भीमा कोरेगाँव- इतिहास, वर्तमान और पुलिस की जांच

  • मयूरेश कोन्नूर
  • बीबीसी संवाददाता, मुंबई
भीमा कोरेगांव

भीमा-कोरेगांव वो जगह है जहाँ एक जनवरी 1818 को मराठा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ था.

इस युद्ध में महार समुदाय ने पेशवाओं के खिलाफ अंग्रेज़ों की ओर से लड़ाई लड़ी थी. अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने महार रेज़िमेंट की बदौलत ही पेशवा की सेना को हराया था.

म्हारों की इस विजय की याद में ही यहां 'विजय स्तंभ' की स्थापना की गई है, जहां हर साल एक जनवरी को दलित समुदाय के लोग, युद्ध में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने और अपने पूर्वजों के शौर्य को याद करने के लिए जुटते हैं.

इस स्तम्भ पर 1818 के युद्ध में मारे गए महार योद्धाओं के नाम अंकित हैं.

पुणे के भीमा कोरेगाँव में हुई हिंसा का घटनाक्रम

पुलिस ने भीमा कोरेगाँव की हिंसा के मामले में दो चार्जशीट दाखिल की, क्योंकि गिरफ़्तारियाँ दो अलग-अलग समय पर हुई थीं. पुलिस ने कहा कि उसने गिरफ़्तार लोगों से बरामद हुई हार्डडिस्क, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड और मोबाइल फोन से मिली जानकारियों के आधार पर चार्जशीट बनाई है.

किसकी क्या भूमिका थी? पुलिस की चार्ज़शीट क्या कहती है?

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सुधीर धावले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन और महेश राउत की गिरफ़्तारी के मामले में फाइल की गई चार्जशीट कहती है-

'कबीर कला मंच' के सक्रिय सदस्य सुधीर धावले से प्रतिबंधित संगठन सीपीआई माओवादी ने कई बार अपने सदस्यों रोना विल्सन और सुरेंद्र गाडलिंग के ज़रिए संपर्क किया था. सीपीआई माओवादी ने उन्हें 'कबीर कला मंच' के बैनर तले एक कार्यक्रम का आयोजन करने के लिए कहा था.

पुलिस के मुताबिक, इस कार्यक्रम का उद्देश्य भीमा कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ के मौके पर दलित संगठनों को एकजुट करके सरकार के खिलाफ़ जनता के गुस्से को भड़काना था.

पुलिस के अनुसार, रोना विल्सन और सुधीर धावले ने फरार भूमिगत कार्यकर्ताओं कॉमरेड एम उर्फ़ मिलिंद तेलतुंबड़े और प्रकाश उर्फ़ रितुपर्ण गोस्वामी के साथ मिलकर एक आपराधिक साज़िश रची.

साज़िश के तहत 'भीमा कोरेगांव शौर्यदिन प्रेरणा अभियान' के बैनर तले 1 जनवरी 2018 को सुधीर धावले और हर्षाली पोतदार ने 'कबीर कला मंच' के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर सरकार के खिलाफ़ भीड़ जुटाई.

पुलिस का कहना है कि उन्होंने 31 दिसंबर को एल्गार परिषद के तहत भड़काऊ नारे लगाए, गाने गाए और नुक्कड़ नाटक किए. पुलिस का आरोप है कि इसकी वजह से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी जिसने हिंसा का रूप ले लिया.

पुलिस का कहना है कि उसे पता चला कि धावले, गाडलिंग, विल्सन, राउत और सेन ने प्रतिबंधित संगठन सीपीआई माओवादी के निर्देश पर ही 'भीमा कोरेगाँव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान' और 'एल्गार परिषद' का आयोजन किया. पुलिस का दावा है कि उन्हें छापे के दौरान जो पत्राचार बरामद हुआ है

उसमें लिखा गया है कि देश में बीजेपी-आरएसएस की ब्राह्मवादी नीतियों की वजह से दलित नाखुश हैं और उनकी असुरक्षा की इस भावना का इस्तेमाल लोगों को संगठित करने में किया जा जाना चाहिए.

इस योजना को कार्यरूप देने के लिए प्रतिबंधित पार्टी ने सुरेंद्र गाडलिंग और शोमा सेन के ज़रिए पैसे उपलब्ध कराए. सीपीआई माओवादी की कमेटी के एक वरिष्ठ सदस्य ने जुलाई-अगस्त 2017 में धावले को पैसे उपलब्ध कराए.

पुलिस का आरोप है कि 'एल्गार परिषद' के आयोजन का मुख्य उद्देश्य सीपीआई माओवादी की योजना को पूरा करना था जिसका निर्णय ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो (ईआरबी) की बैठक में लिया गया था.

इस काम में फरार अभियुक्तों कॉमरेड मंगलू और कॉमरेड दीपू ने धावले के साथ नवंबर-दिसंबर 2017 के बीच तालमेल किया और महाराष्ट्र के कई दलित संगठनों का समर्थन हासिल किया.

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भीमा कोरेगांव में पहली जनवरी 2018 को दलित बहुत बड़ी संख्या में जुटे थे

पुलिस के मुताबिक़, उसके पास इस बात के सबूत हैं कि महेश राउत के ज़रिए धावले, गाडलिंग और सेन को पाँच लाख रुपए दिए गए. पुलिस के मुताबिक ये पैसे राउत को प्रतिबंधित पार्टी सीपीआई माओवादी ने दिए थे.

यह भी आरोप है कि महेश राउत ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के दो छात्रों को छापामार लड़ाई की ट्रेनिंग के लिए जंगल में भेजा. पुलिस का कहना है कि ये बात उस चिट्ठी से साबित होती है जो रितुपर्ण गोस्वामी ने शोमा सेन को लिखी थी.

पुलिस का दावा है कि महेश राउत सीपीआई माओवादी के सक्रिय सदस्य हैं और उनका काम नए लोगों को भर्ती करना है. राउत पर इन कामों के लिए पैसे जुटाने का भी आरोप है.

पुलिस का दावा है कि रोना विल्सन और गाडलिंग से बरामद किए गए कंप्यूटरों में सीपीआई माओवादी की इस्टर्न रिजनल ब्यूरो की मीटिंग का ब्योरा मिला है. यह बैठक दिसंबर 2015 में हुई बताई जाती है.

पुलिस के मुताबिक इस बैठक में तय किया गया था कि दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को एकजुट किया जाए. पुलिस का कहना है कि रोना विल्सन और मिलिंद तेलतुंबडे के पत्राचार में भी यह बात सामने आई है.

पुलिस को एक पर्चा मिला है जिसका शीर्षक है—वर्तमान चुनौतियां और हमारे काम. यह पर्चा सीपीआई माओवादी ने अपने सभी सदस्यों को भेजा था जो रोना विल्सन के कंप्यूटर से मिला है.

पुलिस का कहना है कि इस पर्चे के पेज नंबर 16 पर लिखा है कि गतिविधियाँ (आतंकवादी) भविष्य में जारी रहेंगी. इन्हीं सब उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पुलिस के मुताबिक 'इल्गार परिषद' का आयोजन किया गया था.

रोना विल्सन पर पुलिस ने प्रतिबंधित पार्टी के सदस्य और ईआरबी के सचिव किशनदा उर्फ़ प्रशांत बोस के साथ मिलकर प्रधानमंत्री की हत्या करने और देश के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है.

पुलिस का निष्कर्ष है कि अभियुक्तों ने सीपीआई माओवादी की बड़ी साजिश को पूरा करने की कोशिश की जिसका मकसद भारत की संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रणाली को उलटना था.

पूरक चार्जशीट

यह चार्जशीट वरवर राव, सुधा भारद्वाज, वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरूण फरेरा की गिरफ़्तारी के बाद दायर की गई.

पुलिस का आरोप है कि वरवर राव ने रोना विल्सन और फरार अभियुक्त किशनदा उर्फ़ प्रशांत बोस के साथ मिलकर हथियार और गोला-बारूद खरीदने की साज़िश रची.

पुलिस के मुताबिक वरवर राव सीपीआई माओवादी के वरिष्ठ नेता हैं, पुलिस का कहना है कि राव प्रतिबंधित संगठन के नेताओं के संपर्क में थे. इसके अलावा पुलिस के अनुसार वरवर राव नेपाल के माओवादी नेता वसंत के साथ हथियारों का सौदा कर रहे थे. राव पर पैसे जुटाने और दूसरे अभियुक्तों तक पहुंचाने का आरोप भी लगाया गया है.

पुलिस का कहना है कि वरवर राव और गाडलिंग अपने फरार भूमिगत साथियों को पुलिस और सुरक्षा बलों की आवाजाही के बारे में सूचनाएं देते थे जिसकी वजह से कई हिंसक हमले हुए और कई जानें गईं.

पुलिस के मुताबिक वरनॉन गोंजाल्विस, अरूण फ़रेरा और सुधा भारद्वाज भी सीपीआई माओवादी के सदस्य हैं. और अपने साथ युवाओं को जोड़ते रहे हैं और प्रतिबंधित संगठन की विचारधारा का प्रचार करते हैं.

गोंजाल्विस को पहले भी आर्म्स एक्ट और एक्सप्लोसिव्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया है, उनके खिलाफ़ मुंबई के काला चौकी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया था और एक मामले में वे सज़ा भी काट चुके हैं. पुलिस का कहना है कि गोंजाल्विस अब भी सक्रिय माओवादी कार्यकर्ता हैं.

पुलिस का आरोप है कि एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लायर्स (आइएपीएल) सीपीआई माओवादी का ही संगठन है. सुधा भारद्वाज और गाडलिंग इस संगठन के सदस्य हैं और सीपीआई माओवादी उन्हें आर्थिक मदद देता है.

चार्जशीट में कहा गया है कि वरवर राव रिवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (आरडीएफ़) के अध्यक्ष हैं और यह प्रतिबंधित माओवादी संगठन का फ्रंट ऑर्गेनाइज़ेशन है.

सीपीआई माओवादी के विचारों का प्रचार करने के लिए उन्होंने कई बैठकों, गोष्ठियों और रैलियों का आयोजन किया. पुलिस के मुताबिक वरवर राव, शोमा सेन, महेश राउत और फ़रार रितुपर्ण गोस्वामी हैदराबाद में आरडीएफ़ के वार्षिक सम्मेलन में शामिल हुए थे.

पुलिस के मुताबिक पर्सिक्यूटेड प्रिजनर्स सॉलिडैरिटी कमेटी (पीपीएससी) भी सीपीआई माओवादी का ही हिस्सा है. पुलिस का कहना है कि पीपीएससी को सीपीआई माओवादी ने वरवर राव के ज़रिए फंड मुहैया कराया था और पुलिस कहती है कि सुधा भारद्वाज पीपीएससी की प्रमुख सदस्य हैं.

एक जनवरी 2018 के भीमा कोरेगांव हिंसा कांड में पुलिस ने देश भर से लोगों को गिरफ़्तार किया है. इनमें कुछ लोग स्कॉलर हैं, कुछ वकील, कुछ लेखक-कवि और कुछ मानवाधिकार या दलित अधिकार कार्यकर्ता हैं.

ये सभी अपने-अपने क्षेत्र के नामी-गिरामी लोग हैं. इनमें कुछ लोग आम पीड़ित नागरिकों की ओर से सरकार के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते हैं. इस मामले में अभियुक्त बनाए गए लोगों के बारे में जानिए.

NIA की पूरक चार्ज़शीट

भीमाकोरे गांव मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने दूसरी सप्लिमेंट्री चार्टशीट झारखंड से गिरफ्तार किए गए सोशल एक्टिविस्ट फ़ादर स्टेन स्वामी, प्रोफ़ेसर आनंद तेलतुंबड़े, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हनी बाबू, गौतम नवलखा और क्लचरल ग्रुप कबीर कला मंच के तीन सदस्य ज्योति जगतप, सागर गोरखे और रमेश गायचोर सहित आठ लोगों के ख़िलाफ़ दायर की है. ये सप्लीमेंट्री चार्जशीट 10 हज़ार पन्नों की है.

एनआईए ने अपने बयान में कहा है कि- जाँच के दौरान ये पाया गया कि आनंद तेलतुंबड़े, गौतम नवलखा, हनी बाबू, सागर गोरखे, रमेश गायचोर, ज्योति जगतप और स्टेन स्वामी ने अन्य अभियुक्तों के साथ मिलकर प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) की विचारधारा का प्रचार प्रसार करने की साजिश रची, हिंसा भड़काई, लोगों में सरकार के ख़िलाफ़ नफ़रत और असंतोष पैदा किया.

धार्मिक और जातिय समूहों के बीच वैमन्यस्य पैदा किया. फ़रार अभियुक्त मिलिंद तेलतुंबड़े ने अभियुक्तों को हथियारों की ट्रेनिंग देने के लिए ट्रेनिंग कैंप का आयोजन किया.

चार्ज़शीट कहती है- ''आनंद तेलतुंबड़े जो गोवा में रहते हैं वो भीमां कोरगांव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान के मौके पर 31 दिसंबर , 2017 को पुणे के शनिवार वाड़ा में मौजूद थे. जहां एल्गार परिषद के कार्यक्रम का आयोजन किया गया. उन्होंने अन्य माओवादी कैडर्स के साथ मिलकर फंड पाने से लेकर गतिविधियों को अंजाम देने में अहम भूमिका निभाई.''

''जांच में गौतम नवलखा के भी सीपीआई माओवादी के संपर्क में होने की भूमिका सामने आई है. उन्हें वुद्धिजीवियों को सरकार के ख़िलाफ़ जुटाने का काम सौंपा गया था.''

''वह किसी फ़ैक्ट फ़ाइडिंग कमिटी का हिस्सा था और उन्हें सीपीआई (माओवादी) की ओर से गोरिल्ला युद्ध के लिए भर्ती करने का काम सौंपा गया था. नवलखा के तार इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस यानी आईएसआई के साथ भी जुड़े हुए पाए गए हैं.''

''हनी बाबू, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर विदेशी पत्रकारों के दौरे सीपीआई (माओवादी) के इलाके में कराने का काम करते थे. उन्हें रिवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ़ंड ( आंध्र प्रदेश की प्रतिबंधित संस्था) का वर्तमान औय के कुछ कार्य सौंपे गए थे. यह सीपीआई (माओवादी) के इशारे पर दोषी और सज़ा काट रहे जी.एन साईंबाबा को छुड़ाने के प्रयास कर रहे थे.''

''स्टैन स्वामी सीपीआई (माओवादी) के कैडर हैं और इसकी गतिविधियों में शामिल थे. वह पीपीएससी के संयोजक है तो सीपीआई (माओवादी) की फ्रंटल आर्गनाइजेशन है.''

सुधीर धावले

सुधीर धावले महाराष्ट्र के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और कवि हैं. वे मराठी में 'विद्रोही' नाम की एक पत्रिका भी प्रकाशित करते हैं. वे दलितों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं. 2011 में उन्हें राजद्रोह के अभियोग के तहत गिरफ़्तार किया गया था, और उन पर एक आतंकवादी संगठन का सदस्य होने का आरोप लगाया गया था. बाद में अदालत ने उन्हें दोषमुक्त करार दिया. उस समय उनके वकील सुरेंद्र गाडलिंग थे, जो अब उन्हीं के साथ भीमा कोरेगांव केस में अभियुक्त हैं.

सुरेंद्र गाडलिंग

सुरेंद्र गाडलिंग नागपुर में रहते हैं, पेशे से वकील हैं और मानवाधिकार से जुड़े मुकदमे लड़ते हैं. वे 'इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपुल्स लायर्स' के महासचिव भी हैं. वे दलित कार्यकर्ता भी हैं और कई अभियानों में शामिल रहे हैं.

एक वकील के तौर पर उन्होंने यूएपीए और उससे पहले पुराने आतंकवाद निरोधक कानूनों टाडा और पोटा के अभियुक्तों के मुकदमे लड़े हैं. धावले दिल्ली विश्ववि्यालय के प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा के भी वकील रहे हैं जिन्हें माओवादियों से संबंध रखने के लिए गिरफ़्तार किया गया था.

साईंबाबा को गडचिरौली की अदालत ने दोषी ठहराया है. व्हीलचेयर के सहारे चलने वाले विकलांग प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा अब भी जेल में हैं.

रोना विल्सन

जेएनयू के छात्र रहे विल्सन दिल्ली में रहते हैं. वे राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए अभियान चलाते रहे हैं. वे पिछले कई वर्षों से इस क्षेत्र के सबसे सक्रिय कार्यकर्ताओं में से एक हैं.

वे 'कमेटी फ़ॉर रिलीज़ ऑफ़ पोलिटिकल प्रिज़नर्स' (सीआरपीपी) के भी सदस्य हैं. वे जीएन साईंबाबा के बचाव और रिहाई के अभियान का भी संचालन करते रहे हैं. वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी का विरोध करते रहे हैं.

शोमा सेन

शोमा सेन अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं, वे नागपुर की आरटीएम यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी डिपार्टमेंट की हेड हैं. भीमा कोरेगांव की हिंसा में शामिल होने के आरोप में उन्हें नागपुर से गिरफ़्तार किया गया है.

वे महिलाओं, आदिवासियों और दलितों के अधिकारों के मुद्दों पर लिखती रही हैं, उनके लेख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं. वे 'कमेटी फ़ॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स' की सदस्य हैं.

वे मानवाधिकार के क्षेत्र में काम कर रही कई संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने अत्याचार की शिकार महिला राजनीतिक बंदियों का मामला उठाया है और उन्हें कानूनी सहायता दी है.

महेश राउत

महेश राउत भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ़्तार किए गए सबसे कम उम्र के व्यक्ति हैं. वे मूलत महाराष्ट्र के गडचिरौली ज़िले के रहने वाले हैं. उन्होंने अपनी पढ़ाई मुंबई के प्रतिष्ठित संस्थान—टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेस से की है.

वे ग्रामीण विकास के जानकार हैं और प्राइम मिनिस्टर रूरल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत फेलोशिप भी पा चुके हैं. वे गडचिरौली के ग्रामीण इलाकों में कई ग्राम सभाओं के साथ मिलकर काम कर रहे थे.

गढ़चिरौली महाराष्ट्र का एक आदिवासी बहुल इलाका है जो माओवादी हिंसा से प्रभावित रहा है. वे जल, जंगल और जमीन के अधिकारों से जुड़े अभियानों में भी सक्रिय रहे हैं.

वरवर राव

राव जाने-माने कवि, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वे आंध्र प्रदेश में और तेलंगाना में तेलुगु कवि के रूप में जाने जाते हैं. उनके तकरीबन 15 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनका कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है.

उनके लेखन और कविताओं की वजह से कुछ लोग उन्हें माओवादियों से सहानुभूति रखने वाला भी बताते हैं. उन्हें वामपंथी कार्यकर्ता माना जाता है जिनका देश भर में कई संस्थाओं और अभियानों से निकट संबंध रहा है.

पहले भी उन्हें कई बार गिरफ़्तार किया गया है. उन्हें पहली बार 1973 में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन उन्हें कभी किसी अभियोग में दोषी नहीं पाया गया है. वे आंध्र प्रदेश सरकार और नक्सलियों के बीच हुई बातचीत में भी मध्यस्थ के तौर पर शामिल रहे थे.

वरवर राव बीते दो साल से सलाखों के पीछे हैं. फिलहाल ख़राब स्वास्थ्य के चलते उनका मुंबई के नानावती अस्पताल में इलाज चल रहा है. 21 दिसंबर 2020 को मुंबई हाई कोर्ट ने उनकी ज़मानत याचिका पर सुनवाई की. उनकी पत्नी हेमलता राव ने मेडिकल ग्राउंड पर उनकी ज़मानत मांगी थी.

नंवबर में अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही वरवर राव को अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. वो लीवर से संबंधित बीमारी से पीड़ित हैं. उनकी पत्नी के मुताबिक़, उन्हें जेल में जो इलाज मिल रहा था वो काफ़ी नहीं था.

उनकी हालत जब बिगड़ने लगी तो कोर्ट में एक ज़मानत याचिका डाली गई कि उन्हें इलाज के लिए रिहा किया जाए. उनकी ज़मानत याचिका पर अगली सुनवाई 7 जनवरी 2021 को होगी.

इस बीच एएनआई ने हाई कोर्ट से कहा कि वरवर राव ठीक हैं और उन्हें जेल वापस भेज देना चाहिए.

वरनॉन गोंज़ाल्विस

मुंबई में रहने वाले गोंज़ाल्विस महानगर के कई कॉलेजों में पढ़ा चुके हैं. वे पिछले कई सालों से प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखते रहे हैं. उन्हें 2007 में महाराष्ट्र की एंटी टेरर स्क्वाड ने गिरफ़्तार किया था.

उन पर नक्सलियों से संबंध रखने और विस्फोटक रखने का आरोप लगा था. उन्हें अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट यानी यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था.

मुंबई की एक अदालत ने उन्हें यूएपीए और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी पाया था. छह साल कारावास में गुज़ारने के बाद उन्हें ज़्यादातर अभियोगों में दोषमुक्त करार दिया गया.

अरूण फरेरा

फरेरा मुंबई में रहने वाले मानवाधिकार मामलों के वकील हैं. वे मानवाधिकारों से जुड़े कई अभियानों में शामिल रहे हैं. वे कमेटी फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स यानी सीपीडीआर के सदस्य रहे हैं.

वे इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपुल्स लॉयर्स से भी जुड़े रहे हैं. उन्होंने मुंबई में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों को पुनर्वास के लिए भी आंदोलन चलाया था.

2007 में उन्हें पुलिस ने यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था, उन पर माओवादी होने का आरोप लगाया गया था. 2014 में उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया था. बाद में उन्होंने जेल में बिताए अपने दिनों पर एक किताब लिखी थी और कारावास में रहकर कानून की पढ़ाई भी कर रहे थे.

सुधा भारद्वाज

सुधा भारद्वाज जानी-मानी मानवाधिकार कार्यकर्ता, मज़दूरों की नेता और वकील हैं. कई साल तक विदेश में रहकर उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद सुधा भारद्वाज पिछले तीन दशकों से आदिवासी बहुल इलाकों में सामाजिक कार्य करती रही हैं.

वे सरकार के खिलाफ़ मज़दूरों और आदिवासियों के मुकदमे वकील के तौर पर लड़ती रही हैं, यही वजह है कि उन्हें सरकार विरोधी और माओवादियों से सहानुभूति रखने वाली कार्यकर्ता कहा जाता है.

वे जानी-मानी नागरिक अधिकार संस्था पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ की सचिव भी हैं. छत्तीसगढ़ में मजदूरों और आदिवासियों के बीच वर्षों से काम करने वाली भारद्वाज ने अपनी अमरीकी नागरिकता छोड़कर सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हुईं थीं.

पुणे पुलिस ने लेखक-पत्रकार गौतम नवलखा और सामाजिक मामलों के अध्येता आनंद तेलतुंबडे का नाम 22 अगस्त 2018 को दूसरे अभियुक्तों के साथ एफ़आईआर में जोड़ा. इसके बाद लंबी कानूनी लड़ाई चली क्योंकि उन्होंने इसे अदालत में चुनौती दी.

पुणे पुलिस और बाद में एनआईए ने उनकी अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी को चुनौती दी लेकिन उन्हें हिरासत में नहीं ले सकी. सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों व्यक्तियों की गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी.

जब 8 अप्रैल 2019 को अदालत ने नवलखा और तेलतुंबडे की ज़मानत की अर्ज़ी ठुकरा दी तो उन्होंने एनआईए के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. नवलखा और तेलतुंबडे ने एनआईए के सामने 14 अप्रैल 2020 को आत्मसमर्पण कर दिया.

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भीमा कोरेगांव की घटना के बाद देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए थे

पुलिस ने दोनों पर आरोप लगाया कि वे प्रतिंबधित संगठन सीपीआई माओवादी की एक बड़ी साज़िश का हिस्सा थे. उन्हें ज़मानत न देने के लिए यही दलील अदालत में रखी गई थी.

पुलिस के मुताबिक गौतम नवलखा प्रतिबंधित संगठन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं. पुलिस का कहना है कि वे लोगों को शामिल करने, उन्हें पैसे देने, योजना बनाने में सक्रिय रहे हैंऔर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं.

पुलिस का दावा है कि नवलखा के पास से बरामद सामग्री यह दिखाती है कि उन्होंने कार्यकर्ताओं को भूमिगत होकर देश के विरूद्ध काम करने के लिए उकसाया.

पुलिस ने आनंद तेलतुंबडे पर प्रतिबंधित संगठन का प्रचार करने का आरोप लगाया है. पुलिस का कहना है कि तेलतुंबडे दुनिया भर में सभा-सेमिनारों में हिस्सा लेने जाते थे और वहाँ प्रतिबंधित संगठन के विचारों को फैलाते थे.

दूसरे अभियुक्तों के पास से ऐसी कई चीज़ें मिली हैं जिनमें 'कॉमरेड आनंद' का ज़िक्र है. पुलिस का कहना है कि आनंद तेलतुंबडे की भूमिका बहुत स्पष्ट है, वे 'स्टडी सर्किल' के ज़रिए नफ़रत की भावना का प्रचार कर रहे थे. उन पर प्रतिबंधित संगठन से फंडिंग लेने का भी आरोप है.

गौतम नवलखा

पुलिस ने आनंद तेलतुंबडे को 1 फ़रवरी 2019 को गिरफ़्तार किया था क्योंकि पुणे सेशन कोर्ट ने उनकी ज़मानत की अर्ज़ी ठुकरा दी थी. लेकिन अगले ही दिन उन्हें छोड़ना पड़ा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ़्तारी पर रोक लगा रखी थी.

गौतम नवलखा एक जाने-माने एक्टिविस्ट हैं. वे लेखक भी हैं. दिल्ली में रहने वाले गौतम नवलखा ने वामपंथी और चरमपंथी आंदोलनों पर काफ़ी कुछ लिखा है.

वे सरकार के अनुरोध पर अपहृत पुलिसवालों को माओवादियों से छुड़ाने के लिए हो रही बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका भी निभा चुके हैं. वे नागरिक अधिकार कार्यकर्ता के तौर पर कई आंदोलनों से जुड़े रहे हैं.

गौतम नवलखा ने मुंबई हार्ई कोर्ट में ज़मानत की अपील की थी और कोर्ट ने उनकी ज़मानत याचिका पर फ़ैसला सुरक्षित रख लिया.

आनंद तेलतुंबडे

आनंद तेलतुंबडे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बुद्धिजीवी, अध्येता और लेखक हैं. उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. वे इंजीनियर हैं और आइआइएम अहमदाबाद से भी पढ़ाई कर चुके हैं. वे भारत पेट्रोलियम के कार्यकारी निदेशक भी रह चुके हैं लेकिन उन्होंने इसके बाद अध्ययन-अध्यापन का रास्ता चुना.

वे आइआइटी खड़गपुर में प्रोफ़ेसर रहे. इस समय वे गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में सीनियर प्रोफ़ेसर हैं. वे कई पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर लिखते रहे हैं. वे कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स (सीपीडीआर) के सदस्य के तौर पर कई अभियानों में शामिल रहे हैं.

हनी बाबू एमटी

भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ़्तार किए गए 12वें व्यक्ति हनी बाबू हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं, वे लिंग्विस्ट्क्स यानी भाषा विज्ञान में विशेषज्ञता रखते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के मुताबिक वे भाषा की राजनीति और समाज विज्ञान में भी गहन दिलचस्पी रखते हैं.

उन्हें 28 जुलाई को दिल्ली में गिरफ़्तार किया गया. उन पर प्रतिबंधित संगठन सीपीाआई माओवादी से संबंध रखने के आरोप हैं. भीमा कोरेगांव हिंसा में प्रतिबंधित संगठन की भूमिका की जांच कर रही एजेंसी एनआईए का दावा है कि हनी बाबू 'एल्गार परिषद' का आयोजन करने वालों के साथ संपर्क में थे और उसके पास इस बात को साबित करने के लिए सबूत हैं.

माओवादियों से संपर्क रखने के मामले में सज़ा काट रहे प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा की रिहाई के चलाए जा रहे अभियान से हनी बाबू जुड़े हुए थे, हनी बाबू की पत्नी भी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं.

हनी बाबू को जानने वाले कई साथी प्रोफ़ेसरों का कहना है कि वे एक लोकप्रिय प्रोफ़ेसर थे और उनके लेक्चर सुनने के लिए छात्र बड़ी तादाद में आते थे. हनी बाबू जातिवाद और दलितों के मुद्दों पर लगातार मुखर रहे हैं.

स्टेन स्वामी

एएनआई ने स्टेन स्वामी को अक्टूबर के पहले हफ़्ते में गिरफ़्तार किया था. उनपर नक्सलियों के साथ संबंध होने के आरोप लगाए गए. न्यायिक हिरासत के दौरान पांच जुलाई 2021 को मुंबई के अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें दिल का दौरा पड़ा था.

वो सबसे उम्रदराज़ अभियुक्त थे जिनपर आतंकवाद से जुड़ी धाराएं लगाई गई थीं.

हालांकि, उन्होंने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों का खंडन किया था. हिरासत में रहने के दौरान स्टेन स्वामी को स्ट्रॉ देने से इनकार कर दिया गया था, इसपर जेल प्रशासन की कड़ी निंदा हुई थी.

84 साल की उम्र में आखिरी सांस लेने वाले फादर स्टेन स्वामी पर्किन्सन्स नाम की बीमारी से ग्रसित थे. उनके वकील ने अदालत से कहा था कि वो हाथ में कप नहीं पकड़ सकते, क्योंकि उनके हाथ कांपते रहते हैं. घटना के बाद एक सोशल मीडिया अभियान चलाया गया और लोगों ने तलोजा जेल में कई स्ट्रॉ भेजीं. स्वामी के वकली फिर कोर्ट गए. जेल प्रशासन उन्हें स्ट्रॉ देने को तैयार हो गया.

सरकार बदलने के साथ बदली जाँच एजेंसी

पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज होने के बाद अगले कुछ महीनों में पुणे पुलिस ने 23 में से 9 अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया. पुणे पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट भी दायर कर दी, उसके बाद 21 फ़रवरी 2019 को एक पूरक चार्जशीट भी फ़ाइल की गई.

8 जनवरी, 2018 को इस मामले में एफ़आईआर दर्ज की गई. 17 मई, 2018 को पुणे पुलिस ने इसमें यूएपीए का सेक्शन 13,16,18,18B, 20, 38, 39 और 40 लगाया.

एनआईए ने भी 24 जनवरी, 2020 को इस मामले में एफ़आईआर दर्ज की है जिसमें आईपीसी की धारा- 153A, 505(1)(B), 117 और 34 लगाई गई है. इसके साथ ही यूएपीए का 13,16,18,18B, 20, 39 सेक्शन भी जोड़ा गया है.

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भीमा कोरेगांव में बड़े पैमाने पर हिंसा और तोडफोड़ की घटनाएँ हुई थीं

इस दौरान महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना की साझा सरकार थी. अक्तूबर 2019 में नाटकीय घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी राज्य की सत्ता से बाहर हो गई. शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार सत्ता में आई.

22 दिसंबर 2019 को नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पुणे पुलिस की 'एल्गार परिषद' मामले की जाँच संदेहास्पद है. उन्होंने कहा, "कार्यकर्ताओं को राजद्रोह के आरोप में जेल में डालना गलत है.

लोकतंत्र में हर तरह के विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता है. पुणे पुलिस की कार्रवाई गलत और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित है. कुछ अफ़सरों ने अधिकारों का दुरुपयोग किया है." इस बयान के बाद विवाद छिड़ गया, पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराया.

इसके कुछ ही दिनों के बाद जनवरी 2020 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मामला पुणे पुलिस से लेकर नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी (एनाईए) को सौंपने का निर्देश दिया. शरद पवार की पार्टी एनसीपी से जुड़े महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने इस फ़ैसले का विरोध करते हुए इसे 'असंवैधानिक' बताया था.

केस हाथ में लेने के बाद एनआईए ने मुंबई में एक अलग एफ़आईआर दर्ज की जिसमें 11 अभियुक्तों और कुछ अन्य लोगों के नाम दर्ज किए. एनआईए ने इस मामले में भारतीय कानून की अन्य धाराओं के अलावा यूएपीए भी लगा दिया. हालांकि इस मामले में एनआईए ने 124 (ए) यानी राजद्रोह की धाराएं नहीं लगाई हैं.

भीमा कोरेगांव न्यायिक जाँच आयोग

1 जनवरी को भीमा कोरेगांव और आसपास के इलाकों में भड़की हिंसा के बाद देश भर में उसे लेकर विरोध प्रदर्शन हुए. मामले के गर्माने के बाद इस बात की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन किया गया कि हिंसा की शुरूआत कैसे हुई.

कई 'फैक्ट फाइंडिंग' कमेटियों ने अलग-अलग लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया. इसी बीच पुणे ग्रामीण पुलिस और पुणे सिटी पुलिस ने दो अलग-अलग दिशाओं में जाँच की.

महाराष्ट्र की तत्कालीन देवेंद्र फडणवीस सरकार ने 9 फरवरी 2018 को हिंसा की जाँच के लिए दो सदस्यों वाले न्यायिक आयोग का गठन किया. इस समिति के अध्यक्ष कोलकाता हाइकोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश जेएन पटेल थे.

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भीमाकोरे गांव स्मारक

इस आयोग को अपनी रिपोर्ट चार महीने में सौंपनी थी, लेकिन कई बार आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया है और फ़ाइनल रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है. चौथी बार इसका कार्यकाल बढ़ाकर 4 अप्रैल 2020 तक किया गया था लेकिन उसके कोरोना की वजह से लॉकडाउन शुरू हो गया.

अब तक कई गवाहों ने आयोग को अपना बयान दिया है. आयोग ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख शरद पवार को भी गवाह के तौर पर बुलाया था. इसके पहले पवार आयोग के सामने एक हलफ़नामा दायर कर चुके हैं. इसके अलावा करीब 500 हलफ़नामे आयोग को मिले हैं जिन्हें अलग-अलग लोगों, सरकारी अधिकारियों और संगठनों ने दायर किया है.

हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता

एक ओर जहाँ पुणे सिटी पुलिस ने इन आरोपों की जाँच की है कि भीमा कोरेगाँव की हिंसा में वामपंथी कार्यकर्ताओं का हाथ था, वहीं पुणे ग्रामीण पुलिस ने इन शिकायतों की पड़ताल की है कि 1 जनवरी 2018 को हुई हिंसा के पीछे कई हिंदुत्ववादी नेताओं की भूमिका थी.

दो जनवरी को पिंपरी पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज हुई कि हिंदुत्ववादी नेताओं ने भीमा कोरेगांव और आसपास के इलाकों में भीड़ को हिंसा के लिए भड़काया था. शिकायत करने वाली अनिता साल्वे ने आरोप लगाया था कि मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े नाम के हिंदुत्वादी नेताओं ने उस भीड़ का नेतृत्व किया जिसने 1 जनवरी को दलित संगठनों के आयोजन में हिंसा की.

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मिलिंद एकबोटे

एफ़आईआर दर्ज कराने वाली महिला का कहना है कि वे घटनास्थल पर मौजूद थीं और उन्होंने अपनी आँखों से दोनों अभियुक्तों को देखा था.

शिकायत दर्ज कराने वाली महिला का कहना है कि वे 'शौर्य दिन' के आयोजन में हिस्सा लेने अपनी मित्र अंजना के साथ वहाँ गई थीं. जब उनकी दोस्त शिकरापुर टोल प्लाज़ा पार करके सनासवाड़ी पहुँची तो वहाँ मौजूद भीड़ ने पथराव करना और आग लगाना शुरू कर दिया.

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संभाजी भिड़े

एफ़आईआर में दर्ज है कि भीड़ में कई लोगों के पास हथियार थे और वे उनसे लोगों को पीट रहे थे. एफ़आईआर में संभाजी भिड़े को शिवजागर प्रतिष्ठान का प्रमुख और मिलिंद एकबोटे को हिंदू जनजागरण समिति का प्रमुख बताया गया है जिनके साथ 'ऊंची जाति' के लोग शामिल थे.

सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने जब मिलिंद एकबोटे की अग्रिम ज़मानत की अर्जी खारिज कर दी तो उन्हें पुणे पुलिस ने 14 मार्च 2018 को गिरफ़्तार कर लिया, उनके खिलाफ़ दंगा करने और उत्पीड़न करने सहित कई गंभीर अभियोग लगाए गए.

पुणे कोर्ट ने 4 अप्रैल 2018 को अनिता साल्वे की शिकायत पर दर्ज हुए मामले में उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया लेकिन शिकरापुर पुलिस की एक शिकायत पर उन्हें दोबारा हिरासत में ले लिया गया. शिकरापुर पुलिस का कहना था कि हिंसा से ठीक पहले एकबोटे और उनके समर्थकों ने कुछ पर्चे बाँटे थे.

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भीमा कोरेगांव की हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी

19 अप्रैल को पुणे सेशन कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी. दूसरे अभियुक्त संभाजी भिड़े को कभी गिरफ़्तार नहीं किया गया जबकि उनके ऊपर 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में रहकर लोगों को उकसाने का आरोप लगा था.

कई संगठनों ने उनके खिलाफ़ कार्रवाई की माँग की और अदालत का भी दरवाज़ा खटखटाया. इस मामले में पुलिस ने अब तक चार्जशीट फ़ाइल नहीं की है. ऊपर जिन दो एफ़आईआर का ज़िक्र है, उनके अलावा भीमा कोरेगांव की हिंसा को लेकर पुणे ग्रामीण पुलिस के अधिकार क्षेत्र में कुल 30 मामले दर्ज हुए हैं.

कौन हैं एकबोटे और भिड़े?

पुणे के हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता मिलिंद एकबोटे अपनी विचारधारा की वजह से कई विवादों में घिरे रहे हैं. वे समस्त हिंदू अगाड़ी नाम का एक संगठन चलाते हैं, वे लंबे समय से गौरक्षा अभियान चलाते रहे हैं.

उन्होंने प्रतापगढ़ के किले में मौजूद आदिलशाही सेनापति अफ़ज़ल खान की कब्र को हटाने के लिए उग्र आंदोलन चलाया था जिसके बाद से उनके सतारा ज़िले में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

वे वेलेंटाइंस डे मनाने के विरोध में भी प्रदर्शनों का आयोजन करते रहे हैं. वे राजनीतिक तौर पर भी सक्रिय रहे हैं और उनका जुड़ाव हिंदू महासभा, शिव सेना और भाजपा से रहा है.

वे शिव सेना के टिकट पर 2014 में विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. वे पुणे नगर निगम के पार्षद भी रहे हैं. संभाजी भिड़े को उनके समर्थक गुरुजी के नाम से बुलाते हैं. हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता भिड़े पश्चिमी महाराष्ट्र के सांगली इलाके से आते हैं.

वे 'शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्थान' नाम का संगठन चलाते हैं. वे हिंदुत्व पर व्याख्यान देने के लिए जगह जगह जाते रहते हैं. वे अपने शुरूआती दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े थे लेकिन बाद में शिवाप्रतिष्ठान की स्थापना करने के लिए आरएसएस से अलग हो गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के दूसरे नेताओं से उनकी निकटता सार्वजनिक जानकारी में रही है.

भिड़े अपने बयानों और अपनी गतिविधियों, दोनों की वजह से विवादों में रहे हैं. साल 2008 और 2009 में उनके खिलाफ़ कई गंभीर आरोप लगे जिनमें सांगली में दंगे भड़काने का आरोप भी था, लेकिन बाद में एक आरटीआई के ज़रिए पता चला कि भीमा कोरेगांव की घटना से छह महीने पहले ही उन पर लगे सारे अभियोग हटा लिए गए.

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