तुर्की, भारत का दोस्त है या दुश्मन, पढ़िए पूरी कहानी

  • अपूर्व कृष्ण
  • बीबीसी संवाददाता
रेचेप तैय्यप अर्दोआन और नरेंद्र मोदी

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आमिर ख़ान के तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन की पत्नी से मुलाक़ात की तस्वीरें क्या आईं, एक हंगामा खड़ा हो गया.

सोशल मीडिया, टीवी, वेबसाइटों पर इन तस्वीरों की ख़ूब चर्चा हुई. उन सभी को अगर निचोड़कर कहा जाए तो समझ में ये आया - आमिर ख़ान तुर्की गए, इससे भारत के कई लोग नाराज़ हो गए हैं. पर क्यों?

जवाब शायद ये मिले - क्योंकि तुर्की पाकिस्तान का दोस्त है.

या जैसा कि बीजेपी के राज्य सभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि तुर्की 'ऐंटी-इंडिया' (भारत-विरोधी) है.

पर क्या ये दोनों बातें सही हैं?

तुर्की में भारत के राजदूत रहे राजनयिक एमके भद्रकुमार कहते हैं, "ये बिल्कुल बकवास बात है, जो भी ऐसा कह रहे हैं उन्हें तुर्की की कोई समझ नहीं है."

तो तुर्की भारत का दोस्त है या दुश्मन? इसे समझने के लिए दोनों के संबंधों के अतीत को खंगालना होगा.

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आमिर ख़ान के तुर्की जाने पर सोशल मीडिया पर चर्चा और सवाल

दोस्ती की पहली कोशिश

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1947 में भारत को आज़ादी मिली और पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शुरू से ही जिन देशों के साथ संबंधों को तरजीह देते थे, उनमें तुर्की भी शामिल था.

दिल्ली के जेएनयू विश्वविद्यालय में पश्चिम एशिया मामलों के अध्यापक प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि नेहरू दूसरे विश्वयुद्ध के ख़त्म होने के समय से ही चाहते थे कि तुर्की के साथ अच्छे संबंध बनाकर रखे जाएँ.

प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, "वहाँ मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने ऑटोमन सुल्तान को हटाकर एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य स्थापित किया था, और नेहरू इस बात से काफ़ी प्रभावित थे कि पहली बार इतना बड़ा मुस्लिम राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष देश बनने जा रहा है. वो चाहते थे कि भारत भी ऐसा ही मुल्क़ बने".

मगर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब दुनिया अमरीका और तत्कालीन सोवियत संघ की अगुआई वाले दो ध्रुवों में बँट गई और शीतयुद्ध का दौर शुरू हुआ तो तुर्की अमरीकी खेमे में चला गया और पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नेटो में शामिल हो गया. पाकिस्तान अमरीकी खेमे में शामिल हो गया.

भारत इससे निराश हुआ क्योंकि भारत शीतयुद्ध के दौर में तटस्थ रहा, उसने ना तो अमरीकी अगुआई वाली पश्चिमी ताक़तों का हाथ थामा, ना ही वो साम्यवादी सोवियत संघ की अगुआई वाले दूसरे गुट के झंडे तले गया.

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मुस्तफ़ा कमाल पाशा

शीतयुद्ध के दौर में बढ़ी दूरी

प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं, "नेहरू को इस बात से बहुत दुख हुआ कि हमारी कोशिश के बावजूद तुर्की अमरीका के साथ पश्चिमी देशों के साथ मिल गया."

तो शीतयुद्ध के दौर में भारत और तुर्की की दूरी बढ़ती चली गई. तुर्की अमरीका के क़रीब चला गया, भारत भी सोवियत संघ वाले खेमे में जाने का प्रयास करता हुआ उसके नज़दीक जाने लगा.

और इस दौरान दूसरी ओर तुर्की और पाकिस्तान दोस्त बनते चले गए. तुर्की ने पाकिस्तान की सैन्य मदद भी की. 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में तुर्की ने पाकिस्तान की काफ़ी सहायता की.

इसके बाद 1974 में तुर्की ने साइप्रस पर हमला कर दिया तो भारत और तुर्की के संबंध और बिगड़ते चले गए क्योंकि भारत ने साइप्रस का साथ दिया क्योंकि वहाँ के राष्ट्रपति आर्चबिशप मकारियोज़ नैम यानी गुटनिरपेक्ष आंदोलन के बड़े नेता थे.

प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं, "इंदिरा गांधी को इस बात से बहुत दुख हुआ कि तुर्की ने साइप्रस के एक हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया, इसके बाद उन्होंने गुटनिरपेक्ष नेताओं के साथ मिलकर तुर्की के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी की. इसके बाद और भी कई घटनाएँ हुईं जिसके बाद से दोनों देशों के बीच दूरी बढ़ती चली गई, और पाकिस्तान और तुर्की की नज़दीकी बढ़ती चली गई."

दोस्ती की दूसरी कोशिश

1984 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से तुर्की के साथ संबंधों को बेहतर करने की कई कोशिशें हुईं.

इसकी एक बड़ी वजह था कश्मीर का मुद्दा जो 80 के दशक के आख़िर में ज़ोर पकड़ने लगा था.

उस वक़्त मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी ने कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति की पड़ताल के लिए एक समूह बनाया था और तुर्की और सऊदी अरब जैसे देश उसमें काफ़ी सक्रियता दिखा रहे थे.

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2003 में तुर्की दौरे पर राष्ट्रपति अर्दोआन के साथ तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि उस वक़्त भारत को लगा कि तुर्की से क़रीबी काम आएगी, और रिश्ते बेहतर करने के इरादे से नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रधानमंत्रियों ने तुर्की का दौरा किया.

इसी तरह तुर्की के प्रधानमंत्री बुलंट येविट भी भारत गए और उन्होंने पाकिस्तान होते हुए भारत जाने से ये कहते हुए मना कर दिया कि पाकिस्तान के शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने लोकतांत्रिक सरकार का तख़्ता पलटा है. वो सीधे भारत आए.

1998 से 2001 तक तुर्की में भारत के राजदूत रहे एमके भद्रकुमार कहते हैं," मैं जब राजदूत था, तब संबंध बहुत अच्छे थे, वहाँ के प्रधानमंत्री भारत गए थे, उन्होंने भगवद् गीता और गीतांजलि का अनुवाद किया था."

प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं,"1990, 2001 के क़रीब लगने लगा था कि तुर्की अब पाकिस्तान को छोड़ भारत के क़रीब आ जाएगा, लेकिन 2002 में अर्दोआन की पार्टी इस्लाम के नाम पर सत्ता में आई तो परिस्थितियाँ बदलने लगीं".

अर्दोआन ने भी की कोशिश

इस्लामवाद को मुद्दा बनाकर सत्ता में आने वाली जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी या एके पार्टी के नेता रेचेप तैय्यप अर्दोआन तुर्की की उस पहचान को बदलने की कोशिश करने लगे जो पहचान अतातुर्क यानी मुस्तफ़ा जमाल पाशा ने बनाई थी.

यही नहीं, वो आहिस्ता-आहिस्ता तुर्की को मुस्लिम देशों का एक नेता और क्षेत्रीय शक्ति बनाने की भी कोशिश करने लगे. वे मुस्लिम समुदायों से जुड़े विवादास्पद मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने लगे जिनमें फ़लस्तीनी संकट और कश्मीर का मुद्दा भी शामिल थे.

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2017 में राष्ट्रपति अर्दोआन का स्वागत करते राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

अर्दोआन के शासन के दौरान भी भारत और तुर्की के रिश्तों को बेहतर करने की कोशिशें हुईं मगर प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि इसमें दो बड़ी समस्याएँ थीं.

पहली समस्या थी दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन की, जो भारत के पक्ष में था. यानी भारत सामान तुर्की को भेजता ज़्यादा था, तुर्की से मँगवाता कम था. तो तुर्की चाहता था कि इसे दुरूस्त किया जाए, भारत अपना आयात बढ़ाए, और साथ ही मध्य पूर्व में तुर्की के साथ मिलकर प्रोजेक्टों पर काम करे.

दूसरी समस्या ये थी कि तुर्की के पास अपना तेल-गैस नहीं है. इस वजह से वो न्यूक्लियर पावर या परमाणु बिजली बनाने की तैयारी करना चाहता था क्योंकि उनके यहाँ उसी तरह से थोरियम मौजूद है जिस तरह से भारत में केरल में पाया जाता है.

तो तुर्की चाहता था कि भारत उन्हें थोरियम से बिजली बनाने की तकनीक दे, मगर प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि भारत ने इससे इनकार कर दिया.

प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं,"अर्दोआन खुद आए थे दो बार दिल्ली, 2017 में और 2018 में, पर वो नाराज़ होकर चले गए कि भारत के साथ उम्मीद रखना बेकार है."

और इसके बाद से एक तरफ़ जहाँ भारत की नज़दीकी इसराइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमरीका जैसे देशों के साथ बढ़ती चली गई, वहीं तुर्की और दूर होता चला गया.

पूर्व राजदूत एमके भद्रकुमार कहते हैं,"भारत और तुर्की के संबंध सर्वोत्तम स्थिति में नहीं हैं. तुर्की के साथ हमारे रिश्तों को लेकर बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. हम इसराइल के साथ अपने संबंधों को लेकर जितने प्रयास कर रहे हैं, उससे ज़्यादा प्रयास तुर्की को लेकर करना चाहिए."

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कश्मीर का मामला

भारत और तुर्की के बीच एक और मुद्दे पर दोनों देशों के बीच कड़वाहट बढ़ी जब तुर्की में 2016-17 में बग़ावत हुई.

तुर्की ने इसके लिए अमरीका स्थित तुर्की के धार्मिक नेता फ़ेतुल्लाह गुलान के संगठन को ज़िम्मेदार बताया और आरोप लगाया कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए उनका इस्तेमाल कर तुर्की में तख़्तापलट करना चाहता है.

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रेचेप तैय्यप अर्दोआन के साथ इमरान ख़ान

गुलान मूवमेंट भारत में भी सक्रिय रहा है. और तब अर्दोआन ने भारत से उम्मीद की थी कि वो अपने यहाँ गुलान मूवमेंट के जो भी स्कूल हैं या दफ़्तर हैं, उन्हें बंद करवा दे.

प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं कि भारत ने उनकी बात मानी नहीं, तो वो भी कश्मीर का मुद्दा उठाने लगे.

दरअसल भारत से रिश्ते ना बनते देख तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने अपना ध्यान अब मुस्लिम देशों का नेता बनने पर लगा दिया है.

यही वजह है कि कभी वो क़तर की घेराबंदी पर सऊदी अरब को धमकाता है, तो कभी गज़ा पट्टी की घेराबंदी के दौरान वहाँ के फ़लस्तीनी लोगों की मदद के लिए जहाज़ से सहायता भेजता है, तो कभी वो हाविया सोफ़िया को मस्जिद बनाकर अपने आपको इस्लामी ताक़त बनाने की कोशिश कर रहा है, और कभी मुसलमानों के मानवाधिकारों के कथित दमन वाले मुद्दों को ज़ोर-शोर से उठाता है.

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कश्मीर पर बयान

इसी साल फ़रवरी में राष्ट्रपति अर्दोआन ने पाकिस्तानी संसद में कहा कि कश्मीर जितना अहम पाकिस्तान के लिए है उतना ही तुर्की के लिए भी है. उन्होंने पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महाधिवेशन में भी कश्मीर का मुद्दा उठाया था.

हालाँकि, पूर्व राजदूत एमके भद्रकुमार कहते हैं कि कश्मीर को लेकर भारत जिस तरह से तुर्की को पेश करना चाहता है वो सही नहीं है.

वो कहते हैं," हम चाहते हैं कि कश्मीर पर हमने जो किया उससे सारी दुनिया सहमत हो जाए, पर सच्चाई ये है कि ज़्यादातर देश इससे सहमत नहीं हैं, भले ही वो इसे मुद्दा ना बनाएँ, पर वो इससे सहमत नहीं हैं, पर इसका मतलब ये नहीं कि वो हमारे शत्रु हैं. हमारे ही देश में एक बहुत बड़ा तबक़ा है जो मानता है कि कश्मीर में सरकार ने जो किया वो सही नहीं था, तो क्या वो लोग भारत-विरोधी हो गए."

वहीं प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं कि तुर्की भले ही कश्मीर का मुद्दा उठाता है पर असलियत ये है कि वो पाकिस्तान की कोई ख़ास मदद नहीं कर रहे हैं , पर वो प्रोपेगेंडा करते रहे हैं कि हम कश्मीर को समर्थन देंगे.

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श्रेष्ठ बनने की होड़

पूर्व राजदूत एमके भद्रकुमार कहते हैं कि तुर्की से रिश्ते बिगड़ने की एक बड़ी वजह भारत की बदलती नीति है जिसे तुर्की स्वीकार नहीं कर पा रहा.

उन्होंने कहा,"तुर्की जैसे देशों को भारत से बहुत उम्मीदें रही हैं, क्योंकि वो एक दूसरे तरह के भारत के साथ डील करते रहे हैं, उन्होंने कभी भी इस तरह का भारत का अनुभव नहीं किया है जो अभी है, जिसमें भारत अपने आप को श्रेष्ठ मानकर बर्ताव करता है, वो इससे ख़ुश नहीं हैं."

तो तुर्की दोस्त है या दुश्मन, इसका जवाब शायद ये होगा कि दोनों ही देश फ़िलहाल अपनी-अपनी होड़ में लगे हैं, और दोनों ही एक-दूसरे को परेशान करने की कोशिश करते रहते हैं.

प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं कि जिस तरह से भारत बड़ी ताक़त बनने की कोशिश कर रहा है, वैसी ही कोशिश तुर्की भी कर रहा है.

वो कहते हैं," 1985 से पहले के जो पुराने घाव थे, उसे हम भी खुरच-खुरच कर उन्हें उकसा रहे हैं, और वो भी कश्मीर के मामले में 50-60-70 के दशक की नीति को दोहरा रहे हैं."

पूर्व राजदूत भद्रकुमार कहते हैं, ऐसे माहौल में आमिर ख़ान का तुर्की जाना तो अच्छी बात है, और एक संवेदनशील भारत को तो ऐेसे लोगों को अपना सांस्कृतिक दूत बनाकर पेश करना चाहिए, ना कि उनपर हमले करना चाहिए.

वो कहते हैं, "तु्र्की के साथ संबंध अगर बहुत अच्छे नहीं हैं तो ऐसे तरह के आदान-प्रदान से तो आपसी विश्वास बढ़ेगा. और आमिर ख़ान के मुक़ाबले में पाकिस्तान के पास कोई है खड़ा करने के लिए? भारत को तो उनका इस्तेमाल करन चाहिए."

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