वपूर्ण बात. लॉकडाउन ख़त्म होने का मतलब कोरोना वायरस ख़त्म होना नहीं है. इसलिए फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग समेत उन सभी नियमों का पालन करते रहें जिनका आप लॉकडाउन के दौरान पालन करते थे.

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है? लीड्स के कैटलिन से सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता? बाइसेस्टर से डेनिस मिशेल सबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है? जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है? सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं? मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है? फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है? स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं? कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है? हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए? मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए? लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा? बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए? मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है? लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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