पीआईबी का फ़ैक्ट चेक या पत्रकारों पर दबाव बनाने की क़वायद?

  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
पीआईबी

इमेज स्रोत, PIB

वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के कार्यालयों के लिए महत्वपूर्ण ख़बरों और घटनाओं से संबंधित 'अलर्ट' भेजने का काम 'प्रेस इनफ़ॉर्मेशन ब्यूरो' यानी पीआईबी के पारंपरिक कामों के साथ जोड़ दिया गया था. बाद में ये काम बंद हो गया मगर एक बार फिर पिछले साल नवंबर माह में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाली इस संस्था को अपने पारंपरिक काम के अलावा सूचनाओं और ख़बरों के सत्यापन यानी 'फ़ैक्ट चेक' का काम सौंपा गया.

विभाग के सूत्रों का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि 'सोशल मीडिया' पर भड़काऊ और ग़लत सूचनाओं का प्रसार बढ़ गया है जिसकी वजह से देश के कई हिस्सों में हिंसक वारदातें देखने को मिलीं.

लेकिन पिछले कुछ महीनों में या यूं कहा जाय कि पिछले तीन महीनों में पीआईबी की फ़ैक्ट चेक टीम ने अख़बारों या ख़बरों के पोर्टल के पत्रकारों द्वारा की गयी खोजी ख़बरों को 'फे़क न्यूज़' कहकर ख़ारिज कर दिया.

पीआईबी की इस क़वायद पर उंगलियाँ भी उठने लगी हैं. लोगों का कहना है कि जिन ख़बरों को वो सिर्फ़ सोशल मीडिया में अपने हैंडल से 'फे़क न्यूज़' क़रार दे रहे हैं, उनकी ये क़वायद सिर्फ़ सोशल मीडिया तक ही सीमित क्यों है.

पीआईबी के एक अधिकारी का कहना है कि उनका काम सिर्फ़ समाचारों या प्रकाशित ख़बरों का सत्यापन करना ही नहीं है बल्कि सोशल मीडिया पर फॉरवर्ड किए जा रहे वीडियो या संदेश का सत्यापन करना भी उनका काम है, ताकि फ़र्ज़ी ख़बरों से निपटा जा सके और अफ़वाहों को रोका जा सके.

पीआईबी ने अपनी वेबसाइट पर लिखा है, "आप किसी समाचार का सत्यापन करना कहते हैं ? हमें भेजिए और हम उसका सत्यापन करेंगे, बिना कोई सवाल पूछे."

पीआईबी के सभी सोशल मीडिया अकाउंट पर इस अपील को साझा किया गया है. चाहे वो ट्विटर हो या इंस्टाग्राम या फिर फ़ेसबुक.

सवाल मानकों का

इमेज स्रोत, Getty Images

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
पॉडकास्ट
दिन भर

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

ड्रामा क्वीन

समाप्त

लेकिन कोरोना वायरस के फैलते ही आपदा और महामारी क़ानून लागू हो गया, पीआईबी ने शुरू में इस महामारी से संबंधित जानकारियाँ साझा करना शुरू किया. मगर धीरे-धीरे उसने समाचार पत्रों और समाचार वाले वेब पोर्टल में छपी ख़बरों का ही 'फ़ैक्ट चेक' करना शुरू किया और उन्हें 'फे़क' यानी फ़र्ज़ी बताने लगे.

हालांकि फ़ैक्ट चेक करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानक तय कर दिए गए हैं. लेकिन पीआईबी ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि क्या वो उन मानकों के माध्यम से ही 'फ़ैक्ट चेक' कर रही है.

अब मिसाल के तौर पर सोमरिता घोष की बात करते हैं जो एक अंग्रेज़ी दैनिक के लिए काम करती हैं. उन्होंने दिल्ली स्थित देश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ के चिकित्साकर्मियों के बारे में ख़बर लिखी जिसमें चिकित्साकर्मियों ने कोरोना से ज़्यादा सरकारी उदासीनता के प्रति अपनी चिंता जताई थी.

पीआईबी ने फ़ौरन अपने ट्विटर हैंडल पर इस ख़बर को 'फ़ेक न्यूज़' क़रार दे दिया. बीबीसी से बात करते हुए सोमरिता घोष कहती हैं कि 'फे़क न्यूज़' क़रार देने के लिए पीआईबी ने जिन बिन्दुओं का हवाला दिया, दरअसल वो ख़बर में कहीं नहीं थे.

उनका कहना था, "मैंने भी ट्विटर के ज़रिए ही पीआईबी को जवाब दिया कि ये कहीं से भी 'फ़ैक्ट चेक' है ही नहीं."

उनकी रिपोर्ट में उन 480 के लगभग एम्स के डाक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का ज़िक्र था, जिन्हें कोरोना वायरस के लिए पॉज़िटिव पाया गया था. रिपोर्ट में स्थानीय डॉक्टरों के एसोसिएशन के एक पदाधिकारी का बयान भी छापा गया जिन्होंने सप्लाई किए गए मास्क की गुणवत्ता पर सवाल उठाया था.

पीआईबी की इस हरकत से सत्तारूढ़ दल के जो ट्विटर पर फ़ॉलोवर हैं, वो ऐसी ख़बरों को झुठलाने में लग जाते हैं.

परेशानी पत्रकारों की

इमेज स्रोत, Getty Images

इस महामारी के संकट काल में स्वास्थ्य और अस्पतालों बीट कवर करने वाले पत्रकार सबसे ज़्यादा परेशान हैं. उनके लिए जानकारी जुटाना एक बहुत ही मुश्किल काम है क्योंकि सरकारी तंत्र में कोई भी बोलने को तैयार नहीं है.

कोरोना वायरस से संबंधित स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस ब्रीफ़िंग किस दिन होगी, किसी को नहीं पता. ऐसे में रोज़ ख़बरें निकालना मुश्किल काम बन जाता है.

अश्लिन मैथ्यू भी अंग्रेज़ी अख़बार की संवाददाता हैं और मुख्यतः स्वास्थ्य के मुद्दों पर काम करती हैं. वो बताती हैं कि इस महामारी के दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय या उससे संबद्ध विभागों का कोई भी अधिकारी बात नहीं करना चाहता. ऐसे में अस्पतालों का चक्कर काटना पड़ता है और अपने सूत्रों की मदद से ख़बरें लानी पड़ती हैं जो बहुत मुश्किल काम है.

वो कहती हैं कि जानकारी देना तो दूर, ये सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है कि जानकारियाँ पत्रकारों तक नहीं पहुंचे.

फ़ैक्ट चेक पोर्टल 'ऑल्ट न्यूज़' के संस्थापकों में से एक प्रतीक सिन्हा पीआईबी द्वारा मेहनत से लिखी गयी ख़बरों को लगातार ख़ारिज करने का 'फ़ैक्ट चेक' कर रहे हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि हाल ही में उनके पोर्टल ने पीआईबी द्वारा बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर स्टेशन पर एक महिला की मौत के बारे में लिखे समाचारों को 'फे़क न्यूज़' कहकर ख़ारिज कर दिया था.

मौत की वजह भूख या बीमारी

इमेज स्रोत, SANTOSH KUMAR/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES

ऑल्ट न्यूज़ ने पीआईबी के इस काम का फ़ैक्ट चेक किया और महिला के संबंधियों और अन्य रिश्तेदारों से बातचीत की, जिससे पता चला कि महिला को श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार होने से पहले कोई भी बीमारी नहीं थी. समाचारों में उनकी मौत को भूख से हुई मौत बताया गया था जबकि पीआईबी ने उसकी मौत को बीमारी से हुई मौत बताया था.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "पीआईबी के दावों का क्या आधार हो सकता है? पीआईबी ने तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट का भी इंतज़ार नहीं किया. हमने तो महिला के सभी रिश्तेदारों से बात की. 'फ़ैक्ट चेक' करने के अंतरराष्ट्रीय मानदंड तय हैं. आप सिर्फ़ ये नहीं कह सकते हैं कि फ़लां खबर 'फे़क न्यूज़' है. आपको अपनी दलील में सुबूत देने पड़ते हैं. शोध करना पड़ता है. और उन सब को सामने रखकर आप कह सकते हैं कि ये रहे सबूत और इन सबूतों के आधार पर फ़लां ख़बर 'फ़ेक न्यूज़' है. पीआईबी जो कर रही है वो सिर्फ़ पत्रकारों को परेशान करने वाली बात है. वो फे़क न्यूज़ क़रार देते हैं और ख़बर लिखने वाले पत्रकारों को सोशल मीडिया पर ज़बर्दस्त ट्रोलिंग से दो-चार होना पड़ता है. एक तरह से ये पत्रकारों को डराने वाली बात ही हुई."

इमेज स्रोत, DAVID BENITO

एक न्यूज़ पोर्टल की पत्रकार रोहिणी सिंह ने काफ़ी खोजबीन के बाद गुजरात के वेंटिलेटरों पर ख़बर की, जिसमें कहा गया कि महामारी से लड़ने के लिए गुजरात सरकार ने जो वेंटिलेटर ख़रीदे हैं, वो काम नहीं कर रहे हैं और उनकी गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

पीआईबी की फ़ैक्ट चेक टीम ने उस ख़बर को फ़ौरन ही फे़क न्यूज़ क़रार दे दिया. पीआईबी का कहना था कि किसी संस्थान ने वेंटिलेटर्स को दान में दिया था, ना कि सरकार ने उन्हें ख़रीदा था.

रोहिणी सिंह का दावा है कि गुजरात सरकार के स्वास्थ्य सचिव ने उन्हें जानकारी दी थी कि वेंटिलेटर्स की ख़रीदारी भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के ज़रिए एचएलएल लाइफ़ केयर नामक कंपनी से की गयी थी.

और भी हैं ऐसे मामले

इमेज स्रोत, TWITTER PMO

पीआईबी के दावों के बाद भी रोहिणी अपनी रिपोर्ट पर अडिग रहीं और उन्होंने पीआईबी को सोशल मीडिया पर ही जवाब भी दिया. उनका कहना था कि अगर रिपोर्ट ग़लत थी तो सरकारी महकमे को सोशल मीडिया की बजाय क़ानूनी नोटिस भेजना चाहिए था.

उसी तरह एक पत्रिका के लिए विद्या कृष्णन की रिपोर्ट में कहा गया था कि "प्रधानमत्री ने लॉकडाउन को बढ़ाने से पहले कोविड-19 से निपटने के लिए बनाई गई 21 सदस्यों वाली टास्क फ़ोर्स से कोई सलाह नहीं ली थी."

पीआईबी की फ़ैक्ट चेक की टीम ने सोशल मीडिया पर फ़ौरन ही अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि "ख़बर फे़क यानी फ़र्ज़ी है क्योंकि प्रधानमंत्री ने टास्क फ़ोर्स की सलाह से ही लॉकडाउन को बढाया था.

इंडियन काउंसिल फ़ॉर मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर ने भी ट्विटर का सहारा लेते हुए लिखा, "एक मीडिया रिपोर्ट में टास्क फ़ोर्स को लेकर ग़लत दावे किये गए हैं. हक़ीक़त ये है कि टास्क फ़ोर्स की एक महीने में कुल 14 बैठकें हुईं हैं और जो भी फै़सले लिए गए, उसमें टास्क फ़ोर्स को शामिल किया गया. कृपया ग़लत बयानी से बचें."

विद्या कृष्णन के अनुसार उन्होंने आईसीएमआर से उन बैठकों के मिनट उपलब्ध कराने की माँग की. उन्होंने ख़बर लिखने से पहले संस्थान को मेल भी किये. जब आईसीएमआर ने ट्विटर पर ख़बर का खंडन किया तो विद्या कृष्णन ने भी ट्विटर पर ही अपनी बात रखी.

ऐसा नहीं है कि हर मामले में पीआईबी की छवि नकारात्मक रही हो. उदाहरण के तौर पर, व्हाट्सऐप पर एक सन्देश काफ़ी ज़ोर शोर से भेजा गया जिसमें सरकार के श्रम मंत्रालय का हवाला देते हुए कहा गया कि जो भी मज़दूर साल 1990 से 2020 तक काम कर रहे हैं, उन्हें एक लाख बीस हज़ार रूपए सरकार देगी.

इस मामले में भी पीआईबी की फैक्ट चेक की टीम हरकत में आई और इससे पहले लोग इस सूचना के झांसे में आते, उसने इस खबर को फे़क न्यूज़ कहते हुए ख़ारिज कर दिया.

वहीं गिलगिट-बल्टिस्तान और लद्दाख़ का एक सरकारी जैसा दिखने वाला ट्विटर हैंडल बनाया गया था. पीआईबी ने उसे ख़ारिज करते हुए कहा कि ऐसा कोई सरकारी हैंडल नहीं बनाया गया है.

चंद सवाल

इस मामले में हमने भी कुछ सवाल पीआईबी के प्रमुख महानिदेशक और महानिदेशक को मेल पर भेजे हैं जो इस तरह हैं-

क्यों पीआईबी को ऐसी ज़रूरत आ पड़ी कि वो समाचार पत्रों या समाचारों का फ़ैक्ट चेक कर रहा है?

पत्रकारों द्वारा सबूत जुटाकर की गई ख़बरों को पीआईबी क्यों फे़क न्यूज़ कहकर ख़ारिज कर रहा है?

किसी भी ख़बर को फ़ैक्ट चेक करने का क्या मापदंड और कार्यप्रणाली है?

सरकारी संस्थान होते हुए क़ानूनी कार्रवाई करने के बजाय सोशल मीडिया पर ख़बरों को क्यों फे़क न्यूज़ बताया जा रहा है?

क्या फे़क न्यूज़ के संबंध में मामले भी दर्ज किये गए हैं?

पीआईबी के प्रमुख महानिदेशक स्वस्थ नहीं हैं, इसलिए हम उनके विभाग के दूसरे अधिकृत अधिकारी के जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं. जैसे ही उनकी तरफ़ से जवाब मिलता है, हम अपनी इस कॉपी को अपडेट कर देंगे.

इमेज स्रोत, MoHFW_INDIA

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)