मनोरंजन ब्यापारीः सड़क से साहित्य के शिखर तक पहुँचने की अनूठी मिसाल

  • प्रभाकर मणि तिवारी
  • कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
मनोरंजन ब्यापारी

इमेज स्रोत, Manoranjan Vyapari

"अभी मेरा सर्वश्रेष्ठ लेखन बाक़ी है. उसके बाद कलम को आराम दे दूँगा."- मनोरंजन ब्यापारी जब ये बात कहते हैं, तो उनकी आँखों की चमक अचानक बढ़ जाती है.

मनोरंजन का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है.

देश विभाजन के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बरीशाल ज़िले में पैदा होने के बाद शरणार्थी के तौर पर भारत आना, उसके बाद कई शरणार्थी शिविरों में रहना, होटलों में जूठे बर्तन धोना, नक्सल आंदोलन की वजह से 26 महीने जेल में रहना और फिर दो जून की रोटी के लिए रिक्शा चलाने से लेकर अब शीर्ष साहित्यकारों की सूची में शुमार मनोरंजन की जिजीविषा इस उम्र में भी कम नहीं हुई है.

इस 'जिजीविषा' शब्द की उनके जीवन में बहुत अहमियत है. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि यही उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ.

मनोरंजन का जीवन सड़क से साहित्य के शिखर तक पहुँचने की अनूठी मिसाल है.

उन्होंने दो दशक से ज़्यादा समय तक रसोइए का काम किया है. लेकिन अब जब शरीर थकने लगा, तो उन्होंने ममता बनर्जी से किसी दूसरे पद पर तबादले की अपील की थी. उनके लेखन को ध्यान में रखते हुए सरकार ने इसी सप्ताह उनको उनकी प्रिय शगल यानी पुस्तकों के बीच रहने का मौक़ा दे दिया है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्देश पर मनोरंजन का तबादला एक मूक-बधिर स्कूल के रसोइए से ज़िला पुस्तकालय में लाइब्रेरियन के पद पर कर दिया गया है.

ख़ुद गृह सचिव आलापन बनर्जी ने उनको फ़ोन पर इसकी जानकारी दी. इससे मनोरंजन होने की अहमियत का पता चलता है.

संघर्ष की मिसाल है मनोरंजन की कहानी

देश के विभाजन के क़रीब छह साल बाद वर्ष 1953 में मनोरंजन अपने परिवार के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बरीशाल (अब बांग्लादेश में) से शरणार्थी के तौर पर पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा स्थित शरणार्थी शिविर में पहुँचे थे.

कुछ दिनों बाद ही उन लोगों को दंडकारण्य जाने निर्देश दिया गया. लेकिन मनोरंजन के पिता ने वहाँ जाने से मना कर दिया. उसके बाद शुरू हुआ संघर्ष का अंतहीन सिलसिला.

मनोरंजन छोटी उम्र में ही चाय की दुकान पर काम करने लगे. उन्होंने अपनी आँखों के सामने भूख से बड़ी बहन को दम तोड़ते देखा. उसके बाद दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, गुवाहाटी, लखनऊ और बनारस जैसे शहरों में जाकर बेगारी की. लेकिन कहीं मन नहीं रमा, तो कोलकाता लौट आए.

इमेज स्रोत, Manoranjan Vyapari

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
पॉडकास्ट
दिन भर

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

ड्रामा क्वीन

समाप्त

इस बीच नक्सल आंदोलन से भी जुड़े और 26 महीने जेल में बिताने पड़े. जेल से बाहर आने के बाद वे कोलकाता के जादवपुर रेलवे स्टेशन के सामने रिक्शा चलाने लगे.

यहीं रिक्शा चलाते समय अचानक एक महिला यात्री से मुलाक़ात हुई और उनके जीवन की दिशा ही बदल गई. वह महिला थी आदिवासियों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाली जानी-मानी लेखिका महाश्वेता देवी.

मनोरंजन ने हिम्मत जुटाते हुए उस महिला यात्री से जिजीविषा शब्द का अर्थ पूछा. इससे वह महिला हैरत में रह गई. उसने शब्द का अर्थ तो बताया ही, रिक्शेवाले के अतीत के पन्ने भी पलटे.

महाश्वेता ने उस रिक्शा वाले से अपनी पत्रिका बार्तिका में अब तक के जीवन और संघर्ष की कहानी लिखने को कहा और उसे अपना पता भी बताया. वह साल था 1981.

अब देश के शीर्ष साहित्यकारों में शुमार वो रिक्शाचालक मनोरंजन बताते हैं, "महाश्वेता देवी से उस मुलाक़ात ने मेरी जीवन की दशा-दिशा ही बदल दी. अगर उनसे मुलाक़ात औऱ बात नहीं हुई होती तो तो मैं शायद अब तक रिक्शा ही चला रहा होता."

महाश्वेता देवी की पत्रिका में छपने के बाद धीरे-धीरे उनके लेख कई बांग्ला पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे और पूरा बंगाल उनको पहचानने लगा.

नक्सल आंदोलन के दौरान जेल में रहने के दौरान एक क़ैदी और जेलर ने भी पढ़ने-लिखने की प्रेरणा दी.

शब्दों से उनके परिचय का सफ़र दरअसल कोलकाता के उसी अलीपुर जेल में शुरू हुआ. उस जेल से निकलने के बाद ही उन्होंने रिक्शा चलाना शुरू किया और उसी दौरान महाश्वेता देवी से मुलाक़ात हुई.

कमाई कम होने की वजह से मनोरंजन पुरानी किताबें ख़रीद कर लाते थे और रात को दीए की टिमटिमाती रोशनी में पढ़ने और समझने का प्रयास करते थे. उसी दौरान वे एक बार जिजीविषा शब्द पर अटक गए.

इमेज स्रोत, Manoranjan Vyapari

संयोग से उसी सप्ताह जब महाश्वेता देवी उनके रिक्शे पर चढ़ीं तो उन्होंने उस शब्द का मतलब पूछ लिया था.

वह बताते हैं, "उस दौरान रिक्शा पर चढ़ने वाले कई लोगों को जब मेरी पढ़ाई की आदत के बारे में पता चला, तो कइयों ने पुरानी पुस्तकें भी मुफ़्त में दे दी थीं. इनमें गोर्की से लेकर शरतचंद्र और रबींद्रनाथ तक की पुस्तकें शामिल थीं."

लेकिन आख़िर महाश्वेता देवी जिजीविषा का अर्थ पूछने का ख्याल कैसे आया था? इस सवाल पर वह बताते हैं, "मुझे लगा कि वे कोई प्रोफ़ेसर होंगी. इसलिए हिम्मत जुटा कर पूछ लिया."

महाश्वेता ने उनसे पूछा कि कौन-कौन सी किताबें पढ़ी हैं? मनोरंजन तब तक 400 से ज़्यादा किताबें पढ़ चुके थे. उनमें से कुछ के नाम उन्होंने महाश्वेता देवी को बताए थे.

वह बताते हैं, "जब उस महिला ने अपनी पत्रिका में लिखने की बात कहते हुए अपना नाम और पता बताया तो मुझे पता चला कि वे महाश्वेता देवी हैं. मैं उन दिनों उनकी ही पुस्तक पढ़ रहा था. मैंने उनको वह पुस्तक भी दिखाई थी."

आगे चलकर वह मनोरंजन की साहित्यिक संरक्षक बन गईं. महाश्वेता देवी का मनोरंजन की जीवन पर इतना गहर असर पड़ा कि उन्होंने अपनी पुत्री का नाम भी महाश्वेता ही रखा है.

इमेज स्रोत, Manoranjan Vyapari

जब मनोरंजन को दफ़नाने की तैयारी कर ली गई

मनोरंजन बचपन की धुंधली यादों के सहारे बताते हैं, "सीमा पार से आने के बाद सरकार ने ऊँची जातियों के लोगों को तो ज़मीन देकर बसाया. लेकिन हम जैसे दलितों को शरणार्थी शिविरों में जगह दी गई."

"वहाँ खाना बेहद ख़राब था. शिविर में रोज़ाना किसी न किसी बच्चे या महिला की मौत हो जाती थी. लगता था हम मौत के बीच जी रहे हैं. शिविर के बगल में स्थित तालाब में जहाँ मृतकों का अंतिम संस्कार किया जाता था, वहाँ चिता की आग कभी ठंडी ही नहीं होती थी."

एक दिन तो संक्रमण की वजह से मनोरंजन को भी मृत मान लिया गया. उनको अगले दिन सुबह दफ़नाया जाना था. लेकिन किसी तरह उनकी साँसें दोबारा चलने लगीं.

उनके जीवन में संघर्ष दरअसल उसी दिन से शुरू हो गया था. यही संघर्ष उनके रचनाकर्म में भी झलकता है.

इमेज स्रोत, Manoranjan Vyapari

वर्ष 1981 में लेखक-साहित्यकार के तौर पर शुरू हुआ उनका सफ़र अब कई ऊँचाई हासिल कर चुका है. इस दौरान उनकी आत्मकथा समेत कई पुस्तकें तो प्रकाशित हुई हीं हैं, कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं. उनकी कई पुस्तकों का अंग्रेज़ी में अनुवाद भी हो चुका है.

मनोरंजन की पुस्तकों में दलित वर्ग के संघर्ष और नक्सल आंदोलन का विस्तार से ज़िक्र मिलता है. आजीविका की तलाश उनको कुछ दिनों तक छत्तीसगढ़ भी ले गई थी, जहाँ 1989 से 1991 में शंकर गुहा नियोगी की हत्या तक मनोरंजन उनके साथ काम करते रहे.

सीएम से किया तबादले का अनुरोध

वर्ष 1997 से दक्षिण कोलकाता के एक मूक बधिर स्कूल में छात्रों के लिए खाना पकाने वाले मनोरंजन बताते हैं, "अब शरीर साथ नहीं दे रहा था. घुटनों में दर्द रहने और ऑपरेशन होने की वजह से खड़े होकर खाना पकाना मुश्किल हो गया था. इसलिए मैंने ममता दीदी को अपने तबादले का अनुरोध करते हुए एक पत्र भेजा था."

"उन्होंने पत्र मिलते ही मुझे विद्यानगर ज़िला पुस्तकालय में भेज दिया. अब मैं अपनी पसंदीदा जगह पहुँच गया हूँ."

इमेज स्रोत, Manoranjan Vyapari

वह बताते हैं, "यह मेरे सपनों की जगह है. रोज़ाना हज़ारों पुस्तकों से घिरे रहना एक सपने के सच होने जैसा है. मैं जितनी चाहे किताबें पढ़ सकता हूँ. यहाँ काम करना मेरे लिए ड्यूटी नहीं बल्कि पूजा है."

एक वाक्य में अपने बारे में कैसे बताएँगे? इस सवाल पर मनोरंजन कहते हैं, "ए राइटर इन द एंगुइश. मैं अपने क्रोध की वजह से ही लगातार लिखता रहता हूं. कई कहानियाँ दिमाग़ से निकल गई हैं."

"लेकिन अभी मेरी सर्वश्रेष्ठ कहानी आनी बाक़ी है. जिस दिन उसे लिख लूँगा, अपनी कलम को आराम दे दूँगा. मैं भविष्य के बारे में, भविष्य के लिए और बेहतर भविष्य बनाने में मदद करने के लिए लिखता हूँ."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)