कोरोना संक्रमण का तेज़ी से बढ़ता ग्राफ़, क्या वैक्सीन से ही काबू होगी महामारी

  • मानसी दाश
  • बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस
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भारत में 30 जनवरी 2020 को कोरोना संक्रमण का पहला मामला दर्ज किया गया. मामले धीरे-धीरे बढ़े और मई के आख़िर तक रोज़ाना आठ हज़ार मामले दर्ज किए जाने लगे.

संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए सरकार ने टेस्टिंग बढ़ाई और जुलाई महीना ख़त्म होते-होते रोज़ाना पचास हज़ार से अधिक मामले दर्ज किए जाने लगे.

अगस्त में रोज़ाना दर्ज हो रहे कोरोना पॉज़िटिव मामलों के नए रिकॉर्ड बनने लगे और हर रोज़ संक्रमितों का आंकड़ा साठ हज़ार से ऊपर रहने लगा.

लेकिन क्या इस स्थिति से डरने की ज़रूरत है? और इस पर काबू कैसे पाया जाए?

भारत में तेज़ी से बढ़ा संक्रमण का ग्राफ़

भारत में कोरोना संक्रमण के रोज़ाना आ रहे आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि अगस्त के महीने में कोरोना से बुरी तरह प्रभावित अमरीका और ब्राज़ील से भारत एक कदम आगे निकल चुका है.

भारत में छह अगस्त को संक्रमण के 62,170 मामले, सात को 61,455 मामले, 11 अगस्त को 61,252, 12 अगस्त को 67,066, 13 को 64,124 और 15 अगस्त को 63,989 नए मामले दर्ज किए गए.

अमरीका में अगस्त छह को संक्रमण के 58,710, सात को 63,246 मामले, आठ को 56,071 और नौ को 47,849, दस को 40,171 और पंद्रह को 53,523 नए मामले सामने आए.

वहीं कोरोना के लिए बड़ी संख्या में हो रही मौतों के लिए लगातार चर्चा में रहे ब्राज़ील में अगस्त छह को संक्रमण के 54,801, सात को 49,502 मामले, आठ को 46,305, नौ को 22,213, दस को 22,048 और पंद्रह को 38,937 नए मामले सामने आए थे.

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भारत सरकार लगातार टेस्टिंग की संख्या बढ़ा रही है

अमरीका और ब्राज़ील को पीछे छोड़ चुका है भारत

इंडियन मेडिकल सोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर राजन शर्मा कहते हैं, “हमने बिना लक्षण वाले मामलों की पहचान कर उन्हें आइसोलेट करने के लिए टेस्टिंग को बढ़ाया है, तो मामले अधिक आएंगे ही. लेकिन देश में रिकवरी रेट अब अधिक है और डेथ रेट कम है.”

वो कहते हैं, “कोरोना महामारी ने अच्छे से अच्छे और मेडिकली एडवांस्ड देशों को भी अपने घुटनों पर ला दिया है. मुझे लगता है कि इस मामले में फिलहाल भारत बेहतर स्थिति में है. आपको समझना होगा कि अब हम कोविड-19 बीमारी के इलाज के बारे कुछ जानकारी रखते हैं जो पहले हमारे पास नहीं थी. अब हमारे पास इलाज के प्रोटोकॉल हैं जिनका हम पालन कर सकते हैं.”

हालांकि देश के पूर्व डॉयरेक्टर जनरल ऑफ़ हेल्थ सर्विसेज़ डॉक्टर जगदीश प्रसाद इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते. वो कहते हैं कि आंकड़े सही तस्वीर पेश नहीं कर रहे.

वो कहते हैं, “अभी संक्रमण के जितने मामले हैं असल में मामले उससे कम से कम पांच गुना होंगे. हमारा फोकस लक्षण वाले मामलों की टेस्टिंग है और लगभग 85 फीसदी मामलों में लक्षण नहीं दिखते.”

हाल में आईसीएमआर के निदेशक डॉक्टर रमन गंगाखेडकर ने भी कहा था कि भारत में लगभग 85 फीसदी मामले ऐसे हैं जिनमें लक्षण नहीं दिखते.

जहां तक महामारी के शुरुआती दौर की बात है बिना लक्षण वाले मामलों की टेस्टिंग की नहीं जा रही थी.

महामारी का पीक और टेस्टिंग

संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच एक तरफ सरकार ने जून के पहले सप्ताह से अर्थव्यवस्था को फिर से चालू करने के लिए अनलॉक के पहले चरण की घोषणा की तो दूसरी तरफ संक्रमण की बढ़ती रफ़्तार पर रोक लगाने के लिए टेस्टिंग बढ़ाने का फ़ैसला किया.

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जहां एक तरफ टेस्ट की संख्या बढ़ी वहीं रिकवरी रेट में भी बढ़ोतरी दर्ज की जाने लगी.

मई के आख़िर में देश में रोज़ाना क़रीब सवा लाख टेस्ट किए जा रहे थे और इस दौरान रिकवरी रेट 47.40 था. वहीं अगस्त में रोज़ सवा सात लाख तक टेस्ट हो रहे थे.

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कोरोना संक्रमण के अधिकतर मामलों में लक्षण दिखाई नहीं देते

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पहले कहा जा रहा था कि कोरोना का पीक जुलाई में आएगा, उसके बाद कहा गया कि कोरोना का पीक शायद अगस्त के मध्य या फिर सितंबर में आएगा. लेकिन संक्रमण के लगातार बढ़ते मामलों के बीच अब तक सरकार ने इसके बारे में कुछ नहीं कहा है. लेकिन अब जब रोज़ाना साठ हज़ार से अधिक मामले रोज़ाना दर्ज किए जा रहे हैं तो क्या हम कह सकते हैं कि ये कोरोना का पीक है?

डॉक्टर राजन शर्मा कहते हैं कि हर महामारी का पीक होता है तो ये कहा नहीं जा सकता कि इसका पीक नहीं आएगा. वो कहते हैं, “अब तक मुंबई, बंगलुरु जैसे शहरी केंद्रों में कोरोना का एक तरह से पीक दिख रहा था लेकिन अब वहां स्टैबिलिटी आ रही है. लेकिन छोटे इलाक़ों में संक्रमण के मामले अब बढ़ने लगे हैं.”

वो समझाते हैं कि “वायरस की लहर आती-जाती रहती है बस इसका असर कम या अधिक हो सकता है, ठीक वैसे जैसे डेंगू और स्वाइन फ्लू अपने सीज़न में आते हैं और फिर अपने आप कम भी होने लगते हैं.”

वहीं डॉ. जगदीश प्रसाद कहते हैं कि कोरोना का पीक आना अभी बाक़ी है और जिन इलाक़ों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर नहीं हैं वहां मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

तो क्या अब उम्मीद केवल वैक्सीन से है?

कोरोना वायरस से निपटने के लिए कई देशों में वैक्सीन बनाने का काम चल रहा है. रूस ने इस दावे के साथ अपनी वैक्सीन दुनिया के सामने पेश कर दी है कि ये पूरी तरह असरदार है. वहीं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, चीन और भारत में कई कंपनियां भी कोरोना वैक्सीन का ट्रायल कर रही हैं.

आईसीएमआर के मुताबिक़ भारत में तीन कोरोना वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है, जिनमें ज़ायडस कैडिला, भारत बायोटेक और ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन का ट्रायल शामिल है.

लेकिन मुद्दे की बात ये है कि कोरोना महामारी पर लगाम लगाने के लिए कम वक्त में इसकी वैक्सीन बनाने की तैयारी हो रही है, क्या जल्दबाज़ी में बनी वैक्सीन कामयाब हो सकेगी?

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पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया से जुड़े एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉक्टर हिमांशु नेगांधी कहते हैं, “वैक्सीन एक पूरी प्रक्रिया से हो कर गुज़रती है इसलिए कम समय में बनने पर भी वो कारगर हो सकती है. अगर वैक्सीन आगे चल कर इंसान के शरीर में इम्यूनोजेनेसिटी (बीमारी से लड़ने की शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मज़बूत करना) नहीं बढ़ा पाती तो हम उसे वैक्सीन नहीं मानते.”

वो कहते हैं, “अहम बात ये भी है कि शरीर पर वैक्सीन का असर कितने वक्त के लिए रहेगा इस पर अभी पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.”

वो कहते हैं कि जब कोई महामारी बड़े पैमाने पर फैलती है तो उस पर रोक लगाने के लिए वैक्सीन पर उम्मीद लगाना महत्वपूर्ण हो जाता है.

हालांकि वो ये भी कहते हैं, “लेकिन मुझे नहीं लगता कि वैक्सीन आएगी तो हमें सुरक्षा के सभी कदमों का पालन करना छोड़ कर निश्चिंत हो जाना चाहिए. आप ये मान कर चलें कि आगे भी हमें सभी तरह के एहतियाती कदमों को मानना पड़ेगा.”

वहीं डॉक्टर जगदीश प्रसाद कहते हैं, “वैक्सीन के मामले में सबसे पहले ये सुनिश्चित करना होगा कि वो सभी के लिए सुरक्षित”

“वैक्सीन अपनी जगह है लेकिन हमें जागरुकता बढ़ाने की ज़रूरत है और सभी सुरक्षात्मक कदमों का पालन करने की ज़रूरत है.”

वहीं डॉक्टर राजन शर्मा कहते हैं, “वायरस जाएगा नहीं, बस ये कम असरदार या अधिक असरदार हो जाएगा. बेहतर यही है कि लोग कोरोना को एक बीमारी की तरह समझना शुरू करें और सावधानी बरतें.”

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