बिहार: एक दिन में दो-दो बार मां बनने का जानिए पूरा मामला

  • सीटू तिवारी
  • पटना से बीबीसी हिंदी के लिए
सोनी देवी

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सोनी देवी

"बच्चा ना होने का ऑपरेशन दस बारह साल पहले ही करवा लिया था. लेकिन हमारे अकांउट में चौदह सौ रूपए पिछले साल चार बार आया है. बाढ़ वाला छह हज़ार रुपए चेक करने बैंक गए थे तो मालूम चला कि पैसा आया है. ये पैसा क्यों आया है, और किसी ने निकाला है या नहीं, इस बारे में बैंक ने कोई जानकारी नहीं दी." मुज़फ़्फ़रपुर के रजवाड़ा गांव की राधा देवी ने ये बात बीबीसी से फ़ोन पर कही.

राधा के तीन बच्चे है जिसमें सबसे छोटा बच्चा 15 साल का है. बाढ़ के पानी से घिरी राधा देवी के लिए अकांउट में आया ये पैसा नई पहेली जैसा बन गया है. उनके खाते में सितम्बर 2019 से दिसंबर 2019 तक ये पैसा आया है.

बेंगलुरू में मज़दूरी करने वाले उनके पति राजेश कुमार बताते हैं, "सबसे छोटे बेटे की पैदाइश के बाद ही इसने बंगाल में ऑपरेशन करवा लिया था. अब ये पैसा क्यों आया, कहां गया, हम लोगों को कुछ पता नहीं."

राजेश कुमार के मोबाइल फ़ोन से ही रजवाड़ा की सुरती देवी ने भी मुझसे बात की. तीन बच्चों की मां सुरती देवी ने भी बीबीसी से कहा, "उनके खाते में भी चार बार चौदह सौ रूपए आए हैं जिसे निकाल लिया गया है."

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संस्थागत प्रसव के नाम पर घोटाला

दरअसल तक़रीबन एक हफ्ते पहले बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के मुशहरी ब्लॉक के दो गांव में अजीबोग़रीब मामले सामने आए. इसमें ग़रीब महिलाओं को बहुत थोड़ी समयावधि के दौरान मां बनाया गया.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत संस्थागत प्रसव कराने पर ग्रामीण महिलाओं को प्रोत्साहन राशि के तौर पर 1400 रूपए मिलते हैं.

मुज़फ़्फ़रपुर के मुशहरी में इसी 1400 रूपए की प्रोत्साहन राशि को महिलाओं के खाते में डाला गया और फिर इसे निकाल लिया गया. जबकि संस्थागत प्रसव की इन 'ग़लत' लाभार्थियों का दावा है कि उन्हें पैसे क्रेडिट होने और निकाले जाने के संबंध में कोई जानकारी नहीं है.

66 साल की शांति देवी ऐसी ही एक महिला है. वो मुशहरी ब्लॉक के छोटी कोठिया गांव की रहने वाली हैं. उनके खाते में संस्थागत प्रसव के नाम पर कुल 7000 रूपए आए हैं. उनका सबसे छोटा बेटा 20 साल का है. वो कहती हैं, "हमको कोई जानकारी नहीं है कि हमारे खाते से पैसा निकला है. और हमारे मालिक(पति) तो दस साल से पड़े हैं. एक लड़के की मौत हो गई थी ट्रेन से गिरकर, तब से ये ऐसे ही पड़े हैं. चाहे तो पूरे समाज से पूछ लो."

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जाँच में सही पाए गए मामले

ये मामला सामने आने के बाद प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, मुशहरी के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी उपेन्द्र चौधरी ने मुशहरी के लेखा प्रबंधक अवधेश कुमार पर 20 अगस्त को प्राथमिकी दर्ज (संख्या 143/20) की है.

साथ ही इस अनियमितता को लेकर मुज़फ़्फ़रपुर डी एम के आदेश पर अपर समाहर्ता (राजस्व) राजेश कुमार के नेतृत्व में चार सदस्यीय जाँच टीम का गठन किया गया था. 21 अगस्त को हुई जाँच में मुशहरी की छोटी कोठिया गांव की तीन महिलाओं शांति देवी (उम्र 66 वर्ष), लीला देवी (उम्र 35 वर्ष), सोनी देवी (उम्र 35 वर्ष) और मुशहरी के रोहिया अपूछ की 65 वर्षीय सोनिया देवी को हुए भुगतान की जाँच की गई.

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लीला देवी

एक ही दिन में दो बार बनी मां

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जांच रिपोर्ट के मुताबिक़ 66 साल की शांति देवी के खाते में 3 जुलाई 2019 से 25 मार्च 2020 के बीच पाँच बार 1400 रूपए का भुगतान किया गया. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक़, 3 जुलाई 2019 को वो दो बार मां बनी. वहीं 28 अगस्त 2019 तक उन्हें संस्थागत प्रसव करवाने के लिए 1400 रूपए मिले तो तक़रीबन एक साल बाद 3 अगस्त 2010 को उन्हें वृद्धा पेंशन के 400 रू भी मिलने शुरू हो गए.

इसी तरह 35 साल की लीला देवी 3 जुलाई 2019 से 7 अगस्त 2020 तक यानी 13 महीने में 8 बार मां बनी. इनके खाते में कुल 11,200 रूपए का भुगतान किया गया. दिलचस्प है कि शांति देवी ही तरह ही ये भी 3 जुलाई 2019 को दो बार मां बनी.

छोटी कोठिया गांव की ही सोनी देवी 2 माह के भीतर दो बार मां बनी. वहीं 65 साल की सोनिया देवी 4 माह की अवधि में चार बार मां बनी.

इस मामले में प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी उपेन्द्र चौधरी ने जाँच टीम के सामने ये माना, "इन महिलाओं में से किसी का प्रसव केन्द्र में नहीं हुआ है. एक साथ 20-25 लाभार्थियों का भुगतान बनाते समय प्रखंड लेखपाल के द्वारा बीच में इनका नाम डाल कर भुगतान करा दिया गया है."

जिसका खाता, उसी ने निकाले पैसे: बैंक मैनेजर

इस मामले में बीबीसी ने जब एसबीआई, मुशहरी के बैंक प्रबंधक चंद्रजीत कुमार से बात की तो उन्होने कहा, "सीएसपी (ग्राहक सेवा केन्द्र) से पैसा उसी कस्टमर ने ही निकाला है जिसका खाता है. क्योंकि सीएसपी के खाते आधार से जुड़े होते हैं और अंगूठे के निशान से संचालित होते हैं इसलिए इसमें किसी अन्य माध्यम से पैसे नहीं निकाला जा सकता. बाक़ी पैसा कहां से आया, ये जांँ का विषय है."

इसके आगे सीएसपी के बारे में विस्तार से फ़ोन पर बात करने से उन्होंने इनकार कर दिया.

जाँच का दायरा बढ़ाया गया: डीएम

वही मुज़फ़्फ़रपुर के ज़िलाधिकारी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि जाँच कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंप दी है, जिसके बाद जाँच का दायरा बढ़ाया जा रहा है.

उन्होने कहा, "इस मामले में लेखपाल और सीएसपी संचालक दोनों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज की गई है. जो अभी फ़रार चल रहे हैं. बाक़ी इस मामले में प्रभारी चिकिस्ता पदाधिकारी और हैल्थ मैनेजर की लापरवाही पाई गई है और उन्हे शो कॉज़ किया गया है. उन पर विभागीय कार्रवाई की जाएगी. दूसरी बात ये कि इस प्रकार के अन्य मामले हैं भी या नहीं, ये पता करने के लिए बीते तीन साल के भुगतान की भी जाँच की जा रही है. मुज़फ्फ़रपुर के अन्य पी एच सी की वेरीफिकेशन के लिए जाँच टीम बनाई गई है जिसने दो सप्ताह का समय लिया है. यदि मल्टीपल पेमेंट या उम्रदराज महिला को किसी संदिग्ध भुगतान का मामला मिलता है तो आगे जाँच की जाएगी."

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लाभार्थी महिलाओं की भूमिका भी संदिग्ध

जाँच कमेटी की रिपोर्ट में ये साफ़-साफ़ लिखा है कि इस वित्तीय अनियमितता से संबंधित महिलाओं की भूमिका भी संदिग्ध है. वजह ये कि जिन दिन इनके खाते में प्रोत्साहन राशि डाली गई, उसके अगले दिन ही उक्त राशि निकाली गई, जो महिलाओं के अंगूठे के निशान के बिना संभव नहीं है.

एक स्थानीय रिपोर्टर के मुताबिक़, "ये बहुत बड़ा मामला है जिसमें अब तक सिर्फ़ मेरे पास कम से कम ऐसी 20 महिलाओं का अकांउट डिटेल है जिनके खाते में संस्थागत प्रसव के नाम पर 1400 रूपए डाले गए."

हो चुका है गर्भाशय घोटाला

ऐसा नहीं है कि बिहार में इस तरह की ये पहली घटना है. साल 2012 में भी गर्भाशय घोटाला सामने आया था. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंदर हुआ ये घोटाला औरतों के गर्भाशय निकालने को लेकर था. महिलाओं को गर्भाशय निकालने का ये मामला समस्तीपुर में एक स्वास्थ्य कैंप में सामने आया था जिसके बाद बिहार कई ज़िलों में ऐसे ही मामले सामने आए थे.और नीतीश सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी.

ऐसे में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में संस्थागत प्रोत्साहन राशि के नाम पर सामने आ रही इस वित्तीय अनियमितता का 'दायरा' कितना बड़ा, छोटा या सिमटा हुआ होगा, ये जानने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा.

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