परसिड्स: उल्का पिंडों की बौछार का ये नज़ारा आपकी आंखों में बस जाएगा

  • इवा ओन्टिवेरोस
  • बीबीसी संवाददाता
उल्का पिंडों की बौछार से जगमगाता आसमान

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उल्का पिंडों की बौछार से जगमगाता आसमान

धूल के गुबार और मलबे से भरे रास्ते से कोई भी गुज़रना नहीं चाहेगा. लेकिन कभी-कभी ऐसा कर के आप अचम्भे में पड़ सकते हैं.

अगस्त के मध्य में अपनी धुरी पर घूमती पृथ्वी ब्रह्मांडीय मलबे और धूल के बीच से हो कर गुज़रेगी और इस दौरान आसमान रोशनी से जगमगा उठेगा.

आसमान में उल्का पिंडों की बौछार, यानी शूटिंग स्टार की शानदार प्रदर्शन देखने का ये अहम मौक़ा होगा और अगर आपकी किस्मत ने साथ दिया तो आपको फायर-बॉल भी दिखेगा.

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रूस के बोल्गर शहर में सफेद मस्जिद पर उल्का पिंडों की बौछार

क्या है परसिड्स?

स्विफ्ट-टर्टल नाम का धूमकेतु पृथ्वी की तरह सूरज के चारों तरफ चक्कर काटता है, लेकिन ये चक्कर काटते वक़्त एक ख़ास तरह का एंगल बनाता है.

लंदन के ग्रीनविच में मौजूद रॉयल म्यूज़ियम से जुड़े खगोल विज्ञानी एडवर्ड ब्लूमर कहते हैं, "हर साल सूरज के चारों तरफ घूमती हुई पृथ्वी इस धूमकेतु की कक्षा से हो कर जाती है और इस दौरान वो इसके मलबे और धूल की गवाह बनती है."

बर्फ के टुकड़ों, धूल, चावल के दाने के जितने पत्थर के टुकड़ों से भरा ये ब्रह्मांडीय मलबा पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी परत में प्रवेश करते हैं. ब्लूमर कहते हैं, "वायुमंडल में प्रवेश करते ही ये टुकड़े घर्षण के कारण जलने लगते हैं, भले ही कुछ सेकंड के लिए. ये नज़ारा अद्भुत होता है."

वो कहते हैं, "परसिड्स उल्का पिंड का बौछार इसलिए ख़ास है क्योंकि ये तय समय पर होता है. जुलाई के आख़िर से ही ये दिखवने लगता है और अगस्त में मध्य में अपने पीक पर पहुंचता है."

आप इसे बिना किसी ख़ास चश्मे के आंखों से देख सकते हैं और आप लगातार कई दिनों तक रात के आकाश में इसका मज़ा ले सकते हैं. क्या पता किस रात आपको कुछ ख़ास रोशनी का जलवा दिख जाए.

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ब्लूमर कहते हैं कि कभी-कभी धूमकेतु का कोई बड़ा हिस्सा भी आपको दिख सकता है और "अगर आप लकी हुए तो आपको फायर बॉल भी दिख सकता है."

वो कहते हैं कि दो साल की कोशिशों के बाद वो फायर बॉल की एक झलक पाने में कामयाब हुए थे.

लेकिन उल्का पिंडों को देखने के लिए इतना उत्साह?

ब्लूमर कहते हैं, "बिल्कुल होना ही चाहिए. घर की बत्तियां बुझाइए और कहीं खुले में जा कर इसका आनंद लीजिए. "

परसिड्स प्राकृति की आतिशबाज़ी की तरह है. और ये आतिशबाज़ी अपने आप में शानदार होती है और कभी-कभी घंटे भर में आपको सौ तक उल्का पिंड दिखते हैं.

ये उल्का पिंड 215,000 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से धरती के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं लेकिन फिर भी ये धरतीवासियों के लिए किसी तरह का ख़तरा नहीं हैं.

ब्लूमर कहते हैं, "खुद के लिए थोड़ा वक्त निकालिए, एक खुली जगह पर चीदर बिछाइए और आसमान को निहारिए. आतिशबाज़ी का ये नज़ारा आपका तनाव भी कम कर देगा."

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परसिड्स का मज़ा कैसे लें?

खगोल विज्ञानी एडवर्ड ब्लूमर कहते हैं-

  • आसमान में पूर्व और उत्तर पूर्व की तरफ देखें. अगर आप नक्षत्रों को जानते हैं तो कैसियोपिया नक्षत्र के नज़दीक परसिड्स को ढूंढें. अगर आप इसे नहीं ढूंढ पातो इसके लिए मोबाइल एप की मदद लें.
  • कोरोना महामारी से पहले तारे देखना थोड़ा आसान था, लेकिन अब भी सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करते हुए आप ऐसा कर सकते हैं.
  • जहां से आप आकाश देखना चाहते हैं उस जगह की तलाश शाम से ही कर लें. वहां चादर बिछाएं और आराम से रात होने का इंतज़ार करें. आसपास लाइटें हों तो बंद कर दें, अपने मोबाइल फ़ोन को भी बंद करे या फिर लाइट पॉल्यूशन करने वाली कोई और चीज़ आसपास हो तो उसे बंद करें.
  • अब प्रकृति के अद्भुत नज़ार का आनंद लें. आपको घंटे भर में क़रीब सौ उल्का पिंड तो दिखेंगे ही, हो सकता है कि आपको फायर बॉल भी दिख जाए.

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परसिड्स का नाम क्यों है ख़ास?

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ब्लूमर बताते हैं, "उल्का पिंड की ये बौछार परसियस नक्षत्र से आती दिखती है इस कारण इसे परसिड्स कहते हैं."

लेकिन इस तरह की बौछार पहले भी कई अलग-अलग संस्कृतियों में देखी गई है.

कैथोलिक परंपरा में रोम शहर के सात अहम चर्च अधिकारियों में से एक लॉरेन्टियस की याद में इसे 'टीयर्स ऑफ़ सेंट लॉरेन्स' यानी संत लॉरेन्स के आंसू कहा गया है. 258 ईस्वी में रोमन्स ने जिन ईसाईयों को मार दिया था उनमें से एक संत लॉरेन्टियस भी थे.

कहा जाता है कि 10 अगस्त को इस संत को मारने के लिए उन्हें ज़िंदा आग के ऊपर रख दिया गया था. भूमध्यसागरीय इलाक़ों में प्रचलित लोककथाओं की मानें तो साल के इस दौरान दिखने वाले उल्का पिंड उसी आग के निशान हैं जो आसमान में बिखरते दिखते हैं.

लेकिन रोमन से पहले पर्शिया, बेबीलोन, मिस्र, कोरिया और जापान में ऐसे सही खगोलीय रिकॉर्ड मिले हैं जो उल्का पिंडों की बौछार के बारे में विस्तार से बताते हैं.

माना जाता है कि परसिड्स के नज़ारे का सबसे पहला उल्लेख चीन के हान राजवंश के दौर में मिलता है. 36 ईस्वी के उस दौर खगोल शास्त्रियों ने लिखा था कि पूरी रात आकाश में "सौ से अधिक उल्का पिंड देखे गए थे."

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