शाहीन बाग़ को लेकर 'आप' के आरोप को बीजेपी ने किया खारिज

बीजेपी में शामिल होते शाहीम बाग़ आंदोलन से जुड़े लोग

इमेज स्रोत, Nighat Abbas @twitter

दिल्ली के शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (सीएए और एनआरसी) के ख़िलाफ़ कथित रूप से प्रदर्शन करने वाले कुछ मुसलमान युवाओं के बीजेपी में शामिल होने के बाद दिल्ली की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है.

बीते रविवार शहजाद अली, डॉ. महरीन और तबस्सुम हुसैन समेत कई लोगों ने बीजेपी की सदस्यता ले ली है.

इसके बाद से दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को लेकर बीजेपी को घेरती दिख रही है.

सोमवार दोपहर आम आदमी पार्टी ने शाहीन बाग़ इलाक़े में लंबे समय तक चले इस विरोध प्रदर्शन को बीजेपी द्वारा प्रायोजित करार दिया है.

वहीं, बीजेपी ने कहा है कि जो मुसलमानों को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे वो लोग इस बात से परेशान हैं.

आख़िर क्या है मामला?

आम आदमी पार्टी नेता और विधायक सौरभ भारद्वाज ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से शाहीन बाग़ से कथित रूप से जुड़े लोगों के बीजेपी में शामिल होने पर सवाल उठाए हैं.

नागरिकता संशोधन क़ानून पास होने के बाद महिलाओं ने देश के कई हिस्सों में इस क़ानून का विरोध किया था. दिल्ली का शाहीन बाग़ भी ऐसा ही इलाक़ा था जहां महिलाओं ने खुलकर इस क़ानून का विरोध किया था.

आम आदमी पार्टी का स्पष्ट रुख़ ये है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस आंदोलन को पीछे से समर्थन दिया था.

सौरभ भारद्वाज के हवाले से पार्टी के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा गया है, “दिल्ली पुलिस किसान, डॉक्टर्स, विकलांगों के विरोध प्रदर्शन 3 घंटे से ज्यादा बर्दाश्त नहीं करती लेकिन शाहीन बाग प्रोटेस्ट 101 दिन तक चला. पुलिस ने इसे हटाने की कोशिश नहीं की बल्कि इसे बचाने के लिए आस-पास की कई रोड को बंद कर दिया.”

“आप सब सोचें कि आखिर शाहीन बाग़ के मुद्दे से किस राजनीतिक दल को फायदा हुआ. भाजपा ने दिल्ली चुनाव में शाहीन बाग़ की वजह से ही हिन्दू-मुस्लिमों में खाई पैदा कर नार्थ-ईस्ट की कुछ सीटें जीती. दिल्ली में भाजपा शाहीन बाग़ के मुद्दे पर पर चढ़कर 18 फीसदी से 38 फीसदी पर पहुँची, लेकिन भाजपा चुनाव नहीं जीत सकी तो भाजपा ने दिल्ली में दंगे कराए.”

आंदोलन से जुड़े लोगों ने की निंदा

इस मामले में बीबीसी ने शाहीन बाग़ आंदोलन में हिस्सा लेने वाले लोगों से बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की है.

इस आंदोलन में शामिल होने वाले कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट तौर पर कहा कि चूंकि शाहीन बाग़ आंदोलन बिना किसी नेता के किया गया था, ऐसे में ये वे जो भी कह रहे हैं, वो उनकी व्यक्तिगत राय है.

शाहीन बाग़ आंदोलन से जुड़ीं एक कार्यकर्ता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि बीजेपी में कुछ लोगों के शामिल होने को शाहीन बाग़ आंदोलन से जोड़ा जाना बिलकुल ग़लत है.

वे कहती हैं, “हमने कभी किसी शहज़ाद अली का नाम शाहीन बाग़ में नहीं सुना. वहां कई लोग आते थे, वो भी वहां आते होंगे शायद...अब ये लोग किस पार्टी में जाते हैं, क्या करते हैं, ये उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी है और उनके निजी फ़ैसले हैं. इसे शाहीन बाग़ आंदोलन से जोड़ा जाना बेहद ग़लत है.”

सोशल मीडिया पर ये ख़बर फैलने के बाद आम आदमी पार्टी समेत ने शाहीन बाग़ को बीजेपी प्रायोजित आंदोलन कहना शुरू कर दिया है.

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हालांकि ये महिला कार्यकर्ता इस तरह की लेबलिंग को सिरे से खारिज करती हैं.

वे कहती हैं, “लोग तमाम तरह की बातें कह रहे हैं. कि ये आंदोलन प्रायोजित था – आयोजित था. मैं पूछना चाहती हूं कि आयोजन किस चीज़ का होता है? आयोजन कार्यक्रमों, सम्मेलनों आदि का होता है. आंदोलन अपने आप शुरू होते हैं जैसे कि शाहीन बाग़ आंदोलन शुरू हुआ था. वहां सभी कार्यकर्ता थे और सभी लोग आयोजक. ऐसे में इसे किसी पार्टी के साथ जोड़कर देखा जाना ग़लत है.”

इस आंदोलन में हिस्सा लेने वाली एक अन्य कार्यकर्ता भी आम आदमी पार्टी के इस आरोप को बिलकुल ग़लत बताती हैं.

नाम न बताने की शर्त पर उन्होंने कहा “हम महिलाओं ने वहां बैठकर आम आदमी की आवाज़ को उठाया था. ये आंदोलन बीजेपी का नहीं था और जो व्यक्ति ये कह रहा है कि शाहीन बाग़ ने बीजेपी को समर्थन कर दिया है तो उसे हमने कभी शाहीन बाग़ में देखा ही नहीं है.”

बीजेपी ने क्या दिया जवाब?

इस मुद्दे पर दिल्ली बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष मनोज तिवारी ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से टिप्पणी की है और लिखा है कि केजरीवाल लोगों को बांटना बंद करें.

उन्होंने लिखा, बांटना बंद कीजिए अरविंद केजरीवाल जी, विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी सभी धर्मों का प्रतिनिधित्व करती है और धर्म, जाति, पंथ या वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करती.

दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष आदेश गुप्त ने बीबीसी से कहा, "जिन लोगों की राजनीतिक दुकानें बंद हो गई हैं और जो लोग मुसलमानों को अपने वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, मुसलमानों को गुमराह कर रहे थे, आज वही लोग परेशान हो रहे हैं. क्योंकि उनकी राजनीति उन्हीं के बल पर चल रही थी."

"आज जो लोग बीजेपी में शामिल हो गए हैं, उन्हें ये अहसास हुआ है कि सीएए क़ानून से हिंदुस्तान के मुसलमानों को कोई नुक़सान नहीं हो रहा है. मोदी जी ने मुसलमान महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में शामिल करके तीन तलाक़ क़ानून को पारित किया. अब तक वोट बैंक की राजनीति की ख़ातिर मुस्लिम महिलाओं का दर्द नहीं समझा गया था."

बीबीसी ने आदेश गुप्त से ये सवाल किया कि आंदोलन के दौरान बीजेपी नेताओं ने कहा था कि शाहीन बाग़ वालों को सज़ा देनी चाहिए, लेकिन अब उन्हें पार्टी में शामिल किया जा रहा है, ऐसा कर के पार्टी का क्या संकेत दे ही है?

इसके जवाब में आदेश गुप्त कहते हैं, "वे स्वयं आए हैं क्योंकि उन्हें अहसास हुआ है कि कुछ लोग उन्हें गुमराह कर रहे थे. उन्हें समझ आ गया है कि इस क़ानून से हिंदुस्तान के मुसलमानों का कोई नुक़सान नहीं हो रहा है. इनके बीजेपी में शामिल होने से उनका एजेंडा ही ख़त्म हो जाएगा इसलिए उन लोगों को दर्द हो रहा है."

लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यूनिवर्सिटी की प्रोफे़सर जी अरुणिमा ने सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी के बयान की निंदा की है.

वे लिखती हैं, “आम आदमी पार्टी का ग़ैरज़िम्मेदाराना बयान शाहीन बाग़ की महिलाओं द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से किए गए विरोध प्रदर्शन को कमज़ोर करता है. ये सीएए, एनआरसी, और एनपीआर के ख़तरों से जुड़े अहम राजनीतिक सवालों को भी कमज़ोर करता है.ये दिखाता है कि आप कितने अविश्वसनीय हैं.”

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