भारत-चीन सीमा विवाद: दोनों देशों के बीच रिश्ते और बिगड़ेंगे या सुधरने की गुंजाइश बाक़ी है?

  • सरोज सिंह
  • बीबीसी संवाददाता
भारत-चीन

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भारतीय सेना का कहना है कि भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी में सोमवार रात को दोनों देशों की सेना में ज़ोरदार संघर्ष हुआ है. सीमा पर हिंसक झड़प में एक भारतीय अफ़सर और दो सैनिकों की मौत हो गई है.

चीन की सेना को भी नुक़सान उठाना पड़ा है. हालाँकि इस पर चीन का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.

दोनों देशों के सीमा पर ये विवाद अप्रैल के तीसरे हफ़्ते से जारी है. दोनों देशों के बीच बातचीत से इस मसले को सुलझाने के लिए जून की शुरुआत में ब्रिग्रेडियर स्तर की बातचीत भी हुई, मेजर जनरल स्तर की बात हुई, कोर कमांडर स्तर की बातचीत हुई. लेकिन बीती रात विवाद ने हिंसक रूप ले लिया.

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आख़िर इसके पीछे की वजह क्या है?

जेएनयू में प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह का मानना है कि इसके पीछे एक पूरा पैटर्न है. स्वर्ण सिंह चीन मामलों के जानकार हैं. वे कहते हैं कि बीती रात की घटना से स्पष्ट हो गया है कि अब तक सीमा-विवाद का हल जिस तरह से दोनों देश निकालना चाह रहे थे, वो नाकाफ़ी है. दोनों देशों को कुछ नए रास्ते अपनाने की ज़रूरत है.

स्वर्ण सिंह की मानें तो चीन के साथ सीमा विवाद है उसमें पिछले आठ- 10 सालों में घुसपैठ के मामलों में तेज़ी देखने को मिली है.

पहले ऐसे वाक़ये कम होते थे. लेकिन अब पिछले साल के आँकड़े बताते हैं कि 650 बार ऐसी कोशिश हुई हैं. यानी घुसपैठ की कोशिशें लगातार बढ़ रही हैं.

दूसरी बात जो देखने वाली है उसमें सेना के बल प्रदर्शन की बात है. चीन ने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के बहुत पास तक अच्छी सड़कें बना ली है,

इस वजह से अपना सारा सामान, हथियार और सैनिक जल्द ही सीमा तक आ सकते हैं. इस वजह से चीन के बल प्रदर्शन में आक्रमकता और तीव्रता दोनों आई है. लेकिन दोनों देशों में ऐसी झड़पें या मुठभेड़ जब भी हुई है, कभी बंदूक़ों का इस्तेमाल नहीं हुआ है.

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भारत और चीन के बीच क्या और बुरे हालात होने वाले हैं?

तीसरा परिवर्तन ये आया कि घुसपैठ की कोशिश केवल एक जगह से नहीं एक साथ कई जगहों से एक साथ की जा रही है.

इन वजहों से दोनों देशों के बीच नौबत यहाँ तक पहुँच गई कि आज सीमा पर हिंसा देखने को मिली और जवानों की मौत की खबरें तक आई है.

समाचार एजेंसी एएनआई ने सेना के सूत्रों के हवाले से बताया है कि बीती रात सीमा पर हुई हिंसक झड़प के बाद के तनावपूर्ण स्थिति को दूर करने के लिए मेजर जनरलों की बैठक हो रही है.

जानकारों की माने तो ये स्थिति तब पैदा हुई जब दोनों देश सीमा से सेनाएँ हटा रही थी. यानी 'डिसएंगेजमेंट' की प्रक्रिया चल रही थी.

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भारत-चीन के पास विकल्प क्या है?

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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प्रोफेसर स्वर्ण सिंह का मानना है कि बातचीत ही एक ज़रिया है जिससे इसे सुलझाया जा सकता है. पिछले 40 सालों से भारत और चीन दोनों ने कोशिश की है कि सीमा पर शांति और स्थिरता क़ायम रह सके.

गौरतलब है कि पिछले दो साल में भारत और चीन के बीच दो अनौपचारिक शिखर वार्ता हुई है. एक अप्रैल 2018 में चीन के वुहान शहर में. जहाँ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत हुई थी और दूसरी बार चेन्नई के पास ममल्लपुरम में दोनों एक बार फिर से मिले थे.

इन दोनों मौक़ों पर दोनों देशों के नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई थी कि अपनी सेनाओं को शांति बनाए रखने के निर्देश देंगे.

स्वर्ण सिंह का मानना है कि इस वक़्त चीन के प्रति दुनिया भर में काफ़ी आक्रोश है. इसलिए चीन नहीं चाहेगा कि परिस्थिति युद्ध वाली किसी भी सूरत में बने. चीन के पास भारत से संबंधों को उलझाने का कोई विकल्प नहीं है.

ये वक़्त दोनों देशों के लिए सीखने और सबक लेने का है. उनके मुताबिक़ ज़रूरत इस बात की है कि सीमा पर शांति बनाए रखने से आगे बढ़ते हुए सीमा विवाद सुलझाया जाए.

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर काफ़ी विवाद है, जिसे सुलझाए रखने की ज़रूरत है. प्रोफेसर स्वर्ण सिंह का मानना है कि सीमा विवाद को सुलझाने से दोनों देशों की सेनाओं के बीच जो कंफ्यूजन है वो ख़त्म हो जाएगा.

लेकिन दोनों देश इस विवाद को सुलझाएं कैसे? सारा विवाद तो इसी बात का है कि दोनों देश एक ही इलाक़े पर दावा ठोक रहे हैं?

इस पर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि इसके कई तरीक़े हैं.

पहला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का दवाब तैयार किया जा सकता है ताकि चीन भी भारत की बात मानने को तैयार हो जाए.

दूसरा ये कि जब भी दोनों देशों की पेट्रोलिंग टीम निकले तो एक दूसरे को इलाक़ों की सूचना दें. इस तरह की सूचना का पहले से आदान प्रदान होने पर इस तरह की संघर्ष की स्थिति नहीं आएगी या कम होगी.

ये तात्कालिक क़दम है जो उठाया जा सकता है. दोनों सेनाओं के बीच फ्लैग मीटिंग होती है, उस दौरान भी इस तरह की सूचनाओं का आदान प्रदान किया जा सकता है.

और आगे ऐसा हो इसके लिए तीसरा काम जो दोनों देशों को करना चाहिए वो है अपने अपने दावे वाले क्षेत्रों के नक्शे को एक दूसरे के साथ एक्सचेंज करना.

स्वर्ण सिंह के मुताबिक़ दोनों देशों के बीच सेंट्रल सेक्टर के मैप एक्सचेंज हुए हैं, पूर्वी और पश्चिमी इलाक़े के नहीं हुए हैं. आगे चल कर दोनों देशों को इस बारे में भी पहल करने की जरूरत है, ताकि दोनों देशों के एक दूसरे के दावे के बारे में पूरी जानकारी हो.

भारत और चीन एक दूसरे के लिए ज़रूरी भी, मजबूरी भी

भारत चीन के लिए निवेश का एक बहुत बड़ा मार्केट है.

भारत और चीन के बीच कारोबार में किस तरह बढ़ोतरी हुई है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि इस सदी की शुरुआत यानी साल 2000 में दोनों देशों के बीच का कारोबार केवल तीन अरब डॉलर का था जो 2008 में बढ़कर 51.8 अरब डॉलर का हो गया.

इस तरह सामान के मामले में चीन अमरीका की जगह लेकर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया.

2018 में दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते नई ऊंचाइयों पर पहुँच गए और दोनों के बीच 95.54 अरब डॉलर का व्यापार हुआ. ये इस बात को दर्शाता है कि दोनों देश एक दूसरे की आर्थिक ज़रूरत भी है.

हालाँकि 2019 में इसमें थोड़ी कमी आई है. अब ये व्यापार 92.7 अरब डॉलर रह गया. लेकिन पिछले दस साल की बढ़ोतरी को देखें तो कारोबार बढ़ रहा है, इसका यह मतलब नहीं है कि फ़ायदा दोनों को बराबर हो रहा है.

भारतीय विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक़, 2018 में भारत चीन के बीच 95.54 अरब डॉलर का कारोबार हुआ लेकिन इसमें भारत ने जो सामान निर्यात किया उसकी क़ीमत 18.84 अरब डॉलर थी.

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चाहे ई-कॉमर्स की बात हो या फिर मोबाइल क्षेत्र की बात, भारत चीन के लिए कितना बड़ा निवेश स्थान है ये बात किसी से छिपी नहीं है.

चीनी कंपनी अली बाबा की बिग बास्केट, पेटीएम, स्नैपडील और जौमेटो में तकरीबन 500 मिलियन डॉलर का निवेश है. वहीं BYJUs, फ़्लिपकार्ट, ओला, स्विगी में चीन की टेनसेंट नाम की कंपनी की हिस्सेदारी है.

वीवो, ओपो, शाओमी जैसे मोबाइल फोन का भारत बहुत बड़ा मार्केट है. यही वजह है कि भारत और चीन एक दूसरे से दुश्मनी मोल नहीं ले सकते.

स्वर्ण सिंह के मुताबिक़ अगर बातचीत से रिश्ते नहीं सुधरें तो असर व्यापार और निवेश पर पड़ेगा, जिसका जोखिम दोनों देश कोविड के दौर में उठाना नहीं चाहेंगे.

चीन को दुनिया में बड़ा आर्थिक ताक़त बने रहना है तो भारत से रिश्ते बनाए रखना पड़ेगा. चीन आर्थिक रूप से सुदृढ़ बना रहेगा, तभी शी जिंगपिंग सत्ता में बने रहेंगे.

भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के साथ अगर तालमेंल बिगड़ेगा तो उसका असर चीन के आर्थिक वृद्धि दर पर भी पड़ेगा. ये चीन के राष्ट्राध्यकक्ष भी जानते और समझते हैं. पार्टी को पॉवर में रहना है तो भारत का साथ उन्हें भी चाहिए. ऐसा प्रोफेसर स्वर्ण सिंह का मानना है.

यही बात वो भारत के लिए कहते हैं. कोरोना काल में भारत जैसे बड़े देश में आर्थिक रूप से कई साल पीछे चले गए हैं.

इस वक़्त पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते खराब कर युद्ध जैसी स्थिति बने ये भारत भी नहीं चाहेगा. उदाहरण के लिए देश की बेशक़ीमती हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का निर्यात देख सकते हैं.

अगर किसी भी सूरत में भारत को दूसरे देशों को ये दवा निर्यात करनी होगा तो इस दवा का कच्चा माल जिसे एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स (एपीआई) कहते हैं, चीन से आयात किया जाता है.

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इतना ही नहीं दूसरी निर्यात की जाने दवा क्रोसीन, जिसका एपीआई पैरासीटामॉल भी चीन से आता है. असल में, संसद में भारत सरकार के एक बयान के मुताबिक़, भारत की दवा बनाने वाली कंपनियां क़रीब 70 फ़ीसदी एपीआई चीन से आयात करती हैं.किसी बड़े देश के साथ उलझने का मतलब नुक़सान भारत का भी होगा.

इसके अलावा कॉटन यानी कपास, कॉपर यानी तांबा, हीरा और अन्य प्राकृतिक रत्न भी भारत चीन को बेचता है. इस वजह से स्वर्ण सिंह का मानना है कि दोनों देशों के पास बातचीत ही एक मात्र रास्ता बचता है.

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