कोरोना: चीन अब ऑस्ट्रेलिया को लेकर क्यों चिढ़ा हुआ है?

  • 19 जून 2020
चीन अपने स्टूडेंट्स और पर्यटकों को ऑस्ट्रेलिया को लेकर चेतावनी ज़ारी की है. इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption चीन अपने स्टूडेंट्स और पर्यटकों को ऑस्ट्रेलिया को लेकर चेतावनी ज़ारी की है.

ऑस्ट्रेलिया के इस वक़्त चीन के साथ संबंध अच्छे नहीं चल रहे हैं. कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर ऑस्ट्रेलिया के सवालों ने चीन को नाराज़ कर दिया था.

इसके बाद चीन ने ऑस्ट्रेलिया पर प्रतिबंध लगाए थे और यात्रा चेतावनियाँ जारी की थीं.

ऐसे में ऑस्ट्रेलिया को कई बार चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करने की भी सलाह दी जाती है लेकिन क्या ये वाक़ई संभव है?

दशकों से जौ की खेती करने वाले किसान क्रिस कैली कहते हैं, “मुझे चीन के लोग पसंद हैं. मैं उनसे प्यार करता हूँ. ऑस्ट्रेलिया में जौ की खेती करने वाला हर शख़्स चीन से प्यार करता है क्योंकि उन्होंने हमें अमीर बनाया है.”

पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में 80 लाख टन जौ का उत्पादन हुआ था. जौ का इस्तेमाल बीयर बनाने में किया जाता है. चीन ने उत्पादन का क़रीब आधा हिस्सा ख़रीद लिया था. लेकिन पिछले महीने चीन ने ऑस्ट्रेलियाई जौ पर 80 प्रतिशत टैरिफ़ लगा दिया.

इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने अमरीका की कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर जाँच की मांग का समर्थन किया था. इस क़दम को चीन ने “राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया था.

तब से चीन ने ऑस्ट्रेलिया से होने वाली आयात में से कुछ को टाल दिया था. साथ ही अपने छात्रों और पर्यटकों को “नस्लवादी” देश में जाने को लेकर चेतावनी भी दी थी.

इस हफ़्ते, एक गुप्त प्रक्रिया में, चीन ने ड्रग तस्करी के लिए एक ऑस्ट्रेलियाई व्यक्ति को मौत की सज़ा सुना दी.

इसके बाद से ऑस्ट्रेलिया में इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या चीन कोरोना वायरस को लेकर लगाए गए आरोपों पर जवाबी कार्रवाई कर रहा है? क्या ये अमरीका और चीन की तरह एक व्यापार युद्ध की शुरुआत है?

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Image caption ऑस्ट्रेलियाई किसान क्रिस कैली

चीन पर ऑस्ट्रेलिया की निर्भरता

अन्य उदारवादी लोकतांत्रिक देशों की तरह ऑस्ट्रेलिया भी चीन पर आर्थिक निर्भरता और अपने मूल्यों और हितों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना कर रहा है.

हाल के दिनों में, ऑस्ट्रेलिया ने शिनज़ियांग और हॉन्गकॉन्ग में मानवाधिकारों का मसला उठाया था. चीनी कंपनी ख़्वावे को ऑस्ट्रेलिया के 5जी नेटवर्क के निर्माण से रोक दिया था और चीन पर अपने घरेलू मामलों में हस्तक्षेप करना का आरोप लगाया था.

ऑस्ट्रेलिया के लिए ये टकराव कोई हैरानी की बात नहीं है. कनाडा, जापान और दक्षिम कोरिया भी ऐसी स्थिति देख चुके हैं. ऐसे आरोप लगाए जाते हैं कि चीन राजनीतिक कारणों से ही आर्थिक मदद करता है.

लेकिन, कई अन्य देशों के मुक़ाबले ऑस्ट्रेलिया की चीन पर आर्थिक निर्भरता कहीं ज़्यादा है.

पिछले दशक में, चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार रहा है और उसका ऑस्ट्रेलिया के निर्यात में 32.6 प्रतिशत हिस्सा है. ऑस्ट्रेलिया की खदानों ने चीन के विकास को बढ़ावा देने के लिए लौह अयस्क, कोयला और गैस की आपूर्ति की है.

दूसरे क्षेत्रों जैसे शिक्षा, पर्यटन, कृषि और शराब चीन के बाज़ार में काफ़ी फले-फूले हैं. लेकिन अर्थशास्त्री कहते हैं कि जौ की तरह ये क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया के लिए उतने विशेष नहीं हैं और राजनीतिक कारणों की भेंट चढ़ सकते हैं.

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Image caption विशेषज्ञों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया को अन्य एशियाई देशों के साथ संबंध आगे बढ़ाने चाहिए.

अन्य विकल्पों की तलाश

चीन और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों पर छिड़ी बहस में ये भी पूछा जाता है कि क्या ऑस्ट्रेलिया चीन पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर है और क्या उसे अन्य विकल्प खोजने चाहिए?

सिडनी में यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी में राजनीति वैज्ञानिक डॉक्टर लाई-हा-चान कहती हैं कि ऑस्ट्रेलिया को अपने एशियाई पड़ोसियों के साथ तेज़ी से संबंध मज़बूत करने की ज़रूरत है.

वो कहती हैं कि ऑस्ट्रेलिया इसकी कोशिशें कर रहा है. प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने इस साल भारत के साथ कई समझौते किए हैं. उन्होंने पिछले साल वियतनाम की यात्रा की थी. यह 25 सालों में पहली बार किसी ऑस्ट्रेलियाई नेता का वियतनाम दौरा था.

डॉक्टर चान सलाह देती हैं कि ऑस्ट्रेलिया चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए इंडोनेशिया, जापान और दक्षिण कोरिया से गठजोड़ की मदद ले सकता है.

इनमें से सभी देश ऑस्ट्रेलिया के शीर्ष 10 कारोबारी साझेदारों में नहीं है. कई मामलों में इनके बीच मुक्त व्यापर समझौता भी नहीं है. लेकिन अर्थशास्त्रियों के बीच इसे लेकर भी मतभेद है कि ऑस्ट्रेलिया को आसानी से चीन का विकल्प मिल सकता है.

अक्सर भारत की क्षमता की बात की जाती है. ऑस्ट्रेलिया ने 2035 तक भारत को 45 अरब डॉलर निर्यात का लक्ष्य रखा है. लेकिन, पिछले साल उसने चीन को ही 160 अरब डॉलर का निर्यात किया है.

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में चीनी अर्थव्यवस्था की विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर जेन गोले कहती हैं, “ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में चीन की बराबरी करने वाला कोई और विकल्प नहीं दिखाई देता.”

पूर्वी एशिया के एक विशेषज्ञ डॉक्टर शिरो आर्मस्ट्रांग ने बीबीसी से कहा, "सरकार के लिए कंपनियों से यह कहना अजीब बात है कि आप चीन को सामान नहीं बेच सकते हैं या आपको दूसरे देशों को सामान बेचना है जबकि वो देश सामान ख़रीदना ही नहीं चाहते."

पॉलिसी रिसर्च ग्रुप चाइना मैटर्स के डिर्क वैन डेर क्ले का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया की कंपनियाँ चीन पर निर्भरता कम करने की पहले ही कोशिश कर रही हैं.

उन्होंने कहा, “वाकई उन्होंने कुछ बदलाव किए हैं. लेकिन, यहाँ पर बाज़ार मायने रखता है जहाँ अपना सामान बेचना है.”

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चीन के साथ ज़्यादा अवसर?

प्रोफ़ोसर गोले कहती हैं कि ये निराशाजनक है जब सुरक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन से दूर रहो.

वो कहती हैं, “मैं हैरान होती हूँ कि अगर सड़क चल रहा कोई शख़्स ये हेडलाइन पढ़ता है और सोचता है कि हमें चीन से दूर रहना चाहिए. तब वो सोचता होगा कि इसका क्या मतलब है और ये कैसे उसे और उसके बच्चों को भविष्य में बेरोज़गारी की तरफ़ ले जाएगा.”

हालाँकि, विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि पिछले दशकों में चीन और ऑस्ट्रेलिया के संबंध ख़राब हुए हैं. ऑस्ट्रेलिया के बार-बार अनुरोध के बावजूद दोनों देशों के नेताओं की द्विपक्षीय बैठक हुए तीन साल हो चुके हैं.

प्रोफे़सर गोले का कहना है कि सरकार को ऑस्ट्रेलियाई कारोबारियों को चीनी समकक्षों के साथ बिज़नेस करने में मदद करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए. लेकिन उन्हें डर है कि चीन और ऑस्ट्रेलिया के संबंध जिस तरह से ख़राब हो रहे हैं, उससे इस पर पानी फिर रहा है.

बाक़ी लोगों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया को अपनी कूटनीति में व्यावहारिक रवैया अपनाने की ज़रूरत है.

उदाहरण के लिए चीन पर ख़ुद हल्ला बोलने के बजाय समान विचार वाले देशों के बीच चीन की आलोचना करना ज़्यादा ठीक है. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन को अपनी सरकार के बड़बोले तत्वों पर काबू रखना चाहिए.

पूर्व राजनायिक माउडे कहते हैं कि चाशनी में लिपटी कूटनीति केवल पैकेजिंग के लिहाज से अच्छी लगती है. चाहे ये बाहर से कितनी ही सुंदर क्यों न हो, चीन इसकी ज़रूर आलोचना करेगा.

प्रधानमंत्री मॉरिसन का कहना है, "हम ऑस्ट्रेलियाई लोग हैं. हमने ऐसा कुछ नहीं किया है और न ही हम ऐसा कुछ करना चाहते हैं जो हमारे मूल्यों से मेल नहीं खाता हो या फिर चीन के साथ हमारी साझेदारी को किसी भी तरह से नुक़सान पहुँचा सकता हो."

दूसरी तरफ़, माउडे कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया तो नहीं बदला है लेकिन चीन में बुनियादी बदलाव हुए हैं.

वो कहते हैं कि चीन अब ज़्यादा अधिकारवादी रवैया रखता है और ऑस्ट्रेलिया आर्थिक फायदों के लिए सियासी हकीकतों को नज़रअंदाज नहीं कर सकता है. आज जो रिश्तों की हकीकत है, उसमें बदले की भावना से आर्थिक कार्रवाई एक सामान्य बात होगी.

लेकिन अपने जौ के खेत में खड़े केली कहते हैं, "हम पिछले कई सालों से परेशान थे. हालात कुछ समय के लिए ऐसे ही रहने वाले हैं. अब ये लगता है कि सबसे बुरा वक़्त आ गया है."

ये भी पढ़ें:चीन के ख़िलाफ़ गोलबंद हुए अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया

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