पाकिस्तान के इस बांध निर्माण पर भारत को क्यों है आपत्ति?

  • शुभम किशोर
  • बीबीसी संवाददाता
दियामर बाशा

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भारत ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के गिलगित-बल्तिस्तान में एक बांध निर्माण परियोजना के उद्घाटन का विरोध जताया है. गुरुवार को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि भारत ने इस मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है और ये नहीं बदलेगी.

गुरुवार को मीडिया से बात करते हुए श्रीवास्तव ने कहा, “पूरा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख भारत के अभिन्न अंग रहे हैं और रहेंगे. पाकिस्तान सरकार द्वारा बांध के निर्माण का हम कड़ा विरोध करते हैं.”

श्रीवास्तव के मुताबिक, “इस बांध के कारण भारतीय केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के बहुत इलाके डूब जाएँगे. हम पाकिस्तान के ग़ैर क़ानूनी तौर पर क़ब़्जा किए गए इलाक़ों में बदलाव करने की लगातार कोशिशों की निंदा करते हैं.”

श्रीवास्तव ने कहा कि भारत, पाकिस्तान और चीन दोनों से ही ऐसी परियोजनाओं को लेकर विरोध जताता रहा है.

चीन की मदद से बांध बना रहा है पाकिस्तान

इमरान ख़ान ने 15 जुलाई को दियामर-बाशा बांध के निर्माण परियोजना का उद्घाटन किया. ये प्रोजेक्ट पाकिस्तान चीन की मदद से बना रहा है.

बीबीसी मॉनिटरिंग की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस बांध का निर्माण चीन पावर और पाकिस्तान आर्मीज़ फ्रंटियर वर्क्स ऑरगनाईज़ेशन के बीच एक साझा समझौते के तहत किया जा रहा है.

उद्घाटन के समय इमरान ख़ान के साथ पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ जनरल क़मर जावेद बाजवा और आईएसआई चीफ़ लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद भी मौजूद थे. वहाँ इमरान ख़ान ने कहा कि बांधों ने निर्माण पर ध्यान नहीं देना पाकिस्तान की एक ग़लती रही है.

उन्होंने कहा, “40-50 साल पहले ये फ़ैसला किया गया था और अब प्रोजेक्ट पर काम अब शुरू हो रहा है. ये सबसे बड़ा कारण है कि हम तरक्की नहीं कर पाए,”

पाकिस्तान सरकार को उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट से 4500 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो पाएगा और 16000 से ज़्यादा लोगों को नौकरियाँ मिलेंगी.

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प्रस्तावित बांध निर्माण स्थल

भारत को क्यों है आपत्ति

प्रोजेक्ट से भारत की आपत्ति के दो मुख्य कारण हैं – पहला कश्मीर और लद्दाख के उन इलाक़ों के डूबने का ख़तरा जिन पर भारत अपना हक़ जताता है और दूसरा इस प्रोजेक्ट से चीन का जुड़ा होना.

एशियाई मामलों के जानकार एसडी मुनि बताते हैं, “भारत का विरोध इसलिए है कि ये सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान इकॉनॉमिक कॉरिडोर) के तहत बना रहा है और चीन इससे जुड़ा हुआ है. भारत को ये डर है कि चीन और पाकिस्तान के बीच भारत से जुड़े पानी को लेकर आपस में कोई नीति तय हो सकती है क्योंकि लद्दाख में भी विवाद हो रहा है और नदियाँ लद्दाख से ही होकर ग़ुज़रती हैं.”

मुनि आगे बताते हैं, “इसके अलावा बांध अगर टूटता है तो ज़मीन को नुकसान होता ही है. ऐसा ही भारत और नेपाल के बीच भी होता रहा है. जब बिहार में बांध टूटते हैं या उनसे पानी छोड़ा जाता है तो नेपाल शिकायत करता है और नेपाल पानी को नहीं रोकता तो हम शिकायत करते हैं.”

भारत के पास क्या विकल्प मौजूद

भारत ने पाकिस्तान के इस क़दम का विरोध तो जताया है लेकिन क्या भारत इस परियोजना को रोकने के लिए कोई क़दम उठा सकता है? एस डी मुनि के मुताबिक़ भारत के लिए इसे रोकना मुमकिन नहीं है.

वह कहते हैं, “भारत पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले हिस्से पर अपना हक़ जताता है, लेकिन जब तक वह इलाक़ा पाकिस्तान के पास है, वहाँ पाकिस्तान जो चाहे कर सकता है. पाकिस्तान भी कश्मीर पर अपना अधिकार जताता है, तो जब भारत ने वहाँ बांध बनाना शुरू किया तो पाकिस्तान ने भी ऐतराज़ जताया. भारत जब वहाँ कुछ करता है तो पाकिस्तान सिर्फ़ विरोध कर सकता है, इसके अलावा कुछ नहीं कर सकता, हम भी विरोध ही कर सकते हैं.”

हालांकि मुनि ये भी कहते हैं कि विरोध करना ज़रूरी है, क्योंकि इससे भारत को उन इलाक़ों पर अपने दावे को मज़बूत करने में मदद मिलती है.

द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट या टेरी के वरिष्ठ फ़ेलो डॉ एसके सरकार कहते हैं, “भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि है, अगर उसका उल्लंघन नहीं हो रहा है तो दोनों देशों के लिए विरोध का कोई ठोस आधार नहीं है.”

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पाकिस्तान ने भारत की बांध परियोजना पर विरोध जताया था

पाकिस्तान ने कई बार किए विरोध

पानी के मुद्दे को लेकर भारत पाकिस्तान में तनाव काफ़ी समय से रहा है. हालांकि विरोध के स्वर पाकिस्तान की तरफ़ से ज़्यादा उठे हैं.

डॉ एसके सरकार के मुताबिक, “इसका कारण ये है कि भौगोलिक दृष्टि से देखें तो ये नदियाँ भारत से होकर पाकिस्तान की ओर जा रहीं है, अगर भारत की तरफ़ कोई बांध बनता है तो पाकिस्तान की तरफ़ पानी के बहाव में असर पड़ता है, लेकिन अगर बांध सिंधु जल संधि के मुताबिक़ है, तो ऐसे विरोधों का भी कोई आधार नहीं है."

साल 2018 में पाकिस्तान ने भारत में चेनाब नदी पर बन रही दो परियोजनाओं में से एक पर आपत्ति जताई थी.

भारत चेनाब पर पनबिजली परियोजना के लिए दो बांध बना रहा है- 48 मेगावाट क्षमता की लोअर कालनाई और 1,500 मेगावाट क्षमता का पाकल दुल. पाकिस्तान ने पाकल दुल बांध को लेकर चिंता जाहिर की थी और आरोप लगाया था कि यह सिंधु जल समझौते का उल्लंघन है.

पाकिस्तान के अनुसार पाकल दुल बांध की ऊंचाई 1,708 मीटर हो सकती है, जिससे पाकिस्तान में आने वाले पानी की मात्रा कम हो सकती है. पाकिस्तान का कहना था कि इससे भारत अपनी इच्छासनुसार पानी रोकने या छोड़ने में सक्षम हो जाएगा.

पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा की एक चुनावी रैली में भारत से पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोकने की बात कही थी.

मोदी ने कहा था, "हिंदुस्तान के किसानों के हक़ का पानी, हरियाणा के किसानों के हक़ का पानी 70 सालों तक पाकिस्तान जाता रहा. ये मोदी पानी को रोकेगा, आपके घर तक लाएगा. "

इसके जवाब में पाकिस्तान ने कहा था कि समझौते के तहत तीन नदियों के पानी पर उसका 'ख़ास अधिकार है' और पानी रोकने की कोई भी कोशिश 'उकसावे की कार्रवाई' मानी जाएगी और पाकिस्तान के पास इसका 'जवाब देने का अधिकार होगा'.

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भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता हुआ है

क्या है सिंधु समझौता?

सिंधु जल संधि को दो देशों के बीच जल विवाद के निपटारे का एक सफल अंतरराष्ट्रीय उदाहरण बताया जाता है.

बँटवारे के बाद सिंधु घाटी से गुज़रने वाली छह नदियों पर नियंत्रण को लेकर उपजे विवाद की मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी.

1960 में भारत और पाकिस्तान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

समझौते के अंतर्गत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया. सतलज, ब्यास और रावी नदियों को पूर्वी नदी बताया गया जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया.

समझौते के मुताबिक़ पूर्वी नदियों का पानी, कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो भारत बिना रोकटोक के इस्तेमाल कर सकता है. पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए होगा लेकिन समझौते के भीतर इन नदियों के पानी का कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को दिया गया, जैसे बिजली बनाना, कृषि के लिए सीमित पानी.

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