टिड्डियों का हमला बुंदेलखंड में कितना नुकसान पहुँचा रहा है?

  • प्रदीप श्रीवास्तव
  • झांसी से, बीबीसी हिंदी के लिए
टिड्डा

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करीब तीन दशक बाद बुंदेलखंड में टिड्डियों का हमला हुआ है.

करोड़ों की संख्या में टिड्डों ने बुंदेलखंड के दतिया, झांसी और ललितपुर के कई गाँवों पर धावा बोला है.

यहाँ पेड़, पौधों और सब्ज़ियों को नुक़सान पहुँचाते हुए टिड्डे मध्य प्रदेश की ओर चले गए.

रबी की फसल की कटाई के कारण ज़्यादातर नुक़सान सब्ज़ियों की फसलों को हुआ है.

करोड़ों की संख्या में टिड्डियों को देख कर किसान और आम लोग डरे हुए हैं.

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लॉकडाउन के कारण बढ़ गई संख्या

झांसी मंडल के उप कृषि निदेशक कमल कटियार ने बीबीसी को बताया कि यह टिड्डी दल ईरान में पैदा हुआ, जो पाकिस्तान के रास्ते राजस्थान, गुजरात व मध्य प्रदेश होते हुए बुंदेलखंड पहुँचा है.

पहले टिड्डी दल बुंदेलखंड नहीं आता था. क़रीब 30 साल बाद पहली बार बुंदेलखंड में इसका हमला हुआ है. क्योंकि, लॉकडाउन में मानव गतिविधियां कम होने के कारण इनकी संख्या अरबों में पहुँच गई और यह अब ज़्यादा दूर तक सफ़र तय कर रहे हैं. यह टिड्डे तब तक सफ़र करते हैं, जब तक मर नहीं जाते हैं.

21 मई 2020 का संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एंव कृषि संगठन का ताज़ा बुलेटिन भी टिड्डियों के प्रजनन व प्रवास की जानकारी देता है.

इसमें कहा गया है कि ईरान और दक्षिण-पश्चिम पाकिस्तान में टिड्डियों का वसंत प्रजनन जारी है और वे जुलाई तक भारत-पाकिस्तान की सीमा पर जाते रहेंगे. भारत-पाकिस्तान सीमा में जून की शुरुआत में होने वाली बारिश से टिड्डों के अंडों को फलने फूलने में मदद मिलेगी.

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तीन किलोमीटर लंबा टिड्डी दल

कमल कटियार का कहना है कि झांसी में आने वाला टिड्डी दल क़रीब तीन किलोमीटर लंबा है.

ज़िला प्रशासन के सूचना विभाग की प्रेस विज्ञाप्ति के अनुसार झांसी में पहला टिड्डी दल 22 मई की शाम को आया.

रात होने के कारण यह सो गया और सुबह मध्य प्रदेश के छतरपुर चला गया. वहाँ से सतना होते हुए रीवा पहुंचा. दूसरा हमला 24 मई को हुआ.

सुबह के समय कीटों का समूह ज़िले के बरुआसागर ब्लॉक पहुंच गया. यहाँ छह से अधिक गांवों में सब्ज़ियों की खेतों को नुक़सान पहुंचाया.

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झांसी में सबको सतर्क रहने के निर्देश

टिड्डी दल के हमले को देखते हुए झांसी में ज़िला प्रशासन ने सबको सतर्क रहने का निर्देश जारी किया है.

झांसी के जिलाधिकारी आन्द्रा वामसी ने आला अधिकारियों के साथ बैठक कर टिड्डी दल को ख़त्म करने और उनकी रोकथाम के लिए कई प्रकार के निर्देश जारी किए.

लोगों को तत्काल आपदा कंट्रोल रूम को जानकारी देने को कहा गया है, जिससे इमरजेंसी के हालत में राहत पहुँचाई जा सके.

बैठक में डीएम ने बताया कि किसान किसी भी दशा में टिड्डी दल को अपने खेत में न आने दे, उन्हें तेज़ आवाज़ के माध्यम से भगाएँ. रिज़र्व वाटर बॉडीज पर विशेष सतर्कता बनाए रखें. क्षेत्र में तेज़ आवाज़ के साउंड सिस्टम की व्यवस्था करें.

भारत सरकार की सात टीम लगातार मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में दौरे पर है. इसके अतिरिक्त जनपद की कृषि विभाग की टीम भी क्षेत्र में टिड्डी दल पर कार्रवाई करने को तैयार है.

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चट कर गए सब्ज़ियों की खेती

बुंदेलखंड के किसान पंयायत के अध्यक्ष व किसान नेता गौरी शंकर बिदुआ बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं कि टिड्डियों ने यहाँ ज़्यादा नुक़सान तो नहीं पहुंचाया, लेकिन लॉकडाउन के कारण किसानों ने जो सब्ज़ी पैदा की थी, उसे भी यह टिड्डे चट कर गए.

चूँकि, यह दशकों बाद आएँ हैं, इसलिए अब ख़तरा यह होगा कि यह हर साल यहाँ आएँगे.

बुंदेलखंड के सामाजिक कार्यकर्ता संजय सिंह भी कहते हैं कि बुंदेलखंड में सूखा पहले से ही था, अब यह टिड्डे बहुत बड़ी आफ़त बनेंगे.

ज़िले के बरुआसागर ब्लॉक के उजियान गांव के किसान स्वदेश सिंह का कहना है कि उन्होंने पांच बीघा खेत में बैंगन, तोरई, अरबी, तीली और बाजरा आदि लगा रखी थी. टिड्डियों ने 70 प्रतिशत से ज़्यादा सब्ज़ियों को खा लिया.

वहीं, बबीना ब्लॉक के हस्तिनापुर गांव के किसान राम कुमार कहते हैं कि उनकी सात बीघे की खेती बर्बाद हो गई. उन्होंने खीरा और अरबी की सब्ज़ी लगाई थी, जिसके फूल और पत्तों को टिड्डों ने खा लिया. उनकी 60 प्रतिशत से ज़्यादा सब्ज़ियाँ चैपट हो गई हैं.

एक दिन में खाते हैं दस हाथी के बराबर

बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान विभाग के प्रोफेसर संतोष पांडेय बताते हैं कि झुंड में चलने वाले टिड्डी गाढ़े पीले रंग के होते हैं. यह चार इंच तक लंबे हो सकते हैं. यह हवा के बहाव व नमी की दिशा की ओर चलते हैं. जहाँ रुकते हैं, वहाँ पेड़, पौधों, फसलों आदि को खा जाते हैं. यह रात में सो जाते हैं. नए पत्तों में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट ज्यादा मात्रा में होने के कारण यह सूखे पत्तों और पौधों को ज्यादा पसंद नहीं करते हैं.

"मादा कीट ऊर्जा को लिपिड के रूप में संग्रहित करती हैं, जिसमें पानी होता है. डेढ़ लाख टिड्डियों का वजन लगभग एक टन हो सकता है, जो एक दिन में 10 हाथियों के बराबर खाना खाते हैं. बुंदेलखंड के कई हिस्सों में बलुई मिट्टी पाई जाती है, जो इनके प्रजनन के लिए अनुकूल है."

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