मोदी सरकार बिना संसद चलाए देश कैसे चला रही है? - पूर्व जज जस्टिस एपी शाह

  • तेजस वैद्य
  • बीबीसी संवाददाता
संसद

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"कोविड महामारी के समय हमारी संसद न सिर्फ़ बंद रही बल्कि उसने लोगों का नेतृत्व भी नहीं किया. मनमाने तरीक़े से काम करने की सरकार को अब छूट मिल गई है. उनके ख़िलाफ़ सवाल उठाने का कोई भी संस्थागत तरीक़ा अब नहीं बचा है."

ये कहना है पूर्व जज जस्टिस एपी शाह का जिन्होंने रविवार यानी 16 अगस्त से शुरू हुए छह दिवसीय जनता संसद में ये बातें कही.

देश के कई सामाजिक संगठनों और एकेडमिशियन ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया है. इसमें लोग ऑनलाइन हिस्सा ले सकते हैं.

कोरोना महामारी की वजह से संसद के बजट सत्र की अवधि कम कर दी गई है. संसदीय समिति दो महीने से काम नहीं कर रही और संसद का मॉनसून सत्र भी जुलाई के मध्य से शुरू होना चाहिए था लेकिन नहीं हो सका है.

इस कार्यक्रम के आयोजकों का मानना है कि कोरोना महामारी की वजह से चूंकि संसद नहीं चल रही है इसलिए सरकार से जवाबदेही मांगना कठिन हो गया है. इस मक़सद से ही वर्चुअल जनता संसद का आयोजन किया गया है.

जनता संसद के उद्घाटन सत्र में जस्टिस एपी शाह, सामाजिक कार्यकर्ता सैयदा हमीद, सोनी सोरी और गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवानी ने हिस्सा लिया.

ऑनलाइन क्यों नहीं चल सकती संसद?

जस्टिस एपी शाह ने इस मौक़े पर कहा, "संसद का बजट सत्र जनवरी में हुआ था. उसके बाद कोविड के कारण यह फ़ैसला लिया गया कि संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जाएगा लेकिन इस संकट के वक़्त भी कई दूसरे देशों में हमने संसद को काम करते देखा है. कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों की संसद ने अपने काम करने के तरीक़ों में बदलाव करते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंस के ज़रिए सत्र आयोजित किए हैं. कुछ देशों में इंटरनेट के माध्यम से वोट करके यह भी निश्चित किया गया है कि संसद की कार्यवाही चलती रहे."

"फ़्रांस, इटली, और चिली जैसे देशों में संसद की कार्यवाही चलाई गई है. स्पेन जैसा देश जहाँ पर महामारी का असर ज़्यादा है, वहाँ संसद की कार्यवाही जारी है. मालदीव में एक सॉफ़्टवेयर की मदद से वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग कर संसद का काम चल रहा है. वहाँ के स्पीकर ने कहा है कि संसद अपने लोगों का प्रतिनिधित्व करना कभी ख़त्म नहीं कर सकती फिर चाहे महामारी का वक़्त ही क्यों न हो."

जस्टिस एपी शाह ने आगे कहा, "लेकिन इस तरह की सोच हमारे सांसदों में नहीं दिखाई पड़ रही है. मार्च के बाद से संसद को बंद रखने का जो निर्णय लिया गया था वो अभी तक जारी रखा गया है. आतंकी हमला हो या फिर जंग का वक़्त संसद की कार्यवाही चलती रही है. 2001 में हुए हमले के वक्त भी अगले ही दिन संसद की कार्यवाही चली थी."

"ऐसा नहीं है कि भारत के अंदर इंटरनेट की मदद से संसद काम नहीं कर सकती है. यहाँ भी सांसद मिलकर ऑनलाइन संसद की कार्यवाही चला सकते हैं. यह समझना ज़रूरी है कि इसमें राज्यों के अलग-अलग हिस्सों की क्या भूमिका है. भारत की संविधान सभा जिसने संविधान बनाया था, उसे डर था कि सरकार को सारी ताक़त दे दी जाए तो वो एक तानाशाह के रूप में तब्दील हो जाएगी. इसलिए इस तरह की व्यवस्था बनाई गई कि सरकार, संसद के प्रति जवाबदेह होगी."

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सरकार पर मनमानी का आरोप

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अपने संबोधन में जस्टिस एपी शाह ने आगे कहा, "इस तरह की संसदीय जवाबदेही की वजह से ही इंदिरा गांधी को 1977 में सत्ता छोड़कर जाना पड़ा था. संसद में जो सवाल पूछे जाते हैं, वो जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन कोविड महामारी के समय हमारी संसद न सिर्फ बंद रही बल्कि लोगों की अगुवाई भी नहीं कर पाई. मनमाने तरीके से काम करने की सरकार को अब छूट मिली हुई है. उसके ख़िलाफ़ सवाल उठाने का कोई भी संस्थागत तरीका अब नहीं है."

आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने भी इस मौके पर सरकार पर मनमाने तरीके से काम करने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, "ऑनलाइन शिक्षा की बात की जा रही है लेकिन हमारे आदिवासी इलाक़ों में यह कैसे सभंव होगा जब वहाँ इंटरनेट उपलब्ध ही नहीं. कोरोना महामारी की आड़ में सरकार मनमाना रवैया अपना रही है और हमसे जल, ज़मीन और जंगल का अधिकार छीन रही है."

गुजरात के वडगाम के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि गुजरात की तर्ज पर ही नरेंद्र मोदी ने देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था को धक्का पहुँचाया है.

उन्होंने जस्टिस एपी शाह की बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हुए कहा, "कोरोना महामारी के दौरान सरकार को ज़्यादा जवाबदेह होना चाहिए था. उससे ज़्यादा सवाल पूछे जाने चाहिए थे. संसद और विधानसभाओं में ज़्यादा विमर्श होना चाहिए था लेकिन संसद और विधानसभाएँ ही नहीं चल रही हैं. लोकतंत्र के दरवाज़े बंद कर दिए गए हैं."

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संस्थाओं को कमज़ोर करने की कोशिश

जस्टिस एपी शाह ने सरकार को जवाबदेह बनाने वाली दूसरी संस्थाओं का भी ज़िक्र किया और आरोप लगाया कि उन्हें धीरे-धीरे कमज़ोर बना दिया गया है.

उन्होंने कहा, "मीडिया, नागरिक समाज और ग़ैर-सरकारी संगठन जैसी संस्थाएँ सरकार की जवाबदेही तय करने में मदद करती है लेकिन दुर्भाग्यवश इन सभी संस्थानों को कमज़ोर बना दिया गया है. 2014 के बाद से इन संस्थानों को कमज़ोर बनाने की हर तरह की कोशिश की गई है. ये कोशिशें इंदिरा गांधी की सरकार के समय इन्हें कमज़ोर करने की कोशिशों से अलग नहीं हैं. सरकार की जवाबदेही कम होने से उसकी ताक़त काफी बढ़ गई है."

योजना आयोग की पूर्व सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता सैयदा हमीद ने इस मौके पर कहा, "न सिर्फ मुसलमान बल्कि हर अल्पसंख्यक को यह एहसास दिलाया जा रहा है कि वे इस देश में दूसरे दर्जे के नागरिक हैं."

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कमज़ोर होता लोकतंत्र

जस्टिस एपी शाह ने मानवाधिकार आयोग, सूचना आयोग और न्यायपालिका के प्रभावहीन होने का आरोप लगाते हुए इस पर अपनी चिंता व्यक्त की.

उन्होंने कहा, "न्यायपालिका बहुत कमज़ोर दिखाई पड़ रही है. काफी सारे अहम मुद्दे न्यायपालिका को निपटाने चाहिए थे. नागरिकता संशोधन क़ानून, कश्मीर में इंटरनेट की उपलब्धता और जम्मू-कश्मीर के हालात को लेकर कई मामले न्यायालय में लंबे समय से पड़े हुए हैं. उन्हें सुना नहीं जा रहा. ऐसी और भी कई ज़िम्मेदारियाँ हैं जो न्यायपालिका को निभानी चाहिए थी लेकिन उसने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई. लोकपाल के गठन के बाद लोकपाल में क्या हो रहा है, हमें कुछ पता नहीं है. मानवाधिकार आयोग भी लंबे समय से सक्रिय नहीं दिख रहा है. सूचना आयोग गैर-प्रभावी ढंग से काम कर रहा है."

उन्होंने ऐसे हालात में मीडिया, नागरिक समाज और विश्वविद्यालय से उम्मीद करते हुए कहा कि ऐसे हालात में ये ही ऐसी संस्थाएँ हैं जो सरकार की जवाबदेही तय कर सकती हैं. हालांकि उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं और छात्रों पर दंगा भड़काने का आरोप लगाया जा रहा है.

उन्होंने कहा "भारत की मीडिया बहुत पहले बंट चुकी थी और अब कश्मीर में जो नई मीडिया नीति लाई गई है, उसकी वजह से थोड़ी बहुत बची हुई मीडिया थी, वो भी मर रही है. नागरिक समाज की आवाज़ को धीरे-धीरे दबाया जा रहा है."

"सरकार की रणनीति ये है कि कोई संस्थान जो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती है, उसकी आवाज़ को दबा दिया जाए. इस तरह अगर हर संस्था को कमज़ोर बना दिया जाए तो लोकतंत्र बहुत कमज़ोर पड़ जाता है. लोकतंत्र ऐसे ही मरता है."

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