दिल्ली में कोरोना पर सीरो सर्वे के नतीजे- गुड न्यूज़ हैं या बैड न्यूज़?  

  • सरोज सिंह
  • बीबीसी संवाददाता
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एक काँच के ग्लास में आधा पानी भर दें और कई लोगों से उसके बारे में पूछे कि आप क्या देख रहे हैं. कुछ लोगों का जवाब होगा पानी से आधा ग्लास भरा है. वहीं कुछ लोगों का जवाब होगा पानी से आधा ग्लास ख़ाली है.

यही उदाहरण दिल्ली के सीरो सर्वे के नतीजों पर सटीक बैठता है.  

भारत की राजधानी दिल्ली में लगभग एक चौथाई से ज़्यादा लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं. यह आकलन नेशनल सेंटर फॉर डिजीज़ कंट्रोल की ओर से दिल्ली में कराए गए सीरो सर्वे का है. इस सरकारी सर्वे के लिए दिल्ली में रैंडम तरीक़े से 21,387 लोगों के ब्लड सैंपल लिए गए. इनमें 23.48 प्रतिशत लोगों के ब्लड में कोविड-19 एंटीबॉडी पाया गया.

इस सर्वे के नतीजे से ज़ाहिर है कि कोरोना की स्थिति दिल्ली में जितनी बताई जा रही है उससे कहीं ज़्यादा ख़राब है.

दिल्ली के ताज़ा सर्वे के मुताबिक़ 23.44 प्रतिशत के हिसाब से दिल्ली में 46.5 लाख लोगों के कोरोना संक्रमित होने की आशंका जताई जा सकती है. दिल्ली की कुल आबादी दो करोड़ के आस-पास है. 

कहीं इन आँकड़ों के आधार पर कहा जा रहा है कि दिल्ली हर्ड इम्यूनिटी की तरफ़ बढ़ चला है. कहीं कहा जा रहा है कि स्थिति बेहद चिंताजनक है. 

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क्या इसमें खुशख़बरी भी छुपी है?

इस सवाल का पता लगाने के लिए बीबीसी ने बात की वायरोलॉजिस्ट डॉक्टर टी जैकब जॉन से.

डॉक्टर टी जैकब जॉन  क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर में वायरोलॉजी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर हैं. उनका कहना है कि इस सर्वे के नतीजे को मैं खुशख़बरी तो नहीं कहूंगा. लेकिन इसमें कई राहत भरी खबर ज़रूर है. 

उनके मुताबिक़ सर्वे के नतीजे ये बताते हैं कि कोरोना वायरस उसी तरह से काम कर रहा है, जैसा हमें अब तक इसके बारे में पता है. अभी तक इसके व्यवहार में कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिला है.

कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताब़िक दुनिया के कई बड़े शहरों में इस तरह के सीरो सर्वे कराए गए हैं. वहाँ भी सर्वे के रिजल्ट में 8 से 28 फ़ीसदी तक कोरोना संक्रमण की बात सामने आई है. इस सर्वे से एक बात साबित होती है कि कमोबेश भारत में स्थिति दुनिया से अलग नहीं हैं.

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कोरोना संक्रमण और पीक में आपस में रिश्ता है 

बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर जैकब ने कहा कि दिल्ली में कोरोना का एक पीक जा चुका है. ऐसे में पीक जाने के बाद 20 फ़ीसदी लोग कोविड19 बीमारी से प्रभावित हैं.

इसका मतलब ये निकाला जा सकता है कि 20 फ़ीसदी आबादी संक्रमित हो तो कह सकते हैं कि कोरोना का पीक आ गया है. और फिर उसके बाद संक्रमण का पीक नीचे आना शुरू हो जाएगा. ये अपने आप में सबसे बड़ी राहत की बात है.

दिल्ली में कोरोना का एक पीक जा चुका है- ये बात एम्स के डाक्टर रणदीप गुलेरिया भी कह चुके हैं.

सीरो सर्वे संक्रमण फैलने के किस स्तर पर कराया गया है, ये काफ़ी महत्वपूर्ण होता है. संक्रमण के शुरूआती दिनों के नतीजों से बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती है.

लेकिन भारत में संक्रमण फैलने के बाद से पाँच महीने से ज़्यादा का वक़्त गुज़र चुका है. ऐसे समय पर कराए गए इस सर्वे के नतीजों से आगे की परिस्थिति का अंदाज़ा भी लगाया जा सकता है. 

दिल्ली में ये सीरो सर्वे 27 जून से 10 जुलाई के बीच कराए गए थे. 

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कोविड फ़्री सर्टिफ़िकेट

डॉक्टर जैकब जॉन का मानना है कि इस नतीजे से ये भी साबित होता है कि एंटी बॉडी टेस्ट काम करते हैं और किसी को कोविड फ़्री/ कोविड प्रूफ़ साबित करने के लिए ये काफ़ी मददगार साबित हो सकते हैं. इस सर्वे के नतीजे ये बताते हैं कि दिल्ली की 23 फ़ीसदी जनता अब कोविड फ़्री/ कोविड प्रूफ़ हो गई है. 

उनके मुताबिक़ जिन लोगों का सीरो टेस्ट हुआ और जो लोग उसमें पॉज़िटिव पाए गए, उनको सरकार चाहे तो आसानी से काम शुरू करने की इजाज़त एक सर्टिफ़िकेट से दे सकती है.

यहाँ वो ये भी जोड़ते हैं कि लोगों को फिर भी सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनने और बार बार हाथ धोते रहने के उपाए करते रहने होंगे. ये तरीक़े हमें तब तक अपनाना होगा जब तक कोरोना संक्रमण का ख़तरा नहीं टल जाता. 

बाक़ी राज्यों के लिए सबक

डॉक्टर जैकब के मुताबिक़ बाक़ी राज्य दिल्ली के नतीजों से उत्साहित हो कर सीख सकते हैं कि उन्हें भी अपने राज्यों में इस तरह का सर्वे करवाना चाहिए.

जिन राज्यों में कोरोना की रफ़्तार तेज़ी से बढ़ रही है, वहाँ वायरस के बारे में जानने में इससे काफ़ी मदद मिलेगी.  

पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ इंडिया के डॉक्टर गिरधर आर बाबू भी डॉक्टर जैकब जॉन की बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं. 

डॉक्टर गिरधर के मुताबिक़ बाक़ी राज्यों के लिए भी दिल्ली के सीरो सर्वे के नतीजे मिल का पत्थर साबित होंगे. इससे बाक़ी राज्यों को वायरस का एक पैटर्न समझ में आएगा और फिर वे अपने यहाँ आगे की तैयारी कर सकते हैं. संक्रमण पर क़ाबू पाने के लिए इन नतीजों का और बेहतर इस्तेमाल हो सकता है. उनके मुताबिक़ हर ढाई से तीन महीने में इस तरह के सर्वे को दोबारा करना चाहिए. तब इसके नतीजों को ज्यादा बेहतर समझा जा सकता है.  डॉक्टर गिरधर छह साल तक विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़े रहे हैं. 

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मौत के आँकड़े बाक़ी देशों के मुक़ाबले कम 

भारत सरकार का दावा है कि दुनिया के बाक़ी देशों के मुक़ाबले भारत में इंफ़ेक्कशन ज़्यादा है और कम मौतें हुई है. कई जानकार मौत के आँकड़ों पर सवाल खड़े करते आए हैं. 

लेकिन डॉक्टर गिरधर कहते हैं कि सीरो सर्वे के नतीजे केंद्र सरकार के दावे को सही साबित करते हैं. वो कहते हैं कि इस सर्वे के नतीजे से साफ़ हो जाता है कि भारत में कोरोना संक्रमण से बहुत कम मौतें होंगी. 

आगे चल कर इस पर और स्टडी की जा सकती है कि इंफ़ेक्शन तेज़ी से बढ़ने के बाद भी भारत में मृत्यु दर कम क्यों रही. ये बात केवल भारत के लिए नहीं दक्षिण एशिया के बाक़ी देशों पर भी लागू होती है. ये नतीजे आगे की जाँच के लिए एक ग्राउंड ज़रूर तैयार करते हैं.  

चिंता का सबब

तो क्या सीरो सर्वे में ऐसी कोई बात नहीं, जिससे चिंता बढ़ती हो? दरअसल जितने लोग इस सर्वे में पॉज़िटिव पाए गए हैं वो एसिम्प्टोमेटिक है. 

डॉक्टर गिरधर कहते हैं कि एक लिहाज़ से ये अच्छी ख़बर है कि लोगों को पता भी नहीं चला और वो ठीक भी हो गए. लेकिन दूसरे लिहाज से ये चिंताजनक भी है क्योंकि ऐसे लोग कोरोना संक्रमण फैला सकते हैं. इस लिहाज़ से इस नतीजों को चिंताजनक माना जा सकता है.

इन नतीजों को अगर दूसरे चश्मे से देखें, तो पता चलता है कि दिल्ली की 75 फ़ीसदी आबादी कोरोना की चपेट में आ सकती है. इसलिए बेफ़िक्र होकर घूमने की ज़रूरत नहीं है. और तो और इससे ये भी साबित होता है कि टेस्टिंग बढ़ाने की गुंज़ाइश अब भी बाक़ी है. दिल्ली में इस वक़्त 45000 टेस्ट प्रति मिलियन की रफ़्तार से किए जा रहे हैं. 

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क्या दिल्ली में हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति आ गई है? 

डॉक्टर जैकब जॉन इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. उनका कहना है हर्ड इम्युनिटी के कॉन्सेप्ट को भारत में ठीक से समझा ही नहीं गया है.

सीरो सर्वे के आँकड़ों को सही से पढ़ें तो दिल्ली में आज 23 फ़ीसदी हर्ड इम्यूनिटी हो गई है. लेकिन ऐसा नहीं कि 60-70 फ़ीसदी को ये संक्रमण हो जाए, तो कोरोना का ख़तरा दिल्ली से टल जाएगा. डॉक्टर जैकब इस थ्योरी को सिरे से ख़ारिज़ करते हैं. 

सर्वे में पॉज़िटिव लोग प्लाज़मा डोनेट कर सकते हैं?

सभी जानकार मानते हैं कि इस सर्वे के नतीजे इस बात का सबूत नहीं है कि जिन लोगों में एंटी बॉडी मिले हैं वो प्लाज़्मा डोनेट कर सकते हैं.

दरअसल इसके लिए अलग टेस्ट करने होंगे. आम तौर पर माना जाता है कि मॉडरेट या सिवियर कोरोना मरीज़ ही प्लाज़मा डोनेट कर सकते हैं. 

कैसे किए जाते हैं सीरोलॉजिकल टेस्ट?

सीरोलॉजिकल टेस्ट दरअसल एक तरीक़े का ब्लड टेस्ट है जो व्यक्ति के खून में मौजूद एंटीबॉडीज की पहचान करता है.

दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में मेडिसिन डिपार्टमेंट के हेड डॉ. एसपी बायोत्रा के मुताबिक़ ब्लड में से अगर रेड ब्लड सेल को निकाल दिया जाए, तो जो पीला पदार्थ बचता है उसे सीरम कहते हैं. 

इस सीरम में मौजूद एंटीबॉडीज़ से अलग-अलग बीमारियों की पहचान के लिए अलग-अलग तरह का सेरोलॉजिक टेस्ट किया जाता है.

बावजूद इसके सभी तरह के सीरोलॉजिकल टेस्ट में एक बात कॉमन होती है और वो ये है कि ये सभी इम्यून सिस्टम द्वारा बनाए गए प्रोटीन पर फ़ोकस करते हैं.

शरीर का यह इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बाहरी तत्वों द्वारा शरीर पर किए जा रहे आक्रमण को रोक कर आपको बीमार पड़ने से बचाता है.

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