कोरोना संकट: क्या स्कूलों का सिलेबस छोटा किया जाना चाहिए?

  • गुरप्रीत सैनी
  • बीबीसी संवाददाता
रमेश पोखरियाल निशंक

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मानव संसाधन विकास मंत्रालय कोरोना वायरस के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए इस शैक्षणिक सत्र (2020-21) के पाठ्यक्रम और स्कूल के घंटे घटाने पर विचार कर रहा है.

मंत्रालय ने इस विषय पर शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों से सुझाव भी मांगे हैं.

गर्मियों की छुट्टियों से पहले ज़्यादातर स्कूलों ने बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस लेनी शुरू कर दी थी ऐसे में कई अभिभावक पाठ्यक्रम घटाए जाने के मुद्दे पक्ष में हैं.

दिल्ली में रहने वाली दिपा बिष्ट का एक बेटा छठीं और दूसरा पहली कक्षा में पढ़ता है.

वो कहती हैं, "पाठ्यक्रम कम होना ही चाहिए. क्योंकि अभी जिस तरह से ऑनलाइन क्लासेस हो रही हैं, उस तरह से पूरा सिलेबस कर पाना मुश्किल है. जिस चैप्टर को कराने में दो दिन लगते थे, ऑनलाइन क्लास में वही चैप्टर चार-पांच दिन में हो रहा है. टाइम दोगुना हो गया, इससे तो पाठ्यक्रम पूरा होने में बहुत ज़्यादा टाइम लगेगा."

दिल्ली की ही रहने वाली सीमा की एक बेटी नौवीं और एक छठीं में है. वो भी मानती हैं कि पाठ्यक्रम कम होने से बच्चों पर बोझ कम होगा.

लेकिन पंजाब में मोहाली ज़िले के एक ग्रामीण इलाक़े में रहने वाली ममता कहती हैं कि उनके बच्चों की तो ऑनलाइन क्लास भी नहीं हुई. ऐसे में उनपर पाठ्यक्रम का ज़्यादा दबाव होगा, इसलिए पाठ्यक्रम घटाना ही चाहिए.

वक्त कम होगा, इसलिए पाठ्यक्रम भी कम करना होगा

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मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि स्कूलों को अगस्त के बाद खोला जा सकता है.

शिक्षा विशेषज्ञों की माने तो संकेत मिल रहे हैं कि सिंतबर के पहले हफ्ते से स्कूल खुल सकते हैं.

शिक्षा विशेषज्ञ शेषागिरि कहते हैं कि स्कूल देरी से खुल रहे हैं, इसलिए पाठ्यक्रम घटाने के अलावा कोई चारा ही नहीं है.

वहीं हरियाणा स्थित अंबाला के एक स्कूल में शिक्षिका रमनप्रीत कौर कहती हैं कि स्कूल अगर देरी से खुलेंगे, तो कम वक्त में पूरा पाठ्यक्रम कवर कराना और छात्रों के लिए उसे कवर करना, दोनों के लिए मुश्किल होगा. इसलिए पाठ्यक्रम तो कम करना ही चाहिए.

पाठ्यक्रम कम करने से नुकसान तो नहीं?

लेकिन पाठ्यक्रम घटाने से बच्चों की पढ़ाई का नुकसान तो नहीं होगा? कई लोगों के मन में ये आशंका भी है.

इस पर शेषागिरि कहते हैं, "पाठ्यक्रम कम करने को लेकर इतना चिंतित नहीं होना चाहिए, क्योंकि सिलेबस कम भी कर दें तो जिन बेसिक चीज़ों को सीखना है, वो तो सीख ही जाएंगे. मतलब कम सीखे, लेकिन ठीक से सीखें तो इससे कुछ नुकसान नहीं होगा. बल्कि मैं तो कहूंगा इस बार परीक्षा के तरीक़े को भी आसाना रखना चाहिए."

लेकिन कई छात्रों को डर है कि उन्हें आगे जाकर ये ना कहा जाए कि वो हल्की परीक्षा पास करके आए हैं. इस पर परीक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि हर कोई समझता है कि ये संकट का साल है, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका असर पड़ा है. ऐसे में कोई भी इस तरह असंवेदनशील बातें नहीं कहेगा.

पाठ्यक्रम कम करने के सुझाव

पाठ्यक्रम को लेकर शिक्षक, शिक्षा विशेषज्ञ और परिजन कई तरह के सुझाव देते हैं.

हरियाणा स्थित अंबाला के एक स्कूल में 10वीं और 11वीं के बच्चों को पढ़ाने वाली रमनप्रीत कौर कहती हैं, हिस्ट्री और साइंस जैसे विषयों में कुछ ऐसे टॉपिक होते हैं जो बच्चों को आगे चलकर काम नहीं आते, उन्हें हटाया जा सकता है.

नौवीं में पढ़ने वाली इशिका नेगी की मां सीमा कहती हैं कि कई टॉपिक ऐसे होते हैं जो बच्चों ने पिछली कक्षाओं में पढ़े होते हैं. उससे मिलते-जुलते टॉपिक को हटाया जा सकता है.

हालांकि शिक्षा विशेषज्ञ शेषागिरी कहते हैं , "गणित और विज्ञान जैसे विषयों में ये सब थोड़ा सोच समझ कर करना होगा, क्योंकि हर टॉपिक एक दूसरे से जुड़ा होता है. लेकिन उसमें ये किया जा सकता है, अभ्यास और नंबर ऑफ प्रोब्लम सोल्विंग को कम किया जा सकता है.”

साथ ही वो कहते हैं कि भाषा, इतिहास या भूगोल जैसे विषयों में बहुत आसानी से पाठ्यक्रम को कम किया जा सकता है. उद्हारण के लिए भाषा में आठ या दस कहानी या पाठ पढ़ाने के बजाए, चार-चार ही पढ़ाए तो कोई नुकसान नहीं.

लेकिन स्कूल खोलने पर छिड़ी बहस

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दीपा बिष्ट अपने बेटे काव्यांश और देवांग के साथ

पाठ्यक्रम कम करने पर फिलहाल विचार किया जा रहा है. लेकिन इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि स्कूल खोले भी जाने चाहिए या नहीं.

लोकल सर्किल संस्था ने एक ऑनलाइन सर्वे किया है, जिसमें सामने आया कि ज़्यादातर परिजन तबतक स्कूल खोलने के पक्ष में नहीं हैं, जबतक उनके ज़िले में कोरोना एकदम खत्म ना हो जाए. वो चाहते हैं कि जब 21 दिन तक ज़िले में एक भी कोरोना मामला ना हो, तब स्कूल खुले.

इस सर्वे को 224 ज़िलों से 18 हज़ार प्रतिक्रियाएं मिलीं. 76% परिजनों ने माना कि सोशल डिस्टेंसिंग के साथ उनके बच्चों का स्कूल खुलना फिलहाल अव्यावहारिक और बहुत मुश्किल होगा.

वहीं सिर्फ 11% ने सरकार के कहे वक्त पर स्कूल खोलने का समर्थन किया.

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भारत में स्कूल और कॉलेज कब खुलेंगे, शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने बताया

दीपा बिष्ट कहती हैं कि बच्चों को इस बीमारी की गंभीरता नहीं पता है. मां-बाप की मानकर वो घरपर लगातार हैंडवॉश और बाकी चीज़ें कर रहे हैं.

लेकिन स्कूल जाएंगे तो बच्चों का एक-दूसरे से मिलना, खेलना होगा ही. शिक्षक जितनी भी सख्ती से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करवाएं, लेकिन वो कितना मास्क पहनेंगे, कितना डिस्टेंस रखेंगे, इसे लेकर परिजन चिंतित हैं.

शिक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऐसा डर है. लेकिन सरकार स्कूल के घंटे घटाकर स्कूल कई शिफ्टों में लगवा सकती है, जिससे एक वक्त में कम बच्चे ही स्कूल आएं. हालांकि ग्रामीण अंचल और अर्बन स्लम स्कूलों में पानी की कमी के साथ बार-बार हाथ धोने की कितनी सुविधा होगी, इसे लेकर सवाल हैं.

हालांकि उनका मानना है कि अगर परिजन बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे तो दुनिया की कोई भी ताक़त इसके लिए उनपर दबाव नहीं बना सकती.

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

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    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

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    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

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    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
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    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

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    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है? सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं? मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है? फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है? स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं? कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है? हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए? मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए? लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा? बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए? मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है? लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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