भारत-चीन तनाव के बीच कैसी है भारत में चीनियों की ज़िंदगी

  • फ़ैसल मोहम्मद अली
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
चीनी सामान के बहिष्कार की अपील

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राजधानी दिल्ली के पास गुड़गाँव और नोएडा में इस बार चीनी ड्रैगन बोट फ़ेस्टिवल आया और चला गया, किसी को पता भी नहीं चला.

गुरुवार से शुरू हुए तीन दिनों के इस समारोह के मौक़े पर राजधानी क्षेत्र और दूसरे कई शहरों में मौजूद चीनी गेस्ट हाउस वग़ैरह में या तो उत्सव को लेकर किसी तरह का कोई आयोजन नहीं हुआ या जिनमें हर बार की तरह इस बार भी ज़ोंगज़ी और दूसरी ख़ालिस चीनी डिश तैयार की गईं, वहाँ भी प्रवासी चीनियों की उपस्थिति कम रही.

भारत-चीन तनाव के मद्देनज़र भारत में रह रहे चीनी प्रवासी 'भारी अंदेशे के दौर से गुज़र रहे हैं' और उन्हें हिदायत है कि 'वो लोगों की नज़रों से दूर रहें और बिना ज़रूरत बाहर न निकलें.'

मोहम्मद साक़िब भारत-चीन आर्थिक और सांस्कृतिक काउंसिल के सेक्रेटरी जनरल हैं, वो कहते हैं, "प्रवासियों में ये ख़ौफ़ पैदा हो गया है कि दोनों मुल्कों की फ़ौज के बीच हुई झड़प के बाद चीन विरोधी भावना भारत में दिखने में आ रही है, लोगों में डर है कि वो कहीं उन पर न फूट पड़े."

गलवान घाटी की घटना के बाद पूर्व भारतीय सैनिकों से लेकर, आरएसएस से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच, और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं तक ने चीन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किए हैं, कई जगहों पर चीनी राष्ट्रपति शि जिनपिंग के पोस्टर और पुतले जलाए गए हैं. चीनी माल के बॉयकाट और चीन से बदला लेने के नारे बुलंद हुए हैं. चीन को लेकर नकारात्मक भावनाएँ खुलकर सामने आ रही हैं.

भारत सरकार ने भी चीनी निवेश के नियमों में बदलाव किए हैं और चीनी माल के आयात में आ रही दिक़्क़तों की बात ख़बरों में है. एयरकंडीशनरों में भरी जाने वाली गैस से लेकर कई तरह के रसायनों और दवाओं की क़िल्लत की ख़बरें भी आ रही हैं.

डर और आशंकाएँ

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इन हालात के मद्देनज़र मुंबई के पवई में रहने वाले मोबाइल कंपनी के लिए काम करने वाले वांग वेई ने इलाक़े के शापिंग मॉल तक जाने की बजाए फल और सब्ज़ियाँ तक या तो ऑनलाइन मंगानी शुरू कर दी है या उस ठेलेवाले से ख़रीदने लगे हैं जो उनके अपार्टमेंट में आता है.

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लेकिन वांग वेई उन फ़ब्तियों का क्या करें जो उन्हें अक्सर सुनने को मिलती हैं, जैसे-"भाई, थर्मो-गन (टेंपेरेचर जांचने वाला कांटैक्टलेस यंत्र) लेने जा रहे हो, चीन वाला मत ले लाना" वगैरह.

दूसरी तरफ़, बंगलुरू निवासी मा ली को परिवार वाले सलाह दे रहे हैं कि वो बाहर निकलते वक़्त भारतीय लिबास पहनकर जाएँ. चीनी मूल की मा ली ने एक भारतीय से शादी की है.

भारत में चीन के बढ़ते निवेश के साथ-साथ चीन से आकर काम करने वाले प्रवासियों की तादाद में भी तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ है.

जवाहर लाल नेहरू विश्वद्यालय के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली के मुताबिक़ इस समय भारत में तक़रीबन 25 से 26 हज़ार चीनी प्रवासी रहते हैं, हालाँकि चीनी कंपनियों के साथ काम करने वाले वकील संतोष पाई का मानना है कि ये तादाद तक़रीबन 35-40 हज़ार के बीच हो सकती है.

वर्तमान में भारत में चार तरह के चीनी प्रवासी रहते हैं: वो जो चीनी कंपनियों में काम कर रहे हैं, या वे जो शार्ट टर्म वीज़ा पर किसी प्रोजेक्ट के लिए आते हैं, फिर वे जिन्होंने किसी भारतीय से शादी की है और विश्वद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र.

ये उन चीनी मूल के लोगों से अलग हैं जो 18वीं सदी में कोलकाता, मुंबई, चेन्नई जैसी जगहों को आए और फिर भारत के ही होकर रह गए. फ़िलहाल जब भारत-चीन विवाद ज़ोरों पर है तब जो प्रवासी इस समय यहाँ बचे हैं, उनकी संख्या काफ़ी कम है.

परेशानियाँ

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प्रवासियों की एक बड़ा वर्ग चीनी नए साल के मौक़े पर जनवरी के दूसरे-तीसरे हफ़्ते भारत से चीन पहुँचा ही था कि वहाँ लॉकडाउन शुरू हो गया, फिर भारत ने जनवरी के बाद दिए गए वीज़ा को कैंसिल कर दिया और हाल के दिनों में चीन की यात्रा कर चुके लोगों के भारत आने पर रोक लगा दी, हवाई कंपनियों ने वहाँ की उड़ानें रद्द करनी शुरू कर दीं.

मार्च के पहले हफ़्ते से चीनी प्रवासियों के भारत लौटने का सिलसिला शुरू ही हुआ था कि 25 मार्च से यहाँ तालाबंदी शुरू हो गई और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर रोक लग गई.

विदेशों से आने वाली उड़ानों पर रोक अब भी जारी है.

इस बीच चीनी दूतावास ने कई चार्टर्ड फ़्लाइट्स से प्रवासियों को शंघाई, गुआंगज़ू और दूसरी जगहों पर पहुँचाया है. फ़िलहाल भारत में वही प्रवासी बचे हैं, जो कंपनियों को चलाने के लिए निहायत ही ज़रूरी हैं.

भारत में काम करने वाले चीनियों के लिए मानसिक दबाव कोरोना वायरस के फ़ैलाव के साथ ही शुरू हो गया था, पहले तो चीन पर इस वायरस को दुनिया भर में फैलाने का आरोप लगना शुरू हुआ और फिर भारत में हुई तालाबंदी ने उद्योग-धंधों को पूरी तरह ठप कर दिया.

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लॉकडाउइन के कारण अंतरराष्ट्रीय विमान यात्राओं पर रोक है

इस बीच चीनियों जैसे दिखने वाले भारत के पूर्वोत्तर के लोगों पर हमलों और दुर्व्यवहार की ख़बरें भी मीडिया में आती रहीं.

बंगलुरू में रहने वाले पीटर वैंग पिछले सात-आठ माह से घर नहीं जा पाने का मानसिक तनाव झेल ही रहे थे कि तालाबंदी की वजह से उन्हें कंपनी के 15 कर्मचारियों को काम से निकालना पड़ा और अब उनका माल पोर्ट में फँसा पड़ा है.

हाल के दिनों में ख़बरें आ रही हैं कि चीन से आयात होने वाला माल मुंबई और चेन्नई जैसे बंदरगाहों में अटका पड़ा है. हालाँकि इसकी वजह या फिर नियमों में किसी तरह के बदलाव की कोई आधिकारिक सूचना कंपनियों को नहीं मिली है.

इन हालात में प्रवासियों के पास कोई ऐसा रास्ता नहीं, जिससे वो मानसिक तनाव को कम कर सकें, सिवाए वी-चैट ग्रुप्स में या फिर किसी क़रीबी भारतीय जानकार से इन मामलों को शेयर करने के.

कुछ को छोड़कर ज़्यादातर प्रवासी भारत में परिवार के साथ नहीं रहते और उन्हें अपने जैसे दूसरों का ही सहारा होता है, अपने तर्ज़ का खाना खाने से लेकर त्यौहार में साथ होने तक.

हालाँकि एक तरफ़ जब भारत में चीन का विरोध दिन-ब-दिन बढ़ता दिख रहा है, वहीं चीनी उद्योग का यहाँ आना और चीनी भाषा और संस्कृति में भारतीयों की रुचि बढ़ रही है.

भारत और चीन की भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवाली मुंबई-स्थित संस्था इनचिन क्लोज़र की मुख्य कार्यकारी अधिकारी नाज़िया वासी कहती हैं कि लॉकडाउन के दौरान बहुत सारे लोगों ने उनके इंस्टीच्यूट में दाख़िला लेकर मैंडरीन (चीनी भाषा) सीखी और हाल के सालों में कई स्कूलों ने चीनी भाषा सिखाने के लिए उनकी संस्था के साथ क़रार किया है.

दस साल पहले इनचिन क्लोज़र की स्थापना करनेवाली नाज़िया वासी कहती हैं, "लोग कह रहे हैं कि ये नए ज़माने की भाषा है, कुछ साल पहले तक नई भाषा सीखने के नाम पर लोग फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश वग़ैरह से आगे नहीं बढ़ते थे."

जहाँ भारतीयों के एक तबक़े की दिलचस्पी चीनी भाषा और संस्कृति को लेकर बढ़ी है, वहीं चीन में बड़े पैमाने पर सब-टाइटलिंग की हुई बॉलीवुड फ़िल्मों और साथ ही भारतीय तीज-त्यौहारों पर तैयार पॉडकास्ट और वीडियोज़ की माँग बढ़ी है.

रिश्तों पर असर

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मोहम्मद साक़िब कहते हैं कि आने वाले दिनों में 'ये सब किस रुख़ को जाएँगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि राजनीतिक फ़ैसले आर्थिक रिश्तों पर किस तरह का असर डालते हैं.

दोनों मुल्कों के बीच जारी तनाव और एक ख़ास वर्ग के मूड के बावजूद तक़रीबन 10 दिनों पहले चीन की मशहूर ऑटो कंपनी ग्रेट वॉल मोटर्स ने महाराष्ट्र सरकार के साथ तेलेगांव की अपनी फैक्टरी के आधुनिकीकरण के लिए क़रार किया है.

कंपनी ने एक अरब डॉलर के निवेश की बात को फिर से दोहराया है.

दूसरी तरफ़, चीन की मोबाइल कंपनी ओप्पो के स्मार्टफ़ोन के ऑनलाइन लॉन्च के रद्द होने की ख़बरें सुर्ख़ियों में रहीं.

उद्योग और व्यवसाय संगठन एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ़ कार्मस एंड इंडस्ट्री (ऐसोचेम) के इरफ़ान आलम कहते हैं, "कुछ इसी तरह का चीन-विरोधी माहौल 2017 के डोकलाम विवाद के वक़्त भी था, फिर सब कुछ पुराने ढर्रै पर आ गया और चीनी ख़ुद भी इस तरह की भावना से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं, उनके यहाँ जापान को लेकर अक्सर ऐसी आवाज़ें उठती रहती हैं."

दूसरे विश्व युद्ध के आसपास जापान के चीन पर हमले और उसके बाद हुई लड़ाई की वजह से चीन में जापान के विरुद्ध अभी भी रोष मौजूद है.

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वकील संतोष पाई कहते हैं कि भारत में निवेश की योजना के समय चीनी कंपनी सारे रिस्क फ़ैक्टर्स को ध्यान में रखती है, हाल के विवाद का असर ये होगा कि बीमा कंपनी भारत जाने वाली कंपनियों से अधिक प्रीमियम चार्ज करेंगी.

नरेंद्र मोदी सरकार ने चीन से निवेश पर नए नियम और कुछ दूसरे फ़ैसले तो लिए हैं लेकिन वो इस मामले में उद्योग और व्यवसाय जगत का नज़रिया जानने की कोशिश भी कर रही है जिसमें एलएंडटी के मुखिया एसएन सुब्रमण्यन जैसे लोग खुले तौर पर कह रहे हैं कि चीनी सामानों का बहिष्कार व्यावहारिक नहीं है.

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) में जून के तीसरे हफ़्ते में इस मामले पर ज़बरदस्त बहस हुई और फ़िलहाल इस पर एक सर्वे रिपोर्ट तैयार की जा रही है. केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने सीआईआई से इस मामले पर उनकी राय पूछी थी.

(सुरक्षा कारणों से चीन के लोगों के नाम बदल दिए गए हैं)

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