कोरोना का इलाज: दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों में लाखों का ख़र्च, सरकारी अस्पताल में डरावनी हालत

  • सिन्धुवासिनी/शादाब नाज़मी
  • बीबीसी संवाददाता
कोरोना हॉस्पिटल

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“मेरे पिता कोरोना संक्रमण से पीड़ित हैं. मैंने उन्हें बीएल कपूर, फ़ोर्टिस, मैक्स, मूलचंद, वेंकटेश्वर, होली फ़ैमिली और अपोलो जैसे नामी और सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में भर्ती कराने की कोशिश की लेकिन किसी ने उनकी परवाह नहीं की. उन्होंने बेड न होने की बात कही. उन्होंने कहा कि अगर मैं 15-20 लाख रुपये एडवांस में जमा करा सकता हूं तो कुछ हो सकता है, वरना नहीं.”

दिल्ली के कोटला मुबारकपुर में रहने वाले मोहित ने बीबीसी से अपने कोरोना संक्रमित और गंभीर रूप से बीमार पिता को भर्ती कराने में आई मुश्किलों के बारे में विस्तार से बताया.

मोहित सात जून से ही अपने पिता को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराने की कोशिशों में जुटे थे और आख़िकार उन्हें बड़ी मुश्किल से 10 जून को दिल्ली के कटवारिया सराय के रॉकलैंड हॉस्पिटल में जगह मिली. ‘चैरिटी बेड्स’ नाम की ग़ैर-सरकारी संस्था ने उनके पिता को यहां भर्ती कराने में मदद की लेकिन इसके लिए मोहित तीन दिन तक इंतज़ार करना पड़ा.

मोहित के 62 वर्षीय पिता तीन जून को दिल्ली के सरकारी एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती हुए थे लेकिन वहां के बुरे हालात देखकर मोहित ने उन्हें कहीं और ले जाने का फ़ैसला किया.

इलाज के बंदोबस्त में कमी और भारी ख़र्च की मार झेलने वाले अकेले मोहित ही नहीं हैं. उनकी तरह कई और लोगों ने भी ऐसी ही जानकारी बीबीसी हिंदी से साझा की.

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केजरीवाल ने दिल्ली में कोरोना के हालात और उप राज्यपाल के आदेश पर क्या कहा?

बाटला हाउस इलाके में रहने वाले हैदर अली ने बताया कि कम-से-कम पांच-छह अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद उनकी कोरोना संक्रमित पत्नी को हमदर्द नगर के एक अस्पताल में भर्ती कराया जा सका. हैदर अली का आरोप है कि मरीज़ को भर्ती करने से पहले अस्पताल ने उन्हें एक लाख रुपये कैश में जमा कराने पर मजबूर किया.

इसी तरह सादिक नगर में रहने वाले विनय ने अपने कोविड-19 संक्रमित भाई को भर्ती कराने के लिए चार-पांच प्राइवेट अस्पतालों में संपर्क किया लेकिन कहीं बात नहीं बनी.

उन्होंने बताया, “मैंने लाजपत नगर के मेट्रो हॉस्पिटल से रोज़ाना के संभावित खर्च के बारे में पूछा था और उन्होंने मुझसे कहा था कि रोज़ 25 हज़ार के लगभग ख़र्च आएगा.”

विनय ने अपने भाई को सरकारी आरएमएल अस्पताल में भर्ती कराने का सोचा था लेकिन वहां की स्थति बहुत ख़राब थी.

वो बताते हैं, “अस्पताल के बाहर और अंदर परिसर में बिल्कुल सफ़ाई नहीं थी. हर जगह इतनी भीड़ थी कि लोग मक्खी-मच्छरों की तरह एक-दूसरे से चिपके हुए थे. एक ही जगह पर टेस्ट हो रहा था, वहीं रिपोर्ट मिल रही थी और वहीं किसी की मौत की ख़बर आते ही रोना-धोना चल रहा था. ये सब देखकर मैं बहुत घबरा गया और मुझे लगा कि भाई यहां रहा तो और बीमार हो जाएगा.”

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सरकारी अस्पताल बेहाल, प्राइवेट में भारी बिल

मोहित, हैदर अली और विनय की शिकायत है कि कोरोना वायरस संक्रमण से पीड़ित लोग सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्था, बेड और टेस्टिंग की कमी से परेशान हैं साथ ही प्राइवेट अस्पतालों के भारी-भरमक बिल ने उनके लिए बेबसी के हालात पैदा कर दिए हैं.

प्रोग्रेसिव मेडिकोज़ ऐंड साइंटिस्ट्स फ़ोरम के अध्यक्ष डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी भी मानते हैं कि ज़्यादातर प्राइवेट अस्पताल कोविड संक्रमित मरीजों को भर्ती करने से पहले पांच लाख रुपये तक की एडवांस राशि ले रहे हैं और रोज़ाना का खर्च लगभग 25 हज़ार रुपये तक आ रहा है.

अभी कुछ दिनों पहले ही रोहिणी स्थित सरोज हॉस्पिटल का एक सर्कुलर सोशल मीडिया में वायरल हुआ था जिसमें कहा गया था कि किसी भी कोविड मरीज़ को भर्ती कराने के लिए कम से कम चार लाख रुपये एडवांस में देने होंगे.

विवाद और हंगामे के बाद हॉस्पिटल ने सफ़ाई दी कि यह एक पुराना सर्कुलर है और अब रेट बदल दिए गए हैं.

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सरोज हॉस्पिटल का सर्कुलर, जिस पर विवाद हुआ और जिसे हॉस्पिटल ने पुराना बताया.

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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बीबीसी ने जब सरोज हॉस्पिटल को फ़ोन कर इस बारे में जानकारी लेनी चाही तो बताया गया कि जनरल वार्ड को प्रतिदिन का ख़र्च 30-35 हज़ार और आईसीयू वार्ड का रोज़ाना खर्च 40-50 हज़ार के लगभग आएगा.

बीबीसी की टीम पिछले तीन दिनों से दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में फ़ोन करके खाली बेड, वेंटिलेटर और खर्च का जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही है.इस दौरान हमें अस्पतालों से जो जवाब मिले, वो कुछ इस तरह है:

· फ़ोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट में बेड उपलब्ध हैं लेकिन इसके लिए भारी-भरकर राशि देनी होगी. बेड का रोज़ाना ख़र्च- 9000 रुपये, डॉक्टर की एक विजिट-4200 रुपये, आईसीयू का रोज़ाना खर्च-एक लाख रुपये और भर्ती होने से पहले 50 हज़ार-80 हज़ार रुपये एडवांस में देना होगा.

· संत परमानंद हॉस्पिटल में जनरल वॉर्ड और आईसीयू बेड उपलब्ध हैं लेकिन वेंटिलेटर नहीं. जनरल वार्ड में भर्ती होने के लिए एडवांस में पांच लाख और आईसीयू के लिए नौ लाख का ख़र्च.

· बत्रा हॉस्पिटल में कोई बेड खाली नहीं है लेकिन अगर मरीज़ की हालत बहुत नाजुक है और कोई इंश्योरेंस नहीं है तो लाख रुपये के एडवांस भुगतान के बाद आईसीयू वार्ड में जगह मिल सकती है.

· धर्मशाला नारायण हॉस्पिटल में बेड खाली नहीं हैं और कई मरीज़ पहले से ही वेटिंग लिस्ट में हैं.

· तीर्थराम शाह अस्पताल में बेड हैं लेकिन वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हैं. अस्पताल के पास चार वेंटिलेटर हैं और सभी पर मरीज़ हैं इसलिए गंभीर मरीज़ों की भर्ती नहीं हो रही है.

· सीताराम भरतिया इंस्टिट्यूट में बेड उपबल्ध हैं लेकिन वेंटिलेटर नहीं. इसलिए सिर्फ़ उन्हीं मरीज़ों को भर्ती किया जा रहा है जिनकी हालत स्थिर है.

सरकार ने इस बारे में अब तक क्या किया है?

दिल्ली सरकार ने प्राइवेट अस्पतालों को निर्देश दिया है कि वो कोविड-19 से जुड़ी अपनी हर कैटेगरी की रेट लिस्ट सार्वजनिक करें.

दिल्ली सरकार ने लैब टेस्ट, बेड, आइसोलेशन बेड, आईसीयू और वेंटिलेटर के ख़र्च को भी अस्पताल में अलग-अलग जगहों पर प्रमुखता से डिस्प्ले को कहा है.

सरकार ने ये भी है कहा कि हर निजी अस्पताल में एक सीनियर नर्सिंग ऑफ़िसर भी तैनात किया जाएगा जो मरीज़ों की मदद करेगा और उनकी शिकायतें सरकार तक पहुंचाएगा. हर अस्पताल में 24x7 हेल्पलाइन भी शुरू की गई है.

हालांकि सरकार ने कोविड-19 के इलाज में लगने वाले कुल ख़र्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं की है.

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य महानिदेशालय की प्रमुख डॉक्टर नूतन मुंडेजा ने बीबीसी हिंदी से कहा, “दिल्ली में कोविड-19 के इलाज के ख़र्च पर कोई कैप नहीं लगाया गया है. हमारे पास ऐसा करने के लिए कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं है. भविष्य में ऐसा करना मुमकिन होगा या नहीं, इसका फ़ैसला सरकार करेगी.”

कैसे लगेगी इस ख़र्च पर लगाम?

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दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर गिरीश त्यागी ने बीबीसी हिंदी से कहा कि निजी अस्पतालों के भारी-भरकम ख़र्च पर लगाम लगाने को लिए सरकार को अस्पतालों के प्रतिनिधियों से बात करनी चाहिए.

डॉक्टर त्यागी सुझाव देते हैं, “सरकार अलग-अलग अस्पतालों से पूछे कि कोरोना संक्रमित मरीज़ का इलाज करने में उनके कितने पैसे ख़र्च होते हैं और फिर उसी आधार पर एक औसत राशि निर्धारित कर इस ख़र्च पर कैप लगा दे.”

डॉक्टर हरजीत भट्टी का सुझाव है कि कुछ महीनों के लिए दिल्ली सरकार को निजी अस्पतालों के कुछ हिस्से का प्रबंधन अपने हाथ में ले लेना चाहिए.

वो कहते हैं, “सरकार को चाहिए कि वो प्राइवेट अस्पतालों से कोविड वाले 20 फ़ीसदी बेड टेकओवर कर ले. वहां वो मरीज़ों को भर्ती करे, उनके इलाज के ख़र्च की निगरानी करे और प्रबंधन का ख़र्च उठाए. मुझे नहीं लगता कि निजी अस्पताल इस प्रस्ताव से असहमत होंगे.”

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर राजन शर्मा का मानना है कि मौजूदा हालात में कोरोना से लड़ाई के लिए ‘एक राष्ट्र एक नीति’ अपनाई जानी चाहिए.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, “अचानक कोई एकतरफ़ा आदेश पारित करने और क़ानूनी कार्रवाई के ऐलान से बेहतर ये होगा कि सभी पक्ष मिलकर विचार-विमर्श करें और तब किसी फ़ैसले पर पहुंचे.”

डॉक्टर राजन का मानना है कि महामारी के इस दौर में प्राइवेट अस्पतालों पर भी काफ़ी दबाव है क्योंकि कोरोना संक्रमित मरीज़ की देखभाल करना आसान नहीं होता.

उन्होंने कहा, “मरीज़ों की देखभाल करने वाले डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मी ख़ुद भी संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं. कोरोना पॉज़िटिव होने के बाद संक्रमित स्वास्थ्यकर्मी और उसके संपर्क में आने वाले सभी लोगों को एहतियातन क्वारंटीन में जाना ही पड़ता है. ऐसे में अस्पतालों के सामने स्टाफ़ की कमी लगातार बनी हुई है. कोई भी आदेश जारी करने से पहले सरकार को इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए.”

कैसे सुधरेंगे हालात?

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कोरोना संक्रमण

डॉक्टर हरजीत भट्टी का सुझाव है कि अस्पताल में स्टाफ़ की कमी और मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए सरकार उन मेडिकल ग्रैजुएट्स की मदद ले सकती है जो इंटर्नशिप कर रहे हैं या एमबीबीएस की डिग्री के बाद पीजी की तैयारी कर रहे हैं.

वो कहते हैं, “सभी एमबीबीएस ग्रैजुएट प्रशिक्षित डॉक्टर होते हैं. सरकार को उन्हें कोविड मरीज़ों की देखभाल के लिए बस 10-15 दिनों की ट्रेनिंग देनी होगी और इसके बाद वो ड्यूटी के लिए तैयार होंगे. इस तरह हम अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को पूरा कर सकते हैं.”

डॉक्टर हरजीत कहते हैं कि आख़िर में कुल मिलाकर बात स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश पर आकर रुक जाती है और सरकारें अब भी यहां पैसे ख़र्च करने से कतराती हैं.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने करीब दो हफ़्ते पहले एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा था कि सरकारों से मुफ़्त में ज़मीन लेने वाले अस्पताल कोविड मरीज़ों का मुफ़्त में इलाज क्यों नहीं कर सकते?

कोर्ट ने उन अस्पतालों की पहचान किए जाने का आदेश भी दिया था जो कम ख़र्च में कोरोना संक्रमित लोगों का इलाज कर सकते हैं.

निजी अस्पतालों में कोविड मरीज़ों से मनमानी वसूली के मामले पर देश के और भी कई राज्यों में बहस छिड़ी है.

तमिलनाडु सरकार ने ऐसे कुछ मामलों के बाद इसी सप्ताह आदेश जारी कर कोरोना इलाज के ख़र्च की ऊपरी सीमा तय कर दी है. उसने अलग-अलग कैटेगरी के अस्पतालों के लिए अलग-अलग रेट तय कर दिए हैं.

मिसाल के तौर पर, अगर कोई कोविड-19 संक्रमित मरीज़ तमिलनाडु के ग्रेड-3 और ग्रेड-4 अस्पतालों के जनरल वार्ड में इलाज कराता है तो उससे 5,000 रुपये प्रतिदिन से ज़्यादा पैसे नहीं लिए जा सकेंगे. ग्रेड-1 और ग्रेड-2 के अस्पतालों के प्रतिदिन का अधिकतम ख़र्च 7,500 रुपये होगा और आईसीयू वार्ड का खर्च अधिकतम 15 हज़ार रुपये प्रतिदिन.

इससे पहले महाराष्ट्र सरकार ने पिछले महीने 22 मई को कोरोना संक्रमण के इलाज में प्रतिदिन का अधिकतम ख़र्च 9,000 रुपये निर्धारित कर दिया था.

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है? लीड्स के कैटलिन से सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता? बाइसेस्टर से डेनिस मिशेल सबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है? जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है? सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं? मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है? फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है? स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं? कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है? हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए? मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए? लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा? बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए? मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है? लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

End of मैं और मेरा परिवार

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