रफ़ाल से बोफोर्स तक, कब-कब लगे रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप

  • 1 अगस्त 2020
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भारत में रक्षा सौदों को लेकर विवाद न हो, भ्रष्टाचार के आरोप न लगें, विपक्ष का हंगामा न हो और मामला अदालत तक न जाए तो बड़ी बात मानी जाती है.

बुधवार को रफ़ाल फ़ाइटर प्लेन जब भारत की ज़मीन पर लैंड हुए तो कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने सवाल किए, "क्या सरकार इन सवालों के जवाब देगी? प्रत्येक विमान की क़ीमत 526 करोड़ रुपये के बजाय 1670 करोड़ रुपये क्यों दी गई? 126 की बजाए सिर्फ़ 36 विमान ही क्यों ख़रीदे? हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बजाए दीवालिया अनिल अंबानी को 30,000 करोड़ रुपये का कांट्रैक्ट क्यों दिया गया?"

लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत में रक्षा सौदों को लेकर कोई पहली बार सवाल पूछा जा रहा है.

ख़ुद राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी जब देश के प्रधानमंत्री (1984-89) थे तो बोफ़ोर्स तोप के सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे.

साल 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई कारगिल की लड़ाई में मरने वाले सैनिकों के लिए ताबूतों की ख़रीद के मामले में उस समय की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे.

भारत में रक्षा सौदे को लेकर लगने वाले आरोपों का इतिहास सिर्फ़ बोफ़ोर्स के मामले से नहीं शुरू होता है. ये कहानी भारत की आज़ादी के समय से चली आ रही है.

आइए हम आपको भ्रष्टाचार के कुछ ऐसे मामलों के बारे में बताते हैं.

जीप ख़रीद मामला

आज़ाद भारत में ये कथित भ्रष्टाचार का पहला बड़ा मामला था. 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय सेना को जीप की जल्द ज़रूरत थी.

उस वक़्त ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रहे वीके कृष्णा मेनन ने सरकारी ख़रीद के नियमों को कथित तौर पर नज़रअंदाज़ करते हुए 80 लाख रुपये की लागत से एक विदेशी कंपनी से सेना के लिए जीप खरीदने का सौदा किया था.

इस सौदे के तहत विदेशी कंपनी को लगभग पूरी रक़म का भुगतान तो कर दिया गया लेकिन महज़ 155 जीप की डिलेवरी की गई और वो भी दोनों पक्षों के बीच युद्ध विराम हो जाने के बाद.

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने इस सौदे को स्वीकार कर लिया. उस समय गृह मंत्री रहे गोविंद वल्लभ पंत ने सितंबर, 1955 में कथित जीप घोटाले की जाँच बंद करने की घोषणा की जबकि अनंतशयनम अयंगर जाँच समिति ने इसके उलट अपनी सिफ़ारिश दी थी. इसके कुछ समय बाद वीके कृष्णा मेनन नेहरू कैबिनेट में शामिल हो गए थे.

बोफ़ोर्स मामला

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बोफ़ोर्स मामले ने 1980 और 1990 के दशक में गांधी परिवार और ख़ासकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया.

बाद में सोनिया गांधी पर भी बोफ़ोर्स तोप सौदे के मामले में आरोप लगे जब सौदे में बिचौलिया बने इतालवी कारोबारी और गांधी परिवार के क़रीबी ओतावियो क्वात्रोकी अर्जेंटीना चले गए.

साल 1986 में भारत ने स्वीडन से लगभग 400 बोफ़ोर्स तोप ख़रीदने का सौदा किया था जिसकी क़ीमत लगभग एक अरब तीस करोड़ डॉलर थी.

बाद में 'द हिंदू' अख़बार की चित्रा सुब्रमण्यम ने अपनी रिपोर्टों में भंडाफोड़ किया था कि इस सौदे में कथित तौर पर 64 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी.

इस मामले ने भारत में इतना तूल पकड़ा कि 1989 में राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी लोकसभा का चुनाव हार गई थी.

64 करोड़ रुपये के कथित रिश्वत के इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में राजीव गांधी पर कोई आरोप साबित नहीं हो पाया.

कारगिल युद्ध के दौरान ताबूत की ख़रीद का मामला

भारत के रक्षा मंत्रालय ने अमरीका की एक कंपनी से अल्युमीनियम के ताबूत और बॉडी बैग ख़रीदे थे और उनका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र में शहीद हुए सैनिकों के शव सम्मानजनक तरीक़े से घर पहुँचाने के लिए किया जाना था.

साल 1999-2000 के दौरान ऐसे 500 अल्यूमीनियम ताबूत और 3000 शव थैले ख़रीदने के लिए एक अमरीकी कंपनी को प्रति ताबूत 2500 अमरीकी डॉलर और शव थैलों के लिए 85 अमरीकी डॉलर प्रति थैले के हिसाब से भुगतान किया गया जो कि बहुत बढ़ी हुई दर थी.

यह सौदा कुल 15 लाख और पाँच हज़ार अमरीकी डॉलर का था.

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Image caption जॉर्ज फ़र्नांडिस

ये पाया गया है कि जिस अमरीकी कंपनी के साथ यह सौदा हुआ वह इन ताबूतों और शव थैलों की निर्माता कंपनी नहीं थी और उसने पहले जो 150 ताबूत सप्लाई किए उनका वज़न 55 किलोग्राम प्रति ताबूत था जबकि सौदे के हिसाब से 18 किलोग्राम होना चाहिए था.

प्रारंभिक जाँच में यह भी पाया गया है कि ताबूतों के साथ वेल्डिंग के ज़रिए छेड़छाड़ हुई जिसकी वजह से उसमें सुराख़ होने का ख़तरा था और इसी वजह से वे ताबूत इस्तेमाल के योग्य नहीं पाए गए. इस तरह सरकार को उस समय एक लाख 87 हज़ार अमरीकी डॉलर का घाटा हुआ.

यह भी पता चला कि इसी तरह के अल्यूमीनियम ताबूत और शव थैले सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र मिशन को 172 अमरीकी डॉलर प्रति ताबूत और 27 डॉलर प्रति थैले की दर से सप्लाई किए गए थे. अभियुक्त अधिकारियों पर ये भी आरोप लगे कि उन्होंने सिर्फ़ एक ही कंपनी से सामान ख़रीदा और अलग-अलग कंपनियों से क़ीमत जानकर सौदा करने के सामान्य नियम की अनदेखी की. कारगिल युद्ध के बाद विपक्षी कांग्रेस ने आयात में घपले का आरोप लगाते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडीज़ के ख़िलाफ़ अभियान भी चलाया था. हालाँकि जाँच के बाद जॉर्ज फ़र्नांडीज़ को इस मामले में क्लीन चिट दे दी गई थी.

बराक मिसाइल सौदा

23 अक्तूबर 2000 में तत्कालीन एनडीए सरकार ने इसराइल से बराक एंटी मिसाइल सिस्टम का सौदा किया था. 1150 करोड़ रुपये के इस सौदे की जाँच सीबीआई ने की थी.

इस रक्षा सौदे में हुई कथित धांधली की सीबीआई जाँच के दौरान भारत के पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस, समता पार्टी की अध्यक्ष जया जेटली, पूर्व नौसेना प्रमुख सुशील कुमार के अलावा पूर्व एडमिरल एसएम नंदा के बेटे सुरेश नंदा के नाम भी सामने आए थे.

जाँच एजेंसी सीबीआई का कहना था कि बराक मिसाइल ख़रीद मामले में कथित दलाली के तहत क़रीब दो करोड़ रुपये लिए गए थे.

इसराइल की सरकारी रक्षा कंपनी इसराइल एयरक्राफ़्ट इंडस्ट्री के साथ सात बराक एंटी मिसाइल सिस्टम और 200 मिसाइलों का सौदा किया गया था. इन एंटी मिसाइल प्रणाली को नौसेना के युद्धपोतों पर लगाया जाना था.

इन सौदों का तत्कालीन रक्षा अनुसंधान विकास संगठन डीआरडीओ के अध्यक्ष ने विरोध भी किया था जिसे दरकिनार कर दिया गया था.

जॉर्ज फ़र्नांडिस ने न सिर्फ़ इस सौदे को हरी झंडी दे दी थी बल्कि इसे रक्षा मामलों से जुड़ी कैबिनेट समिति से भी मंज़ूरी दिलवा दी थी.

सन 2006 में बराक मिसाइल की ख़रीद में कथित तौर पर घपले की ख़बरें आईं. उस मामले में कुछ गिरफ्तारियाँ भी हुईं और फिर सात साल की तफ़्तीश के बाद सीबीआई ने मान लिया कि कोई घोटाला नहीं हुआ.

इसके बाद यूपीए सरकार ने खुद फिर बराक मिसाइलों की खरीद का फैसला किया.

टैंकरोधी राइफ़ल सौदे की जाँच

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के दौरान 2003 में दक्षिण अफ़्रीकी कंपनी डेनेल के साथ 20 करोड़ रुपये का सौदा हुआ था जिसके तहत उसे टैंकरोधी राइफ़ल की आपूर्ति करनी थी. भारतीय नियमों के अनुसार रक्षा सौदों में कोई मध्यस्थ या दलाल नहीं होना चाहिए.

हालांकि बाद में दक्षिण अफ़्रीका के अख़बार 'केप आर्गूस' में दावा किया गया कि इस सौदे में ब्रिटिश आइल स्थित एक एजेंट को 13 फ़ीसदी कमीशन दिया गया. इस दौरान जॉर्ज फ़र्नाडिंस भारत के रक्षा मंत्री थे.

साल 2005 में तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कंपनी की ओर से 300 राइफ़लों की आपूर्ति के बाद लगभग उतनी ही राइफ़ल की आपूर्ति पर रोक लगा दी. साथ ही इस मामले की जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से कराने का फ़ैसला लिया गया.

साल 2005 में यूपीए सरकार ने दक्षिण अफ्रीका की इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया हालांकि 13 साल बाद भारत सरकार ने कंपनी पर से ये पाबंदी हटा ली क्योंकि सीबीआई जाँच में कंपनी की तरफ़ से किसी अनियमितता की पुष्टि नहीं हो पाई और सीबीआई ने इस मामले में साल 2014 में क्लोज़र रिपोर्ट फ़ाइल कर दी थी.

हालांकि सौदे के वक़्त देश के रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फ़र्नांडिस ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के इस फ़ैसले को सेनाओं को हतोत्साहित करने की साजिश क़रार दिया था.

स्कॉर्पीन पनडुब्बी मामला

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मनमोहन सिंह की अगुवाई वाले यूपीए सरकार के समय स्कॉर्पीन पनडुब्बी मामले में रिश्वत के आरोप लगे थे. उस समय एनडीए नेताओं ने इसे यूपीए सरकार का सबसे बड़ा घोटाला बताते हुए कहा था कि फ़्रांस के साथ 187.98 अरब रुपयों के इस सौदे में चार प्रतिशत कमीशन दिया गया था.

विपक्ष का आरोप था कि इस मामले में पूर्व कांग्रेस सांसद के बेटे अभिषेक वर्मा ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी जिन्हें इस सौदे में कथित तौर पर 500 से 700 करोड़ रुपयों की दलाली दी गई.

जबकि तत्कालीन रक्षामंत्री प्रणव मुख़र्जी ने एनडीए के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि स्कॉर्पीन पनडुब्बी की ख़रीद के लिए कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं किया गया.

उनका कहना था कि 2002 में हुए इस सौदे के लिए उल्टे यूपीए सरकार ने क़ीमतें कुछ कम करवाने में सफलता हासिल की थी.

लोकसभा में इस मामले पर बयान देते हुए प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि सरकार ने दो फ़्रांसीसी फ़र्मों को 45 अरब रुपयों का कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं किया गया.

उनका कहना था कि स्कॉर्पीन पनडुब्बी का सौदा वर्ष 2002 में हुआ था और उस समय जिन क़ीमतों पर सौदा हुआ था उसमें यूपीए सरकार ने इस पर नए सिरे से विचार किया और क़ीमतों में 313 करोड़ रुपयों की कमी करवाने में सफलता पाई.

साल 2015 में केंद्र सरकार ने एक जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट के सवालों का जवाब देते हुए बताया कि स्कॉर्पीन पनडुब्बी सौदे में कोई रिश्वत नहीं दी गई थी.

इससे पहले भी साल 2008 में सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट को यही बात कही थी कि इस मामले में रिश्वत देने का कोई सबूत नहीं मिला है.

अगस्ता हेलिकॉप्टर मामला

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भारतीय रक्षा मंत्रालय ने फिनमैकानिका से 2010 में क़रीब 3600 करोड़ रुपये में 12 अति सुरक्षित अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टरों की ख़रीददारी की थी.

इस सौदे के एक साल बाद इटली की मीडिया में ऐसी रिपोर्टें आईं कि यूरोप में दो बिचौलियों को गिरफ़्तार किया गया है जिन्होंने इस सौदे को कराने में अहम भूमिका निभाई.

इसके बाद यह रक्षा सौदा भी विवादों के घेरे में आ गया. इटली में इस मामले की जाँच शुरू हुई और अब फिनमैकानिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को गिरफ़्तार किया गया.

साल 2013 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल पर इतालवी चॉपर कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड से कमीशन लेने के आरोप लगे.

इतालवी कोर्ट में रखे गए 15 मार्च 2008 के एक नोट में इशारा किया गया था कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया इस वीआईपी चॉपर ख़रीद के पीछे अहम भूमिका निभा रही थीं.

इस मामले की जाँच भारतीय एजेंसियां आज भी कर रही हैं.

तहलका कांड

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Image caption बंगारू लक्ष्मण

भारत की एक वेबसाइट तहलका डॉट कॉम ने 13 मार्च 2001 को एक वीडियो सीडी जारी किया जिसका टीवी चैनलों पर प्रसारण किया गया.

इस सीडी में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को अपने दफ्तर में एक फर्जी रक्षा सौदे के लिए नगद रिश्वत लेते हुए दिखाया गया था.

इस स्टिंग ऑपरेशन में तहलका के पत्रकारों ने ख़ुद को ब्रिटेन की एक फ़र्ज़ी कंपनी वेस्ट एंड इंटरनेशनल का प्रतनिधि बताकर बंगारू लक्ष्मण से मुलाक़ात की और उनसे आग्रह किया कि वो हाथ में थामे जा सकनेवाले उनके सैन्य उपकरण - थर्मल इमेजर - की सप्लाई के लिए रक्षा मंत्रालय में उनकी सिफ़ारिश करें.

सीडी प्रसारित होने के 11 दिन बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने मामले की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश के. वेंकटस्वामी की अध्यक्षता में एक जाँच आयोग गठित किया.

बाद में वर्ष 2003 में न्यायाधीश वेंकटस्वामी के इस्तीफ़ा देने के बाद जाँच का काम न्यायमूर्ति एस एन फूकन आयोग को सौंपा गया.

फूकन आयोग ने अपनी पहली रिपोर्ट में तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडीस को क्लीन चिट दी थी.

लेकिन 2004 में आयोग की अंतिम रिपोर्ट आने से पहले ही यूपीए सरकार ने फूकन आयोग को भंग कर जाँच का काम सीबीआई को सौंप दिया.

सीबीआई ने दिसंबर 2004 में बंगारू लक्ष्मण समेत पाँच लोगों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून के तहत कई धाराओं में मामला दर्ज किया.

दो साल बाद 2006 को बंगारू लक्ष्मण के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दायर किया गया. इसके छह साल बाद उन्हें सज़ा सुनाई गई है.

तहलका के इसी स्टिंग ऑपरेशन के 20 साल बाद 30 जुलाई 2020 को सीबीआई की एक विशेष अदालत ने समता पार्टी की पूर्व अध्यक्ष जया जेटली, उनकी ही पार्टी के पूर्व सहयोगी गोपाल पचेरलवाल और रिटायर्ड मेजर जनरल एसपी मुरगई को भ्रष्टाचार और आपराधिक साज़िश के मामले में चार-चार साल की सज़ा सुनाई है.

टाट्रा ट्रकों की ख़रीद का मामला

Image caption वीके सिंह

पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने साल 2012 में आरोप लगाया था कि 600 टाट्रा ट्रकों की ख़रीद को मंज़ूरी देने के लिए उन्हें 14 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की गई थी.

इस मामले में सरकारी इंजीनयरिंग और रक्षा कंपनी बीईएमएल के प्रमुख और एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल ने जनरल वीके सिंह को मानहानि नोटिस का नोटिस भिजवाया था.

बाद में टाट्रा ट्रक मामले में सीबीआई की सिफ़ारिश पर बीईएमएल के प्रमुख वीआरएस नटराजन को रक्षा मंत्रालय ने निलंबित कर दिया गया.

सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने एक लिखित शिकायत में इन ट्रकों को घटिया दर्जे का बताया था और ये बात उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी की जानकारी में भी लाई थी.

सेनाध्यक्ष के आरोप के बाद काफ़ी विवाद हुआ था और रक्षा मंत्री को संसद में बयान देना पड़ा था. काफ़ी शोर-शराबे और हंगामे के बाद मामले की जाँच सीबीआई को सौंपी गई थी.

सीबीआई ने इस मामले में वेक्ट्रा मोटर्स के सीईओ रवि ऋषि से कई बार पूछताछ की. वेक्ट्रा मोटर्स वो कंपनी थी जो सेना को टाट्रा ट्रक उपलब्ध कराती थी.

उसी साल मार्च में सेना ने एक प्रेस बयान जारी करके आरोप लगाया था कि रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल तेजिंदर सिंह वेक्ट्रा की ओर से घूस की पेशकश कर रहे थे.

वीके सिंह की शिकायत के बाद सीबीआई ने इस मामले की जांच की और साल 2014 में क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी. सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट में कहा कि जांच को आगे बढ़ाने के लिए कोई सबूत नहीं है.

हालांकि इस क्लोज़र रिपोर्ट पर सुनवाई करते हुए स्पेशल कोर्ट ने सीबीआई के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए थे.

साल 2012 में रक्षा मंत्रालय ने टाट्रा ट्रकों पर प्रतिबंध लगा दिया जो सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट के बाद 2014-15 में हटा लिया गया था.

रफ़ाल सौदा

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साल 2010 में यूपीए सरकार ने रफ़ाल लड़ाकू विमान की ख़रीद की प्रक्रिया फ़्रांस से शुरू की. साल 2012 से 2015 तक दोनों के बीच बातचीत चलती रही. 2014 में यूपीए की जगह मोदी सरकार सत्ता में आई. सितंबर 2016 में भारत ने फ़्रांस के साथ 36 रफ़ाल विमानों के लिए क़रीब 59 हज़ार करोड़ रुपये के सौदे पर हस्ताक्षर किए.

मोदी ने सितंबर 2016 में कहा था, "रक्षा सहयोग के संदर्भ में 36 रफ़ाल लड़ाकू विमानों की ख़रीद को लेकर ये ख़ुशी की बात है कि दोनों पक्षों के बीच कुछ वित्तीय पहलुओं को छोड़कर समझौता हुआ है."

इस सौदे में कथित घपले का आरोप लगाते हुए कांग्रेस पार्टी ने कहा कि यूपीए सरकार के वक़्त एक रफ़ाल की क़ीमत 526 करोड़ रुपये थी. जबकि मोदी सरकार ने इसे तीन गुणा ज़्यादा क़ीमत पर ख़रीदा.

रफ़ाल की क़ीमत को लेकर भारतीय मीडिया में विपक्ष की तरफ़ से समय-समय पर सवाल उठाए जाते रहे. पहले की तुलना में ज़्यादा क़ीमत पर सरकार का कहना था कि डासो ने भारत में 108 फ़ाइटर जेट तैयार करने का वादा किया है.

इन लड़ाकू विमानों को भारत में बनाने के लिए पहले सरकारी कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को कॉन्ट्रैक्ट दिया गया था. यह काम उसे डासो के साथ मिलकर करना था, लेकिन बाद में इस कॉन्ट्रैक्ट को अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफ़ेंस को दे दिया गया.

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने रफ़ाल सौदे में किसी भी तरह के भ्रष्टाचार होने की बात को ख़ारिज कर दिया था.

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