बिहार बाढ़: 'पहले कोरोना देखें या फिर अपनी जान बचाएं'

  • प्रियंका दुबे
  • बीबीसी संवाददाता, बिहार के समस्तीपुर से
बिहार बाढ़, समस्तीपुर

बिहार के समस्तीपुर ज़िले के सैदपुर की मुख्य सड़क से भीतर प्रवेश करने पर आगे एक ऐसा बिंदु आता है जहां से आगे बागमती नदी में आई बाढ़ का पानी सड़क और पास ही खड़े आम के बगीचों में फैला हुआ है.

यहीं एक सूखे बचे हिस्से से निकलने वाली एक कच्ची पगडंडी आपको सैदपुर ग्राम पंचायत के राजकीय बुनियादी विद्यालय की ओर ले जाएगी.

बिहार के समस्तीपुर ज़िले के कल्याणपुर ब्लॉक में पड़ने वाले इस स्कूल का आहता एक विशालकाय नीम के पेड़ से शुरू होता है.

उस नीम के पेड़ पर बने ऊँचे चबूतरे पर खड़े होकर जब मैंने देखा, तो चारों तरफ़ बांस के सहारे टिकी काली-सफ़ेद पन्नियों से बनी तिरपालों वाली अस्थायी झुग्गियों की लम्बी क़तारें नज़र आईं यह बाढ़ पीड़ितों के लिए स्थानीय स्तर पर चलाया जा रहा एक राहत शिविर है.

बागमती के शरणर्थी

चबूतरे पर खड़े-खड़े मैं पल भर के लिए ठिठक गई. मेरे सामने जो था वो मेरे लिए चौंकने वाला दृश्य था.

मेरी पीढ़ी के लोग विभाजन की विभीषिकाओं और शरणार्थी कैम्पों के बारे कई वृतांत पढ़ते-सुनते हुए बड़े हुए हैं. फिर नब्बे के दशक में कश्मीरी पंडितों के रहने के लिए जम्मू में बनवाए गए शरणार्थी कैम्पों के बारे में भी पढ़ा-सुना था. लेकिन नब्बे का दशक मेरे जीवन का भी पहला दशक था इसलिए अपनी आंखों से देखा कुछ भी नहीं था.

लेकिन आज इस चबूतरे पर खड़े हुए जहां तक देख पा रही थी - वहां तक लोग तिरपाल की झुग्गियों में रहने को मजबूर थे. पूछने पर मालूम हुआ कि पंद्रह दिन पहले तक यहाँ तक़रीबन 4,000 बाढ़ प्रभावित लोग रह रहे थे.

बीते हफ़्ते कुछ बाढ़ प्रभावित गाँवों में बागमती का पानी थोड़ा उतरा है तो कई परिवार बाढ़ में टूटे अपने घरों को सुधारने, कीचड़ साफ़ करने और साँपों को भगा कर वापस रहना शुरू करने की कोशिश में वापस चले गए हैं. लेकिन इसके बाद भी फ़िलहाल इस राहत शिविर में 7 गांवों के 2,000 से ऊपर लोग रह रहे हैं.

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राहत शिविर में रहने वाले जगदीश राय बताते हैं, "अभी यहां समस्तीपुर के परसारा, तकिया, कनुआ, सौऊरी, सेमरी और सैदपुर गाँव के लोग रह रहे हैं. साथ ही मुज़फ़्फ़रपुर के खड़कपुर गाँव के बाढ़ प्रभावित भी यहीं हैं. सभी के घरों में बागमती की बाढ़ का पानी घुसा हुआ है. अब पानी कब उतरेगा और कितने दिन और यहाँ रहना पड़ेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता".

उस चबूतरे से पूरे राहत शिविर का एक 180 डिग्री का दृश्य नज़र आता था. चारों ओर काली-सफ़ेद तिरपालों के टेंट और उनके सामने बंधे किसानों के मवेशी. टेन्टों के सामने ऊँघते, सोते या बातें करते हुए लोग.

खुले घूमते मवेशियों से भरे हुए रास्तों के बीच पानी की कुप्पे भर कर अपनी झोपड़ियों में ले जाती महिलाएँ. चारों तरफ़ फैली गंदगी, गोबर और इसी गंदगी और कीचड़ के ऊपर सूखते बाढ़ पीड़ितों के कपड़े.

इसी बीच बरसात के यह मुश्किल दिन काटने के लिए बाढ़ पीड़ितों के बच्चे स्कूल के पोखर में मछली मारने में व्यस्त थे. वहीं दूसरी ओर कीचड़ के बीच ज़मीन के एक छोटे से सूखे टुकड़े पर बैठ कर बतियाती तीन महिलाओं के चेहरे की पथरीली उदासी को देखकर न जाने क्यों मुझे अमृता शेरगिल के प्रसिद्ध चित्र 'थ्री विमन' की याद आ गई.

सवाल यह था कि यह ग्रामीण घर और खलिहान तक फैले हुए अपने पूरे जीवन को समेट कर एक चार कदम जितनी लम्बी तिरपाल की झुग्गी में कैसे समेट सकते थे?

ज़ाहिर है, सभी की घर-गृहस्थी बागमती के पानी के साथ बह गई थी. कुछ के पशु भी डूब गए थे. यहां तक पहुँचे लोग बड़ी मुश्किल से ख़ुद को अपने-अपने मवशियों को ज़िंदा बचा कर निकल पाए थे.

यहां झुग्गियाँ तानने के बाद कच्चे चूल्हे बनाए गए और रोज़ की लकड़ी जुटा कर रोज़ के ईंधन का प्रबंध किया जाने लगा.

बिहार में बाढ़ की विभीषिका का जो वर्णन हम बिहार के साहित्यकारों की कविताओं और उपन्यासों में पढ़ते रहे हैं - वह विभीषिका असल जीवन में कितनी क्रूर, निर्दयी और दुरूह हो सकती थी, उसे सिर्फ़ इस राहत शिविर के बीच खड़े होकर ही महसूस किया जा सकता है.

ऐसे भारतीय नागरिकों की आंखों में झांक कर जो अपना सब कुछ एक गरजती-उफनती नदी में बह जाते हुए देखने के बाद पेड़ों के नीचे फिर से ख़ाली हाथ जीवन शुरू करने को विवश हैं.

इसी सोच में गुम थी कि साऊरी गाँव की निवासी 68 वर्षीय जमुना देवी ने मुझे अपनी तिरपाल दिखाते हुए कहा, "हम मुसहर हरिजन हैं. पहले ही बहुत कठिनाई में रहते थे और अब बाढ़ की वजह से सब कुछ तहस-नहस हो गया है. गांव में हमारे पूरे टोले में इतना-इतना (कमर तक इशारा करते हुए) पानी भर गया था. जो भी दो हाथों में अट सका, वो लेकर हम शाम तक ही यहाँ भाग आए."

"अब यहां रहते-रहते बीस दिन हो गए. एक तिरपाल मिली है और दिन में एक वक़्त खिचड़ी मिल जाती है, बस. शौच खुले में जाना पड़ता है. नहाने धोने के लिए कोई जगह नहीं हैं."

"दो चापाकल हैं लेकिन हज़ारों की भीड़ में दो चापाकल से क्या होता है? कुछ लोग पड़ोस के गाँव से पानी भर के लाते हैं तो कुछ पोखर का पानी पका के इस्तेमाल करते हैं".

कोरोना: हर जगह पानी भरा हुआ है तो दूरी कैसे बनाएँ?

बिहार में लगातार बढ़ रहे कोरोना के मामलों के मद्देनज़र मैं इस यात्रा के दौरान लगतार सभी से दो हाथ की दूरी बनाकर बात करने का निवेदन करती रही.

सैदपुर राहत शिविर में भी स्थानीय ग्रामीणों के घिरे होने पर जब मैं सभी से दूरी बांधकर बात करने के लिए कह रही थी तभी भीड़ से आई एक युवक की आवाज़ से मुझे चौंका दिया, "जब चारों तरफ़ बागमती का पानी भरा है तो दूरी बनाकर रहने के लिए हम लोग कहाँ जाएँगे?"

"जगह तो इतनी सी ही है- अपनी और मवेशियों की जान बचाकर यहां किसी तरह दिन गुज़ारें या कोरोना के चक्कर में पानी में जान ही गवां दें?"

चारों तरफ़ से पानी से घिरे बिहार के बाढ़ पीड़ित कोरोना के लिए ज़रूरी सोशल डिसटेंसिंग की एहतिहात कैसे बरकरार रख सकते थे?

युवक का यह चुभता हुआ सवाल एक क्षण में मेरे भीतर के शहरी को शर्मिंदा कर ग्रामीण जीवन की वास्तविक चुनौतियों से रूबरू करवा गया.

राहत शिविर में सामुदायिक भोजन

दोपहर 3.30 बजे राहत शिविर में खाना परोसा गया. आम के पेड़ों के एक कीचड़, बदबू और गंदगी से भरे बगीचे में दो पंगतों में बैठ बच्चे और बूढ़े काग़ज़ की पत्तलों में परोसी गई खिचड़ी का रहे थे.

पूरे इलाक़े में इस्तेमाल किए गए काग़ज़ के पत्तलों के ढेर बिखरे पड़े थे. पानी में सड़ते अनाज की दुर्गंध चारों ओर फैली हुई थी. गीली मिट्टी पर बैठ कर खिचड़ी खाते हुए भारत के इन बाढ़ पीड़ित नागरिकों को देखना एक पीड़ादायक और मार्मिक दृश्य का साक्षी होना था.

बाढ़ पीड़ित सतहू पासवान कहते हैं, "यहां लोगों की हालत ख़राब है. अभी तक हम लोगों को सरकार की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए जारी किया गया 6 हज़ार रुपया भी नहीं मिला है."

"सिर्फ़ एक वक़्त का खाना दिया जाता है. उसमें भी बीस दिन से रोज़ खिचड़ी ही दी जा रही है. एक दिन भी कुछ और नहीं बनाया गया. सिर्फ़ खिचड़ी खा कर कोई कब तक रह सकता है? दूसरे वक़्त के व्यवस्था हम लोग ख़ुद अपने टेन्ट में करते हैं".

समस्तीपुर के कलेक्टर शशांक शुभांकर बताते हैं कि उनके ज़िले में बाढ़ के टूटे तटबंधों के ऊपर 9 राहत शिविर चल रहे हैं जबकि ज़िले की कुल बाढ़ पीड़ित जनसंख्या ढाई लाख है.

वो कहते हैं, "सैदपुर में बाढ़ पीड़ितों को चापाकल, सामुदायिक रसोई, टोयलेट और टेन्ट उपलब्ध करवाए गए हैं. इसके अलावा 6 हज़ार रुपए की बाढ़ क्षतिपूर्ति राशि भी बाँटी जा रही है. प्रशासन आने वाले दिनों के लिए भी पूरी तरह तैयार है और जिन लोगों को भी राहत राशि नहीं मिल पाई है, उन्हें देने की प्रक्रिया चल रही है".

प्रशासन के दावों और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच मौजूद गहरे फ़ासले में ही शायद बिहार के बाढ़ पीड़ितों के जीवन का सच मौजूद है.

बिहार डायरी का चौथा पन्ना आज यहीं ख़त्म होता है.

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